मानव के सांस्कृतिक उन्नयन का इतिहास संभवतः कृषि के विकास का इतिहास है.आखेट की खोज में भटकते हुए मानव को धरती की भरण क्षमता का ज्ञान ही उसके सांस्कृतिक अभ्युदय का प्रथम सोपान है.यही कारण है कि भारतीय त्यौहार कृषि तथा ऋतुओं से संबंधित रहे हैं.
यद्यपि दुःख,शोक एवं रोदन
हमारे जीवन का स्पर्श अवश्य करते हैं फिर भी लय-ताल पर थिरकते उसके आनंद को वे
विगलित नहीं कर पाते.गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर ने फागुनी सूर्य की आभा को
प्रियालिंगन मधु-माधुर्य स्पर्श बताते हुए कहा है,”सहस्त्र मधु मादक स्पर्शी से
आलिंगित कर रही सूरज की इन रश्मियों ने फागुन के इस बसंत प्रातः को सुगन्धित
स्वर्ण में आह्लादित कर दिया है.यह देश हंसते-हंसाते मुस्कुराते चेहरों का देश
है.”
होली मुक्त स्वच्छंद
हास-परिहास का पर्व है.यह सम्पूर्ण भारत का मंगलोत्सव है.फागुन शुक्ल पूर्णिमा को
आर्य लोग जौ की बालियों की आहुति यज्ञ में देकर अग्निहोत्र का आरंभ करते
हैं,कर्मकांड में इसे ‘यवग्रयण’ यज्ञ का नाम दिया गया है.बसंत में सूर्य दक्षिणायन
से उत्तरायण में आ जाता है.इसलिए होली के पर्व को ‘गवंतराम्भ’ भी कहा गया है.
एक अत्यंत प्रसिद्द पौराणिक
गाथा हिरणकश्यप द्वारा प्रह्लाद को होलिका में जलाने से संबंधित है.रत्नावली में
हर्ष ने कौशाम्बी में रचित फाग का वर्णन इस प्रकार किया है---बसंतोत्सव के अनुरूप
वस्त्र धारण किये हुए राजा से विदूषक कहता है कि मकरदोद्धान में मदनोत्सव की शोभा
देखिए महाराज ! उन्मादोरत कामिनियाँ अपने कोमल हाथों से नागरिकों पर पिचकारी से
कैसे रंग डाल रही हैं.पुरुष ढप-ढोल बजाकर नाच रहे हैं.अबीर गुलाल से दसों दिशाएं
रंगीन हो गई हैं.
रत्नावली में
वारविलासिनियों द्वारा भी फाग खेलने का अद्भुत वर्णन है.भागवत-पुराण में
पिचकारियों की सुंदरता का वर्णन है.सींग के आकार की बनी होने के कारण उन्हें
‘श्रंगक’ कहा गया है.रघुवंश में रमणियाँ राजा कुश पर स्वर्ण की पिचकारी से रंग
खेलते हुए संदर्भित हैं.
महाकवि वाणभट्ट ने कादंबरी में राजा तारापीड़ के फाग खेलने
का अनूठा वर्णन किया है.भवभूति के मालतीमाधव नाटक में पुरवासी मदनोत्सव मनाते
हैं.यहाँ एक स्थल पर नायक माधव सुलोचनामालतीके गुलाबी कपोलों पर लगे कुमकुम के फ़ैल
जाने से बने सौंदर्य पर मुग्ध हो जाता है.राजशेखर ने अपनी काव्य-मीमांसा में
मदनोत्सव पर झूला झूलने का भी उल्लेख किया है.
मुगलकाल में भी होली की खूब
धूम रही.अकबर का रनिवास होली के अवसर पर रंग और गुलाल से भरा जाता था.रानियाँ तथा
दासियाँ बादशाह अकबर को वहां बुलवाकर रंग से सराबोर कर देती थीं.जहाँगीर के शासन
काल में होली खेलने का सविस्तार वर्णन ‘मुल्क-ए-जहाँगीर’ में हुआ है.अंतिम मुग़ल
सम्राट बहदुर शाह जफ़र ने 1857 में होली का वर्णन करते हुए देश की स्थिति भी बतायी
है......
हिन्द में कैसो
फाग,मची जोरा-जोरी
फूल तख़्त हिन्द
बना केसर की सी क्यारी
कैसे फूटे भाग
हमारे लुट गयी दुनियां सारी
गोलन तें गुलाल
बनायो,तोपन की पिचकारी
अवध,मगध,मध्य-प्रदेश,राजस्थान,मैसूर,गढ़वाल,कुमायूं,ब्रज सभी क्षेत्रों में होली की अत्यंत उल्लास
औत उमंग देखने को मिलती है.ब्रज में इसे होली नहीं ‘होरा’ कहते हैं.बरसाना
की लट्ठमार होली और दाऊजी का हुरंगा जनमानस पर अनूठी छाप छोड़ते हैं.
होली का यह पावन
पर्व भारतीय संस्कृति में अनादिकाल से परस्पर संगठन का संदेश देता हुआ जीवन में
उल्लास एवं उमंग भरता रहा है.

