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Thursday, February 6, 2014

प्रकृति से मानव तक




         






मनुष्य जब से दुनियां में आया,उसी समय से प्रकृति के अबूझ रहस्यों की थाह लेने में लगा है.बार-बार असफलता का मुंह देखने पर भी वह इस काम से कभी विरत नहीं हुआ.इतने पर भी वह स्वयं अपने बारे में और अपने आसपास के रहस्यों के बारे में बहुत कम जान पाया है.उसके सामने आए दिन कुछ न कुछ ऐसा आता रहता है,जिसे वह चमत्कार मानता है.

सवाल उठता है कि विज्ञान की कसौटी इन चमत्कारों की संतोषजनक व्याख्या कर सकने में कितनी सक्षम है.इसका उत्तर दिया है विख्यात प्राणिशास्त्री डॉ. लयाल वाटसन ने.उनका कहना है कि विज्ञान में सम्पूर्ण तथ्य कुछ नहीं है.भौतिकी के नियम कभी अकाट्य माने जाते रहे,पर आज वे भी अनिश्चय सिद्धांत के घेरे में आ गए हैं.कृति की ज्ञात शक्तियों से जो कुछ न समझा जा सके,वह सब अनिश्चय-सिद्धांत के खाते में चला जाता है.तब क्या कोई ऐसी अज्ञात शक्ति या उर्जा है, जो मनुष्य और उसके ब्रह्मांड को घेरे हुए है.

लगभग यही बात जाने-माने वैज्ञानिक डॉ. जोसेफ बैंक्स राइन ने भी कही है.वे कहते हैं कि हम ऐसा क्यों मान लें कि हमें जो शक्तियां ज्ञात हैं,उनके अलावा कोई और शक्ति है ही नहीं.ऐसा क्यों मान लें कि प्रकृति की सारी शक्तियां समय,स्थान,सामूहिक संबंध के अंतर्गत हैं और मानवीय इंद्रियों से देखी-सुनी जा सकती हैं.

वैज्ञानिकों की इस जिज्ञासा का समाधान प्राचीन हिंदू दर्शन शास्त्र में मिलता है, जो पश्चिमी दर्शन शास्त्र के मुकाबले कहीं बहुत आगे है.भारत के मनस्वी ऋषियों ने हजारों साल पहले कह दिया था कि समस्त जीवन का अस्तित्व उर्जा के लहराते सागर में है.ब्रह्मांडव्यापी विद्युत क्षेत्र के इस विचार को प्राचीन भारत में ‘प्राण’ कहा गया है.आश्चर्य की बात तो यह है कि आधुनिक भौतिकी की खोजें भी इस कथन की पुष्टि करती हैं.सोवियत रूस और चेक गणराज्य में हुए प्रयोगों से इस उर्जा के अस्तित्व का पता चला है.

आधुनिक विज्ञान ठोस पदार्थों को अब ठोस नहीं मानता.उसके अनुसार विश्व में हर चीज की रचना
कंपनों,लहरों की लम्बाई या लहराते अणुओं से हुई है.मेज हो या गुलाब का फूल अथवा किसी प्राणी का शरीर,हर चीज अणुओं के एक निश्चित जमाव के अलावा कुछ नहीं है.अपना फलता फूलता प्रकाशन व्यवसाय छोड़कर हिंदू दर्शन के अध्ययन के लिए आने वाले अमरीकी मनीषी जॉन येल का कहना है कि,कंपनों के भारतीय विज्ञान के अनुसार प्रत्येक मस्तिष्क के गुण होते हैं,जो भार,रंग या गंध के समान प्रकट होते हैं.इन्हें किसी दूसरे मस्तिष्क में निहित सूक्ष्म उपकरणों से देखा जा सकता है.भिन्न-भिन्न मस्तिष्कों की प्रकट होने और ग्रहण करने क्षमता अलग-अलग होती है जो उनकी एकाग्रता के सापेक्ष स्तर पर निर्भर करती है.इस तरह मानसिक वातावरण एक से दूसरे मस्तिष्क में स्थानांतरण हो सकता है.लेकिन जिस किसी भी वस्तु के संपर्क में आते हैं,या जो भी कार्य करते हैं,उस सब पर अपनी व्यक्तिगत छाप भी छोड़ते हैं.

भारतीय दर्शन के कंपन सिद्धांत की जानकारी एक नए इलेक्ट्रोनिक उपकरण से मिलती है,जिसका अविष्कार सोवियत रूस के डॉ. गेनादी सर्गेयेव ने किया है.इसमें उन्हीं द्रव रवों का उपयोग होता है जो इलेक्ट्रोनिक घड़ियों में लगते हैं.इस यंत्र से बेजान पदार्थों की विद्युत धड़कनें भी चुंबकीय फीते पर अंकित हो जाती हैं.अब इन धड़कनों का अनुवाद समझ में आने वाली भाषा में करने का काम रह गया है,और भविष्य में इस पर भी जानकारियां उपलब्ध हो सकेंगी.

डॉ. सर्गेयेव का सिद्धांत है, 'हर व्यक्ति अपने आसपास के वातावरण पर अपनी छाप छोड़ता है. इसलिए कि हमारे शरीर से एक प्रकार की उर्जा हमेशा निकलती रहती है.आसपास की चीजें इसे सोख लेती हैं और अपने पास जमा रखती हैं.उर्जा का विनाश कभी नहीं होता.इस तरह हमारी उर्जा की छाप हमेशा के लिए सुरक्षित रहती हैं.

जो उर्जा उपकरण से अंकित हो सकती है,उसे क्या सूक्ष्म और चेतन मस्तिष्क से नहीं देखा जा सकता? कुछ ऐसे भी व्यक्ति हैं, जो किसी वस्तु या व्यक्ति का मात्र स्पर्श करते ही उससे संबंधित हर बात और यहाँ तक कि पूरा इतिहास बता देते हैं.इनमें नीदरलैंड के पीटर हरकोस बहुत प्रसिद्द हैं.एक बार सीढ़ी से गिरने पर उनकी खोपड़ी की हड्डी टूट गई थी.इलाज से वह जुड़ तो गई,लेकिन हरकोस एकाग्र हो सकने की क्षमता खो बैठे,किंतु उन्हें एक नयी क्षमता मिल गई.एक बार हेग की पुलिस ने उनसे एक मामले में मदद ली.हरकोस ने मृतक का कोट हाथ में लेकर हत्या की समूची घटना का विस्तार से विवरण दे दिया.

समस्त जीवन के आधार-उर्जा के लहराते सागर पर अविश्वास अब इसलिए भी नहीं किया जा सकता,क्योंकि इस उर्जा को अब देखा जा सकता है,किरलियन छाया चित्रों के जरिये.सोवियत रूस के निवासी सेमेयोन किरलियन बिजली के माहिर मिस्त्री थे.उन्होंने ही अनजाने में किरलियन फोटो-पद्धति का अविष्कार किया था.

दुनियां के लगभग हर धर्म में आत्मा के अस्तित्व का उल्लेख है.तब क्या जीवन की यह आभा या चिनगारी ही आत्मा का सार तत्व है.क्या भौतिक शरीर के अलावा भी आदमी का कोई और शरीर होता है.सूक्ष्म शरीर के अस्तित्व की बात भारत,मिस्त्र,और चीन के प्राचीन ग्रंथों में मिलती है.ईसाई संतों का भी इस बात में विश्वास रहा.ऐसे योगियों की कई कहानियां हैं जो अपना सूक्ष्म शरीर प्रदर्शित कर सकते थे.

भारत के पौराणिक साहित्य में एक ही व्यक्ति के एक समय दो या अधिक स्थानों में मौजूद होने के प्रचुर वर्णन हैं,परन्तु आधुनिक समय में पश्चिमी जगत का ऐसा सबसे पहले दर्ज हुआ उदाहरण अल्फोंसस लिगुओरी का है.वह एक दिन एरिएनजो स्थित अपने आश्रम में सोया हुआ था.यह स्थान रोम से काफी दूर था.उस दिन दो घंटे की गहरी नींद से उठने के बाद उसने बताया कि वह पोप के सिरहाने था और पोप की अभी-अभी मृत्यु हो गई है.जब पोप के निधन की खबर एरिएंजो पहुंची तो लोगों ने लिगुओरी की बात को महज संयोग माना.लेकिन जल्दी ही रोम से यह सूचना भी मिली कि पोप के कमरे में लोगों ने  लिगुओरी को देखा और उससे बात भी की थी.

भौतिक शरीर से दूर होकर सूक्ष्म शरीर के यात्रा करने के तथ्य की भी प्रयोगशालाओं में कई बार जांच हुई है.1973 में अमेरिका की चर्चित जासूसी संस्था सी.आई.ए. ने भी इस संबंध में एक प्रयोग किया,जिसमें इंगोस्वान और पैट प्राइस शामिल हुए.कैलिफोर्निया के स्टेनफोर्ड शोध संस्थान में भौतिकविद फुटहोफ और रसल टार्ग द्वारा किये गए इस प्रयोग के चमत्कारी निष्कर्ष निकले.

इस संबंध में प्राप्त जानकारियों को देखते हुए आधुनिक वैज्ञानिक गंभीरता से विचार करने लगे हैं कि मस्तिष्क और मन कोई एक चीज नहीं हैं.वे मानने लगे हैं कि मानसिकता का संपूर्ण कारण अकेला स्थूल मस्तिष्क नहीं हो सकता और एक अशरीरी मन है,जो शारीरिक मस्तिष्क का उपयोग करता है.