Thursday, September 1, 2011

लुगदी साहित्य से साहित्य तक

साहित्य पढ़ने की शुरुआत लुगदी साहित्य से ही हुई,जैसा कि आमतौर पर सभी व्यक्ति करते हैं.उन दिनों जासूसी उपन्यासों की खूब लोकप्रियता थी.मेरठ से छपने वाले जासूसी उपन्यास ,जिसे साहित्यकार लुगदी साहित्य कहते हैं,बहुतायत में थे.कर्नल रंजीत,सुरेन्द्र मोहन पाठक,वेद प्रकाश शर्मा आदि के उपन्यास खूब पसंद किये जाते थे.

फिर एक दिन शिवानी के उपन्यास 'चौदह फेरे' पढ़ने का अवसर मिला.शुरू में तो उपन्यास की भाषा कुछ क्लिष्ट लगी पर एक बार पढ़ना शुरू किया तो उसमे डूब सा गया.उसके बाद उनके उपन्यासों को कई कई बार पढ़ा.उनकी संस्कृत और बंगला मिश्रित भाषा लेखनी में कई जगह दिखाई पड़ते हैं तो गाँव,समाज में प्रचलित परम्पराएँ,बोल-चाल अक्सर दिखाई देते हैं.चौदह फेरे में पहाड़ की प्रचलित भाषा में बड़े,बुजुर्गों के लिए 'ज्यू' शब्द का प्रयोग रोचक  है.

'चौदह फेरे' धारावाहिक के रूप में 'धर्मयुग' में भी छपा था.चौदह फेरे लेनेवाली कर्नल पिता की पुत्री अहल्या जन्म लेती है अल्मोड़े में, शिक्षा पाती है ऊटी के कान्वेन्ट में, और रहती है पिता की मुँहलगी मल्लिका की छाया में. और एक दिन निर्वासित, हिमालय में तपस्यारत माता के प्रबल संस्कारों से बँध सहसा ही विवाह के दो दिन पूर्व वह भाग जाती है, कुमाऊँ अंचल में.


समूचा उपन्यास विविध प्राणवान् चरित्रों, समाज, स्थान तथा परिस्थितियों के बदलते हुए जीवन मूल्यों के बीच से गुजरता है.
          
अस्सी के दशक में 'सुरंगमा' धारावाहिक के रूप में 'साप्ताहिक हिंदुस्तान' में छपा था.हम पत्रिका के आगामी अंक की उत्सुकता से प्रतीक्षा करते ताकि आगे की कहानी जान सकें.सुरंगमा में बांगला के प्रसिद्ध कवि बुद्धदेव बसु की कविता का प्रयोग दिल को छू लेने वाला है.......                                                                      

                                                          
                                                          
                                                          छोट्टो घर खानी
                                                          
मने की पड़े सुरंगमा ?
                                                         
मने की पड़े, मने की पड़े
                                                         
जानालाय नील आकाश झरे
                                                         
सारा दिन रात हावाय झड़े

                                                           सागर दोला....
                                             
                                              (उस छोटे से कमरे की याद है सुरंगमा ?
                                           
बोलो, क्या अब कभी उस कमरे की याद आती है ?
                                           
जहाँ कि खिड़की से नीलाकाश
                                           
बरसता कमरे में रेंग आता था
                                           
सारे दिन-रात तूफान
                                           
समुद्र झकझोर जाता था)

एक प्राणों से प्रिय व्यक्ति तीन-चार मधुर पंक्तियों से सुरंगमा के जीवन को झंझा के वेग से हिलाकर रख देता है. बार बार.

शराबी, उन्मादी पति से छूट भागी लक्ष्मी को जीवनदाता मिला अँधेरे भरे रेलवे स्टेशन में. रॉबर्ट और वैरोनिका के स्नेहसिक्त स्पर्श में पनपने लगी थी उसकी नवजात बेटी सुरंगमा, लेकिन तभी विधि के विधान ने दुर्भाग्य का भूकम्पी झटका दिया और उस मलबे से निकली सरल निर्दोष पाँच साल की सुरंगमा कुछ ही महीनों में संसारी पुरखिन बन गई थी फिर शिक्षिका सुरंगमा के जीवन में अंधड़ की तरह घुसता है एक राजनेता और सुरंगमा उसकी प्रतिरक्षिता बन बैठती है.

एक एकाकी युवती की आंतरिक और बाहरी संघर्षों की मार्मिक कथा है 'सुरंगमा'.
शिवानी के कई उपन्यासों और कहानियों को पढ़ा है.'कैंजा','श्मशान चंपा','कृष्ण कली','भैरवी' आदि अनेक उपन्यास सीधे दिल को छू लेते हैं.    

Monday, August 8, 2011

बजरंग बली उर्फ़ .........

कॉलेज के एक कर्मचारी वाजपेयी ने पिछले दिनों एक बड़ी मार्के की बात कह दी.कहा ,जानते हैं सर ,बजरंग बली को हमलोग 'भूमि अतिक्रमण पदाधिकारी ' कहते हैं.बात सही भी है.जिस जगह बजरंग बली की मूर्ति स्थापित कर दी,मजाल है कि कोई वहां से हिला दें. पवन पुत्र वैसे भी इतने बलशाली हैं कि साधारण मनुष्यों के वश की बात नहीं.राह चलते चौक-चौराहे ,नुक्कड़,गली सभी जगहों पर आपको बजरंग बली मिल जायेंगे.भले ही इससे रास्ता संकरा होता हो,यातायात की समस्या उत्पन्न होती हो,होती रहे.बजरंग बली तो जहाँ जम गए वहीँ के होके रह गए.भक्तों ने भी इसी भावना से प्रेरित होकर थोड़ी जगह घेर ली तो क्या बुरा किया.लोग तो आजकल सरकारी  जमीन तक को घेर कर बेच देते हैं और सरकार को पता तक नहीं चलता.सो बजरंग बली अब यदि भूमि अतिक्रमण पदाधिकारी बन गए हों तो क्या अचरज.
               व्यक्ति कभी कभी हास-परिहास में भी बड़े मार्के की बात कह जाता है.अब यदि वाजपेयी ने बजरंग बली को 'भूमि अतिक्रमण पदाधिकारी' की संज्ञा दी है तो कुछ तो बात अवश्य होगी. वैसे वाजपेयी बजरंग बली के बड़े भक्त हैं.बजरंग बली के मंदिर आपको हर जगह मिल जायेंगे.खासकर भारत के हर पुलिस थाने में आपको बजरंग बली के मंदिर जरूर मिलेंगे.पुलिस वाले तो बजरंग बली के भरोसे ही अपनी और लोगों की सुरक्षा का भार लिए रहते हैं.लोगों ने तो बात यहाँ तक उड़ाई थी कि अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा भी बजरंग बली के बड़े भक्त हैं और यह भी कि उनका पूर्व जन्म भारत में हुआ था.
             आजकल तो महिलाएं भी पवनपुत्र की बड़ी भक्त हैं.किसी भी बजरंग बली के मंदिर में चले जाइये ,वहां पर आपको पुरुषों से ज्यादा स्त्रियों की संख्या मिलेगी.वैसे स्त्रियाँ बजरंग बली से क्या आशिर्वाद मांगती होंगी यह कयास लगाना मुश्किल नहीं.अपने यहाँ वैसे भी मंदिर और मठों की संख्या बहुत है.आजकल तो मंदिर किसी  कार्पोरेट घराने से कम नहीं हैं.पटना का विशालकाय महावीर मंदिर लोगों के आकर्षण का केंद्र है.कई जगहों पर बजरंग बली के भव्य मंदिर हैं.शायद इसी भव्यता से प्रेरित होकर बजरंग बली को भूमि  अतिक्रमण पदाधिकारी कह दिया गया होगा.

Tuesday, August 2, 2011

रियल्टी शो : आधी हकीकत आधा फ़साना

आजकल विभिन्न टीवी चैनलों पर रियल्टी शो की भरमार है.इनमें कितने शो रियल्टी हैं,कितने बनावटी दर्शकों को अंदाज लगाना मुश्किल नहीं.रियल्टी शो के नाम पर दर्शकों के सामने जो कुछ भी परोसा जा रहा है,वह कितने वास्तविक हैं,यह तो चैनल वाले ही बता सकते हैं.स्टूडियो में रिकॉर्ड होना(शूट करना),फिर एडिटिंग ,तब प्रसारित होना, ये किसी भी शो के सामान्य प्रक्रिया के अंग हैं.
        अब जरा विभिन्न रियल्टी शो पर एक नजर डालें.संगीत के रियल्टी शो विभिन्न चैनलों पर आते रहे हैं.जी टीवी पर 'सा रे गा मा पा' एवं 'लिटिल चैम्प्स' तकरीबन हर साल प्रसारित होते रहते हैं.इन शो के विजयी कलाकार आज कहाँ हैं,क्या कर रहें हैं,कोई नहीं जानता.जब तक शो चलता है तब तक तो वे चर्चा के केंद्र में रहते हैं,उसके बाद गायब.
'सा रे गा मा पा' को जीतने वालों की लम्बी फेहरिस्त है.देबोजीत,अनीक धर,कमल खान आदि गायक आज क्या कर रहे हैं किसी को नहीं पता.इसी तरह 'लिटिल चैम्प्स' को जीतने वाले कलाकारों की अब कोई चर्चा नहीं होती.
इसी तरह सोनी टीवी के 'इंडियन आइडल' को जीतने वाले कलाकारों में काजी तौकीर से लेकर गत वर्ष की विजेता सौरभी देव बर्मन की अब कोई चर्चा नहीं होती.इसके पिछले वर्ष कोलकाता के पुलिस विभाग के बैंड में काम करने वाले प्रशांत तमांग विजयी रहे थे.इनका नाम तक लोगों को पता  नहीं.स्टार प्लस टी.वी चैनल के 'वोईस ऑफ़ इंडिया' के विजेता रवि शुक्ला की भी अब चर्चा नहीं होती.
   इमेजिन के 'राखी का स्वयंवर' का हश्र लोग देख चुके हैं.यही हाल अभी अभी समाप्त 'रतन का रिश्ता' का भी है.
  पब्लिसिटी के लिए कलाकार ऐसे रियल्टी शो में भाग लेते हैं.
  वास्तव में इन रियल्टी शो से किसी कलाकार का भला नहीं होता. इन रियल्टी शो से चैनल वालों और मोबाइल कम्पनियों की भारी कमाई होती है. इसी में से कुछ हिस्सा कार्यक्रम और कलाकारों पर खर्च कर ईनाम की राशि दे दी जाती है.बौलीवुड में स्थापित कलाकारों की(गायक/गायिकाओं) लम्बी फौज है.हर संगीत निर्देशक के पसंदीदा गायक व गायिकाएं हैं,वे उन्ही से गाना गवाते हैं.नए कलाकारों की गुन्जाईश कम ही बनती है.एक्का दुक्का गाना, शो जीतकर आने वाले कलाकारों को मिल जाता है.स्टेज शो में भी इनकी कुछ खास पूछ नहीं होती.
बड़े और स्थापित कलाकारों को ही स्टेज शो मिलता है.
   इसी तरह डांस के विभिन्न शो जीतकर आने वाले कलाकारों को भी आगे प्रदर्शन का कोई मौका नहीं मिलता और न ही फिल्मों में उनके लिए कोई गुन्जाईश होती है.सभी हीरो आजकल स्वयं ही अच्छे डांस करते नजर आते  हैं. सो रियल्टी शो के नाम पर दर्शकों को बेवकूफ बनाने का सिलसिला जारी है.