Monday, July 14, 2014

छठी इंद्री (सिक्स्थ सेंस) बनाम खतरे का संकेतक

सामान्य तौर पर लोग कहते पाये जाते हैं कि अचानक उनकी छठी इंद्री जाग्रत हो उठी और आसन्न खतरे का संकेत मिलते ही सावधानी के कारण बाल-बाल बच गए.लेकिन क्या हर साधारण व्यक्ति में छठी इंद्री वास्तव में जाग्रत की जा सकती है? 

इंद्री के द्वारा हमें बाहरी विषयों - रूप, रस, गंध, स्पर्श एवं शब्द - का तथा आभ्यंतर विषयों - सु:ख दु:ख आदि-का ज्ञान प्राप्त होता है. इद्रियों के अभाव में हम विषयों का ज्ञान किसी प्रकार प्राप्त नहीं कर सकते. इसलिए तर्कभाषा के अनुसार इंद्रिय वह प्रमेय है जो शरीर से संयुक्त, अतींद्रिय (इंद्रियों से ग्रहित न होनेवाला) तथा ज्ञान का करण हो (शरीरसंयुक्तं ज्ञानं करणमतींद्रियम्).

कहा जाता है कि पाँच इंद्रियाँ होती हैं- जो दृश्य, सुगंध, स्वाद, श्रवण और स्पर्श से संबंधित होती हैं. किंतु एक और छठी इंद्री भी होती है जो दिखाई नहीं देती, लेकिन उसका अस्तित्व महसूस होता है. वह मन का केंद्रबिंदु भी हो सकता है या भृकुटी के मध्य स्थित आज्ञा चक्र जहाँ सुषुम्ना नाड़ी स्थित है.

सिक्स्थ सेंस से संबंधित कई किस्से-कहानियाँ किताबों में भरे पड़े हैं. इस ज्ञान पर कई तरह की फिल्में भी बन चुकी हैं और उपन्यासकारों ने इस पर उपन्यास भी लिखे हैं. प्राचीनकाल या मध्यकाल में छठी इंद्री ज्ञान प्राप्त कई लोग हुआ करते थे, लेकिन आज कहीं भी दिखाई नहीं देते तो उसके भी कई कारण हैं.

मस्तिष्क के भीतर कपाल के नीचे एक छिद्र है, उसे ब्रह्मरंध्र कहते हैं, वहीं से सुषुम्ना रीढ़ से होती हुई मूलाधार तक गई है. सुषुम्ना नाड़ी जुड़ी है सहस्रकार से.

इड़ा नाड़ी शरीर के बायीं तरफ स्थित है तथा पिंगला नाड़ी दायीं तरफ अर्थात इड़ा नाड़ी में चंद्र स्वर और पिंगला नाड़ी में सूर्य स्वर स्थित रहता है. सुषुम्ना मध्य में स्थित है, अतः जब हमारे दोनों स्वर चलते हैं तो माना जाता है कि सुषम्ना नाड़ी सक्रिय है. इस सक्रियता से ही सिक्स्थ सेंस जाग्रत होता है।

छठी इंद्री के जाग्रत होने से व्यक्ति के भविष्य में झाँकने की क्षमता का विकास होता है. अतीत में जाकर घटना की सच्चाई का पता लगाया जा सकता है. मीलों दूर बैठे व्यक्ति की बातें सुन सकते हैं. किसके मन में क्या विचार चल रहा है इसका शब्दश: पता लग जाता है. एक ही जगह बैठे हुए दुनिया की किसी भी जगह की जानकारी पल में ही हासिल की जा सकती है. छठी इंद्री प्राप्त व्यक्ति से कुछ भी छिपा नहीं रह सकता और इसकी क्षमताओं के विकास की संभावनाएँ अनंत हैं.

वैज्ञानिक कहते हैं कि दिमाग का सिर्फ 15 से 20 प्रतिशत हिस्सा ही काम करता है। हम ऐसे पोषक तत्व ग्रहण नहीं करते जो मस्तिष्क को लाभ पहुँचा सकें. समस्त वायुकोषों,फेफड़ों और हृदय के करोड़ों वायुकोषों तक श्वास द्वारा हवा नहीं पहुँच पाने के कारण वे निढाल से ही पड़े रहते हैं. उनका कोई उपयोग नहीं हो पाता.

चेकोस्लोवाकिया के परामनोवैज्ञानिक डॉ. मिलान रायजल ने सामान्य व्यक्तियों में अतींद्रिय एवं पराशक्ति जागृत करने के बहुत से सफल प्रयोग किये हैं.इन प्रशिक्षण एवं प्रयोगों में ये शक्तियां सामान्यतः वह सम्मोहन क्रिया द्वारा जागृत करते हैं.

एक दिन प्राग स्थित अपनी प्रयोगशाला में उन्होंने इन प्रयोगों में सहायिका एवं प्रशिक्षण प्राप्त कर रही जोसेफ्का से कहा कि हम यह प्रयास करेंगे कि भविष्य की किसी दुर्घटना को पहले से जानकर उसे बदल सकते हैं.यानि क्या भविष्य की नियति में हम दखल भी दे सकते हैं.यदि आपको यह पता चल जाय कि आपका कोई परिचित भयंकर दुर्घटना का शिकार होने वाला है, तो क्या फिर भी वह दुर्घटना जरूर ही होकर रहेगी या उस व्यक्ति को आपके द्वारा दी गई पूर्व चेतावनी से वह टल भी सकती है? यदि भविष्य को बदला जा सकता है तो कितना,पूरी तरह से या आंशिक रूप में.

रायजल ने जोसेफ्का से अपनी किसी मित्र की ऐसी किसी घटना का भविष्य-दर्शन करने को कहा,जिससे उसे बचना चाहिए.फिर उस मित्र को होने वाली घटना का पूर्व संकेत देकर,परिणाम की प्रतीक्षा करने को कहा.

जिस लड़की के भविष्य की दुर्घटना के पूर्व दर्शन का चयन किया गया वह प्राग से पचास मील दूर रहती थी.तंद्रा की अवस्था में जोसेफ्का रायजल के आदेशों का पालन करती रही.उसने होने वाली घटना के बारे में बताया कि उसकी मित्र कार से शहर से बाहर जा रही है और हाइवे पर एक लॉरी से उसकी कार की जबरदस्त टक्कर हो जाती है और वह गंभीर अवस्था में घायल पड़ी है.

जोसेफ्का को जागृत कर सामान्य अवस्था में लाया गया,जो दर्दनाक दृश्य उसने देखा था,उसके प्रभाव से वह कांप रही थी.उसने सोचा कि वह दिन निकलते ही अपनी सहेली को इसके बारे में संकेत कर देगी. अगली सुबह उसने अपनी सहेली को फोन कर इस बारे में बताना शुरू ही किया था कि उसकी माँ ने कहा-अब क्या फायदा? बहुत देर हो चुकी है और वह अस्पताल में गंभीर अवस्था में पड़ी है.

आश्चर्य की बात यह थी कि जोसेफ्का न तो कोई रूहानी माध्यम थी,न ही अतींद्रिय संपन्न कोई सिद्ध लड़की,जिसे रायजल ने कहीं से खोज निकाला हो.कुछ ही महीने पहले जब रायजल से उसकी मुलाकात हुई थी,तो उसमें इस प्रकार की कोई शक्ति नहीं थी.रायजल ने प्रशिक्षण की जी विलक्षण प्रणाली खोज निकाली उसी से उसे यह क्षमता प्राप्त हो सकी.

डॉ. रायजल ही ऐसे पहले परामनोवैज्ञानिक हैं,जिन्होंने ऐसी प्रणाली खोज निकाली है,जिसके द्वारा किसी भी रास्ता चलते सामान्य व्यक्ति में छठी इंद्री जागृत की जा सकती है.प्रसिद्ध चेक हिंदी लेखक और  कवि ओदोलेन स्मेकल ने भी रायजल के प्रयोगों की प्रशंसा की है.

भविष्य का पूर्वाभास,किसी के मन की बातें पढ़ लेना – इन सब ऋद्धियों-सिद्धियों का भंडार अचेतन मन की किन्हीं परतों में सुरक्षित है.परामनोवैज्ञानिकों का मंतव्य है कि वह प्रशिक्षित व्यक्तियों में इन शक्तियों से संपन्न छठी इंद्री का समुचित विकास कर सकते हैं.

रायजल के कुछ प्रशिक्षित शिष्यों ने अतींद्रिय शक्ति के बल पर उन लोकों में भी झांकना शुरू किया जिन्हें हमारी आँखों से देखना संभव नहीं.

पराशक्ति ऋद्धियों-सिद्धियों के अतिरिक्त मस्तिष्क में असंख्य प्रतिभाएं भी सुरक्षित हैं.अब यह मान्यता जोर पकड़ती जा रही है कि इस चेतन तत्व के हम जीवनभर में एक बहुत ही छोटे से अंश का ही उपयोग कर पाते हैं.यदि विभिन्न प्रतिभाओं को वोक्सित और जाग्रत किया जा सके तो हम समृद्धिशाली प्रतिभाओं के स्वामी हो सकते हैं.

इसी दिशा में रूसी परामनोवैज्ञानिक डॉ. राईकोव ने भी बहुत से सफल प्रयोग किये हैं.परन्तु राईकोव प्रयोग के लिए आगे आए व्यक्ति को गहरे सम्मोहन में उतार देते हैं और फिर इस तरह के संकेत देते हैं कि ‘आप एक बहुत बड़े चित्रकार हैं’ और वह व्यक्ति चित्र बनाने लगता है.

भारतीय आध्यात्म में ऋद्धि-सिद्धियों को जागृत करने की प्रणाली योग एवं समाधि है.समाधि में सम्मोहन की तरह ही,चेतन अवस्था तो लुप्त हो जाती है और साधक अपनी धारणानुसार अचेतन लोक में ही विचरता है,और धीरे-धीरे अचेतन की परतों से ही विभिन्न शक्तियां खींच लेता है.यह दीर्घकालीन और समय साध्य प्रणाली है.यदि परामनोवैज्ञानिकों के प्रयोगों से कोई नई प्रणाली सर्वसुलभ हो गई तो एक दिन सर्वसाधारण व्यक्ति के लिए उन पराशक्तियों को प्राप्त करना संभव हो जाएगा,जो अभी तक सिद्ध योगियों की ही संपत्ति मानी जाती हैं.

Thursday, July 10, 2014

नयनों की भाषा


आँखों को लेकर बेहद संजीदा और उम्दा शायरी की गई है.तमाम नए और पुराने शायरों ने आँखों की भाषा पढ़ने की कोशिश की है और तरह तरह की उपमाएं दी हैं.

जर्मन लेखक और कवि राइनर मारिया रिल्के की एक कविता हैजिसका अनुवाद रामधारी सिंह 'दिनकर' ने किया था.कविता कुछ इस प्रकार है - 'काढ़ लो दोनों नयन मेरेतुम्हारी ओर अपलक देखना तब भी न छोडूंगा'. यहाँ प्रेम अपनी पराकाष्ठा की हद को छू लेता है.आँख न होने के बावजूद भी लगातार देखे जाने की बात वही इंसान कर सकता है,जिसकी अंतर्दृष्टि खुल चुकी हो.जो मात्र बाहरी आँखों के भरोसे जिंदा न हो.सच तो यह है कि प्रेम ही एकमात्र आँख है इस दुनियां में.

एक स्पेनिश कहावत के अनुसार -नीली आँखें कहती हैं - मुझे प्यार करो,नहीं तो मर जाउंगी.काली आँखें कहती हैं - मुझे प्यार करो नहीं तो मार दूँगी.तमाम भाषाओँ में आँखों की खूबसूरती को बयान करने की कोशिश की गई है.लेकिन कहते हैं न कि जो बात कह दी जाय या बयान हो सके वो झूठी हो जाती है क्योंकि सच हमेशा अनकहा,अनगढ़ और कुदरती रूप में होता है.साहित्य में आँखों को लेकर काफी कुछ लिखा गया है.

बात अगर ग़ालिब की हो तो बात ही कुछ और होती है.ग़ालिब की शायरी में अनायास ही फलसफा का पुट दिखाई देता है,जब वे कहते हैं -

'रगों में दौड़ते रहने के हम नहीं कायल,जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है'.

यहाँ आँख से लहू का टपकना इस बात का सबूत है कि ग़ालिब के दामन - ओ - दर्द किस कदर गीले  थे.किस कदर तकलीफ के तकिये पर सर रख कर उम्र भर सोते रहे ग़ालिब और सोच किस आंच पर पकती रही. ग़ालिब का ही एक और शेर है -

'आँख की तस्वीर सरनामे पे खींची है कि ता,
तुझ पे खुल जाए की उसको हसरत - ए - दीदार  है

इस शेर में कहा गया है कि लिफाफे पर आँख की तस्वीर बनाई है ताकि यह पता चले कि  तुम्हें देखना चाहते  हैं .

अपनी शायरी में सियासत की स्याही सहित मुहब्बत की सादगी समोने वाले अहमद 'फराज' कहते हैं..

'सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं,
सो उनके शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं'

महबूब को देखने की आरजू में फराज उसके शहर में कुछ दिन ठहरना चाहते हैं.बहुत ही साधारण ढंग से कही गई बात अपने आप में गहरा रहस्य छुपाए हुए है.

फराज का ही एक शेर है –

तू भी दिल को इक लहू की बूँद समझा है 'फराज'
आँख गर होती तो कतरे में समंदर देखता

कतरे में समंदर देखने के लिए जिस मासूम आँख की जरूरत है वो सबके पास नहीं होती.दरअसल किसी भी चीज को कई नजरिये से देखा जा सकता है.जिस तरह बीज में दरख़्त की संभावना छुपी होती है और उसी बीज में फल, फूल,खुशबू आदि सब कुछ मौजूद होता है.उसी तरह कतरे में समंदर देखने के लिए आध्यात्मिक दृष्टि की आवश्यकता है .

उदास आँखों को पढ़ते हुए एक शायर कहते हैं...

मगर अश्क की खुशबू पहचानता हूँ मैं
खुद से कहीं जियादा तुझको जानता हूँ मैं
कुछ और नहीं तो बस इक बात का हक़ है
उदास आँखों में पानी अजीब लगता है

Monday, July 7, 2014

अपेक्षाओं के बोझ तले सिसकता बचपन


पिछले कई सालों की भांति इस साल भी ग्रीष्मावकाश में मुंबई में था.छोटी बहन वहां के एक प्रतिष्ठित स्कूल में गणित की शिक्षिका है.एक महीने के लम्बे ग्रीष्मावकाश में उसे घर आने और सबों से मिलने-जुलने का अवसर मिल जाता है.वापसी में अक्सर मैं ही उसे पहुँचाने मुंबई जाता हूँ.इस बहाने कुछ घूमना फिरना भी हो जाता है.इस बार दस वर्षीय भांजे ने बताया कि एक प्रतिष्ठित चैनल पर चल रहे जूनियर डांस रियल्टी शो के अंतिम चार में पहुँचने वाली लड़की इसी अपार्टमेंट के पहले तल्ले पर रहती है और उसी के शो जीतने की संभावना है.

बात आयी गयी हो गयी.एक शाम अपार्टमेंट से नीचे उतर कर मुख्य सड़क पर जाने के बारे में सोच ही रहा था कि बिल्डिंग के अहाते में काफी शोरगुल सुनाई दिया.अच्छी खासी भीड़ जमा हो चुकी थी.पूछने पर पता चला एक बच्ची बेहोशी की अवस्था में थी.लगभग एक घंटे बाद वापस लौटने पर छोटी बहन ने बताया कि जूनियर रियल्टी शो वाली बच्ची शो से बाहर हो जाने पर सदमें में थी और कई बार बेहोश हो चुकी थी.

इस घटना से कुछ वर्ष पहले की एक घटना की याद ताजा हो गई.कोलकाता में बच्चों के इसी तरह के एक शो से एक बच्ची के बाहर होने पर,सदमे के कारण उसकी आवाज चली गई थी,जिसे चिकित्सकों के अथक प्रयास के बाद वापस लाया जा सका.ऐसे शो न केवल बच्चों बल्कि उनके माता-पिता एवं अभिभावकों के लिए भी प्रतिष्ठा का प्रश्न बन जाते हैं.बच्चों के मन में यह बात बैठा दी जाती है कि केवल उसे ही जीतना है,और इससे कम कुछ नहीं.नतीजतन, सफल नहीं होने पर ऐसे बच्चे कुंठा के शिकार हो जाते हैं और उन्हें लगता है कि उनकी दुनियां ही समाप्त हो गई है.जबकि इस तरह की कोई भी प्रतियोगिता बच्चों की समुचित प्रतिभा का आकलन करने के लिए पर्याप्त नहीं है.

बच्चों के माता-पिता को ऐसे शो में गर्व के साथ कहते दिखाया जाता है कि हालांकि वे इस विधा में आगे नहीं बढ़ सके लेकिन चाहते हैं उनके बच्चे इस क्षेत्र में आगे बढ़ें.ऐसी महत्वाकांक्षा बुरी नहीं,लेकिन स्वस्थ प्रतियोगिता और असफलता को सामान्य रूप से लेना भी यदि माता-पिता सिखा सकें तो कोई कारण नहीं कि इस तरह की घटना की पुनरावृत्ति हो.

सामान्यतया बच्चे ऐसा कहते पाए जाते हैं कि उनके माता-पिता चाहते हैं कि वह इंजीनियर,डॉक्टर बने,क्योंकि उनके माता या पिता भी इंजीनियर या डॉक्टर हैं,भले ही बच्चों की अभिरुचि का क्षेत्र अलग हो.

सभी बच्चों में एक ही तरह की प्रतिभा एवं रूचि नहीं पायी जाती.जुड़वां बच्चों तक में अलग-अलग तरह की प्रतिभा और रुचियों का पाया जाना सामान्य बात है.ऐसे में यदि बच्चों की रूचि के अनुसार कैरियर का विकल्प मिले तो इससे अच्छी बात कोई नहीं.माता-पिता और अभिभावकों की जिम्मेवारी और भी अधिक है कि बच्चे की अभिरुचि के अनुसार ही शैक्षणिक गतिविधियों को प्रोत्साहन दिया जाय.