Monday, July 28, 2014

क्रूस के अनसुलझे सवाल

यह एक विचारणीय प्रश्न है कि क्या सचमुच ईसा की मृत्यु क्रॉस पर हुई थी? क्रूस या सलीब उसी को कहा जाता है जो दो शहतीरों से बना होता है,लेकिन प्राचीन यूनानी इतिहास इस बात का साक्षी है कि ईसा को दो शहतीरों से बने क्रूस पर नहीं चढ़ाया गया था बल्कि एक सीधे काठ पर टांगा गया था.इस बात को ‘न्यू टेस्टामेंट’ भी प्रमाणित करता है.’

प्रेरितों के कार्य’ 5:30 और 10:39 में ईसाई धर्म की दो शाखाओं कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट में दोनों बाइबिल के अनुवादों में जो अर्थ बताया गया है,वह काष्ठ है न कि क्रूस.हिंदी में प्रकाशित ‘नया नियम’ में जिस क्रूस शब्द का प्रयोग किया गया है,उसके पृष्ठ के नीचे काष्ठ या काठ शब्द अक्षरशः अर्थ के लिए दिये गए हैं.

ईसा का प्रिय शिष्य पतरस उनके अंतिम क्षणों तक साथ था.उसने ईसा के सिद्धांतों का प्रचार किया और ईसा के काष्ठ पर चढ़ाए जाने की चर्चा भी की.यह काष्ठ एक सीधी लकीर के रूप में लम्बा होता था.यह काष्ठ शब्द ‘जाइलान’ या ‘ज्यूलोन’ शब्द का अनुवाद है.

इन शब्दों के अलावा एक और भी शब्द है ‘स्टौरोस’,जिसका अनुवाद कुछ अनुवादकों ने क्रूस के अर्थ में किया है.’द कम्पेनियन बाइबिल’ के परिशिष्ट में लिखा है कि प्राचीन यूनानी कवि होमर ने ‘स्टौरोस’ शब्द का प्रयोग साधारण डंडे के रूप में या सूली या लकड़ी के एक पृथक टुकड़े के रूप में किया है.

प्राचीन यूनानी साहित्य में ‘स्टौरोस’ शब्द का सही अर्थ किसी कोण से एक-दूसरे के ऊपर रखे हुए काष्ठ के दो शहतीरों से नहीं है,बल्कि उसका अर्थ काष्ठ का एक टुकड़ा मात्र होता है.इसलिए ईसा की मृत्यु के संबंध में ‘ज्यूलोन’ या ‘जाइलोन’ शब्द जिसका अर्थ काष्ठ होता है,का प्रयोग किया जाता है.इसलिए यह बात प्रमाणित लगती है कि ईसा को काष्ठ पर टांगकर मारा गया था,न कि काष्ठ के दो टुकड़ों पर जो किसी भी कोण से एक-दूसरे के ऊपर रखे हुए हों. इस बात के प्रमाण अनेक ग्रंथों में हैं,जिन्हें ईसाई अप्रमाणिक मानते रहे हैं.

बाइबिल का सही और सच्चा अनुवाद करने की दिशा में लोग आज भी प्रयत्नशील हैं और जिस दिन यह कार्य संपन्न होगा,सर्व-साधारण की समझ में आने लगेंगी.फिर सलीब ईसाई धर्म का पवित्र प्रतीक क्यों? काँटों का ताज क्यों नहीं?

उन दिनों रोम में सलीब पर चढ़ाए जाने वाले ख़ास व्यक्तियों के सलीब पर उनसे संबंधित दो चार शब्दों के शीर्षक भी टांगे जाते थे.ईसा के तथाकथित सलीब पर लैटिन में ‘आई.एन.आर.आई’ लिखा रहता है,जिसका पूर्ण रूप ‘आइसस नाजरेनस रेक्स आयोडयोरम’ और अंग्रेजी अनुवाद ‘जीसेस ऑफ़ नजारेथ किंग ऑफ़ द ज्यूस’ अर्थात ‘नासेरस का ईसा यहूदियों का राजा’ है.इसे रोमन राज्यपाल पिलातुस ने लैटिन के अतिरिक्त यूनानी और यहूदी  भाषा में लिखा था.

ईसा को शायद आभास भी नहीं रहा होगा कि उनकी मृत्यु के बाद उस ‘खूनी सलीब’ को,जिस पर उन्हें लटकाया जाएगा,उनके द्वारा रोपित ईसाई धर्म का पवित्र प्रतीक मान लिया जाएगा.इस बात पर विचार किया जाना जरूरी है कि वह कौन सा सलीब था,जिस पर ईसा को लटकाया गया था.

अगर ईसा को सचमुच सलीब पर लटकाया गया था तो अहिंसा के पुजारी ईसा द्वारा चलाए गए अहिंसक धर्म ईसाई धर्म का पवित्र चिन्ह ‘खूनी सलीब’,जिसके नाम में ही हिंसा है,पवित्र प्रतीक चिन्ह क्योंकर माना गया?

Monday, July 21, 2014

प्रतीक चिन्ह कितने पवित्र


विभिन्न समाजों में हिंसा के कई अस्त्र-शस्त्र आज पवित्र प्रतीक माने जाते हैं.त्रिशूल,तलवार,धनुष-वाण,चक्र आदि की पूजा वैदिक काल से ही भारत में होती आ रही है.शायद इसका संबंध शक्ति प्रदर्शन,रक्षा आदि से भी रहा हो.सलीब भी ईसाई धर्म का एक पवित्र प्रतीक है. कई ईसाई परिवारों में,विशेषकर रोमन कैथोलिकों में क्रॉस को एक जंजीर में डालकर लॉकेट के रूप में पहनने की प्रथा है.

आम तौर पर इस बात पर सवाल उठता रहा है कि जिस खूनी सलीब पर ईसा को चढ़ाया गया,उसी सलीब को ईसाई धर्म की पवित्रता का प्रतीक बनाकर उसे पूजा के स्थान पर क्यों रख दिया गया?

डब्ल्यू. ई. वाइन ने अपनी पुस्तक ‘एन एक्सपोजिटरी डिक्शनरी ऑफ़ न्यू टेस्टामेंट वर्ल्ड’ में लिखा है कि क्रॉस का प्रयोग सर्वप्रथम प्राचीन कुसूदिया-बाबुल में हुआ था और तेमूद देवता के प्रतीक चिन्ह के रूप में उसका प्रयोग होता था.उसका स्वरूप रहस्यमयी T के आकर का होता था,जो उस देवता के नाम का पहला अक्षर था.इससे सिद्ध होता है कि क्रूस या सलीब ईसा के जन्म से शताब्दियों पूर्व से ही प्रचलित था.हालाँकि उसका आकार कुछ अलग था.

सलीब पर अपराधियों के चढ़ाए जाने की सजा युद्ध के दिनों में प्राचीन फिनिशियन,कार्बेजीनियन, इजिप्शियन और रोमन लोगो में दी जाती थी.सलीब पर चढ़ाने से पहले अपराधी या कैदी को कोड़े या चाबुक से मारा जाता था और उसे सलीब पर बांधकर उसके हाथ-पाँव में कील ठोक दी जाती थी.फलस्वरूप कील पर चढ़ाए जाने वाले कैदियों और व्यक्तियों की मृत्यु खून की कमी से नहीं,बल्कि आम तौर पर ह्रदयगति रूक जाने से हो जाती थी.

ईसा के संबंध में भी यही धारणा व्यक्त की जाती है कि ईसा को सिपाहियों ने जब भाले से बेधा था तब पानी और खून दोनों उनके शरीर से निकला था.दर्द से छटपटाते हुए शरीर में सलीब पर दो या तीन दिनों से अधिक जान नहीं रह पाती थी.मृत्यु का आगमन शीघ्रता से होता था.उन दिनों भयंकर कैदियों और सैकड़ों युद्धबंदियों को नगर से बाहर सड़क के किनारे एक कतार में सलीब स्थापित कर उस पर चढ़ाया जाता था.इस परंपरा के अनुसार अपराधी की लाश तबतक सलीब पर टंगी रहती थी जब तक मांस-भक्षी पक्षी उसके मांस को नोच-नोचकर अस्थिपंजर के रूप में न बदल देते थे.

यदि आत्मा के अतिरिक्त कोई अन्य बाह्य वस्तु ईश्वर की पूजा के लिए प्रयोग में लाई जाती है तो उसका रूप मूर्ति-पूजा सा होता है.सलीब की पूजा ईसाईयों को मूर्तिपूजक भी घोषित करती है.ईसा आत्मा की शुद्धता पर जोर देते थे और मूर्ति पूजा के साधनों एवं उपादानों को सांसारिक वस्तुओं का मोह-जाल समझते थे,लेकिन ईसा के अनुयायियों ने उनके कथन का अर्थ बहुत कम समझा.उन्होंने अन्य देवी देवताओं की प्रतिमा की पूजा को तो धिक्कारा,लेकिन खुद अपने आराध्य ईसा के लिए क्रूस को पवित्र मानकर उसकी पूजा आरंभ कर दी.उनके अनुसार पवित्र लहू क्रूस पर ही गिरा था और क्रूस ही उनकी मृत्यु का निमित्त होने के कारण शायद चिर-स्मरणीय हो गया.डबल्यू. डी. विलेन ने 'द ऐनसिएंट चर्च’ में लिखा है कि अति दूरवर्ती प्राचीनकाल से मिस्त्र और सीरिया में क्रूस को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था.

किसी भी धर्म को स्थापित करने के लिए अनुयायियों को अपने गुरु का ऐसा ठोस आधार ढूंढना पड़ता है कि जन-साधारण पर उसका असर सीधा और शीघ्र पड़ सके.ईसा के अनुयायियों के लिए बाह्य ठोस आधार के रूप में सलीब से बढ़कर प्रभावकारी शायद कोई दूसरा न था.उन्होंने इस मर्म को समझा और और लकड़ी के क्रूस के चिन्ह को ही ईसाई धर्म के प्रचार का साधन बनाया.

प्रारंभ में यह धारणा बन गई थी कि येरुशलम को जाने वाले यात्री उस असली पवित्र सलीब के छोटे-छोटे बने सलीब ही उनके चर्च के लिए लेते हैं.क्रूस को पवित्र मानकर उसे कलात्मक ढंग से सजाकर रखने की प्रथा भी शायद इसी कारण शुरू हुई.

कालांतर में ज्यों-ज्यों लोगों की धार्मिक भावना बढ़ती गई,त्यों-त्यों सलीब लकड़ी के अतिरिक्त स्वर्ण,चांदी,पीतल,कांस्य,ताम्बा आदि धातुओं के बनने लगे.उन पर रत्न जड़े जाने लगे.ईसा के वचन लिखे जाने लगे.

लेकिन सवाल यह है कि क्या ईसा की मृत्यु क्रूस पर हुई थी?

(अगले अंक में जारी)

Thursday, July 17, 2014

सावन और झूलनोत्सव


झूला झूलने का एक अपना अनोखा आनंद है.झूले पर बैठते ही वयस्क मन एकाएक किशोर हो जाता है.शायद,इसलिए कि झूले के साथ बचपन की अनेक मधुर स्मृतियाँ जुड़ी रहती हैं.पावस ऋतु में झूले की बहार दर्शनीय होती है.अमराइयों में वृक्षों की शाखाओं पर लगे झूले और उन पर पेंगें लेती किशोरियां,युवतियां. झूले का हमारे आराध्यों राम-कृष्ण के साथ भी घनिष्ठ संबंध है.

सावन में मथुरा और वृन्दावन में झूलों की अपनी छटा होती है.अयोध्या में भी झूलों का उत्सव,  झूलनोत्सव सावन महीने भर मनाने की प्रथा थी.परन्तु धीरे-धीरे यह प्रथा कुछ मंदिरों तक सिमट कर रह गयी है.

गोस्वामी तुलसीदास ने गीतावली उत्तरार्द्ध के 18-19 पदों में झूले का वर्णन किया है.उसमें उन्होंने श्रीराम एवं जानकी की मंगलमय झांकी को झूले पर बैठकर निहारा है तथा स्थान विशेष का भी उल्लेख किया है........

झुंड-झुंड झूलन चलीं गज गामिनी बरनारि |
कुसुम चीर तन सोहहीं,भूषण विविध संवारि |
पिक नयनी मृगलोचनी, सारद ससिसमतुंड |
रामसुजसु सब गावहीं,सु-सुरसु, सारंग गुंड |
सारंग,गुंड,मलार,सोरठ,सुहव,सुधरनि बाजहीं |
बहुभांति तान-तरंग सुनि, गंधर्व किन्नर लाजहीं |
अतिमचत छूटत कुटिल कच, छवि अधिक सुंदर पावहीं |
पठ उड़त भूषण खसत,हंसि-हंसि ऊपर सखी झुलावहीं |

भक्त रसिक कवि बिहारी द्वारा ‘राम रसायन’ ग्रंथ की रचना की गई थी,जिसमें उन्होंने देश-काल के अनुसार राम और सीता के रसिक स्वरूप का वर्णन किया है.उन्होंने झूलनोत्सव के समय,स्थान आदि का वर्णन भी विस्तार से किया है.......

सुभग जानकी घाट विशाला, मज्जें अंतरंगिनी बाला |
तहं प्रमोद बन परम सुहावन,कोटिन अमरावती लजावन |

पावस ऋतु में सावन झूला श्रवण शुक्ल तृतीया से मनाये जाने के संबंध में बिहारी कहते हैं....

पावस ऋतु उत्सव समय, वर हिंडोल विहार |

पंद्रहवीं शताब्दी पूर्व,मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के श्रृंगारिक स्वरूप को प्रस्तुत नहीं किया जाता था,साधकों द्वारा स्वांतः सुखाय ही नित्य लीला का स्मरण किया जाता था.श्रृंगारी साधना युगधर्म का स्वरूप धारण करता जा रहा था,जबकि राम कथा में ऐश्वर्य की प्रधानता थी और कृष्ण लीला का विकास बढ़ता ही जा रहा था.कृष्ण के भक्त कवि निरंतर उनकी रासलीला आदि का खुलकर अपने शब्दों में प्रयोग कर रहे थे.

इसी समय स्वामी अग्रदास ने इस विशाल पृष्ठ भूमि पर बिखरे राम-रस-रत्नों को पिरोना शुरू किया.स्वामी अग्रदास ने राम-रसिकों का एक सम्प्रदाय बना कर,उन्हें कृष्ण-भक्तों के गो-लोक से भी अधिक वैभव पूर्ण,दिव्य अयोध्या के लीला बिहारी सीता-राम का ध्यान करने का उपदेश दिया.

अयोध्या में दास-परंपरा के अनुयायियों की संख्या अधिक थी,जिसके कारण श्रीराम की लीलाओं को केवल मर्यादित वातावरण के आवरण से ही ढक दिया गया था,किंतु 16वीं शताब्दी में स्वामी अग्रदास के समय रसिक उपासना का अधिक प्रचार हुआ.

मुग़ल काल में भी धार्मिक उत्सवों का यदा-कदा आयोजन किया जाता था,परन्तु स्वतंत्र रूप से इस झूलन उत्सव के प्रचार-प्रसार का कार्य नबाब वाजिद अली शाह के समय और भी अधिक हुआ.अयोध्या में जहाँ एक ओर एक या दो मंदिरों में इसका आयोजन होता था,वहीँ अयोध्या के महाराज ददुआ ने कई मंदिरों का निर्माण कर इस उत्सव को प्रश्रय दिया.

अयोध्या के महाराजा ने राधा ब्रजराज मंदिर से नागपंचमी के दिन रथ पर श्रीकृष्ण एवं राधा की मूर्ति को ले जाकर अपने महल के बगीचे के झूले में बैठाकर झूलनोत्सव मनाने की प्रथा का सार्वजानिक स्तर पर आरंभ किया.

झूलनोत्सव मनाने की प्रथा का प्रचलन रसिकोपासकों द्वारा 16वीं शती के उत्तरार्द्ध से आरंभ हुआ.जिनमें आज तक अनेक प्रकार के परिवर्तन होते रहे हैं.पहले अष्टयाम विधि से केवल अष्टधातुओं की एवं शिलामूर्ति ही पूजी जाती थी,परन्तु इसी शाखा के उपासक श्रीरामवल्ल्भाशरण द्वारा एक नयी प्रथा का सूत्रपात हुआ जिसे आज अयोध्या के अनेक मंदिरों में देखा जा सकता है.इसमें श्रीराम एवं सीता के सजीव रूप की पूजा-अर्चना तथा बच्चों का श्रृंगार करके उन्हें राम और सीता के रूप में झूले पर बैठाया जाता है.इसके बाद रचिकचार्यों के पदों को गाकर उनमें व्यक्त किया गए भावों के अनुरूप अभिनय कराया जाता है.

पहले किसी भी धार्मिक कृत्य में भक्तों की आस्था सादगीपूर्ण थी,किसी प्रकार के रागरंग में उनकी रुचि नहीं थी,वे साधना  करते थे केवल अपने सुख के लिए,बाहरी आडम्बरों से उनका कोई संबंध नहीं था.

जिस प्रकार से साहित्य में इसके निश्चित देशकाल का वर्णन नहीं मिलता ,उसी प्रकार वर्त्तमान समय में भी इस उत्सव के मनाने का कोई दिन निश्चित नहीं है.विभिन्न मंदिरों में अनेक तिथियों से झूलनोत्सव मनाया जाता है.श्रावण शुक्ल की तृतीया को मणि-पर्वत पर पड़े झूले में बिठाकर आयोजन पूर्वक इसकी शुरुआत की जाती है.

समय के परिपेक्ष्य में प्रथाओं के नित क्षरण होते रहने से मंदिरों में भले ही अब आयोजनों में नीरसता आने लगी हो,परंतु इस उत्सव की सरसता में किसी प्रकार की कमी नहीं आई है.