Thursday, February 19, 2015

तुलसीदास की प्रथम कृति - रामलला नहछू



तुलसीदास कृत रामचरित मानस की आभा में उनकी अन्य कृतियां दब सी गयी मालूम पड़ती हैं.गोस्वामी तुलसीदास की प्रथम रचना ‘रामलला नहछू’ मानी जाती है.इस लघु कृति के बीस सोहर छंदों में नहछू लोकाचार का वर्णन हुआ है.’सोहर’ अवध क्षेत्र का प्रख्यात छंद है,जो मुख्तया बच्चे के जन्म पर गाया जाता है,हालांकि यह अन्य क्षेर्त्रों में भी समान रूप से प्रचलित है.इसके अतिरिक्त यह कर्णवेध,मुंडन और उपनयन संस्कारों तथा नहछू लोकाचारों पर स्त्रियाँ इसे गाती हैं.

तुलसीदास ने जीवन में शास्त्रसम्मत विधानों के साथ लोकाचार के परिपालन का भी महत्त्व निरूपित किया है.......

लोक वेद मंजुल दुइ कूला

वेदाचार लिखित नियमों की भांति ग्रंथबद्ध और व्यापक हैं,लेकिन लोकाचार परंपराओं पर आधारित होता है.नहछू लोकाचार का शास्त्रीय विधान न होते हुए भी अवध में कम से कम पांच सौ वर्षों से व्यापक रूप से प्रचलित है.

नहछू दो शब्दों से बना है-नख और क्षुर.नहछू की रस्म में नायिता ससुराल जाने के लिए सजते समय दुल्हे के पैर से नख,नहनी से काटती है,इसके उपरांत उसके पांवों में महावर लगाती है.दूल्हा सजाने का आमंत्रण पाते ही पास-पड़ोस की स्त्रियां रस्म पूर्वक गालियों की बौछार करती हैं.मां के लिए अश्लील गालियां गाये जाने पर दूल्हे को लज्जा और संकोच की विचित्र प्रथमानुभूति होती है, जो थोड़ी ही देर में विनोद के ठहाकों में घुल जाती हैं.

लोकगीतों में रामकथा सहस्त्रमुखी धाराओं में प्रवाहित हुई है.समाज के हर वर्ग ने उसे अपनी मान्यताओं के अनुकूल गढ़ा है,अपनी भावनाओं के रंग में रंगा है.गोस्वामी तुलसीदास की काव्य प्रतिभा ने नहछू लोकाचार का अत्यंत सजीव वर्णन किया है-राजा दशरथ के आँगन में कच्चे बांस का मंडप छाया गया है.मणियों,मोतियों की झालर लगी है.चारों और कनक-स्तंभ हैं,जिनके मध्य राजसिंहासन है.गजमुक्ता,हीरे और मणियों से चौक पूरी गयी है.

भागीरथी जल से राम को स्नान कराया गया है.युवतियों ने मांगलिक गीत गाये.राम सिंहासन पर विराजमान हैं.हाथ में नवनीत लिए अहीरिन खड़ी है,तांबूल लेकर तम्बोलिन,जमा जोड़ा लिए दरजिन,कनक रत्न मणिजटित मयूर लिए मालिन आ पहुंची है.बड़ी आँखों वाली नायिता भौंह नचाते हुए भाग-दौड़ कर रही है.सारी तैयारी हो जाने पर कौशल्या की ज्येष्ठ,कुल की पुरखिन उन्हें आज्ञा देती है-जाओ सिंहासन पर बैठे रामलला का नहछू करा दो.

मां कौशल्या रामलला को गोद में लिए बैठी है.दूल्हा राम के सिर पर उनका आंचल छत्र की भांति सुशोभित है.नहछू के लिए नायिता को पुकारा जाता है.बनी-ठनी,हंसती-मुस्कुराती नायिता कनकलसित नहनी हाथ में लिए खड़ी दुल्हे राम की शोभा निहार रही है.अब बड़भागी नायिता राम के पांवों के नख काटने लगी है.बीच-बीच में वह मुस्कुराते हुए तिरछे नयनों से उन्हें निहारते भी जाती है.नहछू शुरू होते ही उपस्थित युवतियां सोहर गाने लगती हैं.सबसे पहले कौशल्या की खबर ली जाती है,फिर सुमित्रा की......

काहे राम जिउ सांवर लछिमन गोर हो
की दहु रानी कौउसिलहीं परिगा भोर हो |
राम अहहिं दशरथ के लछिमन आनि क हो
भरत सत्रुहन भई सिरी रघुनाथ क हो ||

(एक ही पिता के पुत्र होकर राम सांवले क्यों हैं और लक्ष्मण गोरे क्यों हैं?कहीं दशरथ के धोखे में कौशल्या से चूक तो नहीं हो गयी? अरे नहीं-नहीं ! राम तो दशरथ के ही पुत्र हैं.लक्ष्मण संभव है – दूसरे के पुत्र हों ! भरत और शत्रुघ्न भी राम के भ्राता हैं.)

अगले छंद में उपस्थित मां के प्रति सोहर सुनकर रामलला के सकुचाने का मनोवैज्ञानिक चित्र है..........

गावहिं सब रनिवास देहिं प्रभु गारी हो
रामलला सकुचाहिं देखि महतारी हो |

नख काटने के बाद नायिता ने राम के पैरों की अँगुलियों को जावक से चर्चित कर सूख जाने पर उन्हें पोंछ दिया.नहछू संपन्न हो जाने पर नेग की बारी आयी.कवि ने इस अवसर पर नेग की प्रचुरता और विपुलता का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन किया है.अंत के दो छंद में मां कौशल्या की प्रसन्नता और कृति की फलश्रुति का वर्णन हुआ है.

रामलला नहछू में रचना-काल का वर्णन नहीं है.’गोसाईं चरित’ में लिखा है कि ‘पार्वती मंगल और ‘रामलला नहछू’ की रचना एक साथ मिथिला में हुई.पार्वती मंगल में रचना-काल का वर्णन किया गया है.....

जय संवत् फागुन सुदि पांचै गुरु दिन |
अस्विनी विरचेऊँ मंगल सुनि सुख छिन-छिन ||

विशेषज्ञ ‘पार्वती मंगल’ का रचना काल 1582 मानते हैं और गोस्वामी तुलसीदास का जन्म संवत् 1554 माना जाता है.स्पष्ट है कि ‘रामलला नहछू’ कवि के तारूण्य का उद्गीत है,जिसमें एक ओर अवस्थानुरूप सुलभ श्रृंगारप्रियता है और दूसरी ओर उनकी प्रकृति के अनुरूप मर्यदावादिता का गंगा-जमुनी संगम है.नव-युवतियों के कोमल सौंदर्य में जो अभिरूचि कवि ने इस कृति में दिखलायी है,वह उनकी अन्य कृतियों में दुर्लभ है.

‘रामलला नहछू’ के लघुकाय होने के कारण रचनाकार को यद्यपि यह सुविधा नहीं थी कि ‘रामचरित मानस’ की भांति बीच-बीच में पाठकों को स्मरण कराते कि राम सच्चिदानंद ब्रह्म हैं,फिर भी इस लोक गीत में वे अपने उपास्य की लोकोत्तर महिमा का बोध कराना नहीं भूलते हैं........

जो पग नाउनि धोव राम धोवावइं हो |
सो पगधूरि सिद्ध मुनि दरसन पावइं हो ||
रामलला कर नहछू इहि सुख गाइय हो |
जेहि गाए सिधि होइ परम पद पाइय हो ||

रामलला नहछू की भाषा अवधी है,'रामचरित मानस' की भांति साहित्यिक अवधी या 'विनय पत्रिका' की भांति संस्कृतनिष्ठ अवधी नहीं,बल्कि 'पद्मावत' की भांति ठेठ ग्रामीण पूर्वी अवधी जो गोंडा और अयोध्या के आसपास बोली जाती है. 

Thursday, February 12, 2015

शंका के जीवाणु


हम सब अक्सर एक साथ कई शौक पालते रहते हैं.और समय-समय पर इन शौकों को पुष्पित-पल्लवित भी करते हैं.लेकिन शौक के कारण मुसीबत को गले लगाने का वाकया कम ही होता है.पहले मैं हस्तरेखा विज्ञान या पामिस्ट्री में विश्वास नहीं रखता था.लेकिन एक घटना ने मेरी राय बदल दी.

वह सत्र की शुरुआत के दिन थे.कई प्रकाशकों के विक्रय प्रतिनिधि नमूने की प्रति लेकर शिक्षकों के पास पहुँच रहे थे.इसी क्रम में एक दुबला-पतला,लहीम-शहीम सा एक विक्रय प्रतिनिधि मुझसे टकरा गया.उसने पुस्तक की प्रति देते हुए मुझे मेमो जांच लेने के लिए कहा.मैं मेज पर हाथ रखकर मेमो में लिखी इबारत को पढ़ रहा था तो उसने एक अजीब सा प्रश्न किया- ‘क्या आप हस्तरेखा विज्ञान में विश्वास रखते हैं?’ मैंने कहा- मुझे तो इन सब पर विश्वास नहीं है. उसने एक सुझाव देते हुए कहा- कल आप वाहन का प्रयोग न करें तो बेहतर.अभी जब आप मेज पर हाथ रख मेमो पढ़ रहे थे तो आपकी हथेली पर मेरी नजर गई,इसी वजह से मैं कह सकता हूँ कि कल अत्यधिक सावधानी बरतें.  

मुझे उसकी बातों पर न तो विश्वास हुआ और और न ही कोई सावधानी रखी.अन्य दिनों की तरह मोटर साइकिल से घर वापस आते हुए कब ध्यान भंग हुआ और प्रमुख चौराहे पर दो बकरी के बच्चे आपस में सींगें लड़ाते हुए अचानक से सड़क के बीच आ गए.जोर से ब्रेक लेने के बाद भी मामूली टक्कर हो ही गयी और सड़क पर गिर पड़ा.हेलमेट की वजह से कोई चोट तो नहीं लगी लेकिन दोनों घुटने छिल गए थे.घर में आराम करते वक्त मुझे अनायास ही उस व्यक्ति की याद हो आई जिसने एक दिन पहले इस दुर्घटना की और इशारा किया था.

यहीं से मुझे हस्तरेखा विज्ञान में रूचि जगी और कई वर्षों के अध्ययन के पश्चात मैं यदा-कदा अपने सहयोगियों और करीबी लोगों का हाथ देख कर सटीक जानकारी दे पाने में सक्षम हो गया था.विभिन्न पत्रिकाओं में इस संबंध में मेरे कुछ लेख भी छपे थे.शायद इसी वजह से इटली के खूबसूरत शहर मिलान में हस्तरेखा विज्ञान पर होने वाले एक अंतर्राष्ट्रीय सेमीनार में भाग लेने के लिए तीस सदस्यीय भारतीय प्रतिनिधिमंडल में मुझे भी शामिल कर लिया गया था.

मिलान में दो दिवसीय सेमिनार समाप्त हो चुका था और अगले दो दिन बाद हमें वापस भारत लौटना था.दो दिनों का हमारा व्यस्त कार्यक्रम था,शहर के महत्वपूर्ण स्थलों के भ्रमण का.पहले दिन भ्रमण के पश्चात सभी लौट चुके थे.मैं रात के खाने के बाद थोड़ी चहलकदमी करते हुए होटल के बाहर आ गया था.तभी सामने से आते हुए एक लम्बे कद के व्यक्ति ने मुझे रोका था,वह शायद मेरी और ही आ रहा था.आप शायद भारत से हैं और सेमिनार में शिरकत करने आए हैं.उसने मेरे बारे में काफी जानकारी जुटा रखी थी.क्या आप मेरे साथ चलकर एक व्यक्ति की हस्तरेखा पढ़ सकेंगे? मैं थोड़ा असमंजस में था.रात के दस बज रहे थे और पता नहीं कितनी देर लग जाय.उसने मेरी मनोदशा पढ़ ली थी,कहा,शीघ्र ही आप वापस लौट जाएंगे.

एक पुराने से मोटर कार से हम गंतव्य की ओर चले.मिलान शहर के चर्च को पार करने के कुछ देर के बाद ही कार एक कच्ची सड़क पर हिचकोले ले रही थी.मैंने घड़ी में देखा-दस बजकर पैंतीस मिनट हो चुके थे.तभी कार एक पुराने से दरवाजे पर रुकी.उसके साथ सीढ़ियों चढ़ते एक अंधेरे कमरे में पहुंच गया था.उसने एक कुर्सी की और बैठने का इशारा करते हुए लाईट जला दी.कमरे में चारों ओर निगाह दौड़ाई तो चीख निकलते-निकलते रह गई.पलंग के सामने एक युवती की लाश पड़ी थी.शक्लोसूरत से कोई भारतीय ही लग रही थी.

मारे भय के संज्ञाशून्य हो चला था.तभी उस व्यक्ति से सर्द स्वर में कहा,मैं चाहता हूँ कि आप इन हाथों की रेखाएं पढ़ें.मैंने कई साथियों,परिचितों के हाथ की रेखाएं पढ़ी थीं,लेकिन इतनी भयानक स्थिति में कभी नहीं.मैं अपने आपको असहाय महसूस कर रहा था.मुझे क्या अधिकार था कि उस युवती के हाथ की रेखाओं को पढूं जिसके होठ हमेशा के लिए चुप हो चुके हैं. अतीत की बातों को परतों के नीचे दबे रहना ही ठीक होता है.

मैं इस निश्चय पर पहुंचा ही था कि किसी ठंढे निःश्वास ने मुझे स्पर्श किया.यह कोरी कल्पना थी या वास्तविकता,कह नहीं सकता.मगर मैंने सोचा और महसूस भी किया कि कोई चीज मेरे कानों में फुसफुसा रही है,संकोच न करो.हाथ की रेखाएं पढ़ो और जो सच है,वह बता दो.

उसी क्षण में अपनी सारी संकल्पनाशक्ति गंवा बैठा.मानो मैं किसी अदृश्य शक्ति के नियंत्रण में था.मैंने अपने को पलंग की और खींचता महसूस किया और सिहरकर देखा कि मैंने झुककर उन मृत हाथों को बड़ी मृदुता से अपने हाथों में ले लिया है.

मुझे ज्यादा रौशनी मिल सके इसलिए उस व्यक्ति ने एक और लैंप जलाया,चूंकि कमरे में कोई मेज नहीं थी इसलिए उसने पलंग के पायताने रखे ताबूत को खींच लिया और जब उसने लैंप को उस पर रखा तो मैंने ताबूत पर लिखी इबारत पढ़ी : जूलिया विंगेट,उम्र 25 वर्ष.

उम्र : 25 वर्ष, फिर भी उसकी हस्तरेखाएं परेशानी और चिंता की सूचना दे रही थी.मगर विवाह रेखाएं इसका प्रतिकार करते हुए कह रही थीं कि उसे अपने पति से बेहद प्यार था.जैसे-जैसे में उसके हाथ को पढ़ता गया,उस व्यक्ति के मुखड़े पर अंकित वेदना और भी तीव्र और गहरी होती गयी.उस औरत के जीवन का कोई राज था,जिसे उसने चुपचाप संजो रखा था.यह स्नेह किसी ऐसे व्यक्ति के प्रति था,जिसे वह पैसों से सहायता और सहारा देती आयी थी.मुझे विश्वास है कि वह उसका कोई रिश्तेदार था.

वह व्यक्ति इस तरह कराहा जैसे उसके सीने में चाकू घोंप दिया गया हो और वह कुर्सी में बेहोश होकर ढह गया.मृत हथेलियों को छोड़कर मैं उसकी ओर लपका.तबतक वह होश में आ गया था.वह याद करने की कोशिश कर रहा था कि मैं यहाँ क्यों था.जब उसे याद आया तो मेरी बांह पकड़ते हुए कमरे के बाहर ले गया और कहा,श्रीमान, अब आप जाइए,किसी रोज मैं आपको सभी बातें अच्छी तरह समझा सकूंगा.

किसी तरह वहां से निकलकर मुख्य सड़क पर आया और टैक्सी लेकर अपने होटल पहुंचा.इस क्रम में दो घंटे व्यतीत हो चुके थे.मेरे रूम मेट काफी घबराए हुए थे कि मैं अचानक कहाँ गायब हो गया था.अजीब सी स्थिति थी कि किसी को कुछ बता भी नहीं सकता था.

एक साल गुजर गए थे. उस वाकये के बाद मैंने लोगों के हाथ की रेखाएं पढ़नी बंद कर दी थी.जब भी किसी व्यक्ति का हाथ देखता,वही मृत हाथ सामने आ जाती और मेरे शरीर में एक सिहरन सी दौड़ जाती थी.मैंने यह राज अपने सीने में दफ़न कर रखा था.

एक प्रकाशक के आमंत्रण पर मैं दिल्ली गया था.नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के पास ही पहाड़गंज के एक होटल में ठहरा था.होटल से निकलकर प्रकाशक से मिलने जाने ही वाला था कि एक व्यक्ति ने मुझे रोकते हुए कहा,सर एक व्यक्ति आपसे मिलना चाहते हैं,पास ही एक होटल में रुके हैं.उस व्यक्ति के साथ होटल के कमरे में पहुंचा तो एक व्यक्ति को प्रतीक्षारत पाया,जो हड्डियों का ढांचा मात्र लग रहा था.उसने उठकर हाथ मिलाने की कोशिश की,पर मैं उसे पहचान नहीं पाया.जब उसने यहां बुलाने के लिए माफ़ी मांगी तो आवाज कुछ पहचानी सी लगी.फिर वह सब याद आ गया जब मिलान में एक मृत युवती के हाथ की रेखाएं देखने गया था.

मैंने आपके घर फोन कर आपके बारे में पता किया था कि आप यहां पर हैं.मेरे पास बैठ जाइए,मेरी आवाज में दम नहीं है.फिर खांसी का दौरा रुकते ही उसने कहा,क्या पिछले साल की मिलान की एक रात की याद है आपको,जब आपने मेरी खातिर हस्तरेखाएं पढ़ीं थीं?

मेरे सर हिलाते ही उसने अपनी बात कहनी शुरू की.वह युवती मेरी पत्नी थी.भारत में ही पुरी के जगन्नाथ मंदिर में उससे मिला था.वह टूरिस्ट गाइड का काम करती थी और मैं भारत भ्रमण के आया था.यहीं उससे मित्रता हो गयी थी. मुझे अक्सर लगता था कि उसके जीवन में कोई है,जिसे वह मुझे छिपाकर  रखना चाहती थी.मैंने इस बारे में संकेत किया तो उसने कहा,यदि आप चाहते हैं कि हमारी मित्रता बनी रहे तो इस बारे में कुछ न पूछें.

छह महीने बाद ही उससे विवाह कर उसे मिलान ले गया था.परिवार में उसके अलावा कोई नहीं था.तीन वर्ष हमने मिलान में सुखपूर्वक गुजारे.न उसने कभी मुझे मेरे अतीत के बारे में पूछा,और न मैंने उसके अतीत के बारे में जानने की कोशिश की.

एक रोज भारत से उसके नाम से एक पत्र आया.मैं वह पत्र उसके पास ले गया और पूछा,क्या तुम्हारे भारत में और भी दोस्त हैं,तुमने तो कभी नहीं बताया.वह चौंकी और उसकी आँखों में आंसू छलछला आये.वह अपने कमरे में चली गयी.अगर मैं उसके पीछे-पीछे गया होता और उसका विश्वास जीतने की कोशिश की होती,तो सबकुछ ठीक हो जाता.मगर लगता है उसी एक क्षण में मेरा अहं जग गया था और ईर्ष्या मेरे दिल पर हावी हो गयी थी.

कई दिनों तक मैं अपनी पत्नी से दूर रहा और अपनी ईर्ष्या को सहलाता रहा.अंत में मैंने एक योजना बनाई और प्रतिशोध की बात सोची.मैंने सोचा उससे सच कबूल करवाकर ही रहूंगा.मैंने उस पर नजर रखना शुरू कर दिया और उसकी हर हरकत पर मेरी निगाह रहती.मैंने डाकिये को मिलाकर उसकी डाक पढ़नी शुरू कर दी.रात को चुपचाप उठकर मैं उसके कमरे में चला जाता और उसपर नजर रखता.

एक रात दबे पांव उसके कमरे में पहुंचा तो उसे एक चिट्ठी लिखते हुए पाया.मैं चुपचाप उसके पीछे खड़े रहकर उसकी चिट्ठी को पढ़ने की कोशिश की,मेरे प्रिय,तुम जानते हो कि मैं तुमसे कितना प्यार करती हूं और तुमसे दूर रहकर भी तुम्हारे भविष्य की चिंता मुझे सताती रहती है.मुझे उस दिन की प्रतीक्षा है जब हम तुम फिर मिलेंगे.मैं कुछ पैसे भेज रही हूँ,इसका सदुपयोग करना.’

इसके आगे मैं पढ़ नहीं पाया.मेरी आँखों के आगे अँधेरा छा गया था.मैं ईर्ष्या से पागल हो रहा था.उसी क्षण मैंने फैसला कर लिया कि अपनी जिंदगी का अंत कर लूंगा और उसे स्वतंत्र कर दूंगा ताकि वह भारत जाकर उस आदमी से शादी कर ले,जिसे उससे प्यार है.

मैंने अपनी वसीयत लिखी और सबकुछ उसके नाम कर दिया,मैं नहीं चाहता था कि मेरे मरने के बाद उसे कोई तकलीफ हो.मेरे लिखने के दौरान ही जूलिया के आने की पदचाप सुनायी दी.मैंने झट से तकिये के नीचे वसीयत को छुपाया,जब उसने कमरे में आकर कहा,मेरे सर में बहुत दर्द हो रहा है,जरा दवाई की शीशी देना.मैंने दवा की आलमारी से एक छोटी शीशी उठाकर उसे दी और मुंह फेर लिया.आहिस्ते से वह दरवाजे की और बढ़ी और हमारी नजरें मिली.गुडनाईट कहते हुए वह अपने कमरे की और बढ़ी और कुछ परेशान और विचलित होकर मैंने आखिरी चिट्ठी लिखनी शुरू की.

कई बार लिखा और फाड़ डाला क्योंकि जो लिखा वह जंचता ही नहीं था,सुबह होने को था और मेरा पत्र पूरा नहीं हुआ था.फिर मैंने सोचा,ज्यादा लिखना क्या,चंद लाइनें ही काफी हैं.फिर मैंने लिखा-अलविदा ! जूलिया.मुझे सब पता लग गया है.अब तुम स्वतंत्र हो.सुखी रहो- जॉन विंगेट.

मैंने पत्र लिफाफे में रखा और चुपचाप उसके कमरे में पहुंचकर देखा कि रौशनी की रेखाएं उसके तकिये पर पसर रही थीं.अपने आंसू पोछकर मैं आखिरी चुंबन के लिए झुका.उसके होंठ बर्फ की तरह ठंढे थे.’हे भगवान ! माजरा क्या है?मैंने उसे जल्दी से उठाकर गले लगाया.अंत में एक ठंडी अंगुली ने मेरे दिमाग में यह ख्याल पैदा किया कि वह मर चुकी थी.इतना कहकर वह शख्स निढाल पड़ गया.थोड़ी देर आराम करने के बाद वह पुनः बोला,’आप आसानी से समझ सकते हैं कि क्या हुआ होगा?उस रात उत्तेजित अवस्था में मुझे यह कतई ध्यान नहीं रहा कि मैंने उसे दर्द की दवाई वाली शीशी की जगह जहर वाली शीशी थमा दी थी जो मैंने अपने खात्मे के लिए रखा था.

आपने उस रात बताया था कि कोई शख्स था जिसे वह प्यार करती थी.वह उसका रिश्तेदार था,उस पर बोझ था और उसी ने उसका जीवन बर्बाद किया था.आपकी बात सच निकली.वह व्यक्ति जिसे उसने पैसे भेजे थे,उसका सगा भाई था और बेरोजगार था.मैं अबतक केवल इसलिए जीवित रहा कि उस व्यक्ति के बारे में अपनी पत्नी की इच्छापूर्ति कर सकूं.मैं एक महीने पहले भारत आया और पुरी होते हुए यहां पहुंचा.मैंने सारी धन-संपत्ति उसके नाम कर दिया है.अब वापस अपने वतन लौटने की सोच रहा हूँ ताकि शांति से मर सकूं.सिर्फ आपसे मिलने की आस बाकी थी,वह भी पूरी हो गई.इतना कहकर वह बिस्तर पर गिर पड़ा.

मैंने सांत्वना भरे हाथ उसके माथे पर रखा और अपने कार्य के लिए निकल पड़ा.दो दिन बाद ही उसके होटल के एक स्टाफ ने मुझे खबर दी कि विंगेट इस दुनियां में नहीं रहा.जब उसका शव कब्रिस्तान रवाना हुआ तो उसकी शवयात्रा में शामिल होने वाला एक मात्र व्यक्ति मैं ही था.

एक छोटी सी गलतफहमी या मन में पल रहे शंका के जीवाणु से घर-परिवार के बिखराव की अनेकों कहानियां पढ़ी थीं,और कई हिंदी फिल्मों में भी देखा था,लेकिन प्रत्यक्ष रूप से शंका और संदेह के कारण विंगेट दंपत्ति को अपनी आँखों के सामने मौत के आगोश में सोते हुए पाया.

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Thursday, February 5, 2015

ओऽम नमः सिद्धम

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ग्रामीण अंचलों में बोलचाल में प्रयुक्त ‘ओनामासीधं’ शब्द दरअसल संस्कृत भाषा के प्राचीनतम वैयाकरण महर्षि शाकटायन के व्याकरण का प्रथमसूत्र-‘ओऽम नमः सिद्धम’ है.पहले बच्चों का विद्यारंभ कराते समय सबसे पहले इसी सूत्र की शिक्षा दी जाती थी.इसके बाद ही वर्णमाला का नंबर आता था.

प्रारंभिक शिक्षा का आदिसूत्र होने के कारण कालांतर में यह शब्द विद्यारंभ का पर्यायवाची बन गया और अपभ्रष्ट रूप में लोग इसे ‘ओनामासी’ कहने लगे.कालांतर में इसका प्रयोग व्यंग्यार्थ में होने लगा.जो बच्चे किसी भी कारण से न पढ़ पाते,वे कहने लगते-ओनामासीधं.

वैसे इस सूत्र –‘ॐ नमः सिद्धम’ का भावार्थ स्पष्ट है कि ‘जिसने योग या तप के द्वारा अलौकिक सिद्धि प्राप्त कर ली है,या जो बात तर्क और प्रमाण के द्वारा सिद्ध हो चुकी है,उसे नमस्कार.’

भारतीय भाषाओँ में वर्णमाला चूंकि वेद-सम्मत तथा स्वयंसिद्ध मानी जाती है,अतः कहा जा सकता है कि ‘सिद्धम्’ प्रयोग उसी के निमित्त किया गया है.कुछ लोग इसका संबंध गणेश,वाग्देवी तथा जैन तीर्थंकर महावीर से भी जोड़ते हैं.

‘पाटी’ शब्द किसी विषय की विधिवत शिक्षा या पाठ के अनुक्रम के अर्थ में प्रयुक्त होता है.इसका निकटतम पर्याय ‘परिपाटी’ माना जा सकता है.ज्योतिर्विद एवं गणितज्ञ भास्कराचार्य ने अपने ग्रंथ ‘लीलावती’ को ‘पाटीगणित’ के ही रूप में संबोधित किया है.स्पष्ट है कि पाटी शब्द भाषा और गणित के प्रारंभिक पाठों के लिए प्रयुक्त होता था.यह धारणा प्रचलित है कि बच्चों से ‘पाटियाँ’ लकड़ी के तख्तों पर ही लिखवायी जाती थी,इसलिए ये तख्तियां ही पाटी बन गयीं.

पाटी का संबंध मात्र भाषा ज्ञान से है,संख्या में केवल चार हैं.इसलिए ‘चारों पाटी’ शब्द प्रचलन में आया.पहले पाटियां पढ़ाई जाती थीं,लेकिन ब्रिटिश शासन में उनकी शिक्षा पद्धति के साथ इन पाटियों की पढ़ाई बंद हो गयी.इनको पढ़ाने वाले सिर्फ ग्रामीण क्षेत्रों में रह गए.

संस्कृत के विद्वान,विशेषकर पाणिनीय व्याकरण के अध्येता,तो पहले ही इन पाटियों से नफरत करते थे,अन्य शिक्षित वर्ग भी इनसे परहेज करने लगा.इसका कारण था कि यह इतना कठिन था कि इनकी पढ़ाई का औचित्य ही समझ में नहीं आता था.अब ये सिर्फ बुंदेलखंड के ही कुछ क्षेत्रों में सीमित होकर रह गयी हैं.

हालांकि ये पाटियां निरर्थक-सी प्रतीत होते हुए भी निरर्थक नहीं हैं.इनके तात्पर्य और भावार्थ का कुछ-कुछ अनुमान ‘कातंत्र व्याकरण’ से लगाया जा सकता है.’कातंत्र व्याकरण,व्याकरण के ‘पाणिनि संप्रदाय’ से भिन्न है और शर्ववर्मा की रचना कहा जाता है.कातंत्र व्याकरण के पहले चारों पाद इन चारों पाटियों से काफी मेल खाते हैं.

पाटियों के साथ ‘लेखे’ और ‘चरनाइके’ भी पढ़ाये जाते रहे हैं.इनका प्रचार किसी न किसी रूप में आज भी है.ये हैं-गिनती,पहाड़े,पौआ,अद्धा,पौना,सवैया,ढैया,हूंठा,ढौंचा,पौंचा,कौंचा,बड़ा इकन्ना,विकट पहाड़ा और ड्योढ़ा.कौंचा का प्रचार अब नहीं रहने के कारण इसे हटाकर कुल तेरह ही लेखे हैं.चरनाइके वस्तुतः नीति और शिष्टाचार सम्बन्धी वाक्य होते हैं.इनके द्वारा आचार-विचार की शिक्षा दी जाती है.मान्यता है कि इनकी रचना चाणक्य सूत्रों के आधार पर हुई है.

पाटियों को हाथ पर ताल देकर गा-गाकर पढ़ाया जाता था.प्रत्येक सूत्र के प्रथम अक्षर पर ताल देते हुए दो तालों के मध्य लगभग आठ मात्रा का अंतर रखा जाता था.ताल के बाद प्रत्येक पांचवीं मात्र पर दायीं हथेली ऊपर की और करके खाली प्रदर्शित की जाती थी.पाटी पढ़ने में संगीत के ‘कहरवा’ ताल का उपयोग किया जाता था.किसी कठिन तथा नीरस विषय को बच्चों को याद कराने का यह सर्वोत्तम तरीका था.दक्षिण भारत की संगीत शिक्षा में इस तरह का प्रयोग आज भी देखा जा सकता है.