Thursday, April 2, 2015

रुके रुके से कदम

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मखमूर देहलवी ने  खूब कहा है.....

एक न एक दिन अपनी मंजिल पर पहुँच लेंगे जरूर
जो कदम उठाते हैं आसानी से मुश्किल की तरफ

कदम तो मंजिल की तरफ सभी उठा लेते हैं लेकिन मंजिल तक पहुंचने का सब में माद्दा नहीं होता.मंजिल तक पहुंचने में कई बाधाएं आती हैं लेकिन जो डटे रहते हैं वे जरूर पहुँचते हैं.सफलता आसानी से नहीं मिलती.

असफलता के नाम से हम सभी डरते हैं.सफलता,समृद्धि तभी मिलती है,जब उसके बारे में सोचते हैं.जो व्यक्ति सिर्फ असफलता की बात सोचता है,सफलता उसके बस का रोग नहीं.सफल चिंतन को ही सफलता का वरदान प्राप्त है.बुरी घटनाओं,बुरी बातों से हमेशा ग्रस्त रहना अज्ञानता है.हमारा मन बहुत जल्दी भयभीत हो जाता है.इसे मन से दूर फेंकने का एक ही रास्ता है कि हम सकारात्मक सोचें.हम चिंतन करें,चिंता नहीं.

जीवन के सफ़र में बहुत से साथी मिलते हैं.कुछ मिलते हैं,जिन्हें दो पल याद रखते हैं.कुछ साथी कुछ दिन याद रहते हैं.फिर उनकी छवि धूमिल पड़ने लगती है.यादों की धुरी में आदर्श या प्रेरणा को संयोग से व्यक्ति बहुत कम अनुभव कर पाते हैं.

कभी-कभी एक साधारण सा व्यक्ति अपनी बातों,अपने काम,और अपने व्यक्तित्व से दूसरों को इस हद तक प्रभावित कर देता है कि अनजाने में ही वह प्ररणा बन जाता है.व्यक्तित्व केवल शारीर का उपरी,उसका बोलना,चलना,उठना,बैठना इन सबके साथ-साथ व्यक्ति के व्यक्तित्व के लिए जरूरी है उसका संबंध,उसके विचारों,उसके मन और उसके भीतर छिपी शक्तियों से है.कई बार हममें आत्मविश्वास की कमी के कारण अपने सामर्थ्य पर ही भरोसा नहीं हो पाता.

अपने भीतर जब झांकते हैं तो सबसे पहले चिंता और भय की आवाज सुनाई देती है.पूरा शरीर इसी से त्रस्त दीखता है.असफलता के नाम से हम डरते हैं.आज के प्रतियोगी युग ने मनुष्य को उपहार ने निराशा दी है.मन के भीतर किसी कोने में दुबकी ये निराशा मन पर बार-बार चोट करती है.सजे सुन्दर कमरों में बैठा निराशा से ग्रस्त थका-हारा मानव बहुत जल्दी टूटने लगा है.हम अपने ही विचारों से डर गए हैं.आशा एक सशक्त चुंबक है और वह अभ्यास से प्राप्त होती है.यह हमारी सबसे बड़ी पूंजी है.

आशा का दीपक पथ प्रशस्त करता है.आशा बनी रहे,इसलिए स्वामी विवेकानंद के विचार बहुत सुंदर हैं,”वह बात मन में ही न लाओ,जो तुम व्यक्त नहीं करना चाहते.”

सुख-सुविधाओं से पूर्ण आराम का जीवन सभी को प्यारा होता है.अपने लक्ष्य को पाने के लिए जब प्रयत्न करते हैं,तब अच्छे-बुरे दोनों तरह के लोग संपर्क में आते हैं,जो लोग हमारी बुराई करते हैं,उनसे हम दूर रहना चाहते हैं.यह एक स्वाभाविक प्रवृत्ति है.यदि हमें अपने आपको तराशना है,तो अपनी गलतियों को सुनिए,समझिए और चिंतन करिए ताकि आप मुक्ति पा सकें.

आज के मशीनी युग ने मनुष्य को यंत्रवत जीवन जीना सिखा दिया है.करुणा,दया,प्रेम,क्षमा ये सब नाम मात्र के लिए रह गई हैं.आज का चतुर मनुष्य समय के महत्त्व को पहचान चतुरता से धन कमाने की बात सोचने लगा है.सुख-दु:ख आपके अपने भीतर हैं.

हमारे मन की जो स्थिति होती है,हम हर एक चीज को उसी के रंग में रंग लेते हैं.हमारे मन के भाव सुंदर हैं तो चीज भी सुंदर है और हमारी मनस्थिति असुंदर तो चीज भी असुंदर जान पड़ती है.हमें अपने लक्ष्य की और बढ़ना है,पर यंत्रवत नहीं बल्कि अपने भीतर छोटी-छोटी खुशियों को समेटकर आगे बढ़ें.

व्यक्तित्व को उभरने के लिए आत्मविश्वास साहस का पर्याय है.मनुष्य की महानता साहस से मापी जाती है.शेक्सपियर ने कहा है कि,’साहस अवसर पहचानता है.’ हर रात सोने से पहले यह सोचें कि ‘मैं कर सकता हूँ और करूंगा.’ आत्मविश्वास से साहस की भावना पढ़ती है.लड़खड़ाते क़दमों से मंजिल तय नहीं की जा सकती है.कार्लाइल का कहना है कि ‘अपने काम को समझो और फिर दानव की तरह उस पर पिल पड़ो.’अपने आप जब अपने मन से बातें करते हैं तो शरीर के सेलों से घृणा,झूठ की बात न करके श्रेष्ठ भावना की बात करें.

मकड़ी के जालों की तरह विचार हमारे चारों ओर मंडराते हैं.अपने आपको प्रधानता देने के लिए बार-बार हमारी सोच अपने आप पर केंद्रित हो जाती है.दिन भर में ढेर सारे सही-गलत कार्यों को करने के बाद आत्मचिंतन जरूरी है.आदर्शों के विरुद्ध कोई भी काम करने पर मन में अंतर्द्वंद च्क्ल्ता रहता है.इससे बाहर निकलने के लिए जरूरी है कि अपनी गलती को स्वीकार कर आगे बढ़ने का प्रयास किया जाय.

अपने भीतर जो भी सृजन का अंकुर फूटा है,उसे दबाएं नहीं.कला,चित्रकारी,लेखन,कविता जिस भी रूप में धारा प्रवाहित हो उसे बहने देना ही उचित है.हम स्वयं ही पहचान सकते हैं कि कला का कौन सा कोना अपने मन को छूता है.जीवन अमूल्य है,समय की गति के साथ अपनी रचनात्मक क्षमता को पहचानना चाहिए.

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Thursday, March 26, 2015

बिन रस सब सून

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दुनियां में जिधर देखें,रस ही रस मिलता है.पृथ्वी के तीन चौथाई भाग में रस भरा हुआ है,शेष भाग में भी रस की कमी नहीं.सब तरफ रस की सरसता देखी जा सकती है.जल तो रस है ही काव्य के दस रसों के अलावा और भी अनेक रस होते हैं.आयुर्वेद में भी हेमगर्भ रस,अभृक रस,महामृत्युंजय रस आदि होते हैं.

रस लिया जाता है और दिया भी जाता है.हम सब लोग अच्छे काम,अच्छी बात में रस लेते हैं.विद्यापति की नायिका कहती है “कतमुख मोरि,अधर रस लेल”. भौरा अपनी जान की बाजी लगाकर भी रस पीता है.रसपान की तीव्रता ऐसी होती ही है –

“रसमति मालती पुनि पुनि देखि
पिबए वाह मधु जीव उपेरिव”

नायक,नायिका के मिलन रस में विद्यापति कल्पना कर लिखते हैं कि - नायक,नायिका के संयोग श्रृंगार में ‘औंधा चांद कमल का रसपान कर रहा है’.

रस आता है और रस जाता भी है.हम सब बातचीत में अक्सर कहते हैं कि उस व्यक्ति को बड़ा रस आता है या उसका रस चला गया.रस लगता है और जब किसी बात का रस लग जाता है तो बड़ा रस आता है.रस के बीच विघ्न आने पर रिस उत्पन्न होता है और रस चला जाता है.नयन तो रस से भरे ही रहते हैं,अतः कहा जाता है – “नैन सुधा रस पीजै.”

भौंरे रस के बड़े लोभी होते हैं और फूलों का रस चूसते हैं,रस पीते हैं,रस चुराते हैं.रस बरसता भी है.रस निकलता है और निकाला भी जाता है.कहते हैं कि शरद पूर्णिमा को रस बरसता है,इसलिए खीर से भरे बर्तन को खुले आकाश में रखा जाता है ताकि रस खीर में समा जाए. फलों का रस निकलता है और निकाला भी जाता है.आदमी का भी रस निकल जाता है,किसी का रस निचुड़ जाता है.किसी की आँखों में रस बरसता है,किसी की बातों में रस बरसता है.

सावन और फागुन में रस बरसता है.कवियों ने इस लिए कहा है......

रस बरसाता सावन आया,रस रंगराता फागुन आया

रस रिसता है और रस झरता है.बातों से और आँखों से रस झरता है.रस से भरे फल,रस से भरे यौवन,रसीले नेत्र,रसीले अधर रसीले नृत्य,रसीली अदाएं,रसीले छैल अच्छे लगते हैं.रस की फाग होती है तो आदमी विभोर हो जाता है......

“रंग सों माचि रही रस फाग
पूरी गलियां त्यों गुलाल उलीच में“

रस से अनेक शब्द बने हैं जो बड़े सरस हैं.रस से रसवंती बना है,जो नदी के लिए प्रयुक्त होता है.रस में परिपूर्ण होने से नारियों को भी रसवंती कहते हैं.रस से रसनिधि शब्द बना है जो समुद्र के लिए प्रयुक्त होता है –

“रसनिधि तरंगीन विराजति उगचि”.

रस रंग भी एक शब्द है.रस रंग में बड़ा आनंद आता है.खाद्य सामग्री को रसद कहते हैं.’रसभरा’ एक पौधा होता है जो ईख के खेत में होता है....

“बीच उखारी रस भरा,रस काहे न होय”

जो रस से परिपूर्ण हो उसे भी रसभरा या रसभरी कहते हैं.रस से भरी होने पर जीभ को रसना कहते हैं.’रस हाल’ का अर्थ प्रसन्न या सुखी होना है.रस से ही रसीन बना है जिसका अर्थ है आभा या चमक.रसाल आम को कहते हैं.रसौ या रसा का अर्थ पृथ्वी है.रसा से ही रसातल शब्द बना है.रसराज श्रृंगार रस को कहा जाता है.रसधार जल की धारा को कहा गया है.

गौरस का अर्थ दूध,दही आदि के लिए प्रयुक्त होता है.रामरस नमक कहलाता है जिसमे बिना सब रस नीरस लगते हैं.रस से भींगे,रस में पगे,रससिक्त या रसपगे कहलाते हैं.’पनरस’ लाल रंग का एक कपड़ा होता है जिससे विवाह में गठबंधन होता है.रसगुल्ले और रसमलाई में रस भरा होता है जिसे खाने में रस आता है.रस से ‘रसज्ञ’ बना है जिसका अर्थ है ज्ञाता.

रसविभोर होकर प्राचीन काल में देवतागण सोमरस पिया करते थे.गोपियाँ कृष्ण के रस में रसमग्न हो जाया करती थीं.रसिक जन ही रस का सच्चा आनंद ले पाते हैं.रस का संचार होता है और रस की अनुभूति होती है.

मंगल अवसरों पर रस से भरे कलश सजाए जाते हैं.स्नेह भी एक रस है.दीपक की ज्योति में भी रस होता है.कभी किसी काम में रस आता है तो कभी रस फीका होता है.अनुराग को भी रस कहते हैं.युवतियों के नेत्रों में श्रृंगार रस या प्रेम रस भरा होता है.....

रस श्रृंगार मज्जन किए,कंचन भंजन दैन
अंजन रंजन हूं बिना,खंजन गंजन नैन

रस से अनेक चीजें बनती हैं जिनका रसिकजन आनंद उठाते हैं.आम से आमरस,गन्ने के रस से रसखीर या रसिया,फलों के रस से अनेक द्रव्य बनते हैं.अंगूर के रस से द्राक्षासव,फूलों के रस से इत्र बनता है.फूलों का रस और रंग रंगाई के काम आता है.जिसमें रस हो उसे सरस और बिना रस की चीज को नीरस कहा जाता है.समीर रस से वृक्ष आच्छादित होते हैं.....

“पी पीकर समीर रस तट पर एक वृक्ष है झूल रहा”

रस सरसता भी है और रस में भी रस सरसता है.........

“हंसी करत में रस गए,रस में रस सरसाय”

जीवन में जब तक रस है तभी तक उल्लास,उमंग है.रसीले बोल बोलिए,रसीली मुस्कान बिखेरिये,रसीली चितवन से बचिए और जीवन की रस धारा में डूबते उतराते रहिए.

Thursday, March 19, 2015

शब्दों की तलवार

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आप बोलचाल में अक्सर किस तरह के शब्दों का प्रयोग करते हैं? अगर आप कम बोलते हैं तो नपा-तुला बोलते हैं.यदि आप बातूनी हैं तो शब्दों की तलवार भी चलाते रहते हैं.दरअसल बोलचाल में प्रयुक्त किये  जाने वाले शब्द आपके व्यक्तित्व को भी उजागर करते हैं.विभिन्न क्षेत्रों में बोलचाल का लहजा भी भिन्न-भिन्न होता है.

कई लोग शब्दों की तलवार चलाने में बड़े माहिर समझे जाते हैं.बात-बात में ही ऐसी बात कह देते हैं कि आप मन मसोसकर रह जाते हैं.उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप पर क्या बीत रही होती है.कहते भी न हैं कि उनकी जुबान कैंची की तरह चलती है.

कन्फ्यूशियस इस नतीजे पर पहुंचा है कि जो शब्दों की तलवार चलाने की आदत से लाचार हैं,उन्हें उसके घावों को सहने की क्षमता भी प्राप्त कर लेनी चाहिए,क्योंकि अक्सर उस तलवार से उनका ही अंगच्छेद होता है.अपनी ही शेखी से चोट खाए इंसान मूर्खतावश इन चोटों के लिए दूसरों को दोषी ठहराता है.

श्रीमद्भागवत में इस प्रकार के व्यवहार पर प्रश्न है......

जिह्वां क्रचित्
संदशति स्वदविद्भः
तद्वेद्नाया कत
माय कुप्यते |

(अपने ही दांतों से अक्सर अपनी जीभ के काट लेने पर जो पीड़ा होती है,उसके लिए काटनेवाला आखिर किस पर क्रोध करेगा)

सत्ता का नशा जब सर पर चढ़कर बोलने लगता है तो शब्दों की तलवार अक्सर चलते देखे जाते हैं.राजनीतिज्ञ शब्दों की तलवार चलाने में बड़े माहिर होते हैं. हम प्रायः ही राजनीतिज्ञों को शब्दों की तलवार चलाते देखते सुनते रहते हैं- जब कोई राजनीतिज्ञ शब्दों की तलवार चलाते हुए कहता है कि हम केंद्र को घुटने टेकने पर मजबूर कर देंगे.

कवि फिरदौसी ने बड़े व्यंग्य से ऐसे लोगों के लिए लिखा है कि तलवारें म्यान से बाहर निकालना तो अनाड़ियों के लिए भी आसान है,किन्तु उन्हें शत्रु की गर्दन तक पहुंचाना मौत और जिंदगी के सारे फासले को तय करने की कुव्वत दिखलाना है.

खलील जिब्रान की एक बोध कथा शायद ऐसे ही लोगों के लिए है.......

पुराने नगर अंताकिया में आसी नाम की नदी अंताकिया नगर को दो भागों में बाँटती थी.राजा सरबाओ ने आसी नदी पर एक पुल बनाकर नगर के दोनों भागों को जोड़ दिया.जब पुल बनकर तैयार हुआ तो उस पर इस इबारत का एक शिलालेख भी लगा दिया गया कि – “यह पुल अंताकिया नरेश सरबाओ ने प्रजा की सुख-सुविधा के लिए बनवाया है.”

कई बरसों तक इस पुल पर मुसाफिर आते-जाते रहे.इस पुल के जरिये अन्ताकिया नगर के दिल ही नहीं एक हो गये बल्कि नगर का कारोबार भी काफी बढ़ गया.लोग मुक्तकंठ से राजा के दयालु ह्रदय की प्रशंसा करने लगे.

एक दिन एक अस्त-व्यस्त सा युवक इस पुल पर से गुजरा.शिलालेख को देखकर वह रुक गया.उसने इस शिलालेख को उखाड़कर फेंक दिया और उस स्थान पर लिख दिया – “इस पुल को बनाने में जो पत्थर इस्तेमाल किये गए हैं उन्हें पहाड़ों से खच्चर ढोकर लाये हैं.अतः इस पुल पर यात्रा करते समय आप अंताकिया शहर के उन खच्चरों की पीठ पर चलते हैं जो इस पुल के वास्तविक निर्माता हैं.”

पुल पर सफ़र करने वाले लोगों ने इस इबारत को पढ़ा तो कुछ को हंसी आ गयी,कुछ को इस दूर की सूझ पर आश्चर्य हुआ,कुछ और भी गहराई में गए,उन्हें दार्शनिकता का पुट मिला.कुछ ऐसे लोग भी थे जिन्होंने कहा – “यह किसी खफ्ती के दिमाग का फितूर है.उसके दिमाग के पेंच ढीले हो गाए हैं,नहीं तो इस प्रकार की बेवकूफी के क्या मतलब हैं?”

पुल पर चलनेवाले मुसाफिरों की बातों को एक दिन वहां छाया में विश्राम करने वाले खच्चरों ने भी सुना तो एक दूसरे की तरफ़ गर्व और तृप्ति का आदान-प्रदान करते हुए वे आपस में कहने लगे - “इस शिलालेख में तो ठीक ही लिखा है.इस पुल के पत्थर तो हम ही ढो-ढोकर लाये हैं.राजा ने तो हुक्म भर दिया था,पुल का निर्माण तो हमारे ही जीवट से हुआ है.मगर इस दुनियां की तो रीत ही निराली है.यहाँ मेहनत की महिमा कोई नहीं गाता,सत्ता की महिमा ही सब गाते हैं.मगर इससे क्या होता है? एक न एक दिन तो खच्चरों की पैरवी करने वाला भी कोई पैदा होता है - हमारे लिए यही बहुत है.”

तो अगली बार जब आप शब्दों की तलवार चलाएं तो यह भी ध्यान रखें यह आपको भी घायल कर सकता है.

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