Friday, May 1, 2015

सोप-ऑपेरा की दुनियां

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सोप-ऑपेरा  हमलोग का एक दृश्य 
भारत में ऑपेरा तमाशा,नाचा तथा पवाड़ा के रूप में सदियों से प्रचलित है.इस विधा में किसी नाटक या गाथा को गा-गाकर एवं अभिनय के साथ दर्शकों के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है.आज भी यह विधा उत्तर प्रदेश,महाराष्ट्र तथा मध्य प्रदेश में खूब प्रचलित है.तत्कालीन प्रथा के परिप्रेक्ष्य में पांडवानी गायन भी इसका एक उदहारण है.हममें से अधिकांश ने तीजन बाई का नाम खूब सुना है और प्रत्यक्ष रूप से या टी.वी पर उन्हें लम्बे समय तक पांडवानी के रूप में महाभारत की कथा को एक नए अंदाज में प्रस्तुत करते और सराहे जाते देखा है.

एक अमेरिकी कंपनी ने अपने एक प्रोडक्ट,एक साबुन यानि सोप और पाउडर के प्रचार के लिए एक नाटकीय ढंग अपनाया और उसके विज्ञापन अमेरिकी टी.वी से प्रसारित किया.अमेरिका में उस समय महिलाएं दिन में घर में ही होती थीं.उसे देखने वाली महिलाएं इन विज्ञापनों से प्रभावित होतीं और इस कंपनी के प्रोडक्ट को घर-घर बेचा करती थीं.विज्ञापन का यह तरीका काफी सफल रहा.

इस सोप के प्रचार यानी सोप-ऑपेरा के दौरान अमेरिकी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के कर्णधारों को कुछ नया करने को सूझा.चिकने संगीतमय प्रोडक्ट के विज्ञापन से प्रभावित होकर चिकने संगीतमय नाटक लिखे गए.कुछ ही वर्षों में अमेरिकी टी.वी द्वारा पंद्रह मिनट का धारावाहिक प्रसारित किया जाने लगा,और यह काफी लोकप्रिय हुआ.अमेरिका में औद्योगिक संस्कृति के पनपने के कारण लेखकों तथा कलाकारों के लिए विज्ञापनों के अलावा और कोई प्रगतिशील राह नहीं थी.फलतः वे लोग अमेरिका से पलायन करने लगे छठवें दशक के बाद औद्योगिक नीति में सुधार हुआ,जिससे लेखकों,पत्रकारों तथा कलाकारों को नया रचनात्मक कार्य मिलने लगा.

पहले अमेरिका में सोप-ऑपेरा केवल महिलाओं तक सीमित था,किंतु अब यह पुरुषों के लिए भी काफी आकर्षक हो गया है.बंगाल में सत्यजीत रे ने ‘पाथेर-पांचाली’ में कुछ हद तक सोप-ऑपेरा का प्रयोग भी किया है.सत्यजित रे को ऑस्कर अवार्ड से भी नवाजा गया.

यदि हम अपने लोक-गाथाओं के कलाकारों पर विचार करें तो यह पता चलता है कि वे सोप-ऑपेरा शब्द को भी नहीं जानते,किन्तु वे उसकी अभिव्यक्ति लोकगाथाओं के माध्यम से गा-गाकर, नाचकर,नाटकीयता के साथ खूब अच्छी तरह से करते हैं.भारत में सोप-ऑपेरा का चलन सदियों पुराना है जो सुषुप्तावस्था में था और छठे-सातवें दशक में पुष्पित-पल्लवित होकर नए रूप में सामने आया है.

महाराष्ट्र में अक्षय तृतीया का त्यौहार बड़े तामझाम के साथ मनाया जाता है.इस त्यौहार में झूले डाले जाते हैं और महिलाएं झूला झूलते हुए कभी रोमांटिक,तो कभी ठिठोली भरे गीत गाती हैं.इसी तरह सावन में सारे भारत में झूले पड़ते हैं और प्रेम के रस से सराबोर गीत परवान चढ़ते है.आज औद्योगीकरण के कारण न तो शहरों में अक्षय तृतीया पर झूले पड़ते हैं और न सावन के महीने में.अक्षय तृतीया सिर्फ सोने-चांदी की खरीददारी तक सीमित होकर रह गयी है.

भारत में आधुनिक नाटकीय सोप-ऑपेरा लाने में तत्कालीन दूरदर्शन के वरिष्ठ अधिकारी मनोहर सिंह गिल का विशेष हाथ रहा है.अमेरिका से लौटने के बाद उन्होंने सोप-ऑपेरा से संबंधित जानकारी मनोहर श्याम जोशी को सौंपी थी.मनोहर श्याम जोशी को भारत में आधुनिक सोप-ऑपेरा का जनक माना जाता है. उनके लिखे हमलोग,बुनियाद तथा हमराही जैसे सफलतम सोप-ऑपेरा धारावाहिक रूप में दूरदर्शन से प्रसारित हुए और बेहद लोकप्रिय हुए.इनके कलाकार घर-घर में जाने-पहचाने हो गए और मोहल्ले,गली चौराहों पर इनकी चर्चा होने लगी.

सोप-ऑपेरा में वस्तुतः जीवन की सूक्ष्म भावनाओं का समावेश होता है.इसमें यथार्थ जीवन के सामाजिक परिवारों के सुख-दुःख की भाव प्रवणता,नाटकीय एवं अति-नाटकीयता  होती है.इसमें चिकनी चुपड़ी चापलूसी,प्रेमालाप को वास्तविकता का पुट दिया जाता है.जिस तरह सोप यानि साबुन में झाग होता है,उफ़ान होता है,चिकनाहट होती है.उसी तरह सोप-ऑपेरा में ऐसा ही सब कुछ होता है यानी वह रूपक है,चापलूसी,जी-हुजूरी,चिकनी-चुपड़ी बातों का.

जिन पारिवारिक रचनाओं में साबुन के झाग के सामान भावनाओं को उभारकर जो कड़ियां टी.वी द्वारा प्रसारित की जाती हैं,उसे सोप-ऑपेरा कह सकते हैं.ऑपेरा अर्थात संगीतमय नाटक,जिसमें वाद्य-यंत्रों के साथ दर्शकों के समक्ष नाटकीय प्रहसन का प्रस्तुतीकरण होता है.

सोप-ऑपेरा विधा में लेखक को काफी स्वतंत्रता मिल जाती है.पटकथा में वह अपने पात्रों का क्रिएशन विभिन्न रूप में कर सकता है.कोई भी नेगेटिव पात्र पॉजिटिव या हीरो पात्र की ओर लुढ़क सकता है.किस पात्र को प्राथमिकता दी जाए,उसके लिए भी पटकथा लेखक स्वतंत्र है. 

हंसना,रोना,झगड़ना,रूठना,मनाना आदि भावों को पात्रों में कूट-कूटकर भरा जा सकता है.यों कह सकते हैं कि सोप-ऑपेरा में थोड़ा रोना,थोड़ा हंसना,थोड़ी पारिवारिक     कलह,आदर्श,स्वार्थीपन,जोशिलापन,रसिकता,ताने और कुछ सस्पेंस भी होने चाहिए.

यह चौराहे पर लगे सार्वजानिक सूचना देने वाले होर्डिंग की तरह है जो चलते-फिरते लोगों का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट करता है. 

Monday, April 20, 2015

चम्मच नियरे राखिए....


आजकल आदमी से ज्यादा चर्चा चम्मचों की होती  है,कोई समझ नहीं पाता कि चमचे इतने महत्वपूर्ण क्यों हैं कि उनकी सार्वजनिक रूप से चर्चा हो.शायद चम्मच शब्द से चमचा बना होगा.जब से हमें आधुनिक होने का भ्रम होने लगा,चम्मच हमारे जीवन में प्रवेश कर गया.डाईनिंग टेबल के साथ-साथ चम्मच हमारे जीवन में प्रवेश कर गया.इससे पहले तो हम पीढ़े या मोढ़े पर बैठकर खाना खाने के आदी रहे हैं.

चम्मच परिवार में कई भाई-बहन हैं.ज्यादातर चम्मच से बड़े हैं,उनकी चर्चा कभी नहीं होती.दरअसल उन भाई-बहनों का कार्य भोजन बनाने और टेबल पर सुव्यवस्थित करने का है.ये भाई-बहन कड़छा,बटलोई, खोंचा आदि हैं.इन्हें भोजन करने के काम में नहीं लेते.चम्मच ही ऐसा उपकरण है जो भोजन के समय काम में लाया जाता है.

चम्मच भी कई प्रकार के हैं.आजकल टेबल पर चम्मच का उपयोग तो होता ही है,बड़े-बड़े राजनीतिज्ञों,बड़े अभिनेताओं,अधिकारियों और सुविधाभोगी वर्ग के अलावा अघोषित राष्ट्रीय खेल क्रिकेट में भी मनुष्य रूप चमचों का उपयोग होने लगा है और यही कारण है कि चमचों के मूल्य में भारी वृद्धि हुई है.चम्मच उपयोगिता और हैसियत के अनुसार रखे जाते हैं,वे स्टील के भी हो सकते हैं और चांदी के भी.

सोने के चम्मचों के जिक्र नहीं मिलता.यदि सोने के चम्मच होते तो उनकी चोरी के अनेक किस्से मिलते.चम्मच छोटे,बड़े,मध्यम आकार के हो सकते हैं,किन्तु उनकी बनावट और चरित्र में भी अंतर पाया जाता है,जो जब उपयोग में लाया जाए तभी महत्वपूर्ण होता है.चम्मच की अपनी कोई उपयोगिता नहीं होती.अवसर उनकी उपयोगिता का निर्धारण करता है.चम्मच चौड़े मुंह का,गोल,आड़ा कटा,तिरछा भी हो सकता है.चम्मच अवसर पर अपनी उपयोगिता सिद्ध करते हैं.

यदि आप चिंतन करें तो पाते हैं कि चम्मच में बड़े-बड़े गुण हैं.चमचे आदमी के स्तर को सूचित करते हैं.सामान्य स्तर का आदमी एक सेट चमचे ही रखता है किंतु उच्च श्रेणी के राजनेता के असंख्य चमचे पाए जाते हैं.बड़े राजनेता के चमचे डायनिंग टेबल के साथ बदल जाते हैं.यह उसकी सुधा का सवाल है,किंतु राजनेता का स्तर हमेशा उसके उपलब्ध चमचों से नापा जाता है.

चमचे वह कार्य करते हैं जो कोई कर ही नहीं सकता.चमचे अपने चहेते व्यक्ति के हाथ में आकर उसके मुंह तक भोजन पहुंचाते हैं.चाहे वह रिश्वत खाएं या अन्न,चमचे उनके मुंह तक ले जाकर ही संतुष्ट होते हैं.वे अपने चहेते राजनेता या अधिकारी के हाथ गंदे नहीं होने देते.जमकर खाएं फिर भी कोई साक्ष्य न रहे इस बात की गारंटी चमचे ही देते हैं.इसलिए बदनामी का ठीकरा उन्हीं के सर फूटता है.

चम्मच सदा से ही निःस्वार्थ सेवा करते हैं.कितना ही गर्म मसाला हो वे अपना सर उसमें डाल देंगे और माल उठाकर मालिक तक पहुंचा देंगे.कभी उसमें हिस्सा नहीं मांगेंगे.वे कितने ही कष्ट उठाएं अपने मालिक के आगे कभी इसका उल्लेख नहीं करेंगे.

वे अपनी समस्त सफलताओं का अधिकारी अपने हितकारी को मानते हैं.स्वाद लेने का अधिकार चमचे को नहीं है,वह तो अपने आका को स्वाद पहुंचाने का कार्य करते हैं.चमचे इस मामले में मौन साधक हैं.वे अपने उल्लेखनीय कार्यों का कभी उल्लेख नहीं करते.

चमचे बड़े त्यागी होते हैं.वे अपना काम करने के बाद,कहीं भी रखिए,चुपचाप पड़े रहते हैं.वे कभी मांग पेश नहीं करते.वे भाग्य के भरोसे रहते हैं.बारह बरस में घूरे के दिन फिर जाते हैं पर उनके भी भाग्य फिरेंगे,यह उनका विश्वास रहता है.

ऐसा भी नहीं है कि चमचे मौन रहकर सब चुपचाप सहन करते हैं,इसलिए उनका कोई मूल्य नहीं है.चमचों को संभालकर रखना अपने आप में बड़ी जिम्मेवारी वाला काम है.जरा सी गफलत हुई और अच्छा-भला चमचा गायब.चम्मचों की सफाई,धुलाई का नित्य प्रतिदिन का कार्य होता है.समझदार व्यक्ति चमचों की धुलाई,सफाई कर न सिर्फ उन्हें चमकाता है,उन्हें ऊँचे स्थान पर स्थापित भी करता है.वे चमकते-दमकते, अच्छे स्थान पर काबिज  होकर चमचे रखने वाले की प्रतिष्ठा भी बढ़ाते हैं.

चमचे रखना एक गंभीर मामला है,यदि चमचा उचित स्थान पर स्थापित न किया जाय,उसके साफ़-सफाई एवं स्वच्छता पर ध्यान न दिया जाय तो वह चमचा खतरनाक सिद्ध हो सकता है,वह स्वास्थ्य बिगाड़ सकता है,उसे देखकर उसके आका की इज्जत दो कौड़ी की हो सकती है,वह भले ही कुछ बोले नहीं लेकिन उसका अबोला भी अत्यंत महत्वपूर्ण होता है.

चमचे रखना साधारण आदमी का काम नहीं है.आम आदमी चमचों के प्रति उत्सुक तो रहता है,किंतु चमचा बनना पसंद नहीं करता.हर कोई चमचे के प्रति घृणा या मजाक की धारणा बनाए रखना दिखाता है पर कौन कब अनायास चम्मच धर्म निभाने लगता है,कोई नहीं जानता.बुद्धिहीन चमचे जब किसी बड़े आदमी के हाथ में पड़कर चमकते हैं तो अच्छे विचार करने लगते हैं कि काश ! हमें भी यह सौभाग्य मिलता.वीतरागी और वैराग्य धारण करने वाले भी आजकल चमचे रखने लगे हैं.चम्मच आधुनिक युग की आवश्यकता है,कह सकते हैं कि यह एक आवश्यक बुराई है.

Keywords खोजशब्द :- Value of Spoons,Yes Man Tradition

Thursday, April 9, 2015

इक हंसी सौ अफ़साने

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“आह ! तुम्हारे उजले दांतों के बीच फंसी दूब के साथ
वह हंसी आज भी मेरी नींद में गड़ती है.”

प्रसिद्ध कवि स्व. शमशेर बहादुर की यह पंक्तियाँ हमारे मानवीय जीवन के अन्तःस्थल में हंसी की परतें भले ही न खोलती हों,पर हंसी के भीतर छिपे प्रेम के आशय को जरूर प्रकट करती हैं,जो आदमी की नींद में भी दूब की तरह गड़ रही है.

आमतौर पर जब हम मुस्कुराते हैं उसका सामान्य आशय हम दुसरे के प्रति प्रेम प्रकट करते हैं या प्रसन्न होते हैं.इसलिए सामान्य हंसी के पीछे छिपी होती है- हमारी प्रसन्नता.मसलन जब किसी किलकते हुए बच्चे को देखकर मां हंसती है,दो हमजोली बच्चे गेंद पाने पर एक साथ उछलकर हँसते हैं या जब हमारी कोई प्रिय चीज खो जाए और हम उसे बेतहाशा खोज रहे होते हैं,लेकिन कई दिनों के बाद वह अचानक मिल जाए तो हम अकेले ही प्रसन्न होकर हंस पड़ते हैं.

हंसी का सामान्य मनोविज्ञान तो यही है कि हमारे हंसने में दूसरे का शामिल होना जरूरी है.हम अकेले नहीं हंस सकते.हम प्रायः किसी दुखी व्यक्ति को यह कहता हुआ पाते हैं कि,उसकी हंसी महीनों से गायब है.पर हंसी का असामान्य पक्ष भी है और उसका आशय समझ पाना बेहद कठिन है.एक असामान्य मस्तिष्क का व्यक्ति अँधेरे में अकेले या भीड़ में सार्वजनिक रूप से हँसता दिखाई पड़ जाता है तो उसके असामान्य हंसी की वजह कुछ और है.

आज दुनियां में असामन्य हंसी के अध्ययन को लेकर कई मनोवैज्ञानिक कार्य कर रहे हैं,लेकिन वे आज तक उन आसामान्य हंसी के अर्थ को आज तक नहीं समझ पाए.सामान्य हंसी का आशय यदि सहज प्रसन्नता है तो असामान्य हंसी का कारण प्रायः दुःख,दुविधा,द्वंद और भयानक अत्याचार हो सकते हैं. प्रायः देखा जाता है कि जब व्यक्ति बहुत बड़े दुःख और मानसिक यंत्रणा से गुजर रहा होता है तब अपने दिल का हाल हंसकर बताता है.

यह भी विचार करना जरूरी है कि एक दुखी व्यक्ति को अपनी पीड़ा का बयान रोकर करना चाहिए या दुखी आहत स्वर में,पर उसकी जगह वह हंसी को चुनता है.वह हंसी को इसलिए चुनता है कि दुःख को बयान करने के सारे शब्द अपर्याप्त लगते हैं,तब वह हँसते हुए हलके-फुल्के शब्दों से खेल करता है. दरअसल इस हंसी के पीछे एक बड़ा दुःख रिसता हुआ व्यक्ति की वाणी में हंसी का ज्वार छोड़ता है.  

हिंदी सिनेमा के सबसे बड़े शोमैन स्व. राज कपूर की प्रसिद्ध फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ की याद हम सबको है.उस फिल्म का मुख्य पात्र  जिंदगी की ‘सर्कस’ का ‘जोकर’ है.जब भी उसके जीवन में विडंबना और ट्रेजेडी के मोड़ दिखाई पड़ते हैं,तब वह ठहाका मारकर हंस पड़ता है.पूरी फिल्म में जोकर के बहाने राजकपूर की हंसी किसी रबाब की तरह बजती रहती है.पर जब उसे अकेलापन घेरता है तब वह खामोश हो जाता है.उस जोकर की हंसी में जिंदगी की अनेक दगाबाज ट्रेजडियां हैं,जिसे भुलाकर वह हमेशा हंसने का अभिनय करता है.

नाटक मंडलियों में जोकर को हमेशा हँसते,मजाक करते,दूसरों को हंसाते हुए पाते हैं.पर उस मजाकिए हंसोड़ और मुंहफट जोकर की जिंदगी में झांकें तो पाते हैं कि वह अपने सीने में कितने गम छिपाए हुए है जिसे दबाकर वह जिंदगी के नाटक में एक विवश कथानक बनकर मंच पर हंस रहा होता है.पर उसकी हंसी के भीतर छिपा है - अथाह दुःख भरा सैलाब और सन्नाटा.

प्रसिद्ध इजराइली संत जरथुस्त्र ने अपने एक शिष्य से कहा था कि – “मुस्कुराना किसे बुरा लगता है किंतु बेवजह मुस्कुराना आपकी संस्कृति के खिलाफ जाता है.” मुस्कुराना तभी न्यायसंगत है जब आपकी मुस्कराहट का प्रभाव दूसरे के अंतर्मन में बैठ जाय.मुस्कान तो आत्मविश्वास की की कुंजी है जिससे समस्याओं के बड़े से बड़े भवन सामान्यतः खुल जाते हैं.

प्रसिद्ध हास्य अभिनेता चार्ली चैपलिन के बारे में कहा जाता है कि वे दुनियां के बेजोड़ हास्य अभिनेता थे.उनके अभिनय में हंसी के फव्वारे या फुलझड़ियाँ ही नहीं फूटती थी बल्कि उनके अभिनय में व्यंग्य और विडंबना का समुद्र हिलोरें मारता था.एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था कि दरअसल मेरी हंसी के पीछे छिपी होती है मेरी जिंदगी की असफलताएं.मैं अपने हंसी भरे अभिनय में अपनी असफलता को छिपाने की कोशिश करता हूँ.मुझे संतोष है कि मेरी असफलता को छिपाने की कला आज तक दर्शक नहीं जान पाए.

चार्ली चैपलिन के इस वक्तव्य में यह आशय छिपा है कि जिंदगी के मंच पर जो खूब हंसता दिखता है,वह रोता हुआ नेपथ्य में ओझल हो जाता है.प्रसिद्ध कवि और नाटककार ब्रेख्त ने अपनी एक कविता में कहा था कि ‘जो लोग हंस रहे हैं उन्हें अभी भयानक खबर सुनायी नहीं गयी है.’

अक्सर जब हम दुःख और अवसाद में डूबे आदमी की असामान्य हंसी सुनते हैं तो ताड़ जाते हैं और पूछते हैं कि,क्या बात है? और वह मुंह फेरते हुए जवाब देता है,कुछ नहीं......हम देर तक उसके अधूरे वाक्य का पीछा करते हैं और उसकी हंसी के पीछे दुःख को पकड़ने की कोशिश करते हैं.

जैसे-जैसे जमाना बदल रहा है मनुष्य के स्वभाव में भी काफी परिवर्तन आ रहा है.अक्सर महानगरों में रहने वाले लोगों के बारे में धारणा है कि शहर के लोग हँसते कम हैं.कई बड़े लोग सार्वजनिक रूप से हंसना अपनी शान के खिलाफ समझते हैं.आम जनजीवन में बेवजह हंसना मूर्खता का प्रतीक भी है और कई जगह उसे आज के तनावपूर्ण जीवन में बेहद स्वास्थ्य के लिए उपयोगी माना गया है.

हंसी के समानांतर मुस्कान सुंदरता का एक अनिवार्य उपकरण हो गया है.उपभोक्तावादी संस्कृति में यह व्यवसाय के रूप में उभर रहा है.विश्व के सौन्दर्य और मुस्कान की चर्चा जब भी होती है तो मोनालिसा की मुस्कान को अप्रतिम माना जाता है.

किसी शायर ने वाजिब ही कहा है .......

खामोश बैठें तो कहते हैं इतनी उदासी अच्छी नहीं 
जरा हंस लें तो मुस्कुराने की वजह पूछ लेते हैं