Thursday, April 24, 2014

मूक पशुएं और सौदर्य प्रसाधन















फैशन और सौंदर्य के प्रसाधनों की बढ़ती मांग के कारण मूक पशुओं,प्राणियों का अस्तित्व आज संकट में है.‘फर’ और ‘मखमली’ कोटों,सुगंधित शैम्पू,खाल से बने पर्स आदि की मांग लगातार बढ़ती जा रही है.यह सब अनेक मूक प्राणियों को बर्बरतापूर्वक वध करके प्राप्त किया जाता है.

खरगोश,लोमड़ी आदि को फार्मों में तब तक पाला जाता है जब तक कि इनकी खाल उतरने लायक न हो जाए.इनको क्लोरोफॉर्म युक्त एयरटाइट चैम्बरों में रखा जाता है.साँस न ले पाने के कारण यह धीरे-धीरे मर जाते हैं और फिर इनसे फर कोट तैयार किया जाता है.पानी में रहने वाला ‘मिंक’ नामक जानवर, कभी-कभी बाहर आते ही अपनी नरम और मुलायम खाल के कारण मौत का शिकार हो जाता है.दक्षिण अफ्रीका में पाया जाने वाला ‘चिनचिल’ नामक जानवर भी अकारण मौत का शिकार होता है.इनकी खालों से कोट बनाया जाता है.

‘फर’ उद्योग में काफी मूल्यवान समुद्री ‘सील’ मछली लगभग 450 कि.ग्रा. तक की होती है,लेकिन इसके छोटे –छोटे बच्चों का ‘फर’ काफी मुलायम तथा मूल्यवान होता है.इसके दो हफ्ते के बच्चे को माँ से अलग कर दिया जाता है.उसको डंडों से तब तक मारा जाता है जब तक कि वह मर न जाए.फिर एक सलाख बच्चे के सिर में घुसा दी जाती है.

चमड़ा ख़राब होने के डर से इसको गोली नहीं मारी जाती.कभी-कभी तो मरने से पहले बेहोशी की हालत में ही तुरंत खाल उतारने के लिए उसको चीर दिया जाता है.बेबस और लाचार सील अपने बच्चे का करूण क्रंदन सुनती और देखती रहती है.खाल उतारने के बाद खून से लथपथ मांस के लोथड़े को सूंघती है.लेकिन उसी के ‘फर से बना कोट कितने शौक से पहना जाता है.एक ‘फर’ कोट के लिए 5-6 सील,4-5 चीते,35 मिंक,उदबिलाव या खरगोश,10 बनविलाव,40 अमेरिकी रेकुम भालू चाहिए.

उदबिलाव को पकड़ने के लिए नुकीले दांतों वाला लोहे का पिंजरा होता है.ये पिंजरे काफी मात्रा में जंगल में बिछा दिये जाते हैं.इन पिंजरों मरण पैर फंसने पर उदबिलाव छोटने के लिए तड़पते रहते हैं.इसी हालत में लगभग 15-20 दिन भूखे-प्यासे रहते हैं.मरने पर उनके शरीर की खाल उधेड़ कर ‘फर’ कोट बनाये जाते हैं.

इसी प्रकार व्हेल मछली का शिकार एक ऐसे ‘हार्पून ग्रिनेड’ की मदद से किया जाता है जो इसके शरीर में जाकर फटते हैं.मरते समय अत्यधिक वेदना की वजह से एक विचित्र सी चीख की आवाज आती है.कुछ लोग इसका मांस खाते हैं.इसकी खाल से निकलने वाला तेल मिसाइल के पुर्जों में डाला जाता है.

सुगंधित तेल एवं अन्य प्रसाधन सामग्री के लिए कछुओं को भी नहीं छोड़ा जाता.समुद्र और नदियों से पकड़कर उन्हें बोरों में भरकर ट्रकों और ट्रेनों में लाड दिया जाता है.जीवित हालत में ही इनका मांस निकल लिया जाता है और वे बहुत धीरे-धीरे मरते हैं.इससे ‘टार्टिल ओडल’ बनता है जो मास्चराइजर्स के काम आता है.कछुओं की तस्करी भी की जाती है.दुनियां का तमाम हिस्सों में वन्य जीव अधिनियम लागू होने के बाद भी इन पधुओं का अवैध कारोबार चलता रहता है.

शैम्पू के लिए खरगोशों को मारा जाता है.शैम्पू की दो-तीन बूंदें खरगोश की आँखों में डाली जाती हैं,जिससे पता चल जाए कि उसको कितनी जलन एवं खुजली होती है.कुछ देर तक वह यों ही पड़ा रहता है.उसकी आँखों में छाले पड़ जाते हैं और वह पूरी तरह अँधा हो जाता है.इसके बाद वह मर जाते हैं.यह सब सिर्फ शैम्पू के परीक्षण के लिए किया जाता है जिससे इंसानों के बाल मुलायम और चमकीले रह सकें.इसी प्रकार आफ्टर शेव लोशन का भी सूअर पर परीक्षण किया जाता है.सुअरों के बालों का प्रयोग विविध प्रकार की वस्तुएं बनाने में किया जाता है.

जंगलों में रहने वाले साँपों को भी जिंदा मारा जाता है.सांप के सर पर एक बड़ी कील रखकर हथौड़े से वार किया जाता है.कुछ ही क्षणों में सांप तड़पने लगता है.तब एक आदमी सांप की पूँछ को पैर से दबाकर ब्लेड से चीरता है.एक चीरा गले पर लगाया जाता है.सांप की खाल जिंदा रहते ही उतार ली जाती है.सांप के लोथड़े से प्राण उसके बाद भी नहीं निकलते.कुत्ते या अन्य जानवर उसे जिंदा नोच-नोचकर खाते रहते हैं,सिर्फ इसलिए कि इससे आकर्षक लेडीज बैग,पर्स आदि बनाया जा सके.

नेवला,जो साधारणतया किसी को नुकसान नहीं पहुंचाता,इसे भी लोहे की गरम छड़ों से पीट-पीटकर अधमरा किया जाता है या फिर बिल से बाहर आते ही शिकंजे में इसकी गर्दन फंसाकर जरा सी मोड़ दी जाती है और वह मर जाता है.यह सब इसकी खाल के लिए किया जाता है.कंगारू के मरते ही,उसके मृत शरीर के सारे अंग काम में ले लिए जाते हैं. 

आस्ट्रेलिया के इयान बर्ट्स ने इससे पर्स बनाकर बेचने का इरादा किया और ऐसी विधि विकसित कर ली कि इसे रेजगारी रखने के पारंपरिक बटुओं के रूप में लोकप्रियता मिल गई. इन बटुओं को खरीदने वाले जापानी पर्यटक इसे सुख और समृद्धि का प्रतीक मानते हैं.इसलिए जापानी लोग उर्वरता की देवी की पूजा करने की सारी सामग्री इन्हीं बटुओं में रखने लगे.

धीरे-धीरे इयान के बटुए ने उन्हें करोड़पति बना दिया.अपनी दौलत तथा समृद्धि को जापानियों की कृपा मानने वाले इयान ने जापान में कंगारू फार्म खोला और कंगारू की दुम का सूप बेचने लगा.अनेक कंगारू असमय ही कालकवलित होने लगे.

हाथी दांत को प्राप्त करने के लिए प्रतिवर्ष कितने हाथी मारे जाते थे.हालाँकि वन्य जीव अधिनियम का कड़ाई से पालन होने पर इनकी मौतों पर रोक लगी है लेकिन दुनियां के कई हिस्सों में उस सिलसिला बदस्तूर जारी है.जानवरों में सबसे वफादार कुत्ता है.हंगरी के ‘शेफर्ड’ एवं ‘डलमेशियन’,’मास्टिफ’,विश्व का सबसे विशालकाय कुत्ता ‘जोरबा’,आस्ट्रेलियन कुत्ता ‘जोरबा’ जैसी कई नस्लें हैं.लेकिन इंसान ने इसे भी नहीं छोड़ा.एक विशेष नस्ल के कुत्तों को एक साथ खड़ा करके करेंट प्रवाहित कराया जाता है और भयंकर पीड़ा से छटपटाते कुत्तों का झुंड दम तोड़ देता है.इनके कानों का उपयोग पर्स बनाने के लिए होता है.

खाल के लालच में बाघ,कस्तूरी के लिए प्रति वर्ष कई हजार कस्तूरी मृग मारे जाते हैं.कस्तूरी एक सुगंधित पदार्थ है जो नर कस्तूरी मृग के पेट में लटक रहे अंडे के आकार की एक गिल्टी से प्राप्त होती है.ऐसा समझा जाता है कि वह अपने शरीर में पाए जाने वाली कस्तूरी की सुगंध से बेचैन पूरे जंगल में इसको खोजता रहता है.यह मृग इतना संगीत प्रेमी होता है कि बांसुरी या किसी सुरीली आवाज से मुग्ध होकर एकांत में खड़ा हो जाता है और शिकारी इस तन्मयता का लाभ उठाकर इसे मार डालते हैं.

स्वेटरों के लिए ऊन भेड़ के बालों से बनाया जाता है,लेकिन कराकुल भेड़ के बाल काफी बड़े और नरम तथा घुंघराले होते हैं.मेमने के जन्म लेते ही उस भेड़ के बाल कम मुलायम रह जाते हैं.इसलिए मादा भेड़ पर गर्भावस्था में ही लाठी-डंडों से तब तक प्रहार किया जाता है जबतक कि वह मर न जाए.मरते ही उसके पेट से मेमने को बाहर निकाल लिया जाता है.कभी-कभी तो मरने का इंतजार किये बिना ही उसके शरीर से खाल उतार ली जाती है जिससे कपड़े,टोपी आदि तैयार होती है.

एक स्वस्थ पर्यावरण के लिए मानव समाज के साथ पशुओं का होना भी जरूरी है.कई जानवरों की संख्या में आई कमी के मद्देनजर इनकी सुरक्षा के लिए कार्यक्रम लागू किये गए हैं.लेकिन पर्याप्त जागरूकता,मूक पशुओं के प्रति संवेदनशीलता के अभाव के कारण बेजुबान पशुओं का मारा जाना बदस्तूर जारी है,यह चिंता का विषय है.

Sunday, April 20, 2014

दहकते शोलों पर जिंदगी

        









दहकते अंगारों पर नंगे पैर चलकर अग्नि-परीक्षा देने का चलन दुनियां के बहुत से हिस्सों में सदियों से चला आ रहा है.भारत,स्पेन,बुल्गारिया और फिजी के अनेक संप्रदायों में यह धार्मिक क्रियाकलापों का एक अंग है.आत्मशुद्धि और व्याधियों के उपचार के तरीके और श्रद्धा के प्रतीक रूप में दहकते अंगारों पर नंगे पैर चलना सदियों से यूनान और दुनियां के कुछ अन्य देशों में देवताओं की पूजा के साथ जुड़ा है.

‘प्लिनी दि एल्डर’ ने लिखा है कि रोम में कुछ परिवारों के सदस्य दहकते कोयलों पर नंगे पैर चलने का कमाल दिखाते थे और इसके बदले में उन्हें शासकीय करों से मुक्त कर दिया जाता था.मध्यकालीन यूरोप में फ्रांस के फ्लोरेंस नगर के एक साधू ने नंगे पैर अंगारों पर चलने का प्रदर्शन किया था.इसके पुरस्कार-स्वरूप उसे ‘सेंट पीटर इग्नियस’ की उपाधि से सम्मानित किया गया.

यूनान में आज भी देखने को मिलता है,नंगे पाँव दहकते अंगारों पर चलने का यह करिश्मा.वहां आइया एलेनी ग्राम में हर वर्ष संत कांस्टेटाइन और संत हेलेन के सम्मान में कई दिन तक चलने वाले उत्सव का आयोजन होता है.समापन दिवस पर जब दिन डूब जाता है और अँधेरा घिर आता है तो अंगारों पर चलने का क्रम आता है.

अंगारों पर चलने वाले करीब दरजन भर स्त्री-पुरुष,जिन्हें वहां ‘अनास्ते नैराइड्स’ कहा जाता है,पहले कई घंटों तक नाचते हैं,तीन तारों की थ्रेस की वीणा की धुनों पर.नाचते-नाचते उन्हें तंद्रा सी आ जाती है.तब वे अपने हाथों में देवताओं की मूर्तियाँ उठाकर लाल-अंगारों से दहकते लम्बे-चौड़े अलाव में कूद पड़ते हैं, एकदम नंगे पाँव.

हजारों दर्शक देखते रहते हैं और वे भक्त दहकते अंगारों पर दौड़ते हैं,नाचते थिरकते हैं,चक्कर लगते हैं.जोश के नशे में गला फाड़कर चिल्लाते रहते हैं.उस समय तक लगातार जारी रहता है,देवभक्तों का अग्नि-नृत्य,जब तक दहकते अंगारे राख के ढेर में तब्दील नहीं हो जाते.

आश्चर्य की बात यह है कि ये भक्त अपनी अग्नि-परीक्षा से बिल्कुल सही सलामत निकल आते हैं और कोई फफोला तक नहीं पैरों में.वे कहते हैं कि संत कांस्टेटाइन की दैवी शक्ति उनकी रक्षा करती है.वे यह भी मानते हैं कि यह शक्ति उन्हें रोगों से अच्छा करती है और उन्हें दूसरों को भी रोगमुक्त करने की क्षमता प्रदान करती है.

शरीर के अग्नि-स्पर्शी कृत्यों में अंगारों पर चलने के अलावा और भी बातें आती हैं.रामायण में सीता ने अपनी अग्नि-परीक्षा लपटों में प्रवेश करके जहाँ स्वयं दी थी,वहीँ हनुमान की अग्नि-परीक्षा रावण ने उनकी पूँछ में आग लगाकर ली थी और नतीजे में सोने की लंका जलकर खाक हो गई थी.सुमात्रा में जिन लोगों पर ‘हाल’ आते हैं,वे अपने मुंह में दहकते कोयले भर लेते हैं.मिस्त्र और अल्जीरिया के कई दरवेश दहकते अंगारों को अंगूरों जैसे निगल जाते हैं.अल्जीरिया के फ़क़ीर तो अपना शरीर लोहे की दहकती–सलाखों से दगवाते भी हैं.

इस सिलसिले में कई तरह की बातें सामने आई हैं.कभी-कभी कहा जाता है कि अंगारों पर चलने वाले मानसिक रूप से तंद्रा की स्थिति में होते हैं,इसलिए दर्द का अहसास उन्हें नहीं होता.लेकिन,कई मामलों में ऐसा नहीं लगता कि शरीर को कोई आघात नहीं पहुँचने के पीछे बस तंद्रा की स्थिति है.यह भी कहा जाता है कि पैर के तलवों पर पसीने की परत बन जाती है जो तापरोधक का काम करती है.कुछ लोगों के अनुसार यही काम राख करती है.

कहा जाता है कि फिजी में अंगारों पर चलने के लिए लावा से बनी जो रंध्रदार पत्थर काम में आती है. वह ताप की इतनी कमजोर प्रचालक है कि वहां के कबीलों के लिए डर का कोई कारण ही नहीं रहता. आग से शरीर के सीधे संपर्क की इन धार्मिक क्रीड़ाओं के बारे में आमतौर पर यही धारणा है कि यह सब धूर्तों का मायाजाल है और अग्नि-भक्त जब इसे दैवी चमत्कार कहते हैं तो शंकालुओं की शंका और भी बढ़ जाती है.

इस चमत्कार का रहस्य खोजने में लगे पश्चिमी जर्मनी के अनुभौतिकिविद फ्रेडबर्ट कारगर ने फिजी द्वीपों पर अंगारों पर चलने वाले आदिवासियों के तलवों पर एक ऐसा रंग पोत दिया,जो बढ़ते तापमान के साथ रंग बदलता जाता है.ये आदिवासी चार सेकेंड दहकते अंगारों पर चले और सात सेकेंड उनपर खड़े रहे.कारगर ने अपने रंग का घोल अंगारों पर डाला तो 600 डिग्री फॉरनहाईट का रंग आया.लेकिन आदिवासियों के पैरों पर कोई असर नहीं हुआ.अगरों पर राख की परत भी नहीं आई थी.कारगर ने एक आदिवासी के तलुए से थोड़ी-सी पपड़ी निकालकर अंगारों पर डाली तो वह जलकर कोयला बन गयी.

कारगर का कहना था कि बहुत सी बातें हो सकती हैं.कोई न कोई अवरोधक शक्ति जरूर काम करती है और इस प्रक्रिया में अग्नि-भक्त के शरीर का भार कम हो जाता है.स्वयं अग्नि-भक्त महसूस करते है कि कोई शक्ति उन्हें ऊपर उठाए है.शायद भौतिक-शास्त्र में इसका समाधान नहीं.
शायद मनोविज्ञान इस पर कुछ प्रकाश डाल सकता है.स्टीवन कैने ने इसी विषय पर कई प्रयोग कर अपने शोध पत्र में बताया  कि ये अग्नि-भक्त विनाशक और आग्नेय प्रक्रियाओं पर विजय के परिचायक हैं.कैने के अनुसार कृत्य के समय ये लोग तंद्रा जैसी स्थिति में होते हैं और ऐसी स्थिति में इन्हें गोली लग जाए तो भी पता नहीं चले.

कैने ने अपने प्रयोग में देखा कि सम्मोहन की स्थिति में व्यक्ति को आग के संसर्ग से जलन महसूस नहीं होती.जब दूसरे के द्वारा किया गया सम्मोहन इतना असरकारी हो सकता है तो अग्नि-भक्त का अपना सम्मोहन तो और भी रंग दिखा सकता है.लेकिन शरीर की कोशिकाओं को विनाश से रोकने की केन्द्रीय स्नायु प्रणाली की क्षमता सीमित है.किसी अग्नि-भक्त ने अपने शरीर को एक बार में लगातार दस-पंद्रह सेकेंड से ज्यादा आग के संपर्क में नहीं रखा.यही शरीर के सहने की सीमा है.

अमेरिकन सर्जन फेईन ने दक्षिणी समुद्र के बोरा-बोरा द्वीप में अंगारों पर चलने का आयोजन देखा.वे भी अग्नि-भक्त के साथ अग्निकुंड में आगे बढ़े.उन्हें पैरों के ऊपर तेज किंतु सही जा सकने वाली गर्मी महसूस हुई और पैर में ठंढ लगी.वे साढ़े क़दमों से नीचे देखते हुए बढ़ते रहे.अगरे सैंडपेपर जैसे लग रहे थे और पैरों में झुनझुनी थी,दिमाग सुन्न पड़ गया था.बाहर निकलने पर लगा कि वे सोते से जाग उठे हैं.

वैज्ञानिक पता लगाने में लगे हैं कि ऐसा क्यों होता है.अब वे और संवेदशील उपकरण लेकर जाना चाहते हैं और पता लगाना चाहते हैं कि तलुओं और अंगारों का तापमान किस तरह बदलता है और क्या शरीर के भार में कमी होती है.

Thursday, April 17, 2014

सृष्टि का नियंता : स्त्री या पुरुष












मनुष्य जाति की उत्पति के दो आदिम स्रोत हैं – आदम और हौवा.यही किसी देश में शिव और शक्ति के रूप में,किसी देश में पृथ्वी और आसमान के नाम से,ज्यूस तथा हेरा तथा कहीं यांग और यिन जैसे विभिन्न प्रतीकों से जाने जाते हैं.भिन्न-भिन्न नामों एवं प्रतीकों के बावजूद मानव जाति की उत्पति की मूल कल्पना एक है.

ईसाईयों के प्रख्यात धर्मग्रंथ ‘ओल्ड टेस्टामेंट’ में कहा गया है.......

‘ईश्वर बोला....
यह सही नहीं है
पुरुष अकेला रहे
रचूंगा मैं
इसका कोई सहयोगी
और रीढ़
जिसको ईश्वर ने लिया
पुरुष से रचना की उसने उससे
केवल नारी की’

आज भी हमारा देश पुरुष-प्रधान है.शरीर विज्ञानियों के मत में प्रकृति ने पुरुष को चार लीटर वाली और स्त्री को तीन लीटर वाली कार  के रूप में निर्मित किया है.स्त्री की अपेक्षा पुरुष अधिक बड़ा और बलवान होता है.इसलिए इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि सदियों से पुरुषों ने स्त्रियों पर प्रभुत्व जमाया है,जब आरंभिक काल में आर्य-पूर्वजों ने उत्तरी भारत पर हमला किया था.

सदियों बाद ऋषि और हिन्दू धर्म के नियामक मनु ने व्यस्था दी थी कि बीज(पुरुष),मिट्टी(स्त्री)से श्रेष्ठ है.मनु की संहिता हिंदू समाज को शासित करती रही है.इस युग से पहले,पाषाण युग में स्त्री का स्तर पुरुष की अपेक्षा ऊँचा था और उन्हें प्रसव की देवी के रूप में सम्मान प्राप्त था.पुरुष को आक्रामक और प्रभावी माना जाता है और वह अपनी भावनाओं को नियंत्रित कर सकता है.पुरुष परंपरा को जारी रखते हुए कहा गया कि स्त्री दुर्बल पात्र है जो आक्रामक नहीं होती,वह पर निर्भर और विचारों से व्यक्तिनिष्ठ होती है.

लेकिन प्रश्न उठता है कि पुरुष समाज का वर्चस्व कैसे आया? क्या माँ की प्रकृति का ढांचा ही ऐसा है कि वह मादा की अपेक्षा नर को अधिक शक्ति प्रदान करती है या क्या यह सब पुरुष का ही काम है.अतीत में झांकने पर पता चलता है कि साधारणतया पेड़ों पर रहने वाले बंदरों ने धरती पर सीधे खड़े होकर चलने की कोशिश की और वे चलने में सफल भी हुए.प्रकृति ‘योग्यतम की अतिजीविता’ के सिद्धांत की पक्षधर है और बंदर तथा उनके विकसित प्रतिरूपों,आधुनिक मनुष्य के पूर्वज अर्थात् आदिमानवों को अन्य स्तनपायियों की अपेक्षा अधिक सुविधाएं थी.

पहली सुविधा तो यह है कि वस्तुओं को पकड़ने के लिए उनके हाथ अधिक स्वतंत्र हैं.मनुष्य ही एकमात्र ऐसा प्राणी है जिसका अंगूठा हथेली से समकोण बनाते हुए स्थित होता है,जिसकी वजह से वह चीजों को अंगूठे और अँगुलियों के बीच पकड़ सकता है.अन्य प्राणियों के अंगूठे और अंगुलियाँ एक सीध में होते हैं.दूसरी सुविधा यह है कि अन्य स्तनपायी प्राणियों की अपेक्षा बंदर और मनुष्य में बेहतर वृद्धि होती है.हॉबेल का कहना है कि ‘मनुष्य अपने मस्तिष्क के कारण ही मनुष्य है.’

आदिमानव के वंशज – गुफाओं में रहने वाले नर और मादा जंगल में स्वतंत्र विचरते थे.नर,अभी तक मादा के ह्रदय और घर का स्वयंभू रक्षक नहीं बन पाया था.दोनों ही अपने भोजन की खोज स्वतंत्र करते थे.पुरुष की शारीरिक श्रेष्ठता और नारी की तथाकथित हीनता उस दिन से शुरू हुई जिस दिन पुरुष ने आग की खोज की.ऐसा विश्वास किया जाता है कि चार लाख वर्ष पूर्व मनुष्य के पूर्वज ने रोडेशिया में जंगल की आग या ज्वालामुखी का विस्फोट देखा था.तब उसने कोई लकड़ी जलाई होगी और अपनी समीपस्थ गुफा में ले गया होगा,जहाँ उसने सुखद गर्मी प्राप्त करने के लिए उस आग को लकड़ियाँ जला-जलाकर बनाये रखा होगा.प्राणिशास्त्री कार्लस्टन कून के अनुसार ’आग के उपयोग के आधार पर ही मनुष्य और अन्य प्राणियों में अंतर किया जा सकता है.

चौथे हिमयुग में जीवित रहने के लिए मनुष्य को आग का इस्तेमाल करना पड़ा जिसकी जानकारी उसने अपने अन्य साथियों को दी होगी.आग को जलाये रखने के लिए,किसी न किसी को हर समय गुफा में ही रहना पड़ता और यह दायित्व स्त्रियों पर ही आ पड़ा होगा.आदि पुरुष अपनी स्त्री के लिए भोजन खोजने और और जुटाने वाला बन गया.वह घर के बाहर सक्रिय जीवन बिताता और स्त्री घर में ही सीमित रह गई.शताब्दियों तक अभ्यास की कमी के कारण वह दुर्बल पक्ष बन गई,जबकि अन्य स्तनपायी प्राणियों की मादाएं भोजन की खोज करती हैं और नर की अपेक्षा दुर्बल नहीं मानी जातीं.फिर भी,प्राणियों में पुरुष ने भोजन जुटाने वाले और संरक्षक का ताज पहन लिया.


नृवंशशास्त्रियों ने पुरुष की बेहतर शारीरिक क्षमता के सन्दर्भ में एक चतुराई पूर्ण तर्क प्रस्तुत किया है-पुरुष का स्त्री पर अधिकार जमाना.इस भावना की पूर्ति के लिए वह अन्य पुरुषों से लगातार युद्ध करता रहा.उसने स्त्रियों को हासिल करने या शत्रुओं द्वारा चुराई गई अपनी स्त्रियों की मुक्ति के लिए भी युद्ध किये.

शारीरिक संरचना की दृष्टि से देखें तो किशोरावस्था में अक्सर खामोश रहने वाला किशोर या तो स्वयं को मानसिक रूप से प्रताड़ित करने वाले उपेक्षित नवयुवक के रूप में परिवर्तित हो जाता है या फिर बेहद आत्मविश्वासी बलिष्ठ युवक के रूप में.

इसके विपरीत,एक युवती अपनी किशोरावस्था को बिना किसी मानसिक उद्वेलन के सहजता से व्यतीत कर लेती हैं.वह अधिक समझदार,सही खान-पान के प्रति सचेत होती हैं.उसके मादा हारमोन उसे उच्च रक्तचाप,ह्रदय रोग तथा आघात जैसे प्रौढ़ावस्था के शत्रुओं से बचाते हैं.इसके अलावा वह तनावों को अच्छी तरह झेल लेती हैं.

चिकित्सा विज्ञानियों के अनुसार - इसके पीछे दो महत्वपूर्ण कारक हैं- उनकी अश्रु-ग्रंथि,जिसे विश्व की सर्वाधिक प्रभाव वाली जल-शक्ति कहा गया है,और उनकी जीभ जो तनाव-प्रतिरोधक का काम करती हैं.स्त्रियाँ तनाव से ग्रस्त नहीं रहतीं.वे पुरुषों की तुलना में तनाव को भी भली प्रकार सहन भी कर लेती हैं.इसके विपरीत पुरुष सहज ही प्रौढ़ावस्था की व्याधियों का शिकार हो जाता है और आसानी से तनावग्रस्त हो जाता है.