Thursday, January 29, 2015

तिब्बती साहित्य की रहस्यमयी लेखिकाएं




अलेक्जेंड्रा डेविड नील
तिब्बत आज भी रहस्यमय और अलौकिक विद्याओं का केंद्र माना जाता है.भारतीय योगी भी अपनी साधना के लिए हिमालय के दुर्गम और सामान्य मनुष्य की पहुंच के बाहर वाले क्षेत्रों को ही चुनते हैं.भारत और विशेषकर तिब्बत के प्रति विदेशियों की भी शुरू से ही रूचि रही है.दो महिला लेखकों ने तिब्बती साहित्य में अमूल्य योगदान दिया है.

अलेक्जेंड्रा डेविड नील सत्रह वर्षों तक तिब्बत में रही और इस अवधि में वे अनेक लामाओं,सिद्धों और तिब्बती तांत्रिकों से मिली.वे स्वयं भी अनेक विद्याओं में पारंगत हो गयीं और फलतः तिब्बतियों ने उन्हें ‘लामा’ की उपाधि से अलंकृत किया.अलेक्जेंड्रा मूलतः बेल्जियन,फ्रेंच महिला थीं,उनकी ख्याति 1924 में तिब्बती राजधानी ल्हासा के भ्रमण को लेकर भी है,जब ल्हासा पूरी दुनियां से अनजान था.

अलेक्जेंड्रा ने 30 से ज्यादा पुस्तकें लिखी हैं,जिनमें यात्रा,आध्यात्मिक अनुभव,दर्शन आदि से सम्बंधित हैं.उन्होंने दो बार भारत की यात्रा की,1890-91 और पुनः 1911 में,बौद्ध साहित्य के अध्ययन के लिए.उनकी प्रसिद्ध पुस्तकों में ‘विसडम फ्रॉम दि फॉरबिडन जर्नी’, 'इमोरटेलिटी एंड रिनकार्नेशन' और  ‘मैजिक एंड मिस्ट्री इन तिब्बत’ प्रमुख हैं.

उन्होंने अंतिम समय तक अपने सचिव सिक्किम के युवा भिक्षु योंगडेन,जिन्हें उन्होंने बाद में गोद ले लिया था, के साथ तिब्बत की कई रहस्मयी यात्राएं कीं और अंतिम समय तक लेखन कार्य करती रहीं.101 वर्ष की उम्र में फ़्रांस में 1969 में उनका निधन हुआ और उनके नाम पर पेरिस के उप शहर मैसी में एक सड़क का नामकरण किया गया ‘अलेक्जेंड्रा डेविड नील’. उनकी अंतिम इच्छा के अनुसार उनकी और योंगडेन के अंतिम अवशेष को आपस में मिलकर 1973 में बनारस में गंगा में प्रवाहित किया गया.

मैसी में अलेक्जेंड्रा के नाम की सड़क 
अलेक्जेंड्रा ने अपने अनेक पुस्तकों के माध्यम से पश्चिमी जगत को तिब्बत की समृद्ध अलौकिक परंपराओं से परिचित कराया.लामा अलेक्जेंड्रा डेविड नील का कहना है कि उन्होंने अपनी आँखों से अनेक तिब्बती तांत्रिकों को आकाश में उड़ते और पानी पर चलते देखा है.अनेक योगी कड़ाके की ठंढ में भी विवस्त्रावस्था में साधना रत रहते हैं.

अलेक्जेंड्रा की तरह ही एक और यूरोपीय महिला हैं - एलिस ए. बेली.उन्होंने भी तिब्बत की रहस्यमय विद्याओं पर अनेक पुस्तकें लिखी हैं.बेली कभी भी तिब्बत नहीं गयीं,न उन्होंने तिब्बती विद्याओं के संबंध में कुछ पढ़ा,लेकिन तिब्बत विषयक उनकी पुस्तकें प्रामाणिक मानी जाती हैं.

बेली ने इसका स्पष्टीकरण दिया है.उनका कहना है कि तिब्बत के एक तांत्रिक लामा ‘खुल’ की आत्मा ने ही उनसे ये पुस्तकें लिखवायी हैं.इस संबंध में वे एक रोमांचक घटना का विवरण देती हैं.

एलिस ए. बेली
बेली का कहना है कि,एक दिन वे अकेले पहाड़ी रास्ते पर चली जा रही थी.सहसा उनके कानों में किसी के गीत के स्वर सुनाई दिए.फिर शून्य से आवाज आई.’मनुष्य जाति के कल्याण के लिए एक पुस्तक लिखना अत्यंत आवश्यक है,और यह कार्य आप बखूबी कर सकती हैं.’

बेली भय से सिहर उठीं.उन्होंने घबराकर चारों ओर देखा.उन्हें पुनः सुनायी दिया,घबराओ नहीं.यह कार्य तुम सफलतापूर्वक कर सकती हो.तीन सप्ताह का समय देता हूँ.सोच विचार कर यहीं उत्तर देना.तीन सप्ताह तक बेली ऊहापोह में पड़ी रही.अंत में उन्होंने अदृश्य शक्ति का आदेश मानने का निर्णय कर लिया.

तीन सप्ताह बाद वह उसी स्थान पर गयीं और अद्रश्य व्यक्ति द्वारा प्रश्न किये जाने पर उन्होंने उसके कहे अनुसार पुस्तक लिखने की तत्परता दर्शायी.

बाद में बेली को पता चला कि उस अदृश्य व्यक्ति का नाम खुल है.यह तिब्बती तांत्रिक बेली के मस्तिष्क में विचार पहुंचाता रहा और वह उन्हें लिखती जातीं.बेली के अनुसार तिब्बती तांत्रिक खुल की आत्मा परोपकार की भावना से कार्य करने वाले डाक्टरों,हकीमों और वैद्यों की सहायता करती है.वह उन्हें रोगी के स्वास्थ्य लाभ के लिए उपाय भी बताती हैं.

तिब्बती तांत्रिक खुल के निर्देशों के अनुसार एलिस ए. बेली ने पांच खंडोंवाली एक वृहद् पुस्तक लिखी.इस पुस्तक में रोगों की चिकित्सा के रूहानी उपाय बताये गए हैं.लेकिन हर व्यक्ति इन उपायों को नहीं समझ सकता.बेली का कहना है कि 1919 से 1949 तक लामा खुल की आत्मा विभिन्न लोगों का मार्गदर्शन करती रहीं.आज उनके ये शिष्य प्रचार से दूर रहकर परोपकार के कार्य में लगे हुए हैं.

Keywords खोजशब्द :- Alexandra David Neel,Alice A. Belly,Tibbetan Spiritual Writers

Friday, January 23, 2015

तुमने फ़िराक को देखा था

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आने वाली नस्लें तुम पर रश्क करेंगी हमसरो
उनको जब ये मालूम होगा तुमने फ़िराक को देखा था

फ़िराक द्वारा खुद के बारे में कही गयी ये पंक्तियाँ कितनी बेलौस और बेबाकी से कही गयी लगती हैं.

यह भी एक अजीब इत्तिफाक है कि जो दिन ऊपरवाले ने मुक़र्रर किया हिंदी-उर्दू की अजीम शख्सियत को अपने पास बुलाने के लिए,उसी दिन मशहूर हास्य अभिनेता केश्टो मुखर्जी और बदनाम डाकू छविराम को भी अपने दरबार में बुलाया.जाहिरा तौर पर तीनों में कोई संबंध नहीं है.एक रुबाइयों की नाजुक भीनी बदली में लिपटी रूह है,दूसरी कहकहों की आवाज का लिबास पहने है तो तीसरी यमदूतों की बराबरी करने वाला काली लिबास में मुंह छिपाए है.

क्या कहकहों,डकैती और अपराधों में और नाजुक ख्याली में कोई भीतरी संबंध है? संबंध तो है.क्योंकि ये तीन रंग आत्मा के हैं.जुंग कहता है कि जो असत् है वह चार चेहरों वाला है और जो सत् है उसके तीन चेहरे हैं.असत् हरदम इस कोशिश में रहता है कि उसे सत् समझा जाये.इसके लिए वह अपना एक चेहरा छुपा लेता है.

वह चौथा चेहरा उस साधारण आदमी का हो सकता है जिसमें इन तीनों के गुण नहीं,मगर जिसमें ये तीनों रहते हैं.कोमल अहसास बन कर,हंसी बन कर और भय बन कर.उस गली-मुहल्ले के आदमी को भी इन विशिष्ट लोगों के साथ अपनी वादी में वहीँ जगह देकर मौत जिंदगी की उस तस्वीर को पूरा कर देती है,जिसे खुद जिंदगी पूरा नहीं कर पाती.ये चारों कभी इकट्ठे नहीं हो सकते.और इकट्ठे न होंगे तो जिंदगी के टुकड़े कहलाएंगे,जिंदगी नहीं.

फ़िराक भी जिंदगी का एक ऐसा ही टुकड़ा था जो जिंदगी न हो पाया.फ़िराक कभी जिंदगी जी न सका........

उम्र फ़िराक ने यूँ ही बसर की
कुछ गमें दौरा कुछ गमें जाना

अनुभूतियाँ कुछ इतनी तेज मिली थीं कि अक्सर शामो-सुबह के रंग,फूलों की खुशबू या तो इंतहा गम जगा देते थे या इंतहा ख़ुशी इतनी कि,जिंदगी बर्दाश्त के बाहर हो जाती थी.खुद फ़िराक ने अपने बचपन का जिक्र करते हुए कहा है कि मामूली-मामूली बातें जो औरों के लिए कोई मायने नहीं रखतीं उसके मासूम बचपन पर ही भारी होने लगी थीं.

कविता की देवियों ने बचपन में ही उसके दिल की खिड़की पर अपनी भोली सूरतें दिखाना शुरू कर दिया था,इस तरह कि कुमार रघुपति ठगा सा रह जाता था.अक्सर अपने को औरों से अलग देखकर उसका दिल होता,कहीं छुप जाऊं.उसे इतनी शर्म घेरे रखती कि,खुद उसके शब्दों में,’एक झाड़ू की तरह’ वह सबकी नज़रों से छुपकर ही घर में जीना चाहता था.

मगर जिंदगी अपनी छेड़खानियों से कहाँ बाज आती है.जिसे उसकी अनुभूतियाँ,तीखे दर्द,अनोखी चाहें खुद अपने से,अजनबी बनाए दे रहे थे.उसे शब्दों ने एक सुंदर मूर्ति की शक्ल में ढाल दिया.जिसने भी सुना बोला,यह कौन है,यह कौन है? मीर के बाद रेखती ने यह कैसा सिंगार किया है.ये गंधर्व बालाएं कब से उर्दू बोलने लगीं? ये कालिदास की यक्षणियां कैसे अपने यक्षों को ढूंढने आ गयीं.

दूर-दूर से लोग मिलने आने लगे,कोई फ़िल्मी दुनियां से कोई पत्रिकाओं से,कोई विद्वता की धूल से उठकर,कोई दिल के शोरों से घबराकर.मगर इनमें वह अभिन्नता कहाँ थी जो उस ‘लज्जित झाड़ू’ को सहारा देती.वे तो एक जीनियस से मिलने आते थे जैसे लोग अजायबघर में जाते हैं अजीब चीजें देखने.और इतने मिलने वालों की भीड़ के बीच भी अकेली रह गयी जो,वह फ़िराक की आत्मा तड़पकर बोली एक दिन.....

‘मिल आओ फ़िराक से भी एक दिन
वह शख्स एक अजीब आदमी है'

निजी जिंदगी से न कुछ लिया न कुछ दिया.जो पत्नी मिली उसके लिए खुद फ़िराक के शब्दों में,’पाव भर सत्तू खाकर एक कोने में लिपटे रहना ही स्वर्ग था.’जीवन के दुर्लभ सौन्दर्य की न उसे अनुभूति थी न आवश्यकता.उसने नारी की न जाने कैसी मूरत फ़िराक की निजी जिन्दगी में रख दी कि उम्र भर नारी ने फिर कभी आकर्षित नहीं किया.नारी का सौंदर्य,कोमलता,मातृत्व और मधुर अनुभूतियों से महकता रूप उसकी कल्पना में हमेशा खिला रहा.......

लहरों में खिला कंवल नहाए जैसे
दोशीजाए सुबह गुनगुनाए जैसे
ये रूप ये लोच ये तरन्नुम ये निखार
बच्चा सोते में मुस्काए जैसे 

काश कि फ़िराक ने उस साधारण गली-कूचे के आदमी की सूरत से अपनी सूरत मिलाई होती.शायद तब उसे उसकी सत्तू खाकर ऊंघने वाली,संवेदनाहीन के दिल में छुपे उस खजाने का पता चलता जो फ़िराक की तरह बहुमूल्य तो न था,मगर इतना मूल्यवान जरूर था कि उसके अभाव में फ़िराक की अपनी जिंदगी रुक गयी,ठिठक गयी,घुट गयी.वह उन अनुभूतियों को न जी सका जो नारी ने छेड़-छेड़कर उसकी कल्पना में भर दी.

फ़िराक मीर की तरह खुद नारी से प्रेम की वह जिन्दगी न जी सका,जिसके बिना उसका निजी जीवन बिना बदली का सावन बन गया.मगर उसकी संवेदना मुखर थी.जो औरों ने जिया उसे संवेदना के जरिये खुद अपने पर गुजरे जैसा महसूस करने की शक्ति उसे प्रकृति ने दी थी.

अंग्रेजी कवि यीट्स ने कहा भी है : ‘जो जिन्दगी को भुगतता है और जो उसे महसूस कर चित्रित करता है दरअसल दो अलग-अलग हस्तियाँ हैं.’ 

फ़िराक इन दोनों हस्तियों में दूसरी तरह की हस्ती बन गया.निजी जिंदगी के आँगन पर ज्यों-ज्यों साए लंबे होते गए जीने की अबूझ ललक ने सारी धूप जिंदगी के घर के आगे फैली दूर-दूर तक जाती सड़क पर ले ली.सड़क गुलजार थी,रोज नये-नये चेहरे थे.फ़िराक के घर में रौशनी न सही इनके चेहरों पर तो जिंदगी की धूप थी.दीवानों के लिए इतना ही काफी था......

घर छोड़े हुओं को कोई मंजिल न सही
होती नही सहल कोई मुश्किल न सही
हस्ती की एक रात काट देने को
वीराना सही तेरी महफ़िल न सही 

यह भी एक अजीब इत्तिफाक था या फिर इसके पीछे भी प्रकृति की किसी बज्मे अदब का बुलावा होगा कि फ़िराक की मौत से एक हफ्ते पहले उसका सबसे अजीम दोस्त ‘जोश’ मलीहाबादी चल बसा.इस जोश ने उसे बहुत दुःख दिया था-एक बार बदगुमा होकर और दूसरी बार पाकिस्तान जाकर.मगर इस तरह चले जाने कहीं बंधन टूटते हैं दिल के.

तीसरी बार जब जोश इस दुनियां को भी अलविदा कह गया तो फ़िराक चुप था.एक लंबी बीमारी में दरो-दीवार देखते-देखते आँखें पथरा चुकी थीं.एक झोंक आयी तबियत में और चादर जिस्म पर डाल वह हजारों को रौनक देने वाला सौंदर्य का मासूम बेटा,अपनी मां के पवित्र सौंदर्य को देखता-देखता चला गया.........

‘अहले रिंदा की वो महफ़िलें सबूत हैं इसका फ़िराक
कि बिखर कर भी यह शीराजां परेशां न हुआ' 

वियोग को फ़िराक ने उपहार बना दिया.’कफस की तीलियों से छनता नूर’ इस कदर खूबसूरत है कि वस्ल की चमक फीकी लगती है.फ़िराक ने प्रेम के विनाश को सुंदर बनाया है.उसकी यह चेष्टा कहीं-कहीं जादुई भव्यता की और ले गयी है,उस सीमा तक जहां से काव्य सौन्दर्य को खुद अपना पता नहीं रहता.......

मौत रात एक गीत गाती थी
जिंदगी झूम-झूम जाती थी 

कौन सा वह आश्वासन था जो प्रकृति ने दिल ही दिल में उसे दे दिया था.कौन सा वह अमृत था जो निराशा और एकाकीपन में बिखरकर भी उसकी जिंदगी का शीराजां कभी परेशां न हुआ.हर रोज केशों की तरह दुःख के बादलों को झटककर उसकी जिंदगी का चाँद चमक आता था और लंबे-चौड़े नभ पर अपनी अनंत यात्रा को ही मंजिल मान चलता रहा......

‘एक लिली की तरह खिली काई भरे
पत्थर के किनारे किसी
एक तारे की तरह सुंदर सरल जो
अकेला था आसमान पर’

‘विलियम वर्ड्सवर्थ’ की ये पंक्तियाँ फ़िराक को बहुत प्रिय थीं.क्या कोई छिपा हुआ संदेश था कि मौत के बाद उसकी समाधि पर उसके लिए ही ये दो पंक्तियाँ लिख दी जाएं?

Keywords खोजशब्द :- Firaq Gorakhpuri,Nazm and Shayari of Firaq

Saturday, January 17, 2015

लोकतंत्र बनाम कार्टूनतंत्र

आर.के. लक्ष्मण  का  कार्टून 

पिछले दिनों फ्रांसीसी व्यंग्य पत्रिका ‘शार्ली हेब्दो’ के संपादक और कार्टूनिस्ट की हत्या ने एक नई बहस छेड़ दी है कि अभिव्यक्ति की आजादी की सीमा क्या हो? लोकतंत्र में ही कार्टूनतंत्र फलता-फूलता है. लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है और हर किसी को अपनी बात कहने का हक़ है भले ही माध्यम अलग-अलग क्यों न हो.लेकिन जहाँ धर्म का मसला आता है वहां सभी मुद्दे गौण हो जाते हैं.

आज की पत्र-पत्रिकाओं में मुद्रित कार्टूनों को देखकर पाठकों के होठों पर एक पल के लिए मुस्कान बिखर जाती है.मगर आज से लगभग दो सौ वर्षों पूर्व यह स्थिति नहीं थी.क्योंकि,उस समय पत्र-पत्रिकाओं में कार्टूनों का नामोनिशान नहीं होता था.

कहा जाता है कि कार्टूनों का जन्म अमेरिका के स्वाधीनता-संग्राम के दौरान हुआ था और औद्योगिक क्रांति के समय यूरोप में परवान चढ़ा.गुलाम अमरीकियों में राजनीतिक चेतना जगाने के लिए पॉल रिवेरी नामक चित्रकार द्वारा प्रवर्तित यह कला आज दुनियां भर के लोगों में राजनीतिक,आर्थिक,सामाजिक एवं सांस्कृतिक चेतना जगाने में व्यस्त है.
आर. के. लक्ष्मण का कार्टून 
चूंकि,कार्टूनों का उपयोग व्यवस्था का विरोध करने के लिए किया गया,इसलिए कुछ लोग प्रारंभ से ही कार्टूनकार को ‘एंटी एस्टेब्लिशमेंट’ मानते हैं.कार्टूनकारों को जन्म देने में लोकतंत्र द्वारा निभायी गयी भूमिका को देखते हुए यह आशा भी की जा सकती है जब तक लोकतंत्र की पौध को राजनीतिज्ञ प्रेम से सींचते रहेंगे,तब तक कार्टूनतंत्र भी फलता फूलता रहेगा.

इटली में पहले-पहल इन चित्रों को ‘केरिकेतुरा’ कहा गया.अंग्रेजों ने इन्हें ‘केरिकेचर’ तथा अमरीकियों ने ‘कार्टून’ कहा.उन दिनों ये कार्टून मोटे पेपर पर छपकर,बिना पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम के,स्वयं ही जनता के बीच लोकप्रिय होते रहे.इसके अनेक वर्षों के बाद कार्टून ‘न्यूयार्क टाइम्स’ तथा ‘हार्वर्स वीकली’ जैसे पत्रों में छपने लगे.

पहले,इन कार्टूनों में सामाजिक बुराइयों को ही प्रमुखता मिली.ऐसा मानने का ठोस आधार यह है कि कार्टून कला की उत्पत्ति हुए जहाँ दो शताब्दियाँ गुजर गई हैं,वहां राजनीतिक कार्टून सिर्फ सौ वर्ष पुराने ही मिलते हैं.’स्ट्रिप कार्टूनों’ की उम्र तो अभी मात्र ८५ वर्ष मानी गई है.

कार्टून की पहली और अंतिम शर्त हास्य-व्यंग्य ही होती है.जिस चित्ताकर्षक चित्र का शीर्षक एक वाक्य का हो,उसे ही ‘कार्टून’ कह सकते हैं.इस कसौटी पर देखा जाय,तो आज जो कार्टून के नाम पर छापा जा रहा है,उसमें अधिकांश को कार्टून माना ही नहीं जा सकता.जिस कार्टून को देखते ही हंसी आ जाती हो,जिसे शीर्षक या ‘डायलॉग’ देने की जरूरत नहीं पड़ती हो ,उसे उत्कृष्ट श्रेणी का कार्टून माना जाता है.अधिकांश कार्टूनों में यह भी देखा जा रहा है कि पाठकगण कार्टून को नजरंदाज कर सिर्फ शीर्षक पढ़कर हास्य-व्यंग्य का मजा लेते हैं.मगर इस तरह के चुटकुले ‘कार्टून’ नहीं हुआ करते.चित्र एवं शीर्षक के बीच अटूट संबध होना चाहिए.

कार्टून दो प्रकार के होते हैं-राजनीतिक अवं सामाजिक.इन दोनों  प्रकारों के कार्टूनों में जो व्यंग्य प्रयुक्त किया जाता है,वह भी मुख्यतः दो तरह का होता है- श्रृंगारमिश्रित व्यंग्य तथा करूणामिश्रित  व्यंग्य.राजनीतिक कार्टून प्रायः तीखे व्यंग्य से सने होते हैं.इसे कार्टून विधा की तीसरी श्रेणी कह सकते हैं.

दैनिक समाचार पत्रों के प्रथम पृष्ठ पर छपने वाले ऐसे राजनीतिक कार्टून उन पत्रों के नीतिगत प्रवक्ता भी होते हैं.इसलिए राजनीतिक कार्टूनकारों में एक संपादक के जितनी राजनीतिक सूझबूझ एवं पत्रकारिता की उत्कृष्ट जानकारी पायी जाती है.शंकर,अबू,आर.के. लक्ष्मण,सुधीर जैसे कार्टूनकारों को मिली लोकप्रियता इसका प्रमाण है.

ज्वलंत समस्याओं पर आम आदमी को केंद्रित कर बनाया गया कार्टून जहाँ करूणामिश्रित हास्य-व्यंग्य उत्पन्न करता है ,वहीँ श्रृंगार रस के कार्टून मुख्यतः प्रेमी-प्रेमिकाओं तथा पति-पत्नी के संबंधों पर बनाये जाते हैं.

स्ट्रिप-कार्टूनों के क्षेत्र में हम अब भी पिछड़े हैं.अधिकांश पत्र-पत्रिकाएं स्ट्रिप-कार्टूनों के लिए धन खर्च करने की स्थिति में नहीं होती.आर्थिक रूप से सुदृढ़ बड़े प्रकाशन समूहों की पत्र-पत्रिकाओं में भारतीय की जगह विदेशी फीचर्स सिंडिकेटों की ‘ब्लांडी’,’मट एंड जेफ़’ एवं बीटल जैसी कार्टून-स्ट्रिप छापती हैं.फीचर्स सिंडिकेटों से प्राप्त स्ट्रिप कार्टूनों में उत्कृष्टता नहीं होती.’यंग एंड रेमंड’ की ‘ब्लांडी’ अब तक लगभग विश्व की 1300 से भी अधिक पत्र-पत्रिकाओं में छप चुकी है.इस दिशा में भारत को भी अपना योगदान देना चाहिए.

यहाँ कार्टूनकारों के समक्ष एक मुख्य समस्या आर्थिक भी है.कुछ बड़े पत्रों को छोड़कर हिंदी के अधिकांश पत्रों में न कोई कार्टूनकार फ्रीलांसिंग कर आर्थिक स्थिति को बेहतर कर सकता है और न ‘स्टाफर’ होकर ही.अधिकतर हिंदी पत्र-पत्रिकाओं में कार्टूनों का उपयोग ‘फिलर’ के तौर पर किया जाता है.

अतः कार्टूनों का स्तर उठाने के लिए यह जरूरी है कि एक स्वतंत्र तथा विकसित विधा के रूप में ही इसका उपयोग हो.कार्टूनकारों को पर्याप्त पारिश्रमिक भी मिलना चाहिए.

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