Wednesday, October 16, 2019

कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बढ़ते दायरे


इन दिनों AI अर्थात कृत्रिम बुद्धिमत्ता के दायरे बढ़ते जा रहे हैं.तमाम छोटी बड़ी कंपनियों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता से सुसज्जित उपकरणों को पेश करने की होड़ मची है.बेशक इनमें गूगल और अमेजन जैसी अमेरिकी कम्पनियां काफी आगे हैं और इन्होने आवाज से संचालित कई उपकरणों को पेश किया है और आने वाले दिनों में कई अन्य कम्पनियाँ भी इस होड़ में शामिल हों तो कोई आश्चर्य नहीं. बेशक इन सभी उपकरणों ने मानव जीवन को आसान बना दिया है लेकिन खतरे भी कम नहीं हैं.

सामान्य तौर पर समझा जाता है कि इंसानों में ये गुण प्राकृतिक रूप से पाया जाता है कि उनमें सोचने-समझने और सीखने की क्षमता होती है ठीक उसी तरह एक ऐसा सिस्टम विकसित करना जो आर्टिफिशियल तरीके से सोचने, समझने और सीखने की क्षमता रखता हो और व्यवहार करने और प्रतिक्रिया देने में मानव से भी बेहतर हो, उसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कहते हैं।

कई बार हम रोबोट को AI  समझ लेते हैं जबकि रोबोट तो ऐसा सिस्टम है जिसमें AI डाला जाता है। असल में कृत्रिम बुद्धिमत्ता एक ऐसी विधि है जिसमें ऐसा सॉफ्टवेयर डवलप किया जाता है जिससे एक कंप्यूटर इंसान की तरह और इंसान से भी बेहतर रेस्पॉन्स दे सके। 

1955 में जॉन मकार्ति ने AI को कृत्रिम बुद्धि का नाम दिया और उसे  विज्ञान और इंजीनियरिंग के बुद्धिमान मशीनों बनाने के के रूप परिभाषित किया. कृत्रिम बुद्धि अनुसंधान के लक्ष्यों में तर्क, ज्ञान की योजना बना, सीखने, धारणा और वस्तुओं में हेरफेर करने की क्षमता, आदि शामिल हैं. वर्तमान में, इस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए सांख्यिकीय विधियों, कम्प्यूटेशनल बुद्धि और पारंपरिक खुफिया शामिल हैं. कृत्रिम बुद्धि का दावा इतना है कि मानव की बुद्धि का एक केंद्रीय संपत्ति एक मशीन द्वारा अनुकरण कर सकता है. कभी दार्शनिक मुद्दों के प्राणी बनाने की नैतिकता के बारे में प्रश्न् उठाए गए थे. लेकिन आज, यह प्रौद्योगिकी उद्योग का सबसे महत्वपूर्ण और अनिवार्य हिस्सा बन गया है।

कृत्रिम बुद्धि (एआई) का दायरा विवादित है: क्यूंकि मशीनें तेजी से सक्षम हो रहे हैं, जिन कार्यों के लिए पहले मानते थे कि होशियारी चाहिए, अब वह कार्य "कृत्रिम होशियारी" के दायरे में नहीं आते। उद्धाहरण के लिए, लिखे हुए शब्दों को पहचानने में अब मशीन इतने सक्षम हो चुके हैं, की इसे अब होशियारी नहीं मानी जाती.आज कल, एआई के दायरे में आने वाले कार्य हैं, इंसानी वाणी को समझना. शतरंज  के खेल में माहिर इंसानों से भी तेज, बिना इंसानी सहारे के गाड़ी खुद चलाना आदि.

कृत्रिम बुद्धि का वैज्ञानिकों ने सन 1955 में अध्धयन करना शुरू किया. शुरुआत में  असफलता से निराशा, और फिर नए तरीके अपनाए गए जो फिर आशा जगाते थे. 

AI से सुसज्गूजित नवीनतम उपकरणों में गूगल होम,गूगल होम मिनी.गूगल स्मार्ट हब के साथ अमेजन के इको डॉट,इको शो,फायर टीवी स्टिक आदि उपकरण जहाँ विदेशों में काफी लोकप्रिय रहे हैं वहीँ भारत में भी इन उपकरणों ने पैठ बनानी शुरू कर दी है.भारतीय बाजार को अपने अनुकूल बनाने के लिए अब हिंदी भाषा का सहयोग भी इन उपकरणों को मिलने लगा है.स्मार्ट उपकरणों ने मानव जीवन को न केवल आसान बना दिया है बल्कि समय के बचत की उपयोगिता भी सिद्ध की है.स्कूली बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक में यह अपनी उपयोगिता सिद्ध कर रहा है.

लेकिन आने वाले खतरे भी कम नहीं हैं. मशहूर अमेरिकी लेखक डैन ब्राउन ने 2017 में अपने उपन्यास ‘The Origin’ में इसी विषय को उठाया है.रॉबर्ट लैगडन श्रृंखला के इस उपन्यास में ब्राउन ने विंस्टन नाम के एक AI(आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस) को प्रस्तुत किया है.स्पेन की पृष्ठभूमि में रची गई इस कथानक में प्रमुख भूमिका विंस्टन की है. आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस क्या-क्या कारनामे कर सकता है,इसको तो दर्शाया ही गया है साथ ही कृत्रिम बुद्धिमत्ता के खतरे के प्रति भी यह उपन्यास सचेत करता है.अंततः रॉबर्ट लैंगडन अपने दोस्त द्वारा विकसित AI विंस्टन को समाप्त करने का निर्णय ले लेता है.

आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस जहाँ उपयोगी साबित हो रहा है वहीँ इसकी सहायता से आज स्मार्टहोम की परिकल्पना साकार हो रही है.आज जरूरत है इसके विवेकपूर्ण इस्तेमाल की जिससे विज्ञान की इस परिकल्पना का समुचित सदुपयोग किया जा सके. 

Saturday, March 17, 2018

अनकहे चित्रों की दास्तान

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गृह युद्ध से त्रस्त सीरिया के बच्चे 
गृहयुद्ध से त्रस्त सीरिया से पिछले दिनों आयी चित्रें काफी विचलित कर देने वाली हैं.किसी युद्धरत देश में आम जनजीवन किस कदर बदहाली में जीवन व्यतीत करता है ,चित्रों से काफी बयां हो जाते हैं.

पिकासो का चित्र 'गेर्निका'
युद्ध की विभिषिका से ग्रस्त एक देश के हालात को दर्शाते हुए मशहूर चित्रकार पाब्लो पिकासो द्वारा 1936-37 में बनाये गए चित्र ‘गेर्निका’  युद्ध की विभीषिका को बखूबी दर्शाते हैं.’गेर्निका’ में अंधकार में डूबा दृश्य और बीच में जलता हुआ, तेज प्रकाश देता बिजली का बल्ब.दायें एक औरत आतुर,पीड़ा से चीत्कार करती हुई.खिड़की में बेबसी से बाहें फैलाये.एक औरत दरवाजे से आँगन में प्रवेश करती हुई-भयभीत,प्रश्नसूचक.बाएं एक और औरत,गोद में युवा शिशु और एक अन्य औरत की मुखाकृति,इस सारी बर्बरता की चश्मदीद गवाह.एक सैनिक की धराशायी,भग्न प्रतिमा.कटे हाथ में टूटी तलवार.सिर गर्दन से अलग एवं मुंह पीड़ा से खुला हुआ.एक हाथ तनहा फूल की ओर बढ़ता हुआ.एक बैल जिसका सिर मृत शिशु लिए क्रंदन करती हुई औरत की ओर मुड़ा हुआ है,सीधा ताना हुआ,टेढ़े सींग आक्रमणकारी.उठी हुई पूँछ.केंद्र के प्रकाश के नीचे एक घोड़ा.सिर पीछे की ओए झुका हुआ-दांत बाहर निकले हुए और शरीर में पेबस्त भाले के दर्द से बिलबिलाता हुआ. एक पक्षी इस दृश्य से दूर ऊपर की ओर उड़ता हुआ.लिली और पोस्त के फूल और इन सब पर आयी हुई बमबारी से उत्पन्न गहरे धुएं की कालिमा,एक अँधेरा,और सबकुछ जो मानवीय है ,प्रकाशित है, सुंदर है,पीड़ा से त्रस्त है.दंभ और फासीवाद का प्रतीक है – बैल.

स्पेन के बास्क प्रांत की राजधानी ‘गेर्निका’,बास्क के प्राचीनतम नगर और उसकी सांस्कृतिक परंपरा के केंद्र को स्पेन के तानाशाह जनरल फ्रांसिस्को फ्रांको के आदेश से युद्धक विमानों ने पूरी तरह ध्वस्त कर दिया था.इस भयावह विनाश औरम्रत्यु यंत्रणा का दस्तावेज एक कलाकृति के रूप में प्रस्तुत किया पाब्लो पिकासो ने.’गेर्निका’ का भित्तिचित्र युद्ध की विभिषिका को तो चित्रित करता ही है लेकिन इसके साथ ही मानव मूल्यों,मनुष्य के साहस, उसकी  आध्यात्मिक शक्ति और करूणा को भी प्रस्तुत करता है.

‘गेर्निका’ की कलाकृति से कई प्रश्न उपस्थित होते हैं.गेर्निका पर हवाई हमला दिन के समय हुआ लेकिन पिकासो ने रात का दृश्य प्रस्तुत किया है.गेर्निका भले ही एक छोटा नगर था लेकिन इतना भी नहीं कि बंद घेरे में प्रस्तुत किया जाय.फिर कहीं भी बम वर्षा का दृश्य या प्रतीक नहीं है.घोड़े के शरीर में भाला पेबस्त है,सैनिक के हाथ में तलवार.लेकिन यह युद्ध घोड़ों,तलवारों या भालों का नहीं था.अन्य युद्ध कलाकारों की भांति पिकासो ने आधुनिक मशीन,तोप या विमान को प्रस्तुत नहीं किया.चित्र में रेंखांकित चार औरतें किसकी प्रतीक हैं? क्या यह एक ही औरत के चार विभिन्न रूप हैं.पिकासो ने औरतों को ही महत्त्व क्यों दिया? पिकासो के प्राथमिक प्रारूपों में भूमि पर पड़ी टूटी-फूटी प्रतिमा के स्थान पर ‘जीवित ‘ मनुष्य की आकृति थी.इस तरह के कई सवाल जेहन में उभरते हैं.

शायद इन सवालों के जवाब ढूंढें भी जा सकते हैं.’गेर्निका’ का दृश्य अंधकारमय इसलिए है कि युद्धक विमानों ने आकाश को ढक लिया था और उसकी काली छाया नगर पर छा गयी थी.जलते हुए शहर से उठते हुए धुएं ने सूर्य को ग्रस लिया था.नगर पर बमवर्षा का प्रमाण भग्न प्रतिमा,मृत शिशु और बैल की मशाल जैसी जलती पूँछ है.पिकासो के विचार में मशीन से अधिक प्रभावशाली प्रतीक भाला और तलवार हैं.चार औरतों का एक दृश्य में होना दमन और पाशविक बर्बरता की तीव्रता को प्रदर्शित करना है क्योंकि युद्ध या अपराध में सबसे ज्यादा अमानवीयता का शिकार  स्त्रियाँ ही बनती हैं-स्त्री सृष्टि,जीवन,करूणा और गति का प्रतीक है.भग्न प्रतिमा ध्वंस को चित्रित करती है,जो शायद जीवित मनुष्य के चित्रण से संभव नहीं था.बैल क्रूर, फासिस्ट आक्रमण और हिंसा का प्रतीक है - जो अपने संपूर्ण दृश्य पर हावी है.

तमस और पाशविकता का प्रतिबिंब घोड़े के मुकाबले में उभरकर सामने आया है.घोड़ा वास्तव में जीवन का प्रतीक है.दो औरतें घोड़े के सिर की ओर ही देख रही हैं - एक चेहरा ऊपर करके और दूसरी सिर झुकाकर.उन दोनों के चेहरे समान से हैं लेकिन घोड़े की गरदन दूसरी ओर मुड़ी हुई है - जीवन मृत्यु के चंगुल में है.स्पेन के गणतंत्र की दम तोड़ती जिंदगी का प्रतीक.पक्षी घोड़े की कल्पना को और अधिक सुदृढ़ करता है - जैसे वह घोड़े के श्वास के साथ बाहर निकलकर उड़ रहा हो.पक्षी मनुष्य की स्वच्छंद कामना,स्वाधीनता,अनंत आशा और कल्पना की शक्ति का प्रतीक हैं.

नेत्र-ज्योति और सूर्य ज्योति एक अद्भुत संयोजन प्रस्तुत करते हैं जो तमस को नग्न कर देते हैं और आशा की किरण बनकर पूरे दृश्य को आलोकित कर देते हैं.दुनियां से ज्योति कभी मिटती नहीं.फूल जीवन सौन्दर्य और कोमलता के प्रतीक हैं.



Saturday, March 10, 2018

फूल और व्यक्ति का स्तर



विश्व इतिहास में अन्यत्र ऐसा उदाहरण नहीं मिलता कि एक पुष्प,एक संस्कृति,व्यापार,सभ्यता और राष्ट्र का पर्यायवाची बन जाए.यदि किसी फूल के पौधे के जड़ का किसी के पास होना उसके समृद्ध होने का द्योतक हो तो सचमुच हैरत की बात है.बहुत सावधानी से इसकी सुरक्षा का प्रबंध किया जाना और फूल खिलने पर उतनी ही शान से इसका प्रदर्शन किया जाना तथा उसके वैभव - समृद्धि का वर्णन होने पर उसके इस फूल के संग्रह की संख्या बताया जाना रोचक तो है ही और शायद ही इतना महत्त्व किसी और पुष्प को मिला हो.

एक कटोरीनुमा फूल जो साल भर में केवल एक बार खिलता हो,वह सम्पूर्ण देश का पर्याय बन जाए तो जरूर उसमें कुछ अनूठापन होगा.इस अनूठे पुष्प ट्यूलिप का इतिहास बहुत ही रोचक है.यह पुष्प वस्तुतः तुर्किस्तान,एशिया माइनर का निवासी था और वहां के निवासी इसे ‘ट्यूलिपान’ कहकर पुकारते थे.

सबसे पहले इसका विवरण आस्ट्रिया के निवासी राजदूत ओ.डी. वास्वेक ने कुस्तुनतूनिया से सम्राट फर्निनेंड को अपने एक पत्र में दिया और साथ ही उन्हें उपहार स्वरूप इसकी कंदनुमा जड़ें भी उन्हें भेजीं.वह 1554 में जब कुस्तुनतूनिया पहुंचा तो उसने सम्राट को लिखा-“रास्ते में चारों ओर लाल रंग के विचित्र प्रकार के सुंदर पुष्प खिले हुए थे और ट्यूलिपान नाम से प्रसिद्ध इन पुष्पों के द्वारा वहां लोगों ने जगह-जगह पर मेरा स्वागत किया.” सम्राट ने इस पर विशेष ध्यान नहीं दिया.

राजदूत वास्वेक एक प्रकृतिप्रेमी पुष्पों का संग्रहकर्त्ता भी था,वियना वापस आने पर वह अपने साथ ट्यूलिप की कन्द्नुमा जड़ें लेता आया.वियना के उस युग के प्रसिद्ध वनस्पति विज्ञानी तथा पुष्प प्रेमी कोनार्ड गिसनर ने ऑक्सबर्ग शहर से इसकी जड़ें प्राप्त करके इसे अपने उद्यान में लगाया.वसंत ऋतु के आने पर जब इसका फूल खिला ,तो चर्चा का विषय बन गया और हर व्यक्ति इसे पाने को आतुर हो उठा.डच लेखक हबलुयत के अनुसार सोलहवीं सदी के अंत में इंगलैंड में वियना से लाकर ट्यूलिप बोया गया.

यद्यपि सुंदरता के अतिरिक्त इस पुष्प की और कोई उपयोगिता नहीं थी.फिर भी सोलहवीं शती में इसका शौक संक्रामक रोग की तरह फ़ैल गया.एक इतिहासकार ने इसे ‘ट्यूलिपोमिया’ का नाम दे दिया.पूरे यूरोप में विशेष कर पश्चिमी उत्तरी यूरोप और इंगलैंड में बड़े हों या छोटे,स्त्री हों या पुरूष,धनी हों या निर्धन - सभी इसे पाने को लालयित हो उठे.यहाँ तक कि इसके लिए जमीन जायदाद तक बेचने लगे.एम्सटरडम,हार्लेम,लीडन,रोटरडम आदि शहर ट्यूलिप के व्यापार केंद्र बन गए.

ट्यूलिप के  कंद अपने आकार एवं वजन के अनुसार बेचे जाते थे.19 वीं शताब्दी में इंगलैंड में इसका शौक इतना परवान चढ़ा कि इसके कंद सौ से लेकर डेढ़ सौ पौंड तक में बिके.एक कंद के बदले बारह एकड़ भूमि तक दे दी गयी.जिनके पास धन नहीं था उन्होंने जमीन,पशु,फर्नीचर और शरीर के आभूषण तक दे डाले.

इसका मूल्य इतना अधिक था ,यह इसी घटना से पता चलता है कि तुर्की से आने वाले एक जहाज के नाविक ने भूख लगने पर इस कंद को भूल से प्याज की गांठ समझ,सिरके में भिंगोकर डबलरोटी के साथ खा लिया तो उसका मूल्य चुकाने के लिए उसे कई वर्षों तक उसके स्वामी के पास मुफ्त में काम करना पड़ा.

सत्रहवीं शताब्दी में हॉलैंड में जगह-जगह ट्यूलिप के व्यापार केंद्र खुल गए.शहरों की सरायें न केवल यात्रियों के आराम एवं मनोरंजन का ध्यान रखतीं बल्कि ट्यूलिप के आदान प्रदान  का केंद्र बन गयीं.नए रंग के पुष्पों के कंद का मूल्य बढ़ता चला गया और एक समय ऐसा भी आया जब यह व्यापार एक जुआ बन गया.लोगों के पास देने के लिए कुछ न रहा और वे दिवालिया हो गए.विवश होकर हॉलैंड सरकार को इसके व्यापार पर प्रतिबन्ध लगाना पड़ा.ऐसे नियम बनाये गए ताकि सुनिश्चित ढंग से इसकी कृषि को प्रोत्साहित किया जा सके.

अब ट्यूलिप के व्यापार के लिए लाईसेंस का प्रावधान है.फूल एवं कंद  की बिक्री पर पूरी जांच-पड़ताल होती है.इस प्रकार ट्यूलिप की खेती को न केवल राष्ट्रीय संरक्षण प्राप्त हुआ बल्कि मूलतः विदेशी होने पर भी उसे राष्ट्रीय पुष्प घोषित किया गया.


Monday, March 5, 2018

नाग वंश अतीत और वर्त्तमान



नाग जाति के अतीत और वर्त्तमान के संबंध में कई विद्वानों में एक मत नहीं है कि नाग जाति के लोग कौन थे और इनका मूल निवास कहाँ था?हालांकि इनके संबंध में पुराणों,महाकाव्यों तथा ऐतिहासिक ग्रंथों में उल्लेख मिलता है.कश्मीर के कुछ प्राचीन शासकों के संबंध में कहा गया है कि इनका भी नाग जाति से संबंध था.कश्मीर के कुछ क्षेत्र आज भी नागों के नाम पर और नाग संस्कृति के परिचायक हैं.

कश्मीर का कर्कोटक वंश नाग जाति का सर्वश्रेष्ठ राजवंश था जिसमें दुर्लभ वर्द्धन  जैसा शासक भी हुआ.इसने काबुल,कंधार से चीन और दूसरे पश्चिमोत्तर सीमा प्रान्तों पर शासन किया.चीनी कथाओं और कल्हण की राजतरंगिणी में भी नाग जाति का उल्लेख मिलता है.कश्मीर के नाग जाति के शासकों में दुर्लभ वर्द्धन के अतिरिक्त प्रतापदित्य,श्रीप्रताप,चंद्रापीड़ वज्रादित्य,तारापीड़,उदयादित्य जैसे शासक थे.

ह्वेनसांग ने भी कश्मीर की यात्रा की थी,उसने नाग जाति के राजाओं की उदारता,उनकी सेवा भावना का जिक्र किया है .जन उन हुआ नामक चीनी ग्रन्थ के अनुसार तत्कालीन चीनी शासक त्से उंग ने नाग वंशी राजा चंद्रापीड़ से अरबों और तिब्बतियों के विरुद्ध सहायता मांगी थी परंतु चंद्रापीड़ ने यह सहायता एक समझौते में बदल दी थी और पारम्परिक असंतोष को समाप्त किया था.

नाग जाति की एक दूसरी शाखा का उल्लेख वर्त्तमान मिजोरम और चंपा राज्य(अब भागलपुर) के सन्दर्भ में भी मिलता है जिसके आधार पर यह कहा जाता है कि कुछ समय के बाद नाग जाति का शासन इन क्षेत्रों में फैला था.’इंडियन हिस्टोरिकल क्वार्टरली’ में 1907 में छपे नाग जाति पर एक लेख से पता चलता है कि प्राचीन काल में शेषनाग के रूप में यह सम्मान की पात्र समझी जाती थी.नाग जाति के कुछ लोग दक्षिण भारत में भी थे,जिनको कश्मीरी नागों की एक शाखा माना जाता था.

नागों की महिमा का पता इसी से चलता है कि पुराणों में शेषनाग इसी के आदि वंशज बाते जाते हैं.नाग पंचमी पर नागों की पूजा इस क्षेत्र में काफी प्रचलित है.दुर्गा सप्तशती में उल्लेख है कि भगवती दुर्गा के आविर्भाव के समय नागों के अधिपति ने महामरकत मणियों से युक्त एक नाग हार दिया था,जो सर्वश्रेष्ठ रत्न था.

पाणिनि ने नागों की उत्पत्ति पर्वतों से स्वीकार की है.........

नागे भवः नागः

अर्थात् पर्वतों के वासी होने के कारण नाग जाति को यह रूप मिला.इसके मुख्य वंशज तक्षक,कर्कोटक,वासुकी आदि थे.इसके अतिरिक्त राम के भाई लक्ष्मण और श्रीकृष्ण के भाई बलराम को भी शेष नाग के रूप में मान्यता प्राप्त है,जिनसे अवतारवाद की भूमिका में भी नाग भारतीयों द्वारा पूजित है.

गीता में श्रीकृष्ण ने स्वयं को नागों में अनंतनाग बताया है.......

अनन्तश्चाश्मि नागानां

अर्थात नागों में अनंत नाग. महाभारत में वर्णन है कि महाराज युधिष्ठिर के यज्ञ में नाग लोक के लोगों ने भी भाग़ लिया था.महाराज युधिष्ठिर के पादपीठों की वंदना नाग जाति के लोग किया करते थे.नागलोग की कन्याओं के संबंध में जिक्र आता है कि वे अत्यधिक सुंदर होती थीं,नागों का वैवाहिक संबंध भी भारतीय राजाओं से था.नरकासुर ने अनगिनत नाग कन्याओं को अपने कारागार में बंदी बना रखा था.श्रीकृष्ण ने नरकासुर पर विजय के पश्चात उन्हें मुक्त कराया ही था,उनको लोक मर्यादा के अनुरूप अपनी पटरानी बनाकर सम्मान दिया.ऐतिहासिक ग्रंथों में नंद और मौर्यों के उत्कर्ष के सामान ही सम्राट शिशुनाग का उल्लेख मिलता है जो नागवंशी था.

आज जो नागाओं का स्वरूप है वह लगभग दो हजार वर्षों का उपेक्षित रूप है.कश्मीर में कर्कोटक वंश के पतन के बाद नागों का अस्तित्व आज के असम,मिजोरम,अरुणाचल प्रदेश,,त्रिपुरा आदि क्षेत्रों तक सीमित रह गया.वहां भी ब्रिटिश काल में उन्हें उपेक्षित ही समझा गया.

पुराणों,महाकाव्यों के अतिरिक्त नागा जाति और उनकी संस्कृति के संबंध में जो विवरण प्राप्त हैं उनसे ज्ञात होता है कि नागों का स्थान एशिया में अत्यंत गौरवशाली था.इनका आधिपत्य चीन के मंगोल शासन से लेकर मलेशिया,जावा,फिलिपींस ,बर्मा आदि तक था.मलेशिया में नागा को नाका,बर्मा में नायका,फिलिपींस में नावा  कहा जाता है.अनुसंधानकर्त्ताओं का मानना है कि नागों का वास्तविक जन्मस्थान सिक्यांग का कोई भूभाग है,जहाँ से इन लोगों ने चिंग चिंग तथा ब्रह्मपुत्र नदी को पार करके एशिया के भूभागों में प्रवेश किया.

नागा जातियों का जीवन आज अनेक भागों में बंटा हुआ है.पुराणों में जिस नाग-लोक की कथा मिलती है वह इस नाग जाति से संबंध है या नहीं पर आज जिसे सात बहनों का घर माना जाता है,वह नाग लोगों से अवश्य संबंध रखता है.

Tuesday, October 17, 2017

बुरांस के फूल

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वनों को प्रकृति का श्रृंगार कहा जाता है.वनों के श्रृंगार से आच्छादित प्रकृति बसंत ऋतु में रंग-बिरंगे फूलों के नायाब गहनों से सज-संवर जाती है. फूलों का यह गहना प्रकृति के सौंदर्य में चार चांद लगा देता है. फूल को सौन्दर्य, कमनीयता, प्रेम, अनुराग और मासूमियत का प्रतीक माना जाता है. फूल का रंग उसकी सुन्दरता को बढा़ता है. प्रकृति के हरे परिवेश में सूर्ख लाल रंग के फूल खिल उठे हों तो यह दिलकश नजारा हर किसी का मन मोह लेता है.

उत्तराखण्ड के हरे-भरे जंगलों के बीच चटक लाल रंग के बुरांस के फूलों का खिलना पहाड़ में बसंत ऋतु के यौवन का सूचक है. बसंत के आते ही पहाड़ के जंगल बुरांस के सूर्ख लाल फूलों से मानो लद जाते हैं. बुरांस बसन्त में खिलने वाला पहला फूल है बुरांस धरती के गले को पुष्पाहार से सजा सा देता है. बुरांस के फूलने से प्रकृति का सौंदर्य निखर उठता है.
बुरांस का पेड़ उत्तराखंड का राज्य वृक्ष है, तथा नेपाल में बुरांस के फूल को राष्ट्रीय फूल घोषित किया गया है। गर्मियों के दिनों में ऊंची पहाड़ियों पर खिलने वाले बुरांस के सूर्ख फूलों से पहाड़ियां भर जाती हैं. हिमाचल प्रदेश में भी यह काफी पाया  जाता है.
उत्तराखण्ड के हरे-भरे जंगलों के बीच चटक लाल रंग के बुरांस के फूलों का खिलना पहाड़ में बसंत ऋतु के यौवन का सूचक है.बसंत के आते ही पहाड़ के जंगल बुरांस के सूर्ख लाल फूलों से मानो लद जाते हैं.बुरांस बसन्त में खिलने वाला पहला फूल है.बुरांस के खिलते ही धरती के गले को मानो पुष्पाहार सा मिल जाता है. बुरांस के फूलने से प्रकृति का सौंदर्य निखर उठता है.एक गढ़वाली लोकगीत में इसकी जीवंतता दिखाई देती है....

फूलों की हंसुली

पय्याँ ,धौलू ,प्योंली,आरू
लया फूले बुरांस

(पदम्,धौलू,प्योंली,आड़ू ,सरसों और बुरांस के फूल इस तरह खिले हुए हैं जैसे कोई दरांती हो)

बुरांस जब खिलता है तो पहाड़ के जंगलों में बहार आ जाती है. घने जंगलों के बीच अचानक चटक लाल बुराँस के फूल के खिल उठने से जंगल के दहकने का भ्रम होता है. जब बुराँस के पेड़ लाल फूलों से ढक जाते हैं तो ऐसा आभास होता है कि मानो प्रकृति ने लाल चादर ओढ़ ली हो. बुराँस को जंगल की ज्वाला भी कहा जाता है. उत्तराखण्ड के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में बुराँस की महत्ता महज एक पेड़ और फूल से कहीं बढ़कर है. बुराँस उत्तराखण्ड के लोक जीवन में रचा-बसा है. बुराँस महज बसंत के आगमन का सूचक नहीं है, बल्कि सदियों से लोक गायकों, लेखकों, कवियों, घुम्मकड़ों और प्रकृति प्रेमियों की प्रेरणा का स्रोत रहा है. बुराँस उत्तराखण्ड के हरेक पहलु के सभी रंगों को अपने में समेटे है.

सौंदर्य के प्रतीक इन पुष्पों का दर्शन नारी को भी सुंदर एवं आकर्षक बनने के लिए प्रोत्साहित करता है.एक प्रेयसी इन पुष्पों की कमनीयता पर इतना आकृष्ट हो जाती है कि अपने प्रेमी से अपने लिए बुरांस प्रसून की भांति चित्ताकर्षक परिधान की कामना करती है.......
मेरा विमरैल को जागो सी देवे 
बुरांस फूल को जामो सी 

(बुरांस के रक्त वर्ण के फूलों जैसे रंग के परिधान )
हिमालय के अनुपम प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन, प्रियसी की उपमा, प्रेमाभिव्यक्ति, मिलन हो या विरह सभी प्रकार के लोक गीतों की भावाभिव्यक्ति का माध्यम बुराँस है. उत्तराखण्ड के कई लोक गीत बुराँस के इर्द-गिर्द रचे गये है. विरह गीतों की मुख्य विषय-वस्तु बुराँस ही है. पहाड़ में बुराँस के खिलते ही कई भूले-बिसरे लोक गीत एकाएक स्वर पा जाते है-
उ कुमू य जां एक सा द्यूं प्यार सवन धरती मैं,
उ कुमू य जां कुन्ज, बुंरूस, चम्प, चमेलि, दगडै़ फुलनी

बुराँस का खिलना प्रसन्नता का द्योतक है. बुराँस का फूल यौवन और आशावादिता का सूचक है. प्रेम और उल्लास की अभिव्यक्ति है. बुराँस का फूल मादकता जगाता है. बुराँस का गिरना विरह और नश्वरता का प्रतीक है. बुराँस रहित जंगल कितने उदास और भावशून्य हो जाते है. इस पीडा़ को लोकगीतों के जरिये बखूबी महसूस किया जा सकता है.  बसन्त ऋतु में जंगल को लाल कर देने वाले इस फूल को देखकर नव विवाहिताओं को मायके और रोजी-रोटी की तलाश में पहाड़ से पलायन करने को अभिशप्त अपने पति की याद आ जाती है. अपने प्रियतम् को याद कर वह कहती है-
 अब तो बुरांश भी खिल उठा है, पर तुम नहीं आए
बुरांस के फूल में हिमालय की विराटता है. सौंदर्य है. शिवजी की शोभा है. पार्वती की झिलमिल चादर है. शिवजी सहित सभी देवतागण बुराँस के फूलों से बने रंगों से ही होली खेलते है. बुराँस आधारित होली गीत लोक जीवन में बुराँस की गहरी पैठ को उजागर करता है-

बुरूंसी का फूलों को कुम-कुम मारो,
डाना-काना छाजि गै बसंती नारंगी
पारवती ज्यूकि झिलमिल चादर,
ह्यूं की परिन लै रंगै सतरंगी

पहाड़ के लोक गीतों में सबसे ज्यादा जगह बुराँस को ही मिली है. एक पुराने कुमाऊँनी लोक गीत में जंगल में झक खिले बुराँस को देख मां को ससुराल से अपनी बिटिया के आने का भ्रम होता है. वह कहती है –
'वहां उधर पहाड़ के शिखर पर बुरूंश का फूल खिल गया है. मैं समझी मेरी प्यारी बिटिया हीरू आ रही है. अरे! फूले से झक-झक लदे बुरूंश के पेड़ को मैंने अपनी बिटिया हीरू का रंगीन कपडा़ समझ लिया.'

एक कवि नायिका के होठों की लालिमा का जिक्र करते हुए कहता है –

चोरिया कना ए बुरासन आंठे तेरा नाराणा

(बुराँश के फूलों ने हाय राम तेरे ओंठ कैसे चुरा लिये)

संस्कृत के अनेक कवियों ने बुराँस की महिमा को लेकर श्लोकों की रचना की है।

सुमित्रा नन्दन पंत भी बुराँस के चटक रंग से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके. उन्होंने बुराँस पर कुमाऊँनी कविता लिखी थी –

सल्ल छ, दयार छ, पई छ, अंयार छ
सबनाक फागन में पुग्नक भार छ
 पे त्वी में ज्वानिक फाग छ
रंगन में त्यार ल्वे छ
प्यारक खुमार छ

(जंगल में साल है, देवदार है, पईया है, और अयार समेत विभिन्न् प्रजातियों के पौधें है. सबकी शाखाओं में कलियों का भार है. पर तुझमें जवानी का फाग है. तेरे रंगों में लौ है, प्यार का खुमार है)

पहाड़ के रोजमर्रा के जीवन में बुराँस किसी वरदान से कम नहीं है. बुराँस के फूलों का जूस और शरबत बनता है. इसे हृदय रोग और महिलाओं को होने वाले सफेद प्रदर रोग के लिए रामबाण दवा माना जाता है. बुराँस की पत्तियों को आयुर्वेदिक औषधियों में उपयोग किया जाता है. बुराँस की लकडी़ स्थानीय कृषि उपकरणों से लेकर जलावन तक सभी काम आती है. चौडी़ पत्ती वाला वृक्ष होने के नाते बुराँस जल संग्रहण में मददगार है. पहाडी़ इलाकों के जल स्रोतो को जिंदा रखने में बुराँश के पेड़ों का बडा़ योगदान है। इनके पेड़ों की जड़ें भू-क्षरण रोकने में भी असरदार मानी जाती है. बुराँस का खिला हुआ फूल करीब एक पखवाड़े तक अपनी चमक बिखेरता रहता है. बाद में इसकी एक-एक कर पंखुड़िया जमीन पर गिरने लगती है.पलायन के चलते वीरान होती जा रही पहाड़ के गाँवों की बाखलियों की तरह.

लेकिन दुर्भाग्य से पहाड़ में बुराँस के पेड़ तेजी के साथ घट रहे हैं. अवैध कटाई के चलते कई इलाकों में बुराँस लुप्त होने के कगार पर पहुँच गया है. नई पौधें उग नहीं रही हैं. जानकारों की राय में पर्यावरण की हिफाजत के लिए बुराँस का संरक्षण जरूरी है. अगर बुराँस के पेड़ों के कम होने की मौजूदा रफ्तार जारी रही तो आने वाले कुछ सालों के बाद बुराँस खिलने से इंकार कर देगा. नतीजन आत्मीयता के प्रतीक बुरांस के फूल के साथ पहाड़ के जंगलों की रौनक भी खत्म हो जाएगी. बुरांस सिर्फ पुराने लोकगीतों में ही सिमट कर रह जाएगा. बसंत ऋतु फिर आएगी.फिर किसी पहाड़ी युवती  के स्वर फूटेंगे.......

मेरा मैत्यों का डांडा बुरांस फूल्यां
हिलासी जाण दे मैत

(मेरे मायके में बुरांस के फूल खिले हुए होंगे इसलिए हे पक्षी हिलांसी,मुझे अपने मायके जाने दे.)

Tuesday, October 10, 2017

जीवन की दिशा

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स्ट्राउड
व्यक्तियों के जीवन में कई पल ऐसे भी आते हैं जहाँ से उसके जीवन की दिशा ही बदल जाती है.ऐसा कई प्रमुख और नामचीन व्यक्तियों के साथ हुआ है.अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को की खाड़ी का एक छोटा सा द्वीप ‘अलकेटराज’ जो बंद मुट्ठी के आकर का है,पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है .इसका स्पेनी भाषा में अर्थ है-सारस. पहले यहाँ एक कारागार हुआ करता था जिसमें खतरनाक बंदी रखे जाते थे.

यहाँ बंद कई खतरनाक कैदियों ने 2 मई 1946 को विद्रोह कर दिया.कुछ बंदियों ने पहरेदारों पर आक्रमण कर उसे बंदी बना लिया और उससे चाबियाँ छीन कर अपने साथियों को छुड़ा लिया.लेकिन एक बंदी ऐसा भी था जिसने जिसने इस विद्रोह में भाग लेने से इनकार कर दिया.ऊँचे-पूरे हरी आँखों वाले इस 56 वर्षीय बंदी का नाम था – रॉबर्ट एफ. स्ट्राउड.

      अलकेटराज का कारागार 
स्ट्राउड को एक झगड़े मेंएक व्यक्ति को गोली मार देने के आरोप में बारह वर्ष के कैद की सजा हुई थी.जब वह कनास के लेनवर्थ कारागार  में बंदी था तो वहां के क्रूर पहरेदार को चाकू मारकर हत्या करने के आरोप में फांसी की सजा पाकर अपने जीवन के अंतिम दिन गिन रहा था.बाद में अमेरिकी राष्ट्रपति वुडरो विलसन ने उसके प्राणदंड को आजीवन कारावास में बदल दिया था.इस तरह स्ट्राउड मौत के मुंह में जाते-जाते जीवन की बांहों में लौट आया था.

जीवनदान मिलने के बाद स्ट्राउड ने आत्मचिंतन किया और पाया कि अपने क्रूर और शराबी पिता के कारण ही वह चिड़चिड़ा और आक्रामक बन गया था.उसकी मां के साथ विश्वासघात कर उसके पिता ने उन दोनों को छोड़ दिया था. स्ट्राउड ने अब भले व्यक्तियों की भांति जीवन बिताने का निश्चय किया .वह अपनी कोठरी में ग्रीटिंग कार्ड चित्रित करता और मां के माध्यम से बाजार में बिकने के लिए भेज देता.

अचानक 1920 में उसके जीवन में एक परिवर्तन आया. स्ट्राउड ने देखा कि व्यायाम के लिए बने अहाते में चिड़ियों का एक घोंसला है,जिसमें नन्हें नन्हें बीमार बच्चे हैं. स्ट्राउड उन बीमार बच्चों को अपनी कोठरी मरण ले आया और शाकाहारी सूप में ब्रेड के टुकड़े-टुकड़े भिगो-भिगो कर उन्हें खिलने लगा.शीघ्र ही ये बच्चे स्वस्थ हो गए.

स्ट्राउड के जीवन को अब एक नयी दिशा मिल गयी.उसने कारागार के पुस्तकालय में उपलब्ध पक्षियों की आदतों से संबंधित पुस्तकों को पढ़ना शुरू किया.वह चोरी छिपे कुछ अपनी कोठरी मरण कुछ पक्षी भी ले आता. धीरे – धीरे पक्षियों के संबंध में उसका ज्ञान बढ़ता गया.अब वह बीमार पक्षियों की चिकित्सा करने में भी दक्ष हो गया.धीरे-धीरे उसकी कोठरी ‘पक्षियों का अस्पताल ही बन गया.

स्ट्राउड की किताब 
जेल अधिकारियों ने भी उसे प्रोत्साहित किया और इसी के फलस्वरूप स्ट्राउड पक्षियों के संबंध में एक ज्ञानवर्द्धक पुस्तक लिखने में भी सफल हुआ.1943 में प्रकाशित उसकी इस पुस्तक का नाम था ‘डाईजेस्ट ऑन दी डिसिसेस ऑफ़  बर्ड्स’.इसमें उसके द्वारा बनाए गए पक्षियों के चित्र भी थे.समय बीते के साथ ही स्ट्राउड की ख्याति पक्षी विशेषज्ञ के रूप में होती गयी.एक दिन ‘अमेरिकी फेडरल ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टिगेशन’ के प्रमुख एक्गर हूवर ने उससे मुलाकात की और अपनी मां को भेंट देने के लिए पक्षी का एक चित्र भी खरीदा.

स्ट्राउड का जीवन शांति पूर्वक बीत रहा था,तभी कारागार में अन्य बंदियों के विद्रोह के दौरान उसने बंदियों को समझाने की कोशिश की एवं घायल बंदियों की सेवा भी की .

कारागार में ही 1963 में स्ट्राउड की की मृत्यु हो गयी .परिस्थितिवश स्ट्राउड से कुछ गलतियाँ हुई थी लेकिन विवेक ने उसका साथ नहीं छोड़ा,इसलिए कारागार में रहते हुए भी उसके जीवन को एक नई दिशा मिल गयी.

Saturday, September 30, 2017

कौरवों की पूजा

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पोखू देवता का मंदिर 
महाभारत के पांडवों की सामजिक-सांस्कृतिक मान्यता तो स्वयं ही सिद्ध है ही लेकिन इस देश में ऐसे भी मंदिर हैं जहाँ कौरवों की पूजा की जाती है.देहरादून से कुछ सौ किलोमीटर दूर तमसा नदी के तट पर नेटवार गाँव है  जिसके बीचोबीच पोखू देवता का मंदिर है .तमसा नदी के संबंध में यह मान्यता है कि कुरुक्षेत्र के युद्ध में दुर्योधन के मारे जाने के बाद वहां के स्थानीय निवासी इतना रोये कि उनके आंसुओं ने एक नदी का रूप धारण कर लिया.तमस का अर्थ दुःख भी होता है और आज भी इस नदी का पानी पीने के काम में नहीं लाया जाता.स्थानीय मान्यता है कि आज भी आंसू बह रहे हैं.नेटवार गाँव के निवासी अपने को दानवीर कर्ण का वंशज मानते हैं.

इसके समीप देवरा गाँव में राजा कर्ण का मंदिर है.मकर संक्रांति पर मंदिर के पास में घटोत्कच का मेला लगता है.इसमें गाय की खाल में पत्थर भरकर एक बड़ी गेंद बनायी जाती है  जिसे घटोत्कच का नाम दिया जाता है.

लगभग तीसरे पहर आस-पास के गाँव के लोग सज-धज कर नए कपड़े पहनकर मेले में आते हैं.बाजों गाजों के शोर के बीच दो टोलियाँ जिन्हें कौरवों और पांडवों का नाम दिया जाता है खड़ी हो जाती हैं.जब पुजारी उस गेंद को मैदान में फेंकता है तो दोनों टोलियों के बीच उसे लपकने के लिए धक्का-मुक्की होती है.

कहते हैं कि महाभारत के युद्ध में भीम का पुत्र घटोत्कच कर्ण के हाथों मारा गया था.शायद इसी से उस गेंद को घटोत्कच का नाम देकर कर्ण के मंदिर में इधर से उधर  फेंककर एक प्रकार से घटोत्कच को अपमानित किया जाता है.खेल की धक्का-मुक्की में कई लोगों को चोटें आ जाती है.खेल के ख़त्म होने के संकेत पर गेंद जिस टीम के सदस्य के हाथ में होती है उसे विजयी घोषित कर दिया जाता है.

देवरा गाँव के आसपास के बहुत बड़े इलाके में अभी भी राजा कर्ण का राज माना जाता है तथा लोगों के झगड़ों को निबटाने का काम राजा कर्ण के नाम पर मंदिर का पुजारी करता है.राजा कर्ण के तीन सहायक देवता पोखू,शल्य और रेनुका नाम से जाने जाते हैं.पोखू देवता का मंदिर पुराने नेटवार  गाँव में रूपिन और सूपिन नदियों के संगम पर बना है और उसकी बनावट कर्ण के मंदिर जैसी ही है.

पोखू एक सख्त देवता माना जाता है जो चोरी आदि करने पर सख्त सजा देता है.शायद इसलिए इस इलाके में अपराधों का नामोनिशान नहीं है.पोखू देवता इतना भयानक बताया जाता है कि कोई भी उसकी ओर देखता नहीं,यहाँ तक कि पुजारी भी उसकी आरती उसकी ओर पीठ करके ही करता है.

नेटवार से आगे डाटमीर  और गंगर गाँवों में दुर्योधन देवता के मंदिर हैं और उसकी पूजा भी होती है.ओसला में भी दुर्योधन का सुंदर मंदिर है.दुर्योधन का सबसे बड़ा मंदिर उत्तरकाशी में जखोल में है.

Saturday, September 23, 2017

खिलते हैं फूल पाँव के ठोकर से


पुरातात्विक भग्नावशेषों में मथुरा से प्राप्त ईसा की दूसरी शती की कुषाण कालीन युवती की प्रस्तर प्रतिमा के पार्श्व में अशोक का फूला हुआ पेड़ उत्कीर्ण है और वह युवती अपने पाँव से उस पेड़ की जड़ पर प्रहार कर रही है.इस प्रक्रिया को अशोक दोहद के नाम से जाना जाता है.बोधगया,साँची,भरहुत,संहोल आदि में प्राप्त प्रतिमाओं में भी अशोक दोहद की प्रक्रिया उत्कीर्ण है.ये प्रतिमाएं हमें उस काल के कला-साहित्य और जन-जीवन से परिचित कराती हैं.

वृक्ष दोहद शब्द वृक्ष विशेष की अभिलाषा का द्योतक है. हमारी संस्कृति में माना जाता है कि वृक्ष विशेष भी कुछ अभिलाषा रखते हैं. वृक्ष दोहद की पूर्ति जनकल्याण के लिए किसी युवती की क्रिया विशेष से होती है. वैदिक साहित्य, रामायण, महाभारत संस्कृत-प्राकृत के नाटकों और काव्यों रीति काव्यों तथा लोकगीतों में वृक्ष दोहद का खूब वर्णन है.

भारतीय संस्कृति में यह मान्यता है कि वृक्ष विशेष की भी यह इच्छा होती है कि उसके फूलने-फलने की उम्र यानी युवावस्था में कोई नारी उस को स्पर्श करे, उसे हाथ से थाप दे या पैर से प्रहार करे. इसी कारण भारतीय साहित्य में युवतियों का भी उपवन वाटिका या उद्यान से प्रेम प्रदर्शन का वर्णन है. उद्यान क्रीड़ा के विभिन्न स्वरूप प्राचीन काल में नारियों के मनोरंजन का प्रिय साधन थे. माना जाता था कि जैसे वृक्ष नारी स्पर्श की आकांक्षा रखते हैं वैसे ही नारियाँ भी वृक्षों संग क्रीड़ा कर उतनी ही आनंदित होती थी. इससे दोनों का स्वास्थ्य और सौंदर्य बना रहता था. इसी प्रचलित लोक विश्वास को संस्कृत कवियों ने अपने साहित्य में भी स्थान दिया है.

 'मालविकाग्निमित्रम' से पता चलता है कि मदन उत्सव के बाद अशोक में दोहद उत्पन्न किया जाता था। यह दोहद क्रिया इस प्रकार होती थी- कोई सुंदरी सब प्रकार के आभूषण पहनकर पैरों में महावर लगाकर और नूपुर धारण कर बाएँ चरण से अशोक वृक्ष पर आघात करती थी. इस चरणाघात की विलक्षण महिमा थी. अशोक वृक्ष नीचे से ऊपर तक पुष्पस्तवकों (गुच्छों) से भर जाता था. कालिदास ने 'मेघदूतम' में लिखा है कि दोहद एक ऐसी क्रिया है जो गुल्म, तरु, लतादि में अकाल पुष्प धारण करने की दिशा में द्रव्य का कार्य करता है. मेघदूतम में ही उन्होंने लिखा है कि वाटिका के मध्य भाग में लाल फूलों वाले अशोक और बकुल के वृक्ष थे, एक प्रिया के पदाघात से और दूसरा वदन मदिरा से उत्फुल्ल होने की आकांक्षा रखता था. 'नैषधीयचरितम' में उल्लेख है कि दोहद ऐसे द्रव्य या द्रव्य का फूक है जो वृक्षों एवं लता आदि में फूल और फल देने की शक्ति प्रदान करता है.

भारतीय साहित्य में अलग-अलग वृक्ष, लता, गुल्म आदि को ध्यान में रखकर प्रियंगु दोहद, बकुल दोहद, अशोक दोहद, कुरबक दोहद, मंदार दोहद, चंपक दोहद, आम्र दोहद, कर्णिकार दोहद, नवमल्लिका दोहद आदि की कल्पना की गई है. भारतीय कला विशेष कर शुंगकालीन कला में उद्यान क्रीड़ा के स्वरूपों में शाल भंजिका, आम्र भंजिका, सहकार भंजिका के रूप प्रदर्शित किए गए हैं.

वृक्ष दोहद के स्वरूप आज भी लोक परंपराओं में देखे जा सकते हैं. भोजपुरी समाज में दोहद की इस क्रिया को अकवार देना कहा जाता है। ऐसी मान्यता है की पूर्णरूप से विकसित वृक्ष जब फल-फूल नहीं दे रहा हो तो कोई युवती जब शृंगार कर उसे दोनों हाथों से पकड़ लेती और उसके साथ एक विशेष क्रिया करती है तो वह वृक्ष ज़रूर फूल-फल देने लगता है. यही नहीं वृक्षों और पौधों की शादी की भी परंपरा रही है. तुलसी, आम, आँवला, कटहल, कनैल आदि पौधों तथा वृक्षों के विवाह विधिवत किए जाते हैं ताकि वह अच्छे ढंग से फूल-फल सके.

भोजपुरी समाज में दोहद के कई और रूप देखने को मिलते हैं। इनमें से एक को हरपरौरी कहा जाता है. जब किसी वर्ष वर्षा नहीं होती है पूर्णत: अकाल के लक्षण दिखने लगते हैं तब औरतें हरपरौरी का आयोजन करती हैं. इस परंपरा के अनुसार रात्रि में औरतें गाँव से बाहर निर्जन स्थान में स्थित खेत में इकट्ठा होती हैं. उस स्थान पर औरतों द्वारा काली माता, शीतला माँ, आदि सप्तमातृकाओं का गीत गाया जाता है. उसके बाद दो औरतें झुककर बैल बनने का स्वांग करती हैं और एक औरत किसान के रूप में होती है उन बैल बनी औरतों के कंधों पर जुआठ रखी जाती है और किसान का अभिनय कर रही औरत हल की मूठ सँभालती है. अब खेत में हल चलना शुरू होता है. किसान का अभिनय कर रही औरत गाँव के किसी प्रधानव्यक्ति का नाम लेकर चिल्लाकर कहती है कि हम लोग यहाँ मर रहे हैं और उसके द्वारा पानी नहीं दिया जा रहा है. इस दौरान शेष औरतें वरुण देव का आवाहन कर के गीत गाती हैं .

मान्यता है कि औरतें हरपरौरी क्रिया में जब खेतों में हल चला देती हैं तो वर्षा अवश्य होती है. फसल लहलहाने लगती है और सूखे की समस्या ख़त्म हो जाती है. इसी तरह झारखंड के जनजातीय क्षेत्रों में अकाल की स्थिति में औरतें प्रातः स्नान करके जितिया वृक्ष के जड़ में एक लोटा जल डालती हैं और भगवान से पानी की वर्षा करने का आग्रह करती हैं. विश्वास किया जाता है कि ऐसा करने पर ज़रूर वर्षा होती है. इसके अतिरिक्त उत्तर प्रदेश और बिहार में नए कूप और बावली के विवाह की भी परंपरा है. कूप और बावली भले ही मानव द्वारा निर्मित हों लेकिन वह हमारे पर्यावरण के अंग हैं और प्रकृति संग एकाकार होते हैं. माना जाता है कि इन कूप और बावलियों को भी मादा संसर्ग की आकांक्षा होती है. इस कारण इनके भी विवाह की परंपरा है. भोजपुरी अंचल में यह मान्यता है कि इससे कुएँ तथा बावलियों में भरपूर था मीठा जल बना रहता है. इन परंपराओं के पीछे उद्देश्य रहा होगा कि वृक्ष ही नहीं बल्कि प्रकृति के कई घटक नारी संसर्ग और स्पर्श चाहते हैं.

आज भारतीय समाज में दोहद रूपी लोक परंपरा का ह्रास देखने को मिल रहा है अब नारी, प्रकृति और वृक्षों की आकांक्षा को कम महत्व दिया जा रहा है. ज़रूरत है इस पर ध्यान देने की. इससे एक तरफ़ श्रेष्ठ वंश वृद्धि होगी, संतान स्वस्थ होंगे, सुंदर और कुशल होंगे, वहीं दूसरी ओर वृक्ष और पौधे भी फल-फूलों से लदकर देश का उत्पादन बढ़ाएँगे. तालाबों का भी अस्तित्व बना रहेगा. कुओं का जल मीठा और पीने योग्य होगा तथा उन का जलस्तर भी हमारे लायक़ बना रहेगा. अंततः हम सभी को इन सभी चीज़ों से लाभ होगा.

Monday, July 24, 2017

पौराणिक आख्यानों की ओर


पौराणिक आख्यानों में कई ऐसे दृष्टांत मिल जाते हैं जो आज के सन्दर्भ में भी प्रासंगिक लगते हैं.कहा जाता है कि प्राचीन भारतीय समाज में वर्ण व्यवस्था प्रचलित थी और साधारणतः इसमें परिवर्तन संभव नहीं था.लेकिन विश्वामित्र प्रतापी क्षत्रिय नरेश थे जिन्होंने अपनी तपस्या के बल पर ब्राह्मणत्व प्राप्त किया.जिस सविता देवी की स्तुति रूप गायत्री की दीक्षा उपनयन में दी जाती है उसके दृष्टा विश्वामित्र ही माने जाते हैं.

पुराणों के अनुसार विश्वामित्र कान्यकुब्ज देश के महीपति थे.एक बार वे सेना के साथ आखेट के लिए गए और शिकार करते हुए बहुत दूर निकल गए.भूख-प्यास से व्याकुल लौटते हुए एक जगह सुंदर आश्रम दिखा,पता चला यह महर्षि वशिष्ठ का आश्रम है.सेना को वहीँ छोड़ वे ऋषि के दर्शन हेतु उनके आश्रम जा पहुंचे.वशिष्ठ से कुशल क्षेम पूछने के बाद चलने को तत्पर हुए तो वशिष्ठ ऋषि ने उनसे आतिथ्य ग्रहण का अनुरोध किया.

विश्वामित्र को यह गर्वोक्ति लगी तो उन्होंने कहा कि उनके साथ विशाल संख्या में सैनिक भी हैं.वशिष्ठ ऋषि ने निवदन किया,क्या हानि है,पास ही पवित्र जल वाली नदी है.कम से कम उससे ठंढा जल तो सबको मिल ही जाएगा.भोजन के लिए भी जो हो सकेगा वह प्रबंध हो जाएगा.’

विश्वामित्र ने वशिष्ठ की उस उक्ति को गर्वोक्ति माना और विचार किया कि आज उनका अभिमान तोड़ ही देना चाहिए.प्रकट में कहा कि ऋषि की आज्ञा शिरोधार्य है,मैं सेना सहित आपका आथित्य ग्रहण करूंगा.’वशिष्ठ के शिष्यों ने प्रत्येक के लिए इच्छानुसार भोजन सामग्री प्रस्तुत कर दी साथ ही घोड़ों के केलिए भी यथोचित सामग्री प्रस्तुत की गयी.सभी लोगों के मन में विचार उत्पन्न हुआ कि इतना सुख तो अपने घरों में भी नहीं है.

भोजन आदि से निवृत्त होकर जब विश्वामित्र पुनः विदा मांगने वशिष्ठ के पास पहुंचे जब जिज्ञासा प्रकट की,’आश्रम तो छोटा प्रतीत होता है ,इतनी बड़ी सेना के लिए आथित्य का सामान कहाँ से आया.’वशिष्ठ ने अपनी गौ को ओर संकेत करते हुए कहा –‘भारतवर्ष का मुख्य धन तो यही गौ है.इस कामधेनु गौ की कृपा से ही यहाँ सब कुछ सुलभ है.’
विश्वामित्र ने कहा.’ऐसी अनुपम वस्तु का प्रयोग तो आप कभी-कभी ही कर पाते होगें,यह तो हमारे राजदरबार के उपयुक्त है.कृपया इसे हमें दे दीजिए.’वशिष्ठ ने कहा,’आप हमारे अतिथि हैं.अतिथि को उनकी इच्छानुसार सबकुछ दिया जा सकता है किंतु यदि यह गौ अपनी इच्छानुसार आपके साथ जाना चाहे तो इसे ले जा सकते हैं,इसके लिए बल प्रयोग नहीं होना चाहिए.’

महाराजा विश्वामित्र ने अपने सैनिकों को गौ ले चलने की आज्ञा दी किंतु गौ डकारते हुए वशिष्ठ के चरणों में बैठ गयी.वशिष्ठ ने कहा,’राजन, गौ जाना नहीं चाहती तो मैं बलात भिजने में असमर्थ हूँ.’इस पर विश्वामित्र आवेश में आ गए.उन्हों अपने सैनिकों को गौ को बांधकर ले जाने की आज्ञा दी लेकिन वशिष्ठ के तेज के कारण उनके समीप नहीं पहुँच सके.अंत में दिव्यास्त्रों का प्रहार शुरू कर दिया.

वशिष्ठ ने कोई उत्तर नहीं दिया केवल अपना ब्रह्मदंड लेकर खड़े हो गए.विश्वामित्र के दिव्यास्त्रों को ब्रह्मदंड निगल जाता था.यह देखकर विश्वामित्र ने अपना धनुष तोड़कर फेंक दिया उनके मुंह से निकल पड़ा.........

धिग् बलं क्षत्रियबलं ब्रह्मतेजो बलं वलम् |
एकेन ब्रह्मदण्डेण सर्वस्त्राणि हतानि में ||

विश्वामित्र ने निश्चय किया कि वे ब्रह्म्बल प्राप्त करेंगे.इस निश्चय के साथ ही वे ब्रह्म्बल की प्राप्ति के लिए तपस्या करने चले गए.उन्होंने ताप किया और ब्राह्मणत्व प्राप्त किया.एक क्षत्रिय के ब्राह्मणत्व प्राप्त करने पर भी वर्ण व्यवस्था पर कोई चोट नहीं पहुंची.यह वर्ण व्यवस्था के लचीलेपन का प्रमाण है.ब्राह्मणत्व प्राप्त कर लेने पर भी कौशिक गोत्र में बने रहने कि सम्भावना व्यक्त की जाती है.विश्वामित्र का कौशिक नाम वेदों और पुराणों में मिलता है.

Monday, July 17, 2017

मृत्यु का देवता


दुनियां के प्रायः सभी देशों,सभी सभ्यताओं में प्राचीन आख्यानों और मिथकों की समुद्ध परंपरा रही है.ये आख्यान और मिथक एक तरह से मनुष्य के आध्यात्मिक और भौतिक विकास का इतिहास भी हैं.वे उन परिस्थितियों की ओर भी संकेत करते हैं,जिन्होंने मनुष्य की विचारधारा,उसके दृष्टिकोण,उसके जीवन को प्रभावित किया है.

कई देशों की लोककथाओं में मिथकों का व्यापक विस्तार और समानताएं भी देखने को मिल जाती हैं.भारतीय मिथकों और लोकगाथाओं में यमराज को मृत्यु का देवता माना जाता है.मिस्त्र की सभ्यता में ओसिरिस को मृत्यु का देवता माना जाता है.

प्राचीन मिस्त्र में यह विश्वास प्रचलित था कि मृत्यु के पश्चात प्रत्येक व्यक्ति को ओसिरिस के लोक में प्रवेश करना पड़ता  है,जहाँ उसके पाप-पुण्य का विचार किया जाता है.प्राचीन मिस्त्र की मूर्तिपूजक सभ्यता में भारत से कई गुणा अधिक देवी-देवताओं का आधिपत्य था.सूर्य देवता जिसे ‘रा’ कहा जाता था,मिस्त्र के देव-मण्डल का प्रमुख था.उसी ने स्वयं को बनाया था और उसके बाद सृष्टि की रचना की थी.

प्राचीन मिस्त्र के धार्मिक साहित्य में ‘रा’ की महिमा का वर्णन मिलता है लेकिन देवताओं में सर्वाधिक रोमांचक और विविध वर्णन ओसिरिस का है.ओसिरिस मृत्यु का देवता माना जाता था और मृत्यु के बाद जीवन की कल्पना जितनी गहराई से प्राचीन मिस्त्री आस्था और विश्वासों से जुड़ी हुई थी,उसे देखते हुए ओसिरिस को विशेष स्थान प्राप्त था.

ओसिरिस को लेकर एक रोचक मिथक प्राचीन मिस्त्र के धर्म लेखों में मिलता है.एक बार ‘रा’ को पता चला कि नुतृ और गेब नामक दो देवी-देवता एक दूसरे से प्यार करते हैं.’रा’ ने क्रोधित होकर ‘नुतृ’ को श्राप दिया कि वह वर्ष के किसी भी दिन संतान को जन्म नहीं दे सकेगी.

इस गंभीर समस्या का हल ‘थोत’ देवता ने निकाला.वह हर रोज थोड़ा-थोड़ा समय चुराकर रख लेता था.इस तरह चुराए हुए समय से उसने पांच दिनों का निर्माण किया.उन अतिरिक्त दिनों के दौरान नुतृ ने ओसिरिस,होरस,सेत,आइसिस और नेपथे को जन्म दिया.प्राचीन मिस्त्री लोग वर्ष के अंतिम पांच दिनों को इन्हीं नामों से जानते थे.नेपथे और सेत तथा ओसिरिस और आइसिस विवाह में बंध गए.

बाद में ओसिरिस मिस्त्र का राजा बन गया और देव समाज में उसे महत्वपूर्ण स्थान मिल गया.सेत ओसिरिस से ईर्ष्या करता था.एक बार ओसिरिस मिस्त्र से बाहर दूसरे देश की यात्रा पर गया.लौटने पर सेत ने उसके सम्मान में दावत दी. उसने ओसिरिस की लम्बाई के अनुसार एक सुंदर और मजबूत ताबूत बनवाया.दावत शुरू हुई तभी सेत के संकेत पर दास उस ताबूत को उठाकर लाए.सेत ने मुस्कुराकर कहा-‘मित्रो ! आओ एक खेल खेलते हैं.मुझे यह विचित्र संदूक उपहार में मिला है.हम सब बारी-बारी से इस संदूक में लेट कर देखें.’

खेल शुरू हुआ.ओसिरिस के अतिरिक्त बारी-बारी से हर व्यक्ति उस ताबूत में घुसा,किसी ने ताबूत को छोटा तो किसी ने बड़ा बताया.अंत में ओसिरिस की बारी आई.वह ख़ुशी-ख़ुशी ताबूत में जा लेटा.पलक झपकते ही ताबूत को बंद करके उसमें पिघला हुआ शीशा लगा दिया गया.सेत के घर के पास ही एक नदी बहती थी जिसके गहरे पानी में उसे फेंक दिया गया.

आइसिस को पता चला कि सेत ने उसके साथ क्या कर डाला है.रोती-कलपती वह हर आने-जाने व्यक्ति से पूछती कि क्या उसने नदी में बहते किसी ताबूत को देखा है?आखिर में दो बच्चों ने उसे बताया कि उन्होंने कुछ लोगों को एक ताबूत नदी में फेंकते हुए देखा था.

नदी में गिरने के बाद ताबूत समुद्र में पहुंचा और बहता हुआ लेबनान में बिबलास नगर के तट पर जा लगा.लहरें ताबूत को किनारे पर छोड़ गयीं.ताबूत कुछ पौधों में अटक गया.बाद में वहां एक विशाल वृक्ष उग आया जिसके तने में ताबूत छिप गया.

एक दिन बिबलास के राजा ने पेड़ को देखा तो उसे काटने का आदेश दिया.काटने के बाद शिल्पियों ने पेड़ के तने को एक स्तम्भ का रूप दे दिया.काष्ठ स्तंभ राजप्रासाद के एक कक्ष में छत को सहारा देने के लिए लगा दिया गया.ताबूत में बंद ओसिरिस का शव अब उस स्तंभ की कैद में था.आइसिस अपनी दैवीय शक्ति के बल पर पूरी घटना को जान गयी.वह बिबलास जा पहुंची और रानी की दासियों से मित्रता कर ली.आइसिस के शरीर से विचित्र सुगंध निकलती थी.दासियों के शरीर में भी वही सुगंध बस गयी.

उस विचित्र सुगंध से रानी आकर्षित हुई,दासियों से पूछा और आइसिस को महल में बुला भेजा.आइसिस ने रानी को जैसे सम्मोहित कर दिया था.उसने आइसिस को महल में बच्चे की देखभाल के लिए रख लिया.रात हुई.कक्ष में आग जल रही थी.आइसिस ने सोचा वह बच्चे को अमर बना दे.उसने बच्चे को पवित्र करने के लिए आग में डाल दिया और चिड़िया बनकर उस काष्ठ स्तंभ के चक्कर लगाने लगी जिसके अंदर उसके पति का ताबूत था.

उसी समय रानी कमरे में आयी तो बच्चे को आग में पड़ा देखकर आतंक से चीख उठी.आइसिस ने बच्चे को आग से निकाल लिया,बच्चा सकुशल था.उसने रानी को अपना वास्तविक परिचय दिया,कहा,’मुझे अपने पति की देह चाहिए.’रानी आश्चर्य से अभिभूत खड़ी रही.आइसिस ने स्तंभ को काटकर ताबूत बाहर निकला और ताबूत लेकर चली आयी.बाद में बिबलास ने आइसिस के सम्मान में विशाल मंदिर का निर्माण करवाया.

आइसिस पति का ताबूत लेकर मिस्त्र की ओर चल दी.वहां पहुचकर उसने ताबूत को खोला और ओसिरिस के निष्प्राण शरीर से लिपटकर विलाप करने लगी.फिर ताबूत को झाड़ियों में छिपाकर महल जा पहुंची.इस बीच सेत को भी साड़ी घटना मालूम हो चुकी थी.वह मौका देखकर गया और झाड़ियों में छिपा ताबूत उठाकर चल दिया.उसने ओसिरिस के अनेक टुकड़े कर दिए और मिस्त्र में दूर-दूर तक फेंक दिया.

आइसिस महल से बहन नेपथे के साथ लौटी तो ताबूत को न पाकर खोजबीन शुरू कर दी.दोनों ने ढूंढ़कर ओसिरिस के शरीर के टुकड़े इकठ्ठे किए और हर जगह अंतिम संस्कार करके ओसिरिस का एक मंदिर बना दिया.इस तरह ओसिरिस एक सर्वपूज्य देवता बन गया,मृत्यु का देवता.