Saturday, September 23, 2017

खिलते हैं फूल पाँव के ठोकर से


पुरातात्विक भग्नावशेषों में मथुरा से प्राप्त ईसा की दूसरी शती की कुषाण कालीन युवती की प्रस्तर प्रतिमा के पार्श्व में अशोक का फूला हुआ पेड़ उत्कीर्ण है और वह युवती अपने पाँव से उस पेड़ की जड़ पर प्रहार कर रही है.इस प्रक्रिया को अशोक दोहद के नाम से जाना जाता है.बोधगया,साँची,भरहुत,संहोल आदि में प्राप्त प्रतिमाओं में भी अशोक दोहद की प्रक्रिया उत्कीर्ण है.ये प्रतिमाएं हमें उस काल के कला-साहित्य और जन-जीवन से परिचित कराती हैं.

वृक्ष दोहद शब्द वृक्ष विशेष की अभिलाषा का द्योतक है. हमारी संस्कृति में माना जाता है कि वृक्ष विशेष भी कुछ अभिलाषा रखते हैं. वृक्ष दोहद की पूर्ति जनकल्याण के लिए किसी युवती की क्रिया विशेष से होती है. वैदिक साहित्य, रामायण, महाभारत संस्कृत-प्राकृत के नाटकों और काव्यों रीति काव्यों तथा लोकगीतों में वृक्ष दोहद का खूब वर्णन है.

भारतीय संस्कृति में यह मान्यता है कि वृक्ष विशेष की भी यह इच्छा होती है कि उसके फूलने-फलने की उम्र यानी युवावस्था में कोई नारी उस को स्पर्श करे, उसे हाथ से थाप दे या पैर से प्रहार करे. इसी कारण भारतीय साहित्य में युवतियों का भी उपवन वाटिका या उद्यान से प्रेम प्रदर्शन का वर्णन है. उद्यान क्रीड़ा के विभिन्न स्वरूप प्राचीन काल में नारियों के मनोरंजन का प्रिय साधन थे. माना जाता था कि जैसे वृक्ष नारी स्पर्श की आकांक्षा रखते हैं वैसे ही नारियाँ भी वृक्षों संग क्रीड़ा कर उतनी ही आनंदित होती थी. इससे दोनों का स्वास्थ्य और सौंदर्य बना रहता था. इसी प्रचलित लोक विश्वास को संस्कृत कवियों ने अपने साहित्य में भी स्थान दिया है.

 'मालविकाग्निमित्रम' से पता चलता है कि मदन उत्सव के बाद अशोक में दोहद उत्पन्न किया जाता था। यह दोहद क्रिया इस प्रकार होती थी- कोई सुंदरी सब प्रकार के आभूषण पहनकर पैरों में महावर लगाकर और नूपुर धारण कर बाएँ चरण से अशोक वृक्ष पर आघात करती थी. इस चरणाघात की विलक्षण महिमा थी. अशोक वृक्ष नीचे से ऊपर तक पुष्पस्तवकों (गुच्छों) से भर जाता था. कालिदास ने 'मेघदूतम' में लिखा है कि दोहद एक ऐसी क्रिया है जो गुल्म, तरु, लतादि में अकाल पुष्प धारण करने की दिशा में द्रव्य का कार्य करता है. मेघदूतम में ही उन्होंने लिखा है कि वाटिका के मध्य भाग में लाल फूलों वाले अशोक और बकुल के वृक्ष थे, एक प्रिया के पदाघात से और दूसरा वदन मदिरा से उत्फुल्ल होने की आकांक्षा रखता था. 'नैषधीयचरितम' में उल्लेख है कि दोहद ऐसे द्रव्य या द्रव्य का फूक है जो वृक्षों एवं लता आदि में फूल और फल देने की शक्ति प्रदान करता है.

भारतीय साहित्य में अलग-अलग वृक्ष, लता, गुल्म आदि को ध्यान में रखकर प्रियंगु दोहद, बकुल दोहद, अशोक दोहद, कुरबक दोहद, मंदार दोहद, चंपक दोहद, आम्र दोहद, कर्णिकार दोहद, नवमल्लिका दोहद आदि की कल्पना की गई है. भारतीय कला विशेष कर शुंगकालीन कला में उद्यान क्रीड़ा के स्वरूपों में शाल भंजिका, आम्र भंजिका, सहकार भंजिका के रूप प्रदर्शित किए गए हैं.

वृक्ष दोहद के स्वरूप आज भी लोक परंपराओं में देखे जा सकते हैं. भोजपुरी समाज में दोहद की इस क्रिया को अकवार देना कहा जाता है। ऐसी मान्यता है की पूर्णरूप से विकसित वृक्ष जब फल-फूल नहीं दे रहा हो तो कोई युवती जब शृंगार कर उसे दोनों हाथों से पकड़ लेती और उसके साथ एक विशेष क्रिया करती है तो वह वृक्ष ज़रूर फूल-फल देने लगता है. यही नहीं वृक्षों और पौधों की शादी की भी परंपरा रही है. तुलसी, आम, आँवला, कटहल, कनैल आदि पौधों तथा वृक्षों के विवाह विधिवत किए जाते हैं ताकि वह अच्छे ढंग से फूल-फल सके.

भोजपुरी समाज में दोहद के कई और रूप देखने को मिलते हैं। इनमें से एक को हरपरौरी कहा जाता है. जब किसी वर्ष वर्षा नहीं होती है पूर्णत: अकाल के लक्षण दिखने लगते हैं तब औरतें हरपरौरी का आयोजन करती हैं. इस परंपरा के अनुसार रात्रि में औरतें गाँव से बाहर निर्जन स्थान में स्थित खेत में इकट्ठा होती हैं. उस स्थान पर औरतों द्वारा काली माता, शीतला माँ, आदि सप्तमातृकाओं का गीत गाया जाता है. उसके बाद दो औरतें झुककर बैल बनने का स्वांग करती हैं और एक औरत किसान के रूप में होती है उन बैल बनी औरतों के कंधों पर जुआठ रखी जाती है और किसान का अभिनय कर रही औरत हल की मूठ सँभालती है. अब खेत में हल चलना शुरू होता है. किसान का अभिनय कर रही औरत गाँव के किसी प्रधानव्यक्ति का नाम लेकर चिल्लाकर कहती है कि हम लोग यहाँ मर रहे हैं और उसके द्वारा पानी नहीं दिया जा रहा है. इस दौरान शेष औरतें वरुण देव का आवाहन कर के गीत गाती हैं .

मान्यता है कि औरतें हरपरौरी क्रिया में जब खेतों में हल चला देती हैं तो वर्षा अवश्य होती है. फसल लहलहाने लगती है और सूखे की समस्या ख़त्म हो जाती है. इसी तरह झारखंड के जनजातीय क्षेत्रों में अकाल की स्थिति में औरतें प्रातः स्नान करके जितिया वृक्ष के जड़ में एक लोटा जल डालती हैं और भगवान से पानी की वर्षा करने का आग्रह करती हैं. विश्वास किया जाता है कि ऐसा करने पर ज़रूर वर्षा होती है. इसके अतिरिक्त उत्तर प्रदेश और बिहार में नए कूप और बावली के विवाह की भी परंपरा है. कूप और बावली भले ही मानव द्वारा निर्मित हों लेकिन वह हमारे पर्यावरण के अंग हैं और प्रकृति संग एकाकार होते हैं. माना जाता है कि इन कूप और बावलियों को भी मादा संसर्ग की आकांक्षा होती है. इस कारण इनके भी विवाह की परंपरा है. भोजपुरी अंचल में यह मान्यता है कि इससे कुएँ तथा बावलियों में भरपूर था मीठा जल बना रहता है. इन परंपराओं के पीछे उद्देश्य रहा होगा कि वृक्ष ही नहीं बल्कि प्रकृति के कई घटक नारी संसर्ग और स्पर्श चाहते हैं.

आज भारतीय समाज में दोहद रूपी लोक परंपरा का ह्रास देखने को मिल रहा है अब नारी, प्रकृति और वृक्षों की आकांक्षा को कम महत्व दिया जा रहा है. ज़रूरत है इस पर ध्यान देने की. इससे एक तरफ़ श्रेष्ठ वंश वृद्धि होगी, संतान स्वस्थ होंगे, सुंदर और कुशल होंगे, वहीं दूसरी ओर वृक्ष और पौधे भी फल-फूलों से लदकर देश का उत्पादन बढ़ाएँगे. तालाबों का भी अस्तित्व बना रहेगा. कुओं का जल मीठा और पीने योग्य होगा तथा उन का जलस्तर भी हमारे लायक़ बना रहेगा. अंततः हम सभी को इन सभी चीज़ों से लाभ होगा.

Monday, July 24, 2017

पौराणिक आख्यानों की ओर


पौराणिक आख्यानों में कई ऐसे दृष्टांत मिल जाते हैं जो आज के सन्दर्भ में भी प्रासंगिक लगते हैं.कहा जाता है कि प्राचीन भारतीय समाज में वर्ण व्यवस्था प्रचलित थी और साधारणतः इसमें परिवर्तन संभव नहीं था.लेकिन विश्वामित्र प्रतापी क्षत्रिय नरेश थे जिन्होंने अपनी तपस्या के बल पर ब्राह्मणत्व प्राप्त किया.जिस सविता देवी की स्तुति रूप गायत्री की दीक्षा उपनयन में दी जाती है उसके दृष्टा विश्वामित्र ही माने जाते हैं.

पुराणों के अनुसार विश्वामित्र कान्यकुब्ज देश के महीपति थे.एक बार वे सेना के साथ आखेट के लिए गए और शिकार करते हुए बहुत दूर निकल गए.भूख-प्यास से व्याकुल लौटते हुए एक जगह सुंदर आश्रम दिखा,पता चला यह महर्षि वशिष्ठ का आश्रम है.सेना को वहीँ छोड़ वे ऋषि के दर्शन हेतु उनके आश्रम जा पहुंचे.वशिष्ठ से कुशल क्षेम पूछने के बाद चलने को तत्पर हुए तो वशिष्ठ ऋषि ने उनसे आतिथ्य ग्रहण का अनुरोध किया.

विश्वामित्र को यह गर्वोक्ति लगी तो उन्होंने कहा कि उनके साथ विशाल संख्या में सैनिक भी हैं.वशिष्ठ ऋषि ने निवदन किया,क्या हानि है,पास ही पवित्र जल वाली नदी है.कम से कम उससे ठंढा जल तो सबको मिल ही जाएगा.भोजन के लिए भी जो हो सकेगा वह प्रबंध हो जाएगा.’

विश्वामित्र ने वशिष्ठ की उस उक्ति को गर्वोक्ति माना और विचार किया कि आज उनका अभिमान तोड़ ही देना चाहिए.प्रकट में कहा कि ऋषि की आज्ञा शिरोधार्य है,मैं सेना सहित आपका आथित्य ग्रहण करूंगा.’वशिष्ठ के शिष्यों ने प्रत्येक के लिए इच्छानुसार भोजन सामग्री प्रस्तुत कर दी साथ ही घोड़ों के केलिए भी यथोचित सामग्री प्रस्तुत की गयी.सभी लोगों के मन में विचार उत्पन्न हुआ कि इतना सुख तो अपने घरों में भी नहीं है.

भोजन आदि से निवृत्त होकर जब विश्वामित्र पुनः विदा मांगने वशिष्ठ के पास पहुंचे जब जिज्ञासा प्रकट की,’आश्रम तो छोटा प्रतीत होता है ,इतनी बड़ी सेना के लिए आथित्य का सामान कहाँ से आया.’वशिष्ठ ने अपनी गौ को ओर संकेत करते हुए कहा –‘भारतवर्ष का मुख्य धन तो यही गौ है.इस कामधेनु गौ की कृपा से ही यहाँ सब कुछ सुलभ है.’
विश्वामित्र ने कहा.’ऐसी अनुपम वस्तु का प्रयोग तो आप कभी-कभी ही कर पाते होगें,यह तो हमारे राजदरबार के उपयुक्त है.कृपया इसे हमें दे दीजिए.’वशिष्ठ ने कहा,’आप हमारे अतिथि हैं.अतिथि को उनकी इच्छानुसार सबकुछ दिया जा सकता है किंतु यदि यह गौ अपनी इच्छानुसार आपके साथ जाना चाहे तो इसे ले जा सकते हैं,इसके लिए बल प्रयोग नहीं होना चाहिए.’

महाराजा विश्वामित्र ने अपने सैनिकों को गौ ले चलने की आज्ञा दी किंतु गौ डकारते हुए वशिष्ठ के चरणों में बैठ गयी.वशिष्ठ ने कहा,’राजन, गौ जाना नहीं चाहती तो मैं बलात भिजने में असमर्थ हूँ.’इस पर विश्वामित्र आवेश में आ गए.उन्हों अपने सैनिकों को गौ को बांधकर ले जाने की आज्ञा दी लेकिन वशिष्ठ के तेज के कारण उनके समीप नहीं पहुँच सके.अंत में दिव्यास्त्रों का प्रहार शुरू कर दिया.

वशिष्ठ ने कोई उत्तर नहीं दिया केवल अपना ब्रह्मदंड लेकर खड़े हो गए.विश्वामित्र के दिव्यास्त्रों को ब्रह्मदंड निगल जाता था.यह देखकर विश्वामित्र ने अपना धनुष तोड़कर फेंक दिया उनके मुंह से निकल पड़ा.........

धिग् बलं क्षत्रियबलं ब्रह्मतेजो बलं वलम् |
एकेन ब्रह्मदण्डेण सर्वस्त्राणि हतानि में ||

विश्वामित्र ने निश्चय किया कि वे ब्रह्म्बल प्राप्त करेंगे.इस निश्चय के साथ ही वे ब्रह्म्बल की प्राप्ति के लिए तपस्या करने चले गए.उन्होंने ताप किया और ब्राह्मणत्व प्राप्त किया.एक क्षत्रिय के ब्राह्मणत्व प्राप्त करने पर भी वर्ण व्यवस्था पर कोई चोट नहीं पहुंची.यह वर्ण व्यवस्था के लचीलेपन का प्रमाण है.ब्राह्मणत्व प्राप्त कर लेने पर भी कौशिक गोत्र में बने रहने कि सम्भावना व्यक्त की जाती है.विश्वामित्र का कौशिक नाम वेदों और पुराणों में मिलता है.

Monday, July 17, 2017

मृत्यु का देवता


दुनियां के प्रायः सभी देशों,सभी सभ्यताओं में प्राचीन आख्यानों और मिथकों की समुद्ध परंपरा रही है.ये आख्यान और मिथक एक तरह से मनुष्य के आध्यात्मिक और भौतिक विकास का इतिहास भी हैं.वे उन परिस्थितियों की ओर भी संकेत करते हैं,जिन्होंने मनुष्य की विचारधारा,उसके दृष्टिकोण,उसके जीवन को प्रभावित किया है.

कई देशों की लोककथाओं में मिथकों का व्यापक विस्तार और समानताएं भी देखने को मिल जाती हैं.भारतीय मिथकों और लोकगाथाओं में यमराज को मृत्यु का देवता माना जाता है.मिस्त्र की सभ्यता में ओसिरिस को मृत्यु का देवता माना जाता है.

प्राचीन मिस्त्र में यह विश्वास प्रचलित था कि मृत्यु के पश्चात प्रत्येक व्यक्ति को ओसिरिस के लोक में प्रवेश करना पड़ता  है,जहाँ उसके पाप-पुण्य का विचार किया जाता है.प्राचीन मिस्त्र की मूर्तिपूजक सभ्यता में भारत से कई गुणा अधिक देवी-देवताओं का आधिपत्य था.सूर्य देवता जिसे ‘रा’ कहा जाता था,मिस्त्र के देव-मण्डल का प्रमुख था.उसी ने स्वयं को बनाया था और उसके बाद सृष्टि की रचना की थी.

प्राचीन मिस्त्र के धार्मिक साहित्य में ‘रा’ की महिमा का वर्णन मिलता है लेकिन देवताओं में सर्वाधिक रोमांचक और विविध वर्णन ओसिरिस का है.ओसिरिस मृत्यु का देवता माना जाता था और मृत्यु के बाद जीवन की कल्पना जितनी गहराई से प्राचीन मिस्त्री आस्था और विश्वासों से जुड़ी हुई थी,उसे देखते हुए ओसिरिस को विशेष स्थान प्राप्त था.

ओसिरिस को लेकर एक रोचक मिथक प्राचीन मिस्त्र के धर्म लेखों में मिलता है.एक बार ‘रा’ को पता चला कि नुतृ और गेब नामक दो देवी-देवता एक दूसरे से प्यार करते हैं.’रा’ ने क्रोधित होकर ‘नुतृ’ को श्राप दिया कि वह वर्ष के किसी भी दिन संतान को जन्म नहीं दे सकेगी.

इस गंभीर समस्या का हल ‘थोत’ देवता ने निकाला.वह हर रोज थोड़ा-थोड़ा समय चुराकर रख लेता था.इस तरह चुराए हुए समय से उसने पांच दिनों का निर्माण किया.उन अतिरिक्त दिनों के दौरान नुतृ ने ओसिरिस,होरस,सेत,आइसिस और नेपथे को जन्म दिया.प्राचीन मिस्त्री लोग वर्ष के अंतिम पांच दिनों को इन्हीं नामों से जानते थे.नेपथे और सेत तथा ओसिरिस और आइसिस विवाह में बंध गए.

बाद में ओसिरिस मिस्त्र का राजा बन गया और देव समाज में उसे महत्वपूर्ण स्थान मिल गया.सेत ओसिरिस से ईर्ष्या करता था.एक बार ओसिरिस मिस्त्र से बाहर दूसरे देश की यात्रा पर गया.लौटने पर सेत ने उसके सम्मान में दावत दी. उसने ओसिरिस की लम्बाई के अनुसार एक सुंदर और मजबूत ताबूत बनवाया.दावत शुरू हुई तभी सेत के संकेत पर दास उस ताबूत को उठाकर लाए.सेत ने मुस्कुराकर कहा-‘मित्रो ! आओ एक खेल खेलते हैं.मुझे यह विचित्र संदूक उपहार में मिला है.हम सब बारी-बारी से इस संदूक में लेट कर देखें.’

खेल शुरू हुआ.ओसिरिस के अतिरिक्त बारी-बारी से हर व्यक्ति उस ताबूत में घुसा,किसी ने ताबूत को छोटा तो किसी ने बड़ा बताया.अंत में ओसिरिस की बारी आई.वह ख़ुशी-ख़ुशी ताबूत में जा लेटा.पलक झपकते ही ताबूत को बंद करके उसमें पिघला हुआ शीशा लगा दिया गया.सेत के घर के पास ही एक नदी बहती थी जिसके गहरे पानी में उसे फेंक दिया गया.

आइसिस को पता चला कि सेत ने उसके साथ क्या कर डाला है.रोती-कलपती वह हर आने-जाने व्यक्ति से पूछती कि क्या उसने नदी में बहते किसी ताबूत को देखा है?आखिर में दो बच्चों ने उसे बताया कि उन्होंने कुछ लोगों को एक ताबूत नदी में फेंकते हुए देखा था.

नदी में गिरने के बाद ताबूत समुद्र में पहुंचा और बहता हुआ लेबनान में बिबलास नगर के तट पर जा लगा.लहरें ताबूत को किनारे पर छोड़ गयीं.ताबूत कुछ पौधों में अटक गया.बाद में वहां एक विशाल वृक्ष उग आया जिसके तने में ताबूत छिप गया.

एक दिन बिबलास के राजा ने पेड़ को देखा तो उसे काटने का आदेश दिया.काटने के बाद शिल्पियों ने पेड़ के तने को एक स्तम्भ का रूप दे दिया.काष्ठ स्तंभ राजप्रासाद के एक कक्ष में छत को सहारा देने के लिए लगा दिया गया.ताबूत में बंद ओसिरिस का शव अब उस स्तंभ की कैद में था.आइसिस अपनी दैवीय शक्ति के बल पर पूरी घटना को जान गयी.वह बिबलास जा पहुंची और रानी की दासियों से मित्रता कर ली.आइसिस के शरीर से विचित्र सुगंध निकलती थी.दासियों के शरीर में भी वही सुगंध बस गयी.

उस विचित्र सुगंध से रानी आकर्षित हुई,दासियों से पूछा और आइसिस को महल में बुला भेजा.आइसिस ने रानी को जैसे सम्मोहित कर दिया था.उसने आइसिस को महल में बच्चे की देखभाल के लिए रख लिया.रात हुई.कक्ष में आग जल रही थी.आइसिस ने सोचा वह बच्चे को अमर बना दे.उसने बच्चे को पवित्र करने के लिए आग में डाल दिया और चिड़िया बनकर उस काष्ठ स्तंभ के चक्कर लगाने लगी जिसके अंदर उसके पति का ताबूत था.

उसी समय रानी कमरे में आयी तो बच्चे को आग में पड़ा देखकर आतंक से चीख उठी.आइसिस ने बच्चे को आग से निकाल लिया,बच्चा सकुशल था.उसने रानी को अपना वास्तविक परिचय दिया,कहा,’मुझे अपने पति की देह चाहिए.’रानी आश्चर्य से अभिभूत खड़ी रही.आइसिस ने स्तंभ को काटकर ताबूत बाहर निकला और ताबूत लेकर चली आयी.बाद में बिबलास ने आइसिस के सम्मान में विशाल मंदिर का निर्माण करवाया.

आइसिस पति का ताबूत लेकर मिस्त्र की ओर चल दी.वहां पहुचकर उसने ताबूत को खोला और ओसिरिस के निष्प्राण शरीर से लिपटकर विलाप करने लगी.फिर ताबूत को झाड़ियों में छिपाकर महल जा पहुंची.इस बीच सेत को भी साड़ी घटना मालूम हो चुकी थी.वह मौका देखकर गया और झाड़ियों में छिपा ताबूत उठाकर चल दिया.उसने ओसिरिस के अनेक टुकड़े कर दिए और मिस्त्र में दूर-दूर तक फेंक दिया.

आइसिस महल से बहन नेपथे के साथ लौटी तो ताबूत को न पाकर खोजबीन शुरू कर दी.दोनों ने ढूंढ़कर ओसिरिस के शरीर के टुकड़े इकठ्ठे किए और हर जगह अंतिम संस्कार करके ओसिरिस का एक मंदिर बना दिया.इस तरह ओसिरिस एक सर्वपूज्य देवता बन गया,मृत्यु का देवता.