Wednesday, July 20, 2011

बदलता सिनेमा,बदलते लोग


फ़िल्में समाज का आईना(दर्पण) होती हैं ,ऐसा मानने वालों की कोई कमी नहीं है. इसकी वजहें भी हैं.प्रख्यात
फिल्मकारों ने शुरुआत से ही अपनी फिल्मों का ताना-बाना इस तरह बुना कि उनमे समाज की किसी न किसी  सामाजिक समस्या को स्पष्ट रूप रेखांकित किया जा सकता था.

विधवा पुनर्विवाह,अछूत,दहेज़,स्त्रियों की समस्याओं ,बेटे-बेटी में भेदभाव,डाकुओं की समस्याओं को लेकर कई फ़िल्में बनाई गई, जिसे लोगों ने काफी पसंद भी किया.वी.शांताराम,विमल रॉय इनके अगुआ थे.उनकी फिल्मों में साफ़ सन्देश दिखाई देता था.वी.शांताराम की 'दो आँखे बारह हाथ ' खुले बंदीगृह की समस्या से संबंधित थी.इस तरह का कंसेप्ट उस समय नया था.इसके अलावा इसी फिल्म में नायिका संध्या द्वारा ड्रम की तरह बजने वाली जिस छोटी सी गाड़ी का प्रयोग किया गया था,वह अनूठा था. इस तरह की बजने वाली गाड़ी ग्रामीण क्षेत्रों के मेलों में खूब बिकती थी. पर अब तो वह प्रतीक भर रह गए हैं.इसी तरह के अन्य खिलौने अब ग्रामीण क्षेत्रों में भी नहीं मिलते. अब तरह तरह की बंदूकें,मोबाइल की तरह खिलौने आदि मिलते हैं.
                
कच्चे बांसों से बनाई गई बांसुरी,बड़े डंडों में चिपका कर रंग बिरंगी लाई ,हवा मिठाई बेचने वाले अब नहीं आते.लेकिन चाट और फास्ट फ़ूड बेचने वाले जरुर दिखाई देते हैं.पुरानी फिल्मों में इन प्रतीकों का भरपूर इस्तेमाल हुआ है.आजकल बनने वाली फ़िल्में गाली गलौज से भरी,बेतुके संवाद और बेतुकी कहानी से होती हैं.यह सही हैकि उत्तर प्रदेश और बिहार के ग्रामीण अंचलों में आज भी कई व्यक्ति बातचीत की शुरुआत ही गाली से करते हैं,लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि फिल्मों में भी इसी तरह के दृश्य उत्पन्न किये जाएँ.

फिल्मों का दायरा व्यापक होता है और इसका असर भी लोगों पर पड़ता है.ताजातरीन उदाहरण आमिर खान निर्मित फिल्म 'डेल्ही बेली' का है जिसमे गालियों का भरपूर इस्तेमाल हुआ है.लगान,तारे जमीं पर,रंग दे वसंती,थ्री इडियट्स जैसी फिल्मों के माध्यम से आमिर खान ने फिल्म विषयों को एक विस्तृत आयाम प्रदान किया.इन फिल्मों के विषयों की पृष्ठभूमि में वे समस्याएँ थी जिनसे हम अक्सर दो चार होते हैं,परन्तु निजी जीवन की व्यस्तताओं और  आवश्यकतापूर्ति की जद्दोजहद में इनकी अवहेलना कर जाते हैं.लेकिन इस क्रम में डेल्ही बेली का निर्माण समझ से परे है.यह फिल्म क्या सन्देश देना चाहती है या इसमें प्रस्तुत भाषा समाज के किस वर्ग की दिनचर्या के अनिवार्य अंग के रूप में भेंट करना चाहते हैं?
           
फिल्म निर्देशन एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है.फिल्म निर्माता,निर्देशक,लेखक आदि समाज को दिशा प्रदान करते हैं.यह दिशा प्रभावोत्पादक एवं सकारात्मक परिणाम प्रस्तुत करने में समर्थ हो,यह संकल्प लिया जाना आवश्यक है.निर्माता,निर्देशक यह कहकर नहीं बच सकते कि लोग जो देखना चाहते हैं वही दिखाते हैं.


यह सही है कि लोगों की सोच बदल चुकी है और लोग अब भी फिल्मों को मनोरंजन का ही साधन मानते हैं,पर ऐसी फिल्मों को बनाने का कोई तुक नहीं जिसे लोग अपने परिवार के सदस्यों के साथ बैठकर नहीं देख सकें.मल्टीप्लेक्स को ध्यान में रखकर बनाई गई फ़िल्में इसी कोटि की होती हैं.लेकिन अपने देश के कितने शहरों में मल्टीप्लेक्स हैं.अधिकांशतः एकल सिनेमाघरों में दिखाई जाती हैं.सो इस तरह की बहानेबाजी से नहीं बचा जा सकता.
  
(दैनिक जागरण एवं हरिभूमि में प्रकाशित)

Friday, July 15, 2011

स्मृति के दंश

कहते हैं कि बचपन की यादें जाती नहीं हैं.आज भी कभी बचपन की यादों को कुरेदने की कोशिश करता हूँ तो स्मृतिपटल पर एक के बाद एक कई यादों के दरवाजे खुलते चले जाते हैं.
१९७३-७६ में हमलोग बिहार के समस्तीपुर जिले के सिंघिया प्रखंड में रहते थे.पिताजी उस प्रखंड में प्रखंड विकास पदाधिकारी के रूप में स्थानांतरित होकर आये थे.

हम भाई बहनों का तीन साल वहीँ बीता.विकास की दृष्टि से एक दम पिछड़ा हुआ प्रखंड था.रहने के लिए जो किराये का आवास मिला था वह फूस और खपरैल का दो कमरों का छोटा सा मकान था.साल भर में छह महीने हम उस आवास में रहते और छह महीने अंग्रेजों के बनाये डाकबंगले में.वह पूरी तरह बाढ़ ग्रस्त इलाका था.बरसात आते ही बाढ़ आ जाती और हमारे कमरे में कमर भर पानी भर जाता.डाकबंगला उंचाई पर था,इस लिए बाढ़ आते ही हमलोग डाकबंगले में शिफ्ट हो जाते और छह महीने वहीँ रहते.

बाजार तक जाने के लिए नाव का सहारा लेना पड़ता.बिना नाव के आवागमन संभव नहीं था.उन दिनों पिताजी अहले सुबह नाव से बाढ़ ग्रस्त क्षेत्रों में सहायता कार्य के लिए पूरी टीम के साथ निकलते और देर रात लौटते थे.हम लोगों का स्कूल जाना बंद हो जाता.घर पर ही पढ़ाई लिखाई होती.'करेह' नदी का प्रकोप हर साल होता था.हम लोगों के मकान मालिक के पिता पूर्व के जमींदार थे.उनका बड़ा सा आवास था.
जिसमे कई हाथी,घोड़े,मोर आदि पाल रखे थे.हम उन्हें बाबा कहते.उन्हें बच्चों से बहुत लगाव था.अक्सर हम उनके आवास पहुँच जाते और कौतुहल वश उनके पालतू जानवरों को देखा करते.वे हमलोगों को अपने नाव से झिज्जिर खेलने ले जाया करते थे.

बाढ़ के दिनों में ही एक बार परीक्षा देने समस्तीपुर जाने के लिए सुबह में नाव से सफ़र कर शाम में नजदीकी स्टेशन नरहन पहुंचे,फिर वहां से ट्रेन से समस्तीपुर.सामान्य दिनों में भी आवागमन काफी कठिन था.पहले उफनाती 'करेह' नदी को एक बड़ी नाव से,जिस पर जीप चढ़ाया जाता,पार करना पड़ता था फिर आगे बूढ़ी गंडक को बड़ी नाव से जीप समेत पार करना पड़ता था.
उसके बाद कच्ची पक्की सड़कों से होते हुए जिला मुख्यालय समस्तीपुर जाना होता था.हम लोगों को पढ़ाने के दुर्गा बाबु आते थे, जिन्होंने हम रामायण और महाभारत के अनेक किस्सों को सुनकर अपना मुरीद बना लिया था.हम उत्सुकता से उनकी प्रतीक्षा करते और आते ही कोई नई कहानी सुनाने की फरमाईश कर डालते.

उन्हीं दिनों एक कविजी भी आया करते थे.धोती, कुरता पहने,उन्नत ललाट और गौर वर्ण के.बाद में पता चला कि वे कवि हैं.हम लोगों को उन्होंने कई कवितायेँ लिख कर दी थीं.उनका पूरा नाम यद् तो नहीं,पर कवि 'शंकर' था.जब भी आते एक पर्ची पर कविता कि चार लाइने लिख कर भेजते जिससे पता चल जाता कि कविजी आये हैं.एक बार उन्होंने लिखा,

                                          महानंद शीश जटा सुशोभित

                                               पतित पावनी गंगा

                                            द्वार खड़ा संकोच के मारे

                                              कवि किस्मत का नंगा.

                                            (महानंद,पिताजी का नाम)

उन्होंने हमें अपनी कविताओं कि एक पुस्तक भेंट की थी, जिसमे अपना परिचय एक कविता के रूप में दिया था.वह पुस्तक तो अब उपलब्ध नहीं है,पर उसमे प्रस्तुत उनके परिचय वाली कविता की यादें आज भी ताजा हैं.

एक बानगी देखिये............

                                                               क्या बतलाऊँ अपना परिचय

                                                                  मैं हूँ जलता अंगार एक.

                                                               मैं हूँ चिर शोषित,चिर संतापित

                                                                मुझमें न रक्त,मुझमें न मांस

                                                                चलती कराह या घुटघुट कर

                                                                 मेरे प्राणों की साँस साँस.

                                                                 जलता हाँ तिल तिल जलता हूँ

                                                                  अपनी ही अंतर्ज्वाला में

                                                                  जाने अधरों से लगा मस्त

                                                                 अमृत या कि विष प्याला में.

वर्ष १९७६ में पिताजी का ट्रांसफर उस प्रखंड से हो गया.फिर कभी वहां जाना नहीं हो सका और न ही वहां के किसी परिचित से मुलाकात ही हुई.अब तो शायद करेह नदी पर पुल भी बन गया होगा और बाढ़ से बचाव के लिए बाँध भी बन गया होगा,सड़कें भी पक्की हो गई होगी.रहने के लिए कई पक्के मकान बन गए होंगे.पर वहां बिताये बचपन के दिन आज भी नहीं भूलते.

Tuesday, July 5, 2011

'अनशन' का 'टेंशन'

आगामी १६ अगस्त से सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे फिर से अनशन पर बैठने जा रहे हैं. इससे सरकार का टेंशन फिर बढ़ गया है. लोकपाल पर संप्रग सरकार और सिविल सोसायटी के बीच दूरी बढती जा रही है.केंद्रीय मंत्रियों के बयान से लगता है कि इस बार अन्ना हजारे के अनशन पर सरकार का रुख कड़ा है. उन्हें चिंता है कि जनता ने उन्हें चुनकर भेजा है तो अन्ना हजारे एवं बाबा रामदेव जैसे कुछ लोग उन्हें कैसे चुनौती दे सकते हैं.

लगता है पिछली बार के अन्ना एवं बाबा रामदेव के अनशन का टेंशन अभी ख़त्म नहीं हुआ  है. एक अनशन तो योग गुरु बाबा रामदेव ने  भी रामलीला मैदान में किया था. इसमे सरकार की लीला से  तो बाबा का ही टेंशन बढ़ गया. बेचारे सलवार सूट में ही रातों रात अपने आश्रम पहुंचा दिए गए.
                                              
                                               सुना है कि अब महिलाओं के वस्त्र बनाने वाली एक कंपनी योग गुरु बाबा रामदेव को अपना ब्रांड अम्बेसेडर बनाने  की सोच रही है. उनके योग का ऐसा हस्र होगा ऐसा किसी ने न  सोचा था. अपने आश्रम में 'रूठे पिया' की तरह अनशन पर बैठकर किसी को टेंशन नहीं दे पाए. नौ दिनों में ही उनका टेंशन और बढ़ गया. उधर स्वामी निगमानंद तो अनशन से ही असमय काल कवलित होकर अपने गुरु और परिवार के सदस्यों को टेंशन दे गए. अब तो अन्य योग गुरुओं ने भी बाबा रामदेव को और भी योगाभ्यास की सलाह दे डाली है. देखना है कि बाबा अब कौन कौन से आसन का अभ्यास कर लोगों को सिखाते हैं.

                                             इधर मौन व्रत तोड़ते ही प्रधान मंत्री जी ने कहा है कि वे भी प्रधान मंत्री को लोकपाल के दायरे में लाना चाहते हैं.लगता है कि देश की सभी समस्याओं का समाधान लोकपाल ही है.महंगाई जैसे मुद्दे अब पीछे चले गए हैं. आम लोगों को तो यही चिंता है कि कैसे महंगाई से निजात पाया जाये. हालिया पेट्रोल,डीजल और रसोई गैस में की गई वृद्धि पर सभी चुप हैं. क्या सत्ताधारी और  क्या विरोधी दल सभी लोकपाल पर अपना अपना राग अलाप  रहें हैं.लगता है लोकपाल बिल पास होते ही महंगाई कम हो जाएगी.बेरोजगारी दूर हो जाएगी.

                                            सो लोकपाल पर सभी मुखर हैं. इधर बाबा रामदेव ने भी अन्ना को अपना समर्थन दे दिया है लेकिन अन्ना इस बार फूँक फूँक कर कदम रख रख रहे हैं. उन्हें बाबा के पिछले अनशन के टेंशन का पता है, इस लिए इस बार सशर्त समर्थन चाहते हैं. देखने वाली बात यह है कि आगामी अनशन से किसका टेंशन बढ़ता है, सरकार का, विरोधी दलों का(जिनका भ्रष्टाचार वाला मुद्दा अन्ना एवं बाबा ने हाइजैक कर लिया है)या अन्ना एवं सिविल सोसायटी का.    

Friday, July 1, 2011

सृजनशीलता बनाम शौचालय


सुना है रेलवे ने ऐसा पेंट  विकसित किया है जिसका उपयोग करने के बाद ट्रेनों में पेन या पेन्सिल से कुछ नहीं लिखा जा सकेगा.अब ट्रेन की बोगियां ऐसे पेंट से रंगी जा सकेंगी जिससे ट्रेनों में अश्लील बातें नहीं लिखी जा सकेंगी. इससे मुसाफिरों खासकर महिलाओं को असुविधाजनक स्थिति का  सामना नहीं करना पड़ेगा..प्रायः ट्रेनों के शौचालयों में ही व्यक्ति की सृजनशीलता का परिचय मिलता है.ऐसी ऐसी काव्यात्मक बातें यात्री लिख डालतें हैं कि बड़े बड़े कवि भी शरमा जाएँ.ऐसी ऐसी कलाकृति उकेर डालतें हैं कि मरहूम  हुसैन साहब भी शरमा जाएँ.

अक्सर बड़े बड़े कलाकारों,विचारकों को नया आईडिया शौचालयों  में ही मिलता है.गणितज्ञों को बड़ी बड़ी पहेली सुलझाने का फ़ॉर्मूला शौचालयों में ही मिलता है.ऐसे में यदि यात्री ट्रेनों में सफ़र के दौरान शौचालयों में अपनी सृजनशीलता का परिचय देने लगे तो क्या अचरज.ऐसे वक़्त में व्यक्ति को शील या अश्लील का होश ही कहाँ रहता है.सफ़र काटने और वक़्त बिताने का इससे अच्छा तरीका और क्या हो सकता है? महिलाओं को यदि इससे परेशानी हो तो कौन क्या कर सकता है? रेल प्रशासन चाह कर भी ऐसी कलाकृति के सृजन पर रोक नहीं लगा सकता क्योंकि कब और कौन इसे सृजित कर गया इसका पता ही नहीं चल पाता.
                
एक सुझाव रेलवे को यह भी दिया जा सकता है कि वह सभी ट्रेनों में शौचालय गार्ड की नियुक्ति करे.इससे हजारों लोगों को रोजगार भी मिल जाएगा और यात्री की सृजनशीलता भी बची रहेगी जो बाद में काम आएगी.क्या पता  इनमे से कोई दूसरा हुसैन निकल आये या मशहूर कवि ही बन जाये.
                
सो रेलवे कई उपायों को आजमा सकता है.हो तो यह भी सकता है कि इसके लिए रेलवे शौचालय गार्ड की नियुक्ति के लिए विज्ञापन निकाले जिसमे स्थानीय युवको को ही प्राथमिकता दे ताकि दूसरे राज्यों में जाकर पिटना नहीं  पड़े.रेलवे चाहे तो इसकी आउटसोर्सिंग भी करवा सकता है,जिससे उसे नियुक्ति का झमेला न सहना पड़े और काम भी हो जाये.इसके लिए रेलवे  शौचालय उपयोग शुल्क भी लगा सकता है,सुलभ शौचालय की तरह.इससे रेलवे की आमदनी भी बढ़ेगी और घाटा पूरा करने में थोड़ी मदद भी.इससे आगामी यात्री किराये में वृद्धि कुछ दिनों के लिए और स्थगित हो सकती है.
                 
विचार और सुझाव तो कई हैं,पर जब तक रेलवे इसे नहीं अपनाता तब तक सफ़र के दौरान ट्रेनों के शौचालयों में व्यक्ति की सृजनशीलता और कल्पनाशीलता को झेलते रहिये.