Showing posts with label कुबेर. Show all posts
Showing posts with label कुबेर. Show all posts

Sunday, October 20, 2013

धन का देवता या रक्षक


















दीपोत्सव के पर्व दीपावली पर लक्ष्मी पूजन की परम्परा आम है,क्योंकि लक्ष्मी को धन की देवी माना जाता है. लेकिन धन के रक्षक अर्थात् कुबेर की पूजा का कहीं जिक्र नहीं मिलता.बोलचाल एवं मुहावरे में कुबेर का अक्सर जिक्र होता है कि – जैसे कहीं कुबेर का खजाना मिल गया हो.

ऐसा माना जाता है कि आरंभ में कुबेर एक अनार्य देवता थे.उनका वैदिक ब्राह्मणों के साथ मेल नहीं बैठता था.चौथी – पांचवीं शताब्दी में वैष्णव धर्म के उत्थान के साथ, जब लक्ष्मी की,धन की देवी के रूप में प्रतिष्ठा हुई,तब लोग कुबेर को भूलने लगे.धीरे – धीरे वे उपेक्षित होकर,दिक्पाल के रूप में मंदिरों के बाह्य अलंकरण के साधन – मात्र रह गए.

‘वाराह पुराण’ में एक कथा है – जब ब्रह्मा ने सृष्टि रचने का उपक्रम किया,तब उनके मुख से पत्थरों की वृष्टि होने लगी और आंधी तथा तूफ़ान आए. कुछ देर बाद,जब आंधी शांत हुई तब उन्होंने अपने मुख से निकले हुए उन पत्थरों से एक अलौकिक पुरुष की रचना की.फिर उसे धनाधिपति बनाकर देवताओं के धन का रक्षक नियुक्त कर दिया.वही कुबेर के नाम से प्रख्यात हुए. 

कुबेर के धन का देवता बनने के पीछे उनके पूर्वजन्म से संबंध रखने वाली भी कुछ अनुश्रुतियाँ हैं. एक अनुश्रुति है कि वे पूर्वजन्म में चोर थे.एक दिन वे एक मंदिर में चोरी करने के लिए घुसे और माल देखने के लिए, जो दीपक जलाया वह बुझ गया.इस तरह चोर ने दास बार दीपक जलाया और वह हर बार बुझता गया.इस रौशनी के जलने और बुझने को मंदिर में प्रतिष्ठित शिव ने अपनी आराधना समझ लिया.फलतः वे प्रसन्न हो गए और उनकी प्रसन्नता के कारण वह चोर,दूसरे जन्म में,धन का देवता कुबेर हुआ.

बौद्ध – ग्रंथ ‘दीर्घ-निकाय’ की अट्ठ् कथा के अनुसार कुबेर पूर्व जन्म में कुबेर नामक ब्राह्मण थे.वे ईख के खेतों के स्वामी थे और उनके सात कोल्हू चलते थे.एक कोल्हू की आय वे दान कर देते थे. इस प्रकार वे बीस हजार वर्षों तक दान करते रहे.इसके फलस्वरूप उनका जन्म ‘चातुर माहाराजिक’ देवों के वंश में हुआ.

‘शतपथ ब्राह्मण’ में कुबेर को राक्षस बताया गया है और उन्हें दुष्टों और चोरों का नेता कहा गया है. 

साहित्य में अधिकांशतः कुबेर का उल्लेख यक्ष के रूप में हुआ है.उन्हें यक्षों का राजा,यक्षेन्द्र,देव, यक्षराज आदि नामों से पुकारा गया है.ब्राह्मण साहित्य में ही नहीं,बौद्ध और जैन साहित्य में भी कुबेर का उल्लेख इसी रूप में पाया जाता है.बौद्ध साहित्य में उन्हें वेस्सवण,पान्चिक,जम्मल आदि नामों से पुकारा गया है.

कुबेर के नगर के संबंध में वर्णन है कि आलक(कुबेर का नगर),कैलास पर्वत पर,बहुत भव्य,परकोटे से घिरा हुआ नगर है.वहां न केवल यक्ष वरण किन्नर,मुनि, गंधर्व और राक्षस भी रहते हैं.कैलास पर्वत के उस नगर में अनेक सुंदर प्रासाद,उद्यान और झीलें हैं.संभवतः यह भौतिक सुखों की चरम अभिव्यक्ति को अलंकृत रूप में व्यक्त करने का रूपक है.

महाभारत में कहा गया है कि सोना,वायु और अग्नि के सहारे,पृथ्वी से निकलता है.यहाँ अग्नि से भट्ठी,वायु से धौंकनी और कुबेर से सोना निकलने का तात्पर्य जांन पड़ता है.संभवतः कुबेर ही पहले व्यक्ति हैं,जिन्होंने सोने को जमीन से निकालकर पिघलाया.वे उत्तर दिशा के दिक्पाल कहे गए हैं. भारत में सोना उत्तर से ही आता था.

इन सभी तथ्यों से यही जान पड़ता है कि आरंभ में कुबेर एक अनार्य देवता थे और उनका आरम्भ में वैदिक ब्राह्मणों से मेल नहीं बैठता था.बाद में,उनका वैदिक हिन्दू धर्म में प्रवेश हुआ.देवताओं की पंक्ति में आ जाने पर,कुबेर की नाना प्रकार से पूजा की जाने लगी.

‘गृह्य सूत्रों’ में,वैवाहिक कर्म – कांड में ईशान के साथ – साथ,कुबेर का भी आह्वान करने का विधान है.धनद या वसुध के रूप में उनकी पूजा जनसाधारण किया करते थे.कौटिल्य ने भी लिखा है कि कुबेर की मूर्ति खजाने के तहखाने में स्थापित की जानी चाहिए.

प्राचीन भारत में कुबेर के स्वतंत्र मंदिर होते थे.इसका पता विदिशा के निकट, बेसनगर से प्राप्त दूसरी शती ईसा पूर्व के एक ध्वज – स्तम्भ के शीर्ष से लगता है.कुबेर का निवास वट-वृक्ष कहा गया है.इस शीर्ष के वट –वृक्ष में एक घड़ा और रुपयों से भरी दो थैलियाँ दिखाई गई हैं.

हेमचंद के ‘देशी नाम – माला कोश’ में यक्खरति(यक्ष रात्रि का उल्लेख है.इसमें यक्ष –रात्रि को सुख रात्रि नाम दिया गया है कि उस दिन कुबेर की पूजा होती थी.’वाराह पुराण’ के अनुसार ‘यक्ष रात्रि’ कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को मनायी जाती थी.

आज कुबेर की पूजा का प्रचलन नहीं दिखाई पड़ता.ऐसा प्रतीत होता है कि चौथी – पांचवीं शताब्दी(गुप्तकाल) में वैष्णव - धर्म के उत्थान के साथ जब लक्ष्मी की धन की देवी के रूप में प्रतिष्ठा हुई तो लोग कुबेर को भूलने लगे.धीरे धीरे वे उपेक्षित होकर दिक्पाल के रूप में मंदिरों के बाह्य अलंकरण के साधन मात्र रह गए.