Thursday, November 28, 2013

कावड़ : लोकमन का उत्कृष्ट शिल्प



किसी भी धार्मिक,पौराणिक कथानक को कई खण्डों में बांटकर क्रमबद्ध रूप में काष्ठ फलकों पर वांछित पारंपरिक रंग – शैली में चित्रण का लौकिक प्रभाव कावड़ की अनन्यतम विशिष्टताओं में से एक है.जहाँ कावड़िया भाट,कावड़ बांचकर पुण्य कमाता है,वहीँ श्रोता भक्त उसे सुनकर पुण्य अर्जित करते हैं.

जीवन दिनचर्या एवं सामाजिक तथा पारिवारिक संस्कृति में व्याप्त घरेलू विधानों को हमारे यहाँ के लोग कथावाचक पारम्परिक और उत्कृष्ट कलेवर में प्रस्तुत करते हैं,फिर चाहे फड़ वाचन हो या कावड़ वाचन.इन लोकगाथाओं एवं लोक कथाओं में जहाँ कुछ समय के लिए श्रोता एवं दर्शक अपनी व्यथा संताप भूलकर अविस्मरणीय लोक – गाथाओं एवं कथाओं में अभिव्यक्त लोक कल्याणकारी संदेश रुपी संजीवनी के माध्यम से जीवन जीने का सच्चा आश्वासन प्राप्त करते हैं,वहीँ कलाकार देश की गौरवमयी प्रतिष्ठा और संस्कृति को उजागर करते हुए  अपनी उत्कृष्टप्रतिभा का परिचय देते हैं.

विशिष्टता यह है कि लोक कल्याण से सम्बद्ध इन कथाओं में निहित संदेश सार्वभौम होता है,भले ही संस्कृतियाँ भिन्न हों.कपड़े पर चित्रित सूफी – संत, शौर्य वीर गाथाओं के चित्रण की राजस्थान के भीलवाड़ा जिले के शाहपुरा की अपनी विशिष्ट शैली है,जिसे फड़ चित्रण के नाम से जाना जाता है. इसी प्रकार चितौड़गढ़ से बीस किलोमीटर दूर स्थित बस्सी की शिल्प एवं काष्ठ शिल्पकला वर्षों से पीढ़ी दर पीढ़ी चली आई है.

लकड़ी पर विविध कारीगरी करने वाले ये काष्ठतक्षक कलाकार अपनी विरासती पारम्परिक कला को आज भी उतनी ही लगन से संयोजित कर रहे हैं.काष्ठ निर्मित विविध कलात्मक रूपाकारों में कठपुतली,ईसर,तोरण,बाजोट मानक थंभ चौपड़ खाड़े,मुखौटे,प्रतिमाएं,बेवाण,झूले पाटले गाडुले और कावड़ प्रमुख हैं.

मेवाड़ रियासत काल में चित्तौडगढ़ के ग्राम बस्सी की उत्कृष्ट काष्ठकला का इतिहास बड़ा रोचक है.कहा जाता है कि तत्कालीन बस्सी के शासक गोविन्ददास रावत ने ही सर्वप्रथम काष्ठ कला के सिद्धहस्त कलाकार प्रभात जी सुधार को टौंक जिले के मालपुरा कस्बे से बुलाकर उन्हें एवं उनके परिवार को न केवल सम्मान एवं संरक्षण ही प्रदान किया अपितु काष्ठ शिल्प परम्परा को भी प्रोत्साहित करते हुए कला को विविध नए आयाम दिलवाए.

उल्लेखनीय है कि बस्सी के शिल्पकारों ने उदयपुर के सुप्रसिद्ध लेक पैलेस,शिव निवास महल और चितौड़ दुर्ग में स्थित ऐतिहासिक फतह प्रकाश महल में अपनी मनमोहक चित्ताकर्षक चित्रकारी और रंगाई आदि की कलात्मक छाप छोड़ी है.बस्सी की उत्कृष्ट काष्ठकला लगभग दो हजार वर्ष प्राचीन मानी जाती है.
मेवाड़ रियासती ठिकाने के शासक गोविन्ददास जी के द्वारा सम्मान और संरक्षण प्राप्त प्रभात जी सुधार ने सर्वप्रथम एक उत्कृष्ट सुंदर आदमकद गणगौर बनाकर इन्हीं को भेंट की थी.कहा जाता है कि तीन सौ पचास वर्ष पूर्व पुरानी यह गणगौर आज भी बस्सी ठिकाने में सुरक्षित है.

इसके बाद तो काष्ठ – तक्षण – चित्रण – शिल्प क्षेत्र में एक से बढ़कर नित नए आयाम जुड़ते गए.इसी श्रृंखला की एक कड़ी है कावड़,जो कि धार्मिक आस्था और पारंपरिक आयामों से जुड़ा लकड़ी का चित्रोपम चलता –फिरता देवघर है. विविध कपाटों में परत - दर - परत खुलने और बंद होने वाले इस देवालय की विलक्षण विशिष्टताएं हैं.

दीनानाथ हो या दीनबंधु यह देवालय खुद ब खुद उन दीन – दुखियों के पास पहुँचता है,जो लोग दर्शनार्थ भ्रमण के लिए आर्थिक रूप से समर्थ नहीं होते, अर्थात् यहाँ भक्त नहीं, अपितु भगवान स्वयं ही पहुँचते हैं,अपने श्रद्धालु के पास.कावड़ में चित्रित देवी – देवताओं के दर्शनार्थ कावड़ के विभिन्न पाटों को खुलवाना ,धूप अर्चना करके भेंट पूजा चढ़ाना अर्थात सात लोकों में स्वर्गारोहण और नाम अमर होने – जैसे महान पुण्य की प्राप्ति का सौभाग्य होता है.

लोकमन की स्मृति को प्रतिष्ठित करती इस कावड़ का मूल उद्देश्य आरंभ में गौरक्षा एवं गौसंवर्धन से जुड़ा था क्योंकि कावड़ वाचन से प्राप्त दान- दक्षिणा को  सुरक्षित रखने हेतु कावड़ के भीतर एक गुप्तवाड़ी बनी रहती थी जिसमें एकत्रित दान – दक्षिणा से गाय को घास डाली जाती थी,इसका उल्लेख अति प्राचीन कावड़ में लिखित इबारतों में मिलता है.परन्तु समय में बदलाव के साथ दान –दक्षिणा बंद होने से कावड़ केवल देवघर के रूप में ही शेष रह गई, जिसमें रामायण,महाभारत,कुंती, द्रोपदी,भीम,कृष्ण लीला, रामलीला तथा लोक देवता संबंधी गाथा – कथा – वृत्तांत दिखाए – सुनाये जाने लगे.

कावड़ियों द्वारा लयबद्ध वाचन शैली रामदला पड़वाचन शैली के ही समकक्ष है.वाचन से पूर्व कावड़िया, कावड़ को अपनी गोद में बिछे वस्त्र पर रखता है,तत्पश्चात प्रत्येक पट व् चित्र को मोर पंख का स्पर्श देकर वाचन आरंभ करता है.

कावड़ बनाने की पुश्तैनी कला में, जहाँ काष्ठ निर्मित कावड़ में काष्ठ तक्षण का अनुपम शिल्प सृजन करते हैं वहीँ इसमें उपयोगी विविध रंग भी वे स्वयं ही बनाते हैं.पारंपरिक रंगों में मूलतः चमकदार चटकीले रंगों का ही प्रयोग होता है.कवेलू के टुकड़ों को बारीक़ पीस –छानकर गोंद मिलाकर उसमें लगाये जाने वाले घोंटा को ‘इंटाला’ कहते हैं.

कावड़ पर पहली परत ‘इंटाला’ के सूखने पर  बड़ल्यास गाँव के लाल पत्थर को घिसकर इसमें गोंद मिलाकर पुनः चार-पांच बार इस मिश्रण के लेप की परत चढ़ाते हैं.सूखने के बाद मूलतः चटक लाल रंग पर विविध पारंपरिक रंगों से भांति – भांति की क्रमवार कथा चित्रण एवं मांडने आदि चित्रित किये जाते हैं.पीढ़ियों से काष्ठ की पारम्परिक कलाकृति निर्माण से यहाँ के कई कलाकार जुड़े हुए हैं.

सांस्कृतिक अभिरूचि की सोपान कावड़ की मांग में वृद्धि के फलस्वरूप यह कला पूर्णतया व्यावसायिक बन गई.अब कला अपने मूल उद्देश्य से भटककर केवल ड्राइंगरूम में सज्जात्मक वस्तु का स्वरूप बनकर रह गई है.  

Thursday, November 21, 2013

पुरानी फाईलें और खतों के चंद कतरे !

कोचीन से पेन फ्रेंड सुबास मेनन का 21-06-89 का ख़त  
इरोड से पेन फ्रेंड एस. लीला का 23-10-83 का ख़त 












कच्ची उम्र में हम सब के शौक(हॉबी)  कितने बदलते रहते हैं ,इसका आभास हम सबको अकसर होता है.दीपावली के एक दिन पूर्व किताबों की आलमारी की सफाई करते वक्त कुछ पुरानी फाईलों को खंगाला तो कुछ खतों के चंद कतरे सामने आ गए.कुछ पुराने शौक पर  जमा धूल और गर्द की परतें हट गईं.स्कूल के दिनों  में पुराने डाक टिकटों के संग्रह का शौक था.काफी दिनों तक यह सिलसिला चला.

फिर पत्र - पत्रिकाओं को निरंतर पढ़ते रहने से पेन फ्रेंड का शौक कब पनप गया,पता ही नहीं चला.उन
दिनों विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में पेन फ्रेंडशिप का कॉलम छपता था.अपनी उम्र और रुचियों के अनुसार पेन फ्रेंड बनाने की सुविधा.वह समय मोबाईल,इन्टरनेट,इंस्टेंट मैसेजिंग का न था.सभी मित्रों से संपर्क का जरिया सिर्फ ख़त हुआ करते थे.तब देश के अलग-अलग राज्यों में पेन फ्रेंड हुआ करते थे,ज्यादातर दक्षिण भारत के.कारण यही था कि दक्षिण भारत के प्रति उत्सुकता कुछ ज्यादा रहती थी.प्रत्येक सप्ताह एक-दो पत्र आते रहते थे.उन पत्रों के द्वारा दक्षिण भारत के प्रसिद्द शहरों,ऐतिहासिक,धार्मिक स्थलों के बारे में काफी कुछ जानकारी हो जाती थी.खतो-किताबत का यह सिलसिला लम्बे समय तक चला.

विझिन्जम से एडोल्फ जेरोम का 11-05-88 का ख़त

थिरूवैयारम से पेन फ्रेंड एम. दिनेश का 16-05-88 का ख़त
       
         
अचानक उन्हीं पत्रों को हाथ मेंलेते ही स्कूल-कॉलेज के दिनों की यादें ताजा हो आईं.तब मित्रों के ख़त आने से वह ख़ुशी मिलती थी,जो आज इंस्टेंट मैसेजिंग और वीडियो चैटिंग के ज़माने में संभव नहीं.तब फेसबुक के आभासी जाल का जमाना न था.उन पत्रों की लिखावट और उसके अहसास की आज कोई तुलना नहीं हो सकती.

एक शौक(हॉबी) कितने ही ज्ञान चक्षुओं के द्वार खोल गया था.तब कितने ही शहरों से ख़त आते थे.त्रिची,कोचीन,वेलौर,इरोड,विझिन्जम,विदिशा,रतलाम,मंदसौर,उज्जैन आदि शहरों से नियमित ख़त मिलते थे.कुछ ख़त तो अभी भी जैसे के तैसे हैं,मानो वे कल ही आए हों.  ख़त लिखना और पढ़ना, अब कई सदियों पुरानी बात लगती है.पारिवारिक सदस्यों के भी अब ख़त नहीं आते.संचार क्रांति ने जिंदगी के मायने बदल दिये हैं.खतों के द्वारा जो ऊष्मा,संवेदनाओं की गहन अनुभूति प्राप्त होती थी,वह आज के ज़माने में संभव कहाँ.कहते हैं कि नए बदलाव कुछ न कुछ पुराने मूल्यों के परिमार्जन पर ही होते हैं.

कॉलेज के शुरूआती दिनों में ही स्पेनिश गिटार सीखने का शौक पनप गया था.उन दिनों कलकत्ते से एक शिक्षक गिटार की क्लास लेने आते थे.उनके एक रिश्तेदार कटिहार में डिविजनल रेलवे में अधिकारी थे.उन्हीं के घर पर रुकते और सप्ताह में दो दिन क्लासेज लेते.लगभग दो वर्षों तक यह सिलसिला चला,फिर शिक्षक महोदय की व्यस्तता के कारण कलकत्ता से आना बंद हो गया और साथ ही थम गया,मेरे गिटार सीखने का सिलसिला.
अधूरे शौक की इंतिहा : गिटार के टूटे तार 

स्नातकोत्तर में अध्ययन के दौरान पटना से छपने वाले  'The Hindustan Times' में लिखने का शौक पनप गया.उन दिनों इस न्यूज पेपर में रविवार को पूरे एक पेज का 'The Retrospect' कॉलम छपता था.जिसमें चर्चित हस्तियों के बारे में चर्चाएँ होती थीं.तब केरल के  A.J.Phillip इसके संपादक हुआ करते थे.विभिन्न सामाजिक मुद्दों को लेकर 'Letters to the Editor' कॉलम में लखने की शुरुआत हुई तो अनेक विषयों पर लिखा.तब प्रायः एक दो दिनों पर उक्त समाचार पत्र में मेरे पत्र छपते थे.संपादक महोदय ने लिखने के लिए
काफी प्रेरित किया,विभिन्न विषयों पर लिखने के सुझाव भी दिये.स्नातकोत्तर विभाग के शिक्षकों को मेरे पत्रकार होने का भ्रम हो गया था.इसलिए लाईब्रेरी से लिए जाने वाले पुस्तकों के संबंध में भी उदारता बरतते थे.

स्नातकोत्तर में अध्ययन तक उक्त समाचार पत्र में लिखने का सिलसिला चला.फिर स्नातकोत्तर उत्तीर्ण होने एवं उधर संपादक महोदय का लखनऊ संस्करण में तबादला होने के साथ ही वह कॉलम भी बंद हो गया और मेरे लिखने का सिलसिला भी टूट गया.
 

Thursday, November 14, 2013

पुनर्जन्म की अवधारणा : कितनी सही


पुनर्जन्म को लेकर प्राचीन भारतीय साहित्य और पुराण कथाओं ने वैसे ही दुनियां भर में सरगर्मी फैला दी है.संभवतः इसीलिए अब यूरोप और अमेरिका जैसे नितांत आधुनिक और मशीनी देश भी पुनर्जन्म का वैज्ञानिक आधार खोजने लगे हैं.अमेरिका में वर्जीनियां विश्वविद्यालय ने तो एक परा – मनोविज्ञान विभाग ही खोल दिया है.इस विश्वविद्यालय ने भारत में अपने शोध के पश्चात् यह निष्कर्ष दिया कि भारत की यह धारणा सही है कि मनुष्य का पुनर्जन्म होता है.

मनोवैज्ञानिकों ने यह सिद्ध कर दिया है कि मरणासन्न व्यक्ति को मृत्यु की अनुभूति हो जाती है.पश्चिमी मनोवैज्ञानिक कार्ल जुंग को एक बार ऐसा ही अनुभव हुआ.अपनी इस अनुभूति का वर्णन उन्होंने अपनी पुस्तक ‘मेमोरीज ड्रीम्स रिफ्लेक्शंस’ में किया है.एक बार उनको दिल का भयानक दौरा पड़ा.डाक्टरों ने उनके जीवित रहने की आशा छोड़ दी थी.आक्सीजन द्वारा किसी तरह उनको जीवित रखने का प्रयास किया जा रहा था.

उस मृतप्राय अवस्था में उन्होंने अनुभव किया कि जैसे वे उड़ रहे हैं.धरती से कई मील दूर आकाश में एक बादल के टुकड़े की तरह इधर-उधर भटक रहे हैं और वे इतने हलके हो गए हैं कि इच्छानुसार जब जिस दिशा में जाना चाहें जा सकते हैं.इस अवस्था में वे बहुत देर तक रहे.नभ में विचरते हुए उन्होंने येरुशलम शहर का भी अवलोकन किया.कुछ घंटों तक ऐसी अवस्था में रहने के बाद,वे पुनः अपने पहले शरीर में आ गए और उनको अस्पताल के आस-पास का वातावरण धीरे-धीरे स्पष्ट होने लगा,जैसे मूर्च्छाके पश्चात् कोई व्यक्ति धीरे – धीरे चेतनावस्था में आता है.

मृत्यु  - संबंधी ऐसी धारणाएं,जैसे ‘आत्मा परमात्मा में समा जाती है’,’मिटटी में मिल जाती है’ या फिर कबीर के शब्दों में ‘फूटा कुंभ जल जलहिं समाना’,आज तक सुनने को मिलती रही है,लेकिन उनका वैज्ञानिक आधार भी है,यह बहुत कम लोगों को पता है.मरणोपरांत हमारी आत्मा एक विशेष प्रक्रिया से गुजरने के बाद दूसरे शरीर में प्रवेश करती है,जिससे एक नए शरीर का जन्म होता है.सृष्टि की रचना में,प्राकृतिक उपादानों को छोड़कर,शेष समस्त वस्तुओं या पदार्थों का अंत निश्चित है.

कदाचित यही कारण है कि शरीर के विनाश को हम रोक नहीं सकते.शरीर का विनाश या मृत्यु क्यों अटल है,वैज्ञानिक इसका एक ठोस कारण बताते हैं.उनका कहना है कि हमारा सारा शरीर कोशिकाओं द्वारा बना है.प्रत्येक कोशिका में ‘प्रोटोप्लाज्म’ नामक एक तरल और चिकना पदार्थ होता है.इस ‘प्रोटोप्लाज्म’ के द्वारा दूषित वायु बाहर आती है और ताज़ी हवा अंदर जाती है.हमारी साँस के साथ ये करोड़ों की संख्या में ये ‘प्रोटोप्लाज्म’ नामक कण विद्यमान रहते हैं.

इन प्रोटोप्लाज्म’ कणों में ‘न्यूक्लियस’ नामक एक अन्य पदार्थ होता है.यह पदार्थ ही मानव-शरीर में जीवन शक्ति प्रदान करता है.कोशिकाओं को पुष्ट करने में भी यह सहायक होता है.यदि यह पदार्थ सूखना आरंभ हो जाए तो ‘प्रोटोप्लाज्म’ कण भी धीरे-धीरे क्षीण होने आरंभ हो जाते हैं और इस प्रकार यह ‘प्रोटोप्लाज्म’ कण क्षीण होते- होते एक दिन अकस्मात ख़त्म हो जाते हैं और इनसे मूल चेतना गायब हो जाती है.

इसी प्रकार प्रजनन प्रक्रिया भी पुनर्जन्म के सिद्धांत को महत्व प्रदान करती है.माता-पिता के संसर्ग के परिणामस्वरूप शरीर के कुछ सूक्ष्म संस्कार भी एक-दूसरे शरीर में आ जाते हैं.सम्प्रेषण का यह सिद्धांत पुनर्जन्म के सिद्धांत को युक्तियुक्त होने में सहायता करता है.जिस प्रकार दो इन्द्रियों से एक नए शरीर को जन्म मिलता है उसी प्रकार एक शरीर को छोड़ने के पश्चात जीवात्मा अपने साथ उस शरीर के सूक्ष्म संस्कार भी ले जाती है.वे संस्कार उसके साथ बने रहते हैं और नए शरीर में भी विद्यमान रहते हैं.इन्हीं संस्कारों को हमने ‘पूर्वजन्म की यादें’ की संज्ञा दी है और ऐसी घटनाओं को सुनकर या पढ़कर हम आश्चर्यचकित हो जाते हैं.

शरीर में कोशिकाओं के साथ रहने वाला ‘प्रोटोप्लाज्म’ जीवात्मा का ही दूसरा रूप है.वैज्ञानिकों के अनुसार मृत्यु के पश्चात यही प्रोटोप्लाज्म शरीर से अलग होने पर मिट्टी-राख आदि में समाहित हो जाता है.वायुमंडल में प्रवेश होने पर यह प्रोटोप्लाज्म खेतों-खलिहानों से होते हुए वनस्पतियों में पहुंच जाता है.उसके पश्चात यह फूलों,फलों,और अनाज में समाविष्ट हो जाता है.इन फूलों,पत्तियों और अनाज को जानवर और मनुष्य दोनों खाते हैं.यही ‘प्रोटोप्लाज्म’ कण ‘जीन्स’ में परिवर्तित होते हैं और नए शिशु के साथ दोबारा जन्म लेते हैं.

नया जन्म लेने पर जब शिशु के स्मृतिपटल पर कोई ‘प्रोटोप्लाज्म’ जाग्रत हो जाता है,तब उसको पहले जीवन की घटनाएं धीरे-धीरे याद आने लगती हैं.

आत्मा के संबंध में गीता में विस्तार से कहा गया है.अध्याय दो में एक स्थान पर कहा गया है कि..... 

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः |
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ||

अर्थात आत्मा न तो शस्त्रों द्वारा नष्ट होती है और न इसको अग्नि जला सकती है.इसको जल गीला नहीं कर सकता और न ही वायु सुखा सकती है.यह मात्र गीता की ही बात नहीं.आज का विज्ञान जगत भी इस बात को स्वीकार करने लगा है कि हमारे शरीर में कोई सूक्ष्म पदार्थ ऐसा रहता है,जो शरीर के नष्ट होने के बाद भी नष्ट नहीं होता और यही सूक्ष्म पदार्थ आत्मा कहलाता है.

पश्चिमी वैज्ञानिक अपने प्रयोगों द्वारा इस भारतीय दृष्टिकोण के बहुत पास आते जा रहे हैं कि आत्मा अजर-अमर है.अमेरिका के वैज्ञानिक विलियम मैंड्रगल ने आत्मा के विषय में विभिन्न प्रकार की खोजें की हैं.उन्होंने एक ऐसी तराजू का निर्माण किया है जो अशक्त मरीज के पलंग पर लेटे रहने के बावजूद ‘ग्राम’ के हजारवें भाग तक का वजन बता सकता है.उन्होंने एक पलंग पर एक रोगी को लिटाकर उसके पास एक मशीन लगा दी,जो वास्तव में भार तौलने वाली तराजू थी.वह मशीन, उसके कपड़ों,पलंग,फेफड़ों की सांसों और दी जाने वाली दवाईयों तक का वजन लेती रही.

जब तक वह रोगी जीवित रहा,उस तराजू की सूई में कोई अंतर नहीं आया.वह एक स्थान पर खड़ी रही,लेकिन जैसे ही रोगी के प्राण निकले,सूई पीछे हट गई.रोगी का वजन आधी छटांक कम हो गया.ऐसे ही प्रयोग मैंड्रगल ने कई रोगियों पर किये है.और उसने यह निष्कर्ष निकला कि कोई ऐसा सूक्ष्म तत्व है,जो जीवन का आधार है और उसका भी वजन है.वास्तव में यही आत्मा है.

इसी प्रकार डॉ. गेट्स ने भी आत्मा के बारे में कई प्रयोग किये हैं.इन्होंने ऐसी प्रकाश-किरणों की खोज की है,जिनका रंग कालापन लिए हुए गाढ़ा लाल है.ये किरणें मरे हुए पशुओं से प्राप्त की गई हैं.इन्होंने एक मरणासन्न चूहे को गिलास में रखकर ये किरणें उस पर फेंकी.दीवार पर उस चूहे की छाया दिखाई दी.प्राण निकलते ही वह छाया गिलास से निकली और दीवार की ओर बढ़ी.उस दीवार में रोडापसिन नामक पदार्थ का लेप किया गया था,क्योंकि इस मसाले का प्रयोग करने के बाद ही दीवार पर ये किरणें स्पष्ट दिखाई देती हैं.

यह छाया कुछ दूर तक ऊपर दिखाई दी और उसके पश्चात उसका कहीं कुछ पता नहीं लगा.डॉ. गेट्स ने इस छाया की सही स्थिति जानने के लिए गैल्वानोमीटर से उन किरणों की शक्ति तथा मानव-शरीर में संचालित विद्युत तरंगों को मापा और उन्हें लगा कि दीवार पर पड़ने वाली प्रकाश-किरणों की अपेक्षा शरीर की ताप-शक्ति अधिक होती है.डॉ. गेट्स के अनुसार यही विद्युत शक्ति आत्मा की प्रकाश-शक्ति है.

ऐसे ही अनेक प्रयोग अमेरिका में भी किये गए हैं.प्रयोगशाला में एक चैम्बर,जो देखने में पारदर्शी सिलिंडर-सा लगता है,रखा जाता है.इसके भीतर के भागों में रासायनिक घोल पोता जाता है.इस चैम्बर में चूहों और मेढकों को जीवित अवस्था में रखकर प्रयोग किया जाता है.

फ़्रांस के डॉ. हेनरी बराहुक ने अपने मरणासन्न बच्चों पर ऐसे प्रयोग किए हैं.इसी तरह लंदन के प्रसिद्द डॉ. जे. किलर ने अपनी पुस्तक ‘दि ह्यूमन एटमोस्फियर’ में भी अपने कई प्रयोगों का वर्णन किया है,जो उन्होंने रोगियों की जाँच करते समय किये थे और वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि मानव देह में एक प्रकाशपुंज का अस्तित्व अवश्य है, जो मृत्यु के पश्चात भी यथावत रहता है.

अनेक मान्यताओं को अस्वीकार करने वाले रूस ने भी इस ओर काम किया है.उनकी विज्ञान संबंधी खोजों ने भी इस बात को प्रमाणित कर दिया है कि व्यक्ति का पुनर्जन्म संभव है.वहां की प्रयोगशालाओं में अनेक प्रयोग किये गए और प्रयोगों के पश्चात् वैज्ञानिक इस परिणाम पर पहुंचे कि मरणोपरांत भी कोई ऐसा सूक्ष्म तत्व रह जाता है,जो इच्छानुसार पुनः किसी शरीर में प्रवेश कर एक नये शरीर को जन्म देता है.

साधारणतः पदार्थ की चार अवस्थाएँ होती हैं – ठोस,द्रव,गैस और प्लाज्मा.रूस के वैज्ञानिकों ने एक और अवस्था की खोज की है,यह पांचवीं अवस्था ‘जैव प्लाज्मा’ है.दूसरे शब्दों में,यही अवस्था ‘प्राण’ है,जिसके न रहने से व्यक्ति मृत कहलाता है.

इस पांचवीं अवस्था की खोज 1944 में रूस के भौतिक शास्त्री वी. एस. ग्रिश्चेंको ने की.इनका कहना है कि ‘जैव प्लाज्मा’ में ‘आयंस’ स्वतंत्र इलेकट्रान और स्वतंत्र प्रोटान होते हैं,जिनका अस्तित्व स्वतंत्र होता है और जिनका नाभिक से कोई संबंध नहीं होता.इनकी गति बहुत तीव्र होती है और दूसरे जीवधारियों में शक्ति के संवहन करने में यह सक्षम होता है.यह मानव की सुषुम्ना नाड़ी में एकत्रित रहता है.यह टेलीपैथी,मनोवैज्ञानिक और मनोगति की प्रक्रियाओं से मिलता-जुलता है.

पुनर्जन्म से संबंधित कुछ खोजों में रूस के वैज्ञानिकों को अत्यधिक श्रम करना पड़ा है.कई विकसित उपकरणों के प्रयोग से यह खोज संभव हो सकी है.उच्च वोल्टेज वाली फोटोग्राफी,क्लोजसर्किट टेलीवीजन तथा मोशन पिक्चर तकनीक आदि उपकरणों से वे अपने प्रयोगों को सफलता की सीमा तक पहुंचा सके हैं.

भारत में प्रचलित ‘सूक्ष्म शरीर’ की मान्यता से रूस की वैज्ञानिक ‘बायो-प्लाज्मा’ की धारणा बहुत साम्य रखती है.रूसी वैज्ञानिक दृढ़तापूर्वक यह स्वीकार करते हैं कि बायो-प्लाज्मा का अस्तित्व है और यह बायो-प्लाज्मा भारत के ‘सूक्ष्म-शरीर’ या आत्मा से बहुत कुछ मिलता जुलता है.

अमेरिका ने भी रूस की इस वैज्ञानिक खोज को स्वीकार किया है.रूस के वैज्ञानिक शैला आस्त्रेंडर तथा लीं स्क्रोडर ने एक स्थान पर अपनी इस खोज को महत्व प्रदान करते हुए बड़े गर्व से कहा है कि ‘जीवधारियों में कोई प्रकाशपुंज,कोई सूक्ष्म शक्ति या कोई अदृश्य शरीर भौतिक शरीर को आवृत्त किये रहता है,इसका प्रमाण हमें मिल गया है.

इस प्रकाशपुंज को रूस के वैज्ञानिकों ने इलेक्ट्रोन माइक्रोस्कोप द्वारा देखा है.उनका कहना है कि मरणासन्न जीवधारी में उन्होंने फ्रीक्वेंसी पर कोई ऐसी वास्तु ‘डिस्चार्ज’ होते देखी है,जो पहले ‘क्लेयर वोमेंटस’(भविष्य को पढने वाले) ही देख पाते थे.जीवित शरीर में उनको उसी शरीर की प्रतिकृति देखने को मिली है.यही प्रतिकृति विद्युत –चुम्बकीय क्षेत्रों में समा जाती है.इस अदृश्य शरीर की एक विशिष्ट संरचना है.

इन परिणामों को ध्यान में रखते हुए यह निःसंदेह कहा जा सकता है कि पुनर्जन्म का सिद्धांत किसी ठोस वैज्ञानिक आधार पर आधारित है.हमारे प्राचीन ग्रंथ भी इस सिद्धांत का समर्थन करते हैं. हमारे धर्म-ग्रंथों में वर्णित जीव और ब्रह्म की कल्पना जीवन और जीवनोपरांत जीवधारियों की स्थिति की ही गाथा है.

ब्रह्म मरणोपरांत की स्थिति है और जीव, जीवित समय की.जीव और ब्रह्म के पारस्परिक आदान-प्रदान पर ही समस्त चेतना-शक्ति निवास करती है.वह दिन दूर नहीं,जब विज्ञान पुनर्जन्म की सत्यताओं को सार्थक सिद्ध कर यह घोषणा कर देगा कि आदमी मरता नहीं है,उसके भीतर आत्मा नाम का तत्व होता है,और जो कभी नष्ट नहीं होता. नष्ट होता है,केवल शरीर. 

Thursday, November 7, 2013

उर्जा के वैकल्पिक स्रोत : कितने कारगर

मेरे घर की छत पर लगे दो सोलर पैनल 
सोलर पैनल पर पड़ती सूर्य की किरणें 











उत्तर भारत में,खासकर गर्मियों में,बिजली की समस्या काफी गंभीर हो जाती है.राज्यों की विद्युत उद्पादन क्षमता काफी सीमित है.ऐसे में केन्द्रीय पूल से निर्धारित किये गए कोटे से ही राज्यों को मिलने वाली बिजली पर संतोष करना पड़ता है.कभी-कभी तो इसमें भी कटौती की जाने लगती है.ऐसे में बिजली कटौती,लोगों का जीना मुहाल कर देती है.

ज्यों - ज्यों हमने विज्ञान और प्रौद्योगिकी में तरक्की की है,बिजली से चलने वाली उपकरणों का हमारे जीवन में दखल बढ़ गया है.बिजली के बिना, आज के ज़माने में जीने की कल्पना नहीं की जा सकती.ऐसे में जिस तरह बिजली की खपत बढ़ रही है,उसकी तुलना में उत्पादन सीमित है.
इस स्थिति में उर्जा के वैकल्पिक स्रोतों का महत्व काफी बढ़ जाता है.

उर्जा के वैकल्पिक स्रोतों में सौर उर्जा का महत्व काफी अधिक है.लेकिन इस ओर सरकार एवं अन्य संगठनों का पर्याप्त ध्यान नहीं जाने के कारण,इसका पर्याप्त प्रचार,प्रसार नहीं हो सका है. 
   
सौरमंडल में सूर्य ऐसा तारा है, जो ऊर्जा का अतुलनीय भंडार है। इससे ही कई ग्रह प्रकाश तथा ऊर्जा पाते हैं. पृथ्वी का तो जीवन ही इसी से चलता है. सूर्य की ऊर्जा सर्व सुलभ तथा सस्ती है. इसके लिए अधिक परिश्रम करने की आवश्यकता नहीं है. मनुष्यों ने ऊर्जा प्राप्त करने के लिए प्रकृति का इतना दोहन किया है कि आज उसके पास साधन नाममात्र के लिए बचे हैं. 

ऐसे में मनुष्य को ऐसे स्रोत की आवश्यकता पड़ी जो कभी समाप्त न हो और मनुष्य की समस्त आवश्यकता उससे पूर्ण हो जाए. सूर्य ऐसे विकल्प में सर्वोत्तम जान पड़ा. कुछ उपकरणों के माध्यम से इसकी ऊर्जा को संचित करके रखा जा सकता है और उससे बहुत से कार्य किए जा सकते हैं. इसपर अब वैज्ञानिक ध्यान देने लगे हैं और बहुत से ऐसे उपकरण बन गए हैं, जिनसे इसकी ऊर्जा का इस्तेमाल करना सरल हो गया है. आने वाले समय में मनुष्य के लिए यह बहुपयोगी साबित होगी.

सूर्य के दिव्य शक्ति स्रोत, शान्त एवं सुहृद प्रकृति के कारण इससे उत्पन्न,नवीकरणीय सौर ऊर्जा को लोगों ने अपनी संस्कृति एवं जीवन यापन के तरीके के समरूप पाया है.विज्ञान व संस्कृति के एकीकरण तथा संस्कृति व प्रौद्योगिकी के उपस्करों के प्रयोग द्वारा सौर ऊर्जा भविष्य के लिए अक्षय उर्जा का स्रोत साबित होने वाली है.

सूर्य से सीधे प्राप्त होने वाली ऊर्जा में कई खास विशेषताएं हैं. जो इस स्रोत को आकर्षक बनाती हैं. इनमें इसका अत्यधिक विस्तारित होना, अप्रदूषणकारी होना व अक्षुण होना प्रमुख हैं. सम्पूर्ण भारतीय भूभाग पर 5000 लाख करोड़ किलोवाट घंटा प्रति वर्ग मी० के बराबर सौर ऊर्जा आती है, जो कि विश्व की संपूर्ण विद्युत खपत से कई गुना अधिक हैं. साफ धूप वाले (बिना धुंध व बादल के) दिनों में प्रतिदिन का औसत सौर-ऊर्जा का सम्पात 4 से 7 किलोवाट घंटा प्रति वर्ग मीटर तक होता है. देश में वर्ष में लगभग  से 300 दिन ऐसे होते हैं जब सूर्य की रोशनी पूरे दिन भर उपलब्ध रहती है.

सौर ऊर्जा वह उर्जा है जो सीधे सूर्य से प्राप्त की जाती है. सौर उर्जा ही मौसम एवं जलवायु का परिवर्तन करती है. यहीं धरती पर सभी प्रकार के जीवन (पेड़-पौधे और जीव-जन्तु) का सहारा है.
वैसे तो सौर उर्जा के विविध प्रकार से प्रयोग किया जाता हैकिन्तु सूर्य की उर्जा को विद्युत उर्जा में बदलने को ही मुख्य रूप से सौर उर्जा के रूप में जाना जाता है. सूर्य की उर्जा को दो प्रकार से विदुत उर्जा में बदला जा सकता है. पहला प्रकाश-विद्युत सेल की सहायता से और दूसरा किसी तरल पदार्थ को सूर्य की उष्मा से गर्म करने के बाद इससे विद्युत जनित्र चलाकर.

सौर ऊर्जा, जो रोशनी व उष्मा दोनों रूपों में प्राप्त होती है, का उपयोग कई प्रकार से हो सकता है। सौर उष्मा का उपयोग अनाज को सुखाने, जल उष्मन, खाना पकाने,जल परिष्करण तथा विद्युत ऊर्जा उत्पादन हेतु किया जा सकता है. फोटो वोल्टिक प्रणाली द्वारा सौर प्रकाश को बिजली में रूपान्तरित करके रोशनी प्राप्त की जा सकती है, प्रशीतलन का कार्य किया जा सकता है, दूरभाष, टेलीविजन, रेडियो आदि चलाए जा सकते हैं, तथा पंखे व जल-पम्प आदि भी चलाए जा सकते हैं.

जल का उष्मन सौर-उष्मा पर आधारित प्रौद्योगिकी का उपयोग घरेलू, व्यापारिक व औद्योगिक इस्तेमाल के लिए जल को गरम करने में किया जा सकता है. देश में पिछले दो दशकों से सौर जल-उष्मक बनाए जा रहे हैं. लगभग 4,50,000 वर्गमीटर से अधिक क्षेत्रफल के सौर जल उष्मा संग्राहक संस्थापित किए जा चुके हैं जो प्रतिदिन 220 लाख लीटर जल को 60-70° से० तक गरम करते हैं. भारत सरकार का अपारम्परिक ऊर्जा स्रोत मंत्रालय इस ऊर्जा के उपयोग को प्रोत्साहन देने हेतु प्रौद्योगिकी विकास, प्रमाणन, आर्थिक एवं वित्तीय प्रोत्साहन, जन-प्रचार आदि कार्यक्रम चला रहा है. इसके फलस्वरूप प्रौद्योगिकी अब लगभग परिपक्वता प्राप्त कर चुकी है तथा इसकी दक्षता और आर्थिक लागत में भी काफी सुधार हुआ है. वृहद् पैमाने पर क्षेत्र-परिक्षणों द्वारा यह साबित हो चुका है कि आवासीय भवनों, रेस्तराओं, होटलों, अस्पतालों व विभिन्न उद्योगों (खाद्य परिष्करण, औषधि, वस्त्र, डिब्बा बन्दी, आदि) के लिए यह एक उचित प्रौद्योगिकी है.

सौर फोटोवोल्टिक तरीके से ऊर्जा, प्राप्त करने के लिए सूर्य की रोशनी को सेमीकन्डक्टर की बनी सोलर सेल पर डाल कर बिजली पैदा की जाती है. इस प्रणाली में सूर्य की रोशनी से सीधे बिजली प्राप्त कर कई प्रकार के कार्य सम्पादित किये जा सकते हैं.

भारत उन अग्रणी देशों में से एक है जहाँ फोटोवोल्टिक प्रणाली प्रौद्योगिकी का समुचित विकास किया गया है एवं इस प्रौद्योगिकी पर आधारित विद्युत उत्पादक इकाईयों द्वारा अनेक प्रकार के कार्य सम्पन्न किये जा रहे हैं. देश में नौ कम्पनियों द्वारा सौर सेलों का निर्माण किया जा रहा है एवं बाइस द्वारा फोटोवोल्टायिक माड्यूलों का. लगभग 50 कम्पनियां फोटो वोल्टिक प्रणालियों के अभिकल्पन, समन्वयन व आपूर्ति के कार्यक्रमों से सक्रिय रूप से जुड़ी हुयी हैं. भारत सरकार का अपारम्परिक ऊर्जा स्रोत मंत्रालय सौर लालटेन, सौर-गृह, सौर सार्वजनिक प्रकाश प्रणाली, जल-पम्प, एवं ग्रामीण क्षेत्रों के लिए एकल फोटोवोल्टायिक ऊर्जा संयंत्रों के विकास, संस्थापना आदि को प्रोत्साहित कर रहा है.

सोलर पैनल की कार्य प्रणाली 


फोटोवोल्टिक प्रणाली माड्यूलर प्रकार की होती है. इनमें किसी प्रकार के जीवाष्म उर्जा की खपत नहीं होती है तथा इनका रख रखाव व परिचालन सुगम है. साथ ही ये पर्यावरण सुहृद हैं. दूरस्थ स्थानों, रेगिस्तानी इलाकों, पहाड़ी क्षेत्रों, द्वीपों, जंगली इलाकों आदि, जहाँ प्रचलित ग्रिड प्रणाली द्वारा बिजली आसानी से नहीं पहुँच सकती है, के लिए यह प्रणाली आदर्श है.अतएव फोटोवोल्टिक प्रणाली दूरस्थ दुर्गम स्थानों की दशा सुधारने में अत्यन्त उपयोगी है. 

फोटोवोल्टिक सेलों पर आधारित बिजली घरों से ग्रिड स्तर की बिजली ग्रामवासियों को प्रदान की जा सकती है. इन बिजली घरों में अनेकों सौर सेलों के समूह, स्टोरेज बैटरी एवं अन्य आवश्यक नियंत्रक उपकरण होते हैं. बिजली को घरों में वितरित करने के लिए स्थानीय सौर ग्रिड की आवश्यकता होती है. इन संयंत्रों से ग्रिड स्तर की बिजली व्यक्तिगत आवासों, सामुदायिक भवनों व व्यापारिक केन्द्रों को प्रदान की जा सकती है. इनकी क्षमता 1.25 किलोवाट तक होती है. अबतक लगभग एक मेगावाट की कुल क्षमता के ऐसे संयंत्र देश के विभिन्न हिस्सों में लगाए जा चुके हैं. इनमें उत्तर प्रदेश, देश का उत्तर पूर्वी क्षेत्र, लक्षद्वीप, बंगाल का सागर द्वीप, व अन्डमान निकोबार द्वीप समूह प्रमुख हैं.

ग्रामीण इलाकों में सार्वजनिक स्थानों एवं गलियों, सड़कों आदि पर प्रकाश करने के लिए ये उत्तम प्रकाश स्रोत है. इसमें 74 वाट का एक फोटोवोल्टिक माड्यूल, एक 75 अम्पीयर-घंटा की कम रख-रखाव वाली बैटरी तथा 11 वाट का एक फ्लुओरेसेन्ट लैम्प होता है. शाम होते ही यह अपने आप जल जाता है और प्रात:काल बुझ जाता है. देश के विभिन्न भागों में पंचायतों के माध्यम से ये बड़े पैमाने पर लगाये जा रहे हैं.

घरेलू सौर प्रणाली के अन्तर्गत इसके उपयोग के लिए आपके पास एक अच्छी बैट्री एवं इनवर्टर का होना जरूरी है,तभी सोलर पैनल से बैट्री को चार्ज करके इसे उपयोग में लाया जा सकता है.अन्यथा सीधे सोलर पैनल से चलने वाले उपकरण(बल्ब,पंखे) खरीदने पड़ेंगे.

पर्याप्त प्रचार,प्रसार नहीं होने एवं महंगे होने के कारण ये अभी तक सर्वसुलभ नहीं हो पाए हैं.एक अच्छी कंपनी के 80-80 वाट के दो सोलर पैनल के लिए मुझे 13 हजार रूपये खर्च करने पड़े.अन्य उपकरण जैसे - स्टैंड,तार वगैरह को लेकर एक हजार अतिरिक्त.इस तरह कुल चौदह हजार रूपये का खर्च.हालाँकि,बिजली नहीं रहने या ब्रेकडाउन की स्थिति में इससे बैट्री पूरी तरह चार्ज हो जाती है.

लेकिन,यह आसानी से समझा जा सकता है कि इतने महंगे उपकरण खरीदने में कितने लोगों की रूचि होगी.आज जरूरत इस बात की है कि सोलर पैनल की कीमतें कम की जाय,सरकार द्वारा सब्सिडी देकर इसे लोगों तक पहुँचाया जाय,तभी इसका व्यापक उपयोग हो सकेगा.          

सौर ऊर्जा की कई परेशानियां भी हैं. व्यापक पैमाने पर बिजली निर्माण के लिए पैनलों पर भारी निवेश करना पड़ता है. दूसरा, दुनिया में अनेक स्थानों पर सूर्य की रोशनी कम आती है, इसलिए वहां सोलर पैनल कारगर नहीं हैं. तीसरा, सोलर पैनल बरसात के मौसम में ज्यादा बिजली नहीं बना पाते. फिर भी विशेषज्ञों का मत है कि भविष्य में सौर ऊर्जा का अधिकाधिक प्रयोग होगा.

Friday, November 1, 2013

दीप एक : रंग अनेक












हमारी भारतीय मनीषा प्रकाशोन्मुखी है.प्रकाशधर्मी देवता और ज्ञानरूपी प्रकाश का ही प्रतीक है – हमारा दीपक यानि चिराग.अप्रतिम सौंदर्य और तेज की कल्पना हम दीपक से करते हैं.दीपक हमारी जन जागृति का प्रतीक है.

भारत ही दुनियां का एकमात्र देश है जिसने त्योहारों और पर्वों की अपनी कालजयी परंपरा में दीप की बाती गूंथकर प्रकाश की वंदना,आवाहन और पूजन को अपने धार्मिक,सांस्कृतिक जीवन में सर्वोच्च सत्ता प्रदान की है.

भारतीय कवियों और शायरों ने दीपक के संबंध में अपने – अपने नजरिये से अलग –अलग भाव व्यक्त किये हैं.छोटे से दीपक ने महान कवियों,साहित्यकारों,शायरों को प्रेरित किया है.संस्कृत के महाकवि कालीदास ने कहा है कि आँखें होते हुए भी अंधकार में दीपक के बिना नहीं देखा जा सकता है.

दृश्यं तमसि न पश्यति,दीपने बिना सचच्छुरपि

जगत् जननी सीता की सुन्दरता इतनी है मानो छवि के गृह में दीपशिखा जल रही हो.तुलसीदास लिखते हैं ........

सुंदरता कहूँ सुंदर करई,छवि गृह दीपशिखा जनु बरई 

दूसरी ओर तुलसीदास युवती के तन को दीपशिखा की की तरह बताते हुए आगाह करते हैं कि इस दीपशिखा सम तन पर पतिंगे मत बनिए......

दीप शिखा सम युवती तन,मन जनि होसि पतंग

संत कवि सूरदास प्रभु को दीपक बनाते हैं और स्वयं उनकी बाती बनते हैं क्योंकि बाती ही तो जलती है.वे कहते हैं .....

प्रभु जी तुम दीपक,हम बाती

भक्त कवियित्री मीराबाई अपना अलग दीपक जला रही हैं,वे लिखती हैं.......

सूरत निरत दिवला संजो ले
मनसा की कर ले बाती

संत कबीरदास ने दीपक के प्रकाश में उस अल्ला का नूर देखा है,जिसने सारे अंधकार मिटा दिया हैं....

अव्वल अल्ला नूर उपाया,कुदरत के सब बन्दे
एक नूर ते जग उपजाया,कौन भले को मंदे

एक अन्य जगह कबीर दास कहते हैं कि .....

“सब अँधियारा मिट गया,जब दीपक देख्या मांहि |”

कवि रहीम ने दीपक की उपमा कपूत से दी है.दीपक जलाने पर उजेला देता है और बढ़ाने पर अँधेरा करता है,उसी प्रकार कपूत बचपन में अच्छा लगता है अरे बड़े होने पर काली करतूतें करता है.......

जो रहीम गति दीप की,कूल कपूत गति सोय
बारौ उजियारों करे,बढ़ै अंधेरो होय

रीतिकालीन कवि बिहारी ने दीपक को बिना हाथ का बताकर उसकी मानसिक परेशानी की ओर इशारा किया है.नयी वधू अपने आँचल में दीपक छिपाए जा रही है.हाथ न होने से दीपक की परेशानी कोई भी महसूस कर सकता है,उसका सर धुनना तो वाजिब है ही ......

दीपक हिये छिपाय,नवल वधू घर लै चली
कर विहीन पछिताय,कुच लखि निज सीसे धुनें

उधर रीतिकालीन कवि मतिराम ने एक चंद्रमुखी को जिसने नंदलाल की रूप सुधा पी ली है उसे पवन रहित निवास में जलती हुई गुपचुप शिखा-सी बताया है.......

चंद्रमुखी न हिलै,न चलै
निरवात निवास में दीप शिखा सी

छायावादी कवियित्री महादेवी वर्मा ने अपने प्राणों का दीप जलाकर दीपावली मनाई है......

अपने इस सूनेपन की मैं रानी मतवाली
प्राणों का दीप जलाकर,करती रहती दीवाली

एक दार्शनिक कवि ने दीपक में ईश्वर का अंश,खुदा का नूर बताया है ......

नूरे खुदा है कुफ़ की हरकत पै खंदाजन
फूकों से ये चिराग बुझाया न जाएगा

उर्दू के शायरों ने दीपक को अलग नजरिये से देखा है.उर्दू में दीपक को चिराग या शमा कहा जाता है.जोश मलीहाबादी का कहना है .....

जल बुझा वो शमां पर,मैं मर मिटा इस रश्क से
मौत परवाने की थी,या मौत का परवाना था

प्रसिद्द शायर बहादुरशाह जफ़र का शमा और परवाने के परस्पर संबंधों पर नज़र गौर कीजिए.....

जिस तरह से शम्अ पर परवाना होता है फ़िदा
उस तरह से शम्अ उसके रुख पै परवाना रहे

फ़िराक गोरखपुरी का मन प्रसन्न है. वे अपनी नायिका की मुस्कराहट में मंदिर के दीपक की झिलमिलाहट देखते हैं....

ये फूट रही झिलमिलाहट की किरण
मंदिर में चिराग झिलमिलाए जैसे

दाग़ साहब की नायिका के रोशन कपोल और उधर जलती शमा में मुकाबला है,वे देखना चाहते हैं कि परवाना किधर आकृष्ट होता है ......

रूखे रोशन के आगे,शमा रखकर वो ये कहते हैं
उधर जाता है देखें,या इधर परवाना जाता है

गजलकार दुष्यंत कुमार आज के हालातों पर चिंतित है कि कहाँ तो हर घर के लिए दीपक होना था,वहीँ शहर भर के लिए चिराग नहीं है......

कहाँ तो तय था चिरागां हरेक घर के लिए
कहाँ चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए

शायर वसीम ,मुहब्बत की शमा के लिए लिखते हैं कि ये शमा एक बार ठंढी हो जाने पर नहीं जलती हैं .....

ठंढी हुई जो शम्ऐ-मुहब्बत इक बार
वो फिर न जली,फिर न जली,फिर न जली

मोहसिन जैदी का मानना है कि वक्त की तेज हवा में दीपक भी कब तक जलता?

जलता कब तक वह,इक दिया आख़िर
तेज थी वक्त की हवा आख़िर

जौक साहब शमा को संबोधित करते हुए जीवन दर्शन की ओर इशारा करते हैं कि जीवन थोड़ा है, चाहे हंसकर गुजारिए या रोकर ....

ऐ शम्मा ? तेरी उम्रे – तवीई है एक रात
हंसकर गुजार या इसे रोकर गुजार दे

शायर सोहरवर्दी का नजरिया दीपक के संबंध में अलग ही है.उनका कहना है कि हम दीपक को बुझाने से बचाते हैं और वही हमारा दामन जला देता है ......

मैंने जिसको दूर रक्खा,आँधियों के वार से
उस दिये की लौ से दिल के,साज का दामन जला

एक उर्दू शायर ने अपनी प्रियतमा का हाथ अपने हाथ में जैसे ही लिया,रात में चिराग रोशन हो उठे......

मुझे सहज हो गयी मंजिल,हवा के रुख बदल गये
तेरे हाथ में हाथ आया,कि चिराग रात में जल उठे

एक लोक गीत में दीपक के प्रति एक अलग नजरिया देखा गया है.लोक गीतकार की मान्यता है कि दीपक में तो तेल और बाती जलती है,जबकि नाम दीपक का होता है......

तेल जले,बाती जले,नाम दिया कौ होय
लरका खेलें यार के,नाम पिया कौ होय

बेचारे दीपक की किस्मत ही ऐसी है कि कुछ लोग आलोचना करते हैं तो कुछ तारीफ़.उसे तो जलना और प्रकाश फैलाना है ......

क्या बताएं हम तुम्हें शम्मा की किस्मत
जलने के सिवा उसे रखा ही क्या है ?

दीपावली के दीप से यही आशा है कि वह अँधेरे को मिटा दे और सब जगह प्रकाश भर दे......

दीपावली के दीप जरा कुछ ऐसे जल
घर – घर पहुंचे किरण,अँधेरा गल जाए