Monday, December 26, 2011

मेड इन चायना


हमारे दैनिक जीवन में उपयोग होने वाली जिन वस्तुओं,उत्पादों से हमारा साबका पड़ता है ,वे अधिकतर चायनीज हैं,अर्थात मेड इन चायना.चायनीज उत्पादों ने हमारे जीवन में इस तरह घुसपैठ कर लिया है कि इनके बिना तो जीवन अधूरा ही लगता है.मोबाईल हैंडसेट से लेकर मोबाइल की नामचीन कंपनियों की बैट्रियां,चार्जर,लेड टौर्च,लैपटॉप,एल.सी.डी टीवी,कम्पूटर के मोनिटर,हार्ड डिस्क और अधिकतर पार्ट्स,सी.एफ.एल बल्ब,पेन ड्राइव,मेमोरी कार्ड्स,यू.एस.बी मौडम अदि अनेक उत्पादों ने कब हमारे जीवन में प्रवेश कर लिया पता ही नहीं चला.

नोकिया,सैमसंग जैसे बड़े और अंतर्राष्ट्रीय ब्रांड्स की मोबाइल बैटरियां चीन की बनी होती हैं.एच.पी,डेल,लेनोवो जैसे बड़े ब्रांड्स के लैपटॉप,प्रिंटर चीन के बने होते हैं.अधिकांश डिजिटल कैमरे और बैट्रियां चीन में निर्मित हैं.

लब्बोलुआब यह कि इन उत्पादों में एक भी भारतीय नहीं है.क्या हिंदुस्तान में सिर्फ सायकिल,मोटर सायकिल और खाद्य पदार्थ ही बनते हैं.और तो और दीपावली में सजाने वाली छोटे-छोटे बल्बों की लड़ियाँ,लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति तक चायनीज हैं.

अस्सी के दशक में चीन में बने जिस प्रमुख उत्पाद ने हमें आकर्षित किया था वह था रिचार्जेबल टौर्च,इमरजेंसी लाईट और बारह बैंड का छोटा सा रेडियो जिसमें एफ.ऍम के अलावे दूरदर्शन के कार्यक्रम भी पकड़ते थे.हिंदुस्तान का शायद ही कोई ऐसा मध्य वर्ग का घर होगा जिसमें ये उत्पाद न पहुंचे हों.हिंदुस्तान में रेडियो बनाने वाली अनेक कम्पनियां हैं लेकिन किसी ने भी इस तरह के उत्पाद प्रस्तुत नहीं किये.

बाद के दशक में चायनीज सी.डी. और डी.वी.डी प्लेयरों ने भारतीय घरों में धूम मचा दी.लोग पाँच रूपये में किराये की पायरेटेड सी.डी. लेकर नयी रिलीज फिल्मों का आनंद उठाने लगे.जो लोकप्रियता वी.सी.आर और वी.सी.पी नहीं पा सकी उसकी कसर चायनीज सी.डी. और डी.वी.डी प्लेयरों ने पूरी कर दी.फिर चीन और ताईवान से आयातित डी.टी.एच के सेट टॉप बॉक्स की कीमतों में कमी का फायदा दर्शकों को मिला और केबल को पीछे छोड़ते हुए डी.टी.एच घर घर में पहुँच गए.

भारतीय कम्पनियाँ एंटी डंपिंग का रोना रोती रही और चायनीज उत्पाद लोगों के घरों में जगह बनाते चले गए.किसी भी भारतीय कम्पनी ने इन उत्पादों के विकल्प प्रस्तुत करने के प्रयास नहीं किये.

एक ऐसे देश जिसकी उभरती हुई अर्थव्यवस्था की प्रशंसा अमेरिकी राष्ट्रपति भी करते हों और भारत से खतरा बताते हों,उस देश का इस तरह चीनी उत्पादों का गुलाम बन जाना अवश्य ही चौंकाता है.
क्या वजह है की भारतीय कम्पनियाँ चीनी उत्पादों का विकल्प नहीं प्रस्तुत कर पाती हैं और विदेशी सामानों के मार्केटिंग में ही अपने को धन्य समझती हैं.

आज दूर संचार के अधिकाश उपकरण चीन में निर्मित हैं और दूर संचार सेवा प्रदाता कम्पनियाँ इन्हीं का प्रयोग कर रही हैं तथा सरकार सिर्फ चिंता ही प्रकट कर रही है.
भारत ही क्यों,दुनिया के सभी देश चीनी उत्पादों से अटे पड़े हैं.चीनी उत्पादों के इस तरह पूरी दुनिया में छा जाने से अन्य देशों के उत्पादों को बड़ा धक्का लगा है.

आज जरूरत इस बात की है हम चीनी उत्पादों को कोसें नहीं, बल्कि उसकी तरह आम जरूरतों को ध्यान में रखकर ऐसे उत्पाद व उपकरण बनायें जो न केवल सस्ती हो बल्कि टिकाऊ भी हो,तभी भारतीय कम्पनियाँ चीनी उत्पादों का मुकाबला कर सकेंगी.

Tuesday, December 13, 2011

बेटियों का पेड़

भागलपुर जिले के नवगछिया से सटे गोपालपुर प्रखंड का एक छोटा सा गाँव है धरहरा.यह पटना से पूर्व में  230 किलोमीटर की दूरी पर है.जब निर्मला देवी ने 1961 में एक बेटी को जन्म दिया तो उनके पति ने 50 आम का पेड़ लगाकर जन्मोत्सव मनाया.उनकी दूसरी पुत्री के जन्म के बाद तथा बाद में पोतियों के जन्म का उत्सव पेड़ लगाकर मनाया.आज निर्मला देवी के पास आम और लीची का 10 एकड़ का बगीचा है.

इस सदियों पुरानी प्रथा के बारे में कोई नहीं जानता कि इसकी शुरुआत कब और कैसे हुई.
लेकिन चाहे वे अमीर हों या गरीब,उच्च जाति के हों या निम्न जाति के,बेटी के जन्म पर पेड़ जरुर लगाते हैं.बेटी का जन्मोत्सव यहाँ पर कम से कम 10 फलदार पेड़ लगाकर मनाया जाता है और बेटी को लक्ष्मी का अवतार माना जाता है.हरियाली से ओत-प्रोत धरहरा गाँव दक्षिण में गंगा से और उत्तर पूर्व में कोसी नदी से घिरा है.धरहरा की बेटियां गर्व से अपने आपको हरित सक्रियतावादी कहलाना पसंद करती हैं.

2010 में यह गाँव तब प्रकाश में आया जब लोगों को पता चला कि एक परिवार बेटी के जन्म पर कम से कम 10 पौधे जरुर लगाते हैं. पेड़ लगाने की यह प्रथा कई पीढ़ियों से जारी है. 2010 में 7000 की जनसँख्या वाले इस गाँव में लगभग एक लाख पेड़ हैं,ज्यादातर आम और लीची के.
1200 एकड़ क्षेत्रफल वाले इस गाँव में 400 एकड़ क्षेत्र में फलदार पेड़ लगे हैं.इस गाँव में स्त्रियों और पुरुषों का अनुपात 1000:871 है. पर्यावरण को साफ़ सुथरा और बीमारियों से परे रखने के अलावा यह प्रथा बेटियों का एक तरह से बीमा कवर का कार्य करती है.शहरों में लोग बेटियों की शिक्षा,विवाह आदि के लिए रुपया जमा करते हैं लेकिन धरहरा में फलदार पेड़ लगाते हैं.

भारत जैसे देश में जहाँ कन्या भ्रूण हत्या और दहेज़ हत्या चरम पर है,इस तरह की प्रथा अवश्य ही प्रशंसनीय है.महिला सशक्तिकरण की दिशा में यह अद्भुत कदम है.यहाँ की वनपुत्रियाँ ग्लोबल वार्मिंग से चेत जाने का सन्देश देती हैं.

बेटियों को तो हम अलंकार में काफी प्रतिष्ठा देते हैं,लेकिन व्यवहार में हम ऐसा नहीं करते.यही स्थिति पेड़ों को लेकर है.पेड़ों की पूजा की जाती है लेकिन जब आस्था पर आवश्यकता भारी पड़ने लगती है तो पेड़ों को काटते भी हैं.ऐसे में धरहरा के लोगों ने एक बड़ा सन्देश दिया है.

धरहरा से निकला बेटियों के नाम पर पेड़ लगाने का सन्देश अब देश भर में गूंजे और देश के अन्य गाँव भी इससे प्रेरित हों,इससे बड़ी बात कुछ नहीं.स्वच्छ पर्यावरण के प्रति जागरूक करता यह अभियान अब देश की सरहदों को पार कर विदेशों में भी सुर्खियाँ बटोर रहा है.आशा की जा सकती है कि ग्लोबल वार्मिंग के इस दौर में इसका संदेश बहुत दूर तक जाएगा.

Wednesday, December 7, 2011

अंतर्विरोध की शिकार : टीम अन्ना

भ्रष्टाचार के विरुद्ध मुहिम में जनलोकपाल की मांग को लेकर गठित टीम अन्ना अंतर्विरोध की शिकार हो गई है.टीम अन्ना के अनेक सदस्यों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं.पहले पूर्व कानून मंत्री शांति भूषण पर जो सर्वोच्च न्यायालय के अधिवक्ता भी हैं,गलत ढंग से पैरवी के आरोप लगे,फिर प्रशांत भूषण पर जम्मू कश्मीर पर विवादित बयान का मामला सामने आया,फिर अरविन्द केजरीवाल पर आयकर विभाग के बकाये का मुद्दा गर्माता रहा और पूर्व पुलिस अधिकारी किरण बेदी पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे.

पहले आयोजकों से ज्यादा हवाई किराया वसूल करने,जिसकी भरपाई उन्होंने रकम वापस करके,करने की कोशिश की और हालिया पुलिस विभाग की विधवाओं एवं बच्चों के लिए मुफ्त कम्पूटर प्रशिक्षण के नाम पर माइक्रोसौफ्ट से करोड़ों की राशि ले लेने और प्रशिक्षण के नाम पर छात्रों से प्रशिक्षण शुल्क वसूलने का मामला गरमा रहा है और न्यायालय के आदेश पर प्राथमिकी भी दर्ज हो चुकी है.इस प्राथमिकी के दर्ज होने पर किरण बेदी की टिप्पणी थी कि उन्हें इस तरह की प्राथमिकी से निपटने का तरीका आता है. बेशक ! वे पूर्व पुलिस अधिकारी जो रह चुकी हैं.कुछ ज्ञान आम लोगों को भी दे देती तो लोगों का कल्याण हो जाता.कुमार  विश्वास  पर भी अपने नियोक्ता कौलेज पर लम्बे समय से गायब रहने का आरोप लग रहा है.

ऐसा क्यों है.जो भी व्यक्ति पद प्रतिष्ठा प्राप्त कर लेता है,मीडिया में सुर्खियाँ बटोर लेता है,अपने आपको देश से,कानून से ऊपर समझने लगता है.

अन्ना के अनशन के दौरान भी इस तरह की बातें होती  रही हैं.मंचीय भाषण में भी टीम अन्ना के कई सदस्यों ने एक सुर से टीम अन्ना को संसद से ऊपर बताया.इस तरह की अराजक प्रवृत्ति निश्चय ही निंदनीय है.भ्रष्टाचार को समाप्त करने के नाम पर कोई समिति अराजक कैसे हो सकती है.अपने को संसद और कानून से सर्वोच्च बताने वाले इन लोगों को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि वे पूर्व में भारतीय संविधान और कानून में आस्था प्रकट कर सरकारी सेवा कर चुके हैं.

अन्ना की जुबान भी असमय फिसलती रही है.शरद पवार के थप्पड़ प्रकरण पर उनका बयान देख लीजिये. किरण बेदी पर पूर्व में भी कई आरोप लगते रहे हैं.जाहिर है उनमें सच्चाई भी होगी.मिजोरम में पदस्थापन के दौरान अपनी बेटी का मेडिकल में मिजोरम के कोटे से नामांकन कराकर एम्स में ट्रान्सफर कराना,पूर्णतः अवैध था जिस पर सरकार ने भी ऑंखें मूंद ली थी.फिर बिना सूचना के मिजोरम छोड़ कर गायब हो गयी थीं जिस पर काफी बावेला मचा था.एक पूर्व पुलिस अधिकारी जिन्होंने तिहाड़ जेल में पदस्थापन के दौरान जेल सुधार पर काफी काम किया था और मैग्सेसे पुरस्कार की विजेता भी रही हैं,इस देश के कानून के खिलाफ काम करने का अधिकार नहीं प्राप्त हो जाता.

पद और प्रतिष्ठा प्राप्त करते ही व्यक्ति अराजक क्यों हो जाता है इसके लिए विस्तृत समाजशास्त्रीय अध्ययन की आवश्यकता है.जरा अपने आस-पास नजर दौड़ाइये.अपने क्षेत्र के विधायक और सांसद को देख लीजीए.समझ में आ जाएगा.इन्हीं की देखा देखी आजकल जिला परिषद् के अध्यक्ष,सदस्य,ग्राम पंचायत के मुखिया,सरपंच आदि करने लगे हैं. 

भ्रष्टाचार के विरोध के कारण टीम अन्ना को आम जनता से जो जनसमर्थन मिला है वह सरकार के नकारात्मक रुख के कारण ही है.

ऐसा न हो कि अपने ही अंतर्विरोधों से ग्रस्त एक सफल मुहिम असमय ही काल कवलित हो जाय.    

Saturday, October 29, 2011

चिट्ठी न कोई सन्देश

'चिट्ठी न कोई सन्देश......'
दिवंगत जगजीत सिंह की यह चर्चित गज़ल आज के सन्दर्भ में भी मौजूं है.

क्या आपको याद है कि आपने आखिरी बार कब कोई चिट्ठी लिखी थी? नहीं! न. शायद याद होगी भी नहीं.
अब चिट्ठी,पत्री या डाकिया घर पर नहीं आता.लोग चिट्ठी,पत्री के महत्व को भूलने लगे हैं.और बदलने लगे हैं वो मुहावरे जो चिट्ठी,पत्री के सम्बन्ध में ही गढ़े गए थे.जैसे 'ख़त का मजमून भांप लेते हैं लिफाफा देख कर '.

रंग बिरंगे लिफाफे अलग-अलग पत्रों की श्रेणी को दर्शाते थे.गुलाबी लिफाफे को देखकर लोग सहज ही उस पत्र के महत्व को समझ जाते थे.लेकिन आज के इन्टरनेट और मोबाइल के युग में लोग चिट्ठी,पत्री लिखने जैसे वाहियात काम को दूर से ही  नमस्कार करते हैं.

हर हाथ में मोबाइल ने जिस सन्देश भेजने वाली भाषा 'हिंगलिश' को जन्म दे दिया है वह शायद ही सभी लोगों को समझ में आये.अब तो डाकिये सिर्फ पत्रिकाओं या 'सूचना के अधिकार' वाले लिफाफे लेकर आते हैं,जिसे पढ़ने से शायद ही पाने वाले को ख़ुशी होती हो.चिट्ठी लिखने वालों की भावनाओं को चिट्ठी पढ़नेवाला ही समझ सकता है.

चिठ्ठी -पत्री के महत्व को समझते हुए हिंदी सिनेमा के कई गीतकारों ने अच्छे -अच्छे गीतों की रचना की.मसलन,'लिखे जो ख़त तुझे,'फूल तुम्हें भेजा है ख़त में',फिल्म बॉर्डर का चर्चित गाना 'सन्देशे आते हैं ','नाम' में पंकज उधास का मशहूर गाना 'चिट्ठी आई है ' को कौन भूल सकता है. 

चिट्ठी,पत्री के साथ जो मनोभाव,भावना,आवेग जुड़े होते हैं वह इलेक्ट्रोनिक सन्देश में कहाँ मिल सकता है.चिट्ठी,पत्री की लिखावट को  देखकर उस व्यक्ति की मनोदशा का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता था.पर आजकल की भाग दौड़ भरी जिंदगी में लोगों के पास वक़्त कहाँ जो कागज के चंद टुकड़ों पर अपने दिल का हाल खोल कर रख सके.वह दिन दूर नहीं जब आने वाली पीढ़ी चिट्ठी,पत्री को हैरत से देखा करेगी कि पहले ज़माने के लोग कागज के टुकड़ों पर सन्देश भेजा करते थे.

Thursday, September 8, 2011

ख़ामोश ! अन्नागिरी जारी है

अन्ना का अनशन तो समाप्त हो गया.इसमे जीत किसकी हुई,कहा नहीं जा सकता.जन लोकपाल बिल को संसद के इसी सत्र में पास करने की मांग अंततः संसद से तीन मांगों के प्रस्ताव को पारित कराने पर आ टिकी.इसमे भी सत्ता पक्ष और विपक्ष की  नौटंकी साफ़ नजर आई.कई तरह की अड़ंगेबाजी के बाद प्रस्ताव पारित होकर स्टैंडिंग कमिटी को भेजने की बात कही गई.वहां यह प्रस्ताव क्या रूप लेती है,कहना कठिन है क्योंकि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सभी दल एक ही थैली के चट्टे बट्टे नजर आते हैं.
           
अन्ना के बारह दिनों के अनशन ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं.कई चेहरे बेनकाब हुए तो कई चेहरे पर नकाब डाले घूमते फिर रहे थे.सत्ताधारी दल के एक प्रवक्ता जिस नाटकीय भाव भंगिमा के साथ आरोप लगते नजर आए,बाद में वे खुद को अफ़सोस जताते नजर आए. आयोजकों में भी  गंभीरता कमी थी. पूर्व पुलिस आयुक्त जिस तरह रामलीला मैदान के मंच पर अभिनय करती नजर आई उससे लगा कि वे टी.वी एंकरिंग के हैंग ओवर से बहार नहीं निकल पाई हैं.अभिनेता ओम पुरी तो किसी फिल्म के संवाद ही पढ़ते नजर आए.इन लोगों पर संसद की अवमानना का मामला लम्बा खिंचने की आशंका है.वैसे संसद सदस्य संसद में जिस तरह का आचरण करते हैं वह संसद की महिमा बढ़ाने वाला नहीं है.माईक तोड़ना,कुर्सियां फेंकना,हाथा पाई,गाली-गलौज आदि दृश्य तो अब आम हो चले हैं. पत्नी के नाम पर दूसरी स्त्री के साथ हवाई यात्रा करना,पैसे लेकर सवाल पूछना,हत्या जैसे जघन्य अपराधों में लिप्त रहना,संसद की गरिमा बढ़ाने वाला तो कतई नहीं है.तो फिर संसद सदस्यों के भोंडी नक़ल पर इतनी हाय तौबा क्यों.
       
अन्ना का अनशन तो पूर्व निर्धारित था.जिस तरह सरकार ने इस मसले को हैंडिल किया वह अफसोसनाक था.भ्रष्टाचार के विरुद्ध मुहिम में जिस तरह लोगों की भीड़ रामलीला मैदान में उमड़ी,उससे तो यही साबित होता है कि लोग भ्रष्टाचार से त्रस्त हैं और इससे छुटकारा पाना चाहते हैं.सरकार के नुमाइंदों की बेशर्मी इसी से पता चलती है कि एक तरफ तो अन्ना बारह दिनों से अनशन पर थे तो दूसरी और सर्वदलीय बैठक के नाम पर सत्ता और विपक्ष के प्रतिनिधि स्नैक्स टूंगते नजर आए.
        
इस आन्दोलन में जिस तरह समाज के सभी तबकों की भागीदारी रही,वह भी चौंकाने वाला  रहा. खाते,पीते,अघाए युवा पीढ़ी का व्यापक समर्थन तो और भी जोशीला रहा.वह वर्ग जो आजादी के कई दशकों बाद पैदा हुई और जिसने आजादी के आन्दोलन को न तो देखा और न ही महसूस किया, उसके लिए तो यह अवसर मानो भाग्य से प्राप्त हो गया.हिंदुस्तान की बुढाती नेतृत्व के सामने यही युवा वर्ग अन्ना के आन्दोलन में जोश भरते नजर आए.राजधानी दिल्ली के अभिजात स्कूल,कॉलेजों के छात्र,छात्राएं भी इस आन्दोलन में शिरकत करते नजर आए.इस आन्दोलन की गूंज राजधानी दिल्ली से लेकर देश के गावों,कस्बों तक सुनाई पड़ी.
       
पिछले कई घोटालों,घपलों से घिरी केंद्र सरकार की इस मामले पर हठधर्मिता और अधकचरा होमवर्क भी साफ़ नजर आया.रामलीला मैदान की पिछली गलती से सबक लेते हुए सरकार ने जिस तरह अपने कदम पीछे  किये,उसके बाद तो गिरफ्तारी से लेकर रिहाई,फिर अनशन तक अन्ना और उनके समर्थकों की चली.यह वाकई चिंताजनक स्थिति है कि भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए सरकार के पास कोई स्पष्ट और कारगर नीति नहीं है.नहीं तो आदर्श सोसायटी घोटाले,कॉमनवेल्थ,2G,3G एवम अन्य घोटालों की बाढ़ नहीं आती.अन्ना ने तो जनता की नब्ज पर हाथ रखी और जनता उनके पीछे-पीछे चली आई.यह तो आने वाले समय में पता चलेगा कि लोकपाल बिल क्या आकार लेती है पर इसके प्रभावों से  केंद्र सरकार अछूती नहीं रह सकेगी. 

Thursday, September 1, 2011

लुगदी साहित्य से साहित्य तक

साहित्य पढ़ने की शुरुआत लुगदी साहित्य से ही हुई,जैसा कि आमतौर पर सभी व्यक्ति करते हैं.उन दिनों जासूसी उपन्यासों की खूब लोकप्रियता थी.मेरठ से छपने वाले जासूसी उपन्यास ,जिसे साहित्यकार लुगदी साहित्य कहते हैं,बहुतायत में थे.कर्नल रंजीत,सुरेन्द्र मोहन पाठक,वेद प्रकाश शर्मा आदि के उपन्यास खूब पसंद किये जाते थे.

फिर एक दिन शिवानी के उपन्यास 'चौदह फेरे' पढ़ने का अवसर मिला.शुरू में तो उपन्यास की भाषा कुछ क्लिष्ट लगी पर एक बार पढ़ना शुरू किया तो उसमे डूब सा गया.उसके बाद उनके उपन्यासों को कई कई बार पढ़ा.उनकी संस्कृत और बंगला मिश्रित भाषा लेखनी में कई जगह दिखाई पड़ते हैं तो गाँव,समाज में प्रचलित परम्पराएँ,बोल-चाल अक्सर दिखाई देते हैं.चौदह फेरे में पहाड़ की प्रचलित भाषा में बड़े,बुजुर्गों के लिए 'ज्यू' शब्द का प्रयोग रोचक  है.

'चौदह फेरे' धारावाहिक के रूप में 'धर्मयुग' में भी छपा था.चौदह फेरे लेनेवाली कर्नल पिता की पुत्री अहल्या जन्म लेती है अल्मोड़े में, शिक्षा पाती है ऊटी के कान्वेन्ट में, और रहती है पिता की मुँहलगी मल्लिका की छाया में. और एक दिन निर्वासित, हिमालय में तपस्यारत माता के प्रबल संस्कारों से बँध सहसा ही विवाह के दो दिन पूर्व वह भाग जाती है, कुमाऊँ अंचल में.


समूचा उपन्यास विविध प्राणवान् चरित्रों, समाज, स्थान तथा परिस्थितियों के बदलते हुए जीवन मूल्यों के बीच से गुजरता है.
          
अस्सी के दशक में 'सुरंगमा' धारावाहिक के रूप में 'साप्ताहिक हिंदुस्तान' में छपा था.हम पत्रिका के आगामी अंक की उत्सुकता से प्रतीक्षा करते ताकि आगे की कहानी जान सकें.सुरंगमा में बांगला के प्रसिद्ध कवि बुद्धदेव बसु की कविता का प्रयोग दिल को छू लेने वाला है.......                                                                      

                                                          
                                                          
                                                          छोट्टो घर खानी
                                                          
मने की पड़े सुरंगमा ?
                                                         
मने की पड़े, मने की पड़े
                                                         
जानालाय नील आकाश झरे
                                                         
सारा दिन रात हावाय झड़े

                                                           सागर दोला....
                                             
                                              (उस छोटे से कमरे की याद है सुरंगमा ?
                                           
बोलो, क्या अब कभी उस कमरे की याद आती है ?
                                           
जहाँ कि खिड़की से नीलाकाश
                                           
बरसता कमरे में रेंग आता था
                                           
सारे दिन-रात तूफान
                                           
समुद्र झकझोर जाता था)

एक प्राणों से प्रिय व्यक्ति तीन-चार मधुर पंक्तियों से सुरंगमा के जीवन को झंझा के वेग से हिलाकर रख देता है. बार बार.

शराबी, उन्मादी पति से छूट भागी लक्ष्मी को जीवनदाता मिला अँधेरे भरे रेलवे स्टेशन में. रॉबर्ट और वैरोनिका के स्नेहसिक्त स्पर्श में पनपने लगी थी उसकी नवजात बेटी सुरंगमा, लेकिन तभी विधि के विधान ने दुर्भाग्य का भूकम्पी झटका दिया और उस मलबे से निकली सरल निर्दोष पाँच साल की सुरंगमा कुछ ही महीनों में संसारी पुरखिन बन गई थी फिर शिक्षिका सुरंगमा के जीवन में अंधड़ की तरह घुसता है एक राजनेता और सुरंगमा उसकी प्रतिरक्षिता बन बैठती है.

एक एकाकी युवती की आंतरिक और बाहरी संघर्षों की मार्मिक कथा है 'सुरंगमा'.
शिवानी के कई उपन्यासों और कहानियों को पढ़ा है.'कैंजा','श्मशान चंपा','कृष्ण कली','भैरवी' आदि अनेक उपन्यास सीधे दिल को छू लेते हैं.    

Monday, August 8, 2011

बजरंग बली उर्फ़ .........

कॉलेज के एक कर्मचारी वाजपेयी ने पिछले दिनों एक बड़ी मार्के की बात कह दी.कहा ,जानते हैं सर ,बजरंग बली को हमलोग 'भूमि अतिक्रमण पदाधिकारी ' कहते हैं.बात सही भी है.जिस जगह बजरंग बली की मूर्ति स्थापित कर दी,मजाल है कि कोई वहां से हिला दें. पवन पुत्र वैसे भी इतने बलशाली हैं कि साधारण मनुष्यों के वश की बात नहीं.राह चलते चौक-चौराहे ,नुक्कड़,गली सभी जगहों पर आपको बजरंग बली मिल जायेंगे.भले ही इससे रास्ता संकरा होता हो,यातायात की समस्या उत्पन्न होती हो,होती रहे.बजरंग बली तो जहाँ जम गए वहीँ के होके रह गए.भक्तों ने भी इसी भावना से प्रेरित होकर थोड़ी जगह घेर ली तो क्या बुरा किया.लोग तो आजकल सरकारी  जमीन तक को घेर कर बेच देते हैं और सरकार को पता तक नहीं चलता.सो बजरंग बली अब यदि भूमि अतिक्रमण पदाधिकारी बन गए हों तो क्या अचरज.
               व्यक्ति कभी कभी हास-परिहास में भी बड़े मार्के की बात कह जाता है.अब यदि वाजपेयी ने बजरंग बली को 'भूमि अतिक्रमण पदाधिकारी' की संज्ञा दी है तो कुछ तो बात अवश्य होगी. वैसे वाजपेयी बजरंग बली के बड़े भक्त हैं.बजरंग बली के मंदिर आपको हर जगह मिल जायेंगे.खासकर भारत के हर पुलिस थाने में आपको बजरंग बली के मंदिर जरूर मिलेंगे.पुलिस वाले तो बजरंग बली के भरोसे ही अपनी और लोगों की सुरक्षा का भार लिए रहते हैं.लोगों ने तो बात यहाँ तक उड़ाई थी कि अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा भी बजरंग बली के बड़े भक्त हैं और यह भी कि उनका पूर्व जन्म भारत में हुआ था.
             आजकल तो महिलाएं भी पवनपुत्र की बड़ी भक्त हैं.किसी भी बजरंग बली के मंदिर में चले जाइये ,वहां पर आपको पुरुषों से ज्यादा स्त्रियों की संख्या मिलेगी.वैसे स्त्रियाँ बजरंग बली से क्या आशिर्वाद मांगती होंगी यह कयास लगाना मुश्किल नहीं.अपने यहाँ वैसे भी मंदिर और मठों की संख्या बहुत है.आजकल तो मंदिर किसी  कार्पोरेट घराने से कम नहीं हैं.पटना का विशालकाय महावीर मंदिर लोगों के आकर्षण का केंद्र है.कई जगहों पर बजरंग बली के भव्य मंदिर हैं.शायद इसी भव्यता से प्रेरित होकर बजरंग बली को भूमि  अतिक्रमण पदाधिकारी कह दिया गया होगा.

Tuesday, August 2, 2011

रियल्टी शो : आधी हकीकत आधा फ़साना

आजकल विभिन्न टीवी चैनलों पर रियल्टी शो की भरमार है.इनमें कितने शो रियल्टी हैं,कितने बनावटी दर्शकों को अंदाज लगाना मुश्किल नहीं.रियल्टी शो के नाम पर दर्शकों के सामने जो कुछ भी परोसा जा रहा है,वह कितने वास्तविक हैं,यह तो चैनल वाले ही बता सकते हैं.स्टूडियो में रिकॉर्ड होना(शूट करना),फिर एडिटिंग ,तब प्रसारित होना, ये किसी भी शो के सामान्य प्रक्रिया के अंग हैं.
        अब जरा विभिन्न रियल्टी शो पर एक नजर डालें.संगीत के रियल्टी शो विभिन्न चैनलों पर आते रहे हैं.जी टीवी पर 'सा रे गा मा पा' एवं 'लिटिल चैम्प्स' तकरीबन हर साल प्रसारित होते रहते हैं.इन शो के विजयी कलाकार आज कहाँ हैं,क्या कर रहें हैं,कोई नहीं जानता.जब तक शो चलता है तब तक तो वे चर्चा के केंद्र में रहते हैं,उसके बाद गायब.
'सा रे गा मा पा' को जीतने वालों की लम्बी फेहरिस्त है.देबोजीत,अनीक धर,कमल खान आदि गायक आज क्या कर रहे हैं किसी को नहीं पता.इसी तरह 'लिटिल चैम्प्स' को जीतने वाले कलाकारों की अब कोई चर्चा नहीं होती.
इसी तरह सोनी टीवी के 'इंडियन आइडल' को जीतने वाले कलाकारों में काजी तौकीर से लेकर गत वर्ष की विजेता सौरभी देव बर्मन की अब कोई चर्चा नहीं होती.इसके पिछले वर्ष कोलकाता के पुलिस विभाग के बैंड में काम करने वाले प्रशांत तमांग विजयी रहे थे.इनका नाम तक लोगों को पता  नहीं.स्टार प्लस टी.वी चैनल के 'वोईस ऑफ़ इंडिया' के विजेता रवि शुक्ला की भी अब चर्चा नहीं होती.
   इमेजिन के 'राखी का स्वयंवर' का हश्र लोग देख चुके हैं.यही हाल अभी अभी समाप्त 'रतन का रिश्ता' का भी है.
  पब्लिसिटी के लिए कलाकार ऐसे रियल्टी शो में भाग लेते हैं.
  वास्तव में इन रियल्टी शो से किसी कलाकार का भला नहीं होता. इन रियल्टी शो से चैनल वालों और मोबाइल कम्पनियों की भारी कमाई होती है. इसी में से कुछ हिस्सा कार्यक्रम और कलाकारों पर खर्च कर ईनाम की राशि दे दी जाती है.बौलीवुड में स्थापित कलाकारों की(गायक/गायिकाओं) लम्बी फौज है.हर संगीत निर्देशक के पसंदीदा गायक व गायिकाएं हैं,वे उन्ही से गाना गवाते हैं.नए कलाकारों की गुन्जाईश कम ही बनती है.एक्का दुक्का गाना, शो जीतकर आने वाले कलाकारों को मिल जाता है.स्टेज शो में भी इनकी कुछ खास पूछ नहीं होती.
बड़े और स्थापित कलाकारों को ही स्टेज शो मिलता है.
   इसी तरह डांस के विभिन्न शो जीतकर आने वाले कलाकारों को भी आगे प्रदर्शन का कोई मौका नहीं मिलता और न ही फिल्मों में उनके लिए कोई गुन्जाईश होती है.सभी हीरो आजकल स्वयं ही अच्छे डांस करते नजर आते  हैं. सो रियल्टी शो के नाम पर दर्शकों को बेवकूफ बनाने का सिलसिला जारी है.    

Wednesday, July 20, 2011

बदलता सिनेमा,बदलते लोग


फ़िल्में समाज का आईना(दर्पण) होती हैं ,ऐसा मानने वालों की कोई कमी नहीं है. इसकी वजहें भी हैं.प्रख्यात
फिल्मकारों ने शुरुआत से ही अपनी फिल्मों का ताना-बाना इस तरह बुना कि उनमे समाज की किसी न किसी  सामाजिक समस्या को स्पष्ट रूप रेखांकित किया जा सकता था.

विधवा पुनर्विवाह,अछूत,दहेज़,स्त्रियों की समस्याओं ,बेटे-बेटी में भेदभाव,डाकुओं की समस्याओं को लेकर कई फ़िल्में बनाई गई, जिसे लोगों ने काफी पसंद भी किया.वी.शांताराम,विमल रॉय इनके अगुआ थे.उनकी फिल्मों में साफ़ सन्देश दिखाई देता था.वी.शांताराम की 'दो आँखे बारह हाथ ' खुले बंदीगृह की समस्या से संबंधित थी.इस तरह का कंसेप्ट उस समय नया था.इसके अलावा इसी फिल्म में नायिका संध्या द्वारा ड्रम की तरह बजने वाली जिस छोटी सी गाड़ी का प्रयोग किया गया था,वह अनूठा था. इस तरह की बजने वाली गाड़ी ग्रामीण क्षेत्रों के मेलों में खूब बिकती थी. पर अब तो वह प्रतीक भर रह गए हैं.इसी तरह के अन्य खिलौने अब ग्रामीण क्षेत्रों में भी नहीं मिलते. अब तरह तरह की बंदूकें,मोबाइल की तरह खिलौने आदि मिलते हैं.
                
कच्चे बांसों से बनाई गई बांसुरी,बड़े डंडों में चिपका कर रंग बिरंगी लाई ,हवा मिठाई बेचने वाले अब नहीं आते.लेकिन चाट और फास्ट फ़ूड बेचने वाले जरुर दिखाई देते हैं.पुरानी फिल्मों में इन प्रतीकों का भरपूर इस्तेमाल हुआ है.आजकल बनने वाली फ़िल्में गाली गलौज से भरी,बेतुके संवाद और बेतुकी कहानी से होती हैं.यह सही हैकि उत्तर प्रदेश और बिहार के ग्रामीण अंचलों में आज भी कई व्यक्ति बातचीत की शुरुआत ही गाली से करते हैं,लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि फिल्मों में भी इसी तरह के दृश्य उत्पन्न किये जाएँ.

फिल्मों का दायरा व्यापक होता है और इसका असर भी लोगों पर पड़ता है.ताजातरीन उदाहरण आमिर खान निर्मित फिल्म 'डेल्ही बेली' का है जिसमे गालियों का भरपूर इस्तेमाल हुआ है.लगान,तारे जमीं पर,रंग दे वसंती,थ्री इडियट्स जैसी फिल्मों के माध्यम से आमिर खान ने फिल्म विषयों को एक विस्तृत आयाम प्रदान किया.इन फिल्मों के विषयों की पृष्ठभूमि में वे समस्याएँ थी जिनसे हम अक्सर दो चार होते हैं,परन्तु निजी जीवन की व्यस्तताओं और  आवश्यकतापूर्ति की जद्दोजहद में इनकी अवहेलना कर जाते हैं.लेकिन इस क्रम में डेल्ही बेली का निर्माण समझ से परे है.यह फिल्म क्या सन्देश देना चाहती है या इसमें प्रस्तुत भाषा समाज के किस वर्ग की दिनचर्या के अनिवार्य अंग के रूप में भेंट करना चाहते हैं?
           
फिल्म निर्देशन एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है.फिल्म निर्माता,निर्देशक,लेखक आदि समाज को दिशा प्रदान करते हैं.यह दिशा प्रभावोत्पादक एवं सकारात्मक परिणाम प्रस्तुत करने में समर्थ हो,यह संकल्प लिया जाना आवश्यक है.निर्माता,निर्देशक यह कहकर नहीं बच सकते कि लोग जो देखना चाहते हैं वही दिखाते हैं.


यह सही है कि लोगों की सोच बदल चुकी है और लोग अब भी फिल्मों को मनोरंजन का ही साधन मानते हैं,पर ऐसी फिल्मों को बनाने का कोई तुक नहीं जिसे लोग अपने परिवार के सदस्यों के साथ बैठकर नहीं देख सकें.मल्टीप्लेक्स को ध्यान में रखकर बनाई गई फ़िल्में इसी कोटि की होती हैं.लेकिन अपने देश के कितने शहरों में मल्टीप्लेक्स हैं.अधिकांशतः एकल सिनेमाघरों में दिखाई जाती हैं.सो इस तरह की बहानेबाजी से नहीं बचा जा सकता.
  
(दैनिक जागरण एवं हरिभूमि में प्रकाशित)

Friday, July 15, 2011

स्मृति के दंश

कहते हैं कि बचपन की यादें जाती नहीं हैं.आज भी कभी बचपन की यादों को कुरेदने की कोशिश करता हूँ तो स्मृतिपटल पर एक के बाद एक कई यादों के दरवाजे खुलते चले जाते हैं.
१९७३-७६ में हमलोग बिहार के समस्तीपुर जिले के सिंघिया प्रखंड में रहते थे.पिताजी उस प्रखंड में प्रखंड विकास पदाधिकारी के रूप में स्थानांतरित होकर आये थे.

हम भाई बहनों का तीन साल वहीँ बीता.विकास की दृष्टि से एक दम पिछड़ा हुआ प्रखंड था.रहने के लिए जो किराये का आवास मिला था वह फूस और खपरैल का दो कमरों का छोटा सा मकान था.साल भर में छह महीने हम उस आवास में रहते और छह महीने अंग्रेजों के बनाये डाकबंगले में.वह पूरी तरह बाढ़ ग्रस्त इलाका था.बरसात आते ही बाढ़ आ जाती और हमारे कमरे में कमर भर पानी भर जाता.डाकबंगला उंचाई पर था,इस लिए बाढ़ आते ही हमलोग डाकबंगले में शिफ्ट हो जाते और छह महीने वहीँ रहते.

बाजार तक जाने के लिए नाव का सहारा लेना पड़ता.बिना नाव के आवागमन संभव नहीं था.उन दिनों पिताजी अहले सुबह नाव से बाढ़ ग्रस्त क्षेत्रों में सहायता कार्य के लिए पूरी टीम के साथ निकलते और देर रात लौटते थे.हम लोगों का स्कूल जाना बंद हो जाता.घर पर ही पढ़ाई लिखाई होती.'करेह' नदी का प्रकोप हर साल होता था.हम लोगों के मकान मालिक के पिता पूर्व के जमींदार थे.उनका बड़ा सा आवास था.
जिसमे कई हाथी,घोड़े,मोर आदि पाल रखे थे.हम उन्हें बाबा कहते.उन्हें बच्चों से बहुत लगाव था.अक्सर हम उनके आवास पहुँच जाते और कौतुहल वश उनके पालतू जानवरों को देखा करते.वे हमलोगों को अपने नाव से झिज्जिर खेलने ले जाया करते थे.

बाढ़ के दिनों में ही एक बार परीक्षा देने समस्तीपुर जाने के लिए सुबह में नाव से सफ़र कर शाम में नजदीकी स्टेशन नरहन पहुंचे,फिर वहां से ट्रेन से समस्तीपुर.सामान्य दिनों में भी आवागमन काफी कठिन था.पहले उफनाती 'करेह' नदी को एक बड़ी नाव से,जिस पर जीप चढ़ाया जाता,पार करना पड़ता था फिर आगे बूढ़ी गंडक को बड़ी नाव से जीप समेत पार करना पड़ता था.
उसके बाद कच्ची पक्की सड़कों से होते हुए जिला मुख्यालय समस्तीपुर जाना होता था.हम लोगों को पढ़ाने के दुर्गा बाबु आते थे, जिन्होंने हम रामायण और महाभारत के अनेक किस्सों को सुनकर अपना मुरीद बना लिया था.हम उत्सुकता से उनकी प्रतीक्षा करते और आते ही कोई नई कहानी सुनाने की फरमाईश कर डालते.

उन्हीं दिनों एक कविजी भी आया करते थे.धोती, कुरता पहने,उन्नत ललाट और गौर वर्ण के.बाद में पता चला कि वे कवि हैं.हम लोगों को उन्होंने कई कवितायेँ लिख कर दी थीं.उनका पूरा नाम यद् तो नहीं,पर कवि 'शंकर' था.जब भी आते एक पर्ची पर कविता कि चार लाइने लिख कर भेजते जिससे पता चल जाता कि कविजी आये हैं.एक बार उन्होंने लिखा,

                                          महानंद शीश जटा सुशोभित

                                               पतित पावनी गंगा

                                            द्वार खड़ा संकोच के मारे

                                              कवि किस्मत का नंगा.

                                            (महानंद,पिताजी का नाम)

उन्होंने हमें अपनी कविताओं कि एक पुस्तक भेंट की थी, जिसमे अपना परिचय एक कविता के रूप में दिया था.वह पुस्तक तो अब उपलब्ध नहीं है,पर उसमे प्रस्तुत उनके परिचय वाली कविता की यादें आज भी ताजा हैं.

एक बानगी देखिये............

                                                               क्या बतलाऊँ अपना परिचय

                                                                  मैं हूँ जलता अंगार एक.

                                                               मैं हूँ चिर शोषित,चिर संतापित

                                                                मुझमें न रक्त,मुझमें न मांस

                                                                चलती कराह या घुटघुट कर

                                                                 मेरे प्राणों की साँस साँस.

                                                                 जलता हाँ तिल तिल जलता हूँ

                                                                  अपनी ही अंतर्ज्वाला में

                                                                  जाने अधरों से लगा मस्त

                                                                 अमृत या कि विष प्याला में.

वर्ष १९७६ में पिताजी का ट्रांसफर उस प्रखंड से हो गया.फिर कभी वहां जाना नहीं हो सका और न ही वहां के किसी परिचित से मुलाकात ही हुई.अब तो शायद करेह नदी पर पुल भी बन गया होगा और बाढ़ से बचाव के लिए बाँध भी बन गया होगा,सड़कें भी पक्की हो गई होगी.रहने के लिए कई पक्के मकान बन गए होंगे.पर वहां बिताये बचपन के दिन आज भी नहीं भूलते.

Tuesday, July 5, 2011

'अनशन' का 'टेंशन'

आगामी १६ अगस्त से सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे फिर से अनशन पर बैठने जा रहे हैं. इससे सरकार का टेंशन फिर बढ़ गया है. लोकपाल पर संप्रग सरकार और सिविल सोसायटी के बीच दूरी बढती जा रही है.केंद्रीय मंत्रियों के बयान से लगता है कि इस बार अन्ना हजारे के अनशन पर सरकार का रुख कड़ा है. उन्हें चिंता है कि जनता ने उन्हें चुनकर भेजा है तो अन्ना हजारे एवं बाबा रामदेव जैसे कुछ लोग उन्हें कैसे चुनौती दे सकते हैं.

लगता है पिछली बार के अन्ना एवं बाबा रामदेव के अनशन का टेंशन अभी ख़त्म नहीं हुआ  है. एक अनशन तो योग गुरु बाबा रामदेव ने  भी रामलीला मैदान में किया था. इसमे सरकार की लीला से  तो बाबा का ही टेंशन बढ़ गया. बेचारे सलवार सूट में ही रातों रात अपने आश्रम पहुंचा दिए गए.
                                              
                                               सुना है कि अब महिलाओं के वस्त्र बनाने वाली एक कंपनी योग गुरु बाबा रामदेव को अपना ब्रांड अम्बेसेडर बनाने  की सोच रही है. उनके योग का ऐसा हस्र होगा ऐसा किसी ने न  सोचा था. अपने आश्रम में 'रूठे पिया' की तरह अनशन पर बैठकर किसी को टेंशन नहीं दे पाए. नौ दिनों में ही उनका टेंशन और बढ़ गया. उधर स्वामी निगमानंद तो अनशन से ही असमय काल कवलित होकर अपने गुरु और परिवार के सदस्यों को टेंशन दे गए. अब तो अन्य योग गुरुओं ने भी बाबा रामदेव को और भी योगाभ्यास की सलाह दे डाली है. देखना है कि बाबा अब कौन कौन से आसन का अभ्यास कर लोगों को सिखाते हैं.

                                             इधर मौन व्रत तोड़ते ही प्रधान मंत्री जी ने कहा है कि वे भी प्रधान मंत्री को लोकपाल के दायरे में लाना चाहते हैं.लगता है कि देश की सभी समस्याओं का समाधान लोकपाल ही है.महंगाई जैसे मुद्दे अब पीछे चले गए हैं. आम लोगों को तो यही चिंता है कि कैसे महंगाई से निजात पाया जाये. हालिया पेट्रोल,डीजल और रसोई गैस में की गई वृद्धि पर सभी चुप हैं. क्या सत्ताधारी और  क्या विरोधी दल सभी लोकपाल पर अपना अपना राग अलाप  रहें हैं.लगता है लोकपाल बिल पास होते ही महंगाई कम हो जाएगी.बेरोजगारी दूर हो जाएगी.

                                            सो लोकपाल पर सभी मुखर हैं. इधर बाबा रामदेव ने भी अन्ना को अपना समर्थन दे दिया है लेकिन अन्ना इस बार फूँक फूँक कर कदम रख रख रहे हैं. उन्हें बाबा के पिछले अनशन के टेंशन का पता है, इस लिए इस बार सशर्त समर्थन चाहते हैं. देखने वाली बात यह है कि आगामी अनशन से किसका टेंशन बढ़ता है, सरकार का, विरोधी दलों का(जिनका भ्रष्टाचार वाला मुद्दा अन्ना एवं बाबा ने हाइजैक कर लिया है)या अन्ना एवं सिविल सोसायटी का.    

Friday, July 1, 2011

सृजनशीलता बनाम शौचालय


सुना है रेलवे ने ऐसा पेंट  विकसित किया है जिसका उपयोग करने के बाद ट्रेनों में पेन या पेन्सिल से कुछ नहीं लिखा जा सकेगा.अब ट्रेन की बोगियां ऐसे पेंट से रंगी जा सकेंगी जिससे ट्रेनों में अश्लील बातें नहीं लिखी जा सकेंगी. इससे मुसाफिरों खासकर महिलाओं को असुविधाजनक स्थिति का  सामना नहीं करना पड़ेगा..प्रायः ट्रेनों के शौचालयों में ही व्यक्ति की सृजनशीलता का परिचय मिलता है.ऐसी ऐसी काव्यात्मक बातें यात्री लिख डालतें हैं कि बड़े बड़े कवि भी शरमा जाएँ.ऐसी ऐसी कलाकृति उकेर डालतें हैं कि मरहूम  हुसैन साहब भी शरमा जाएँ.

अक्सर बड़े बड़े कलाकारों,विचारकों को नया आईडिया शौचालयों  में ही मिलता है.गणितज्ञों को बड़ी बड़ी पहेली सुलझाने का फ़ॉर्मूला शौचालयों में ही मिलता है.ऐसे में यदि यात्री ट्रेनों में सफ़र के दौरान शौचालयों में अपनी सृजनशीलता का परिचय देने लगे तो क्या अचरज.ऐसे वक़्त में व्यक्ति को शील या अश्लील का होश ही कहाँ रहता है.सफ़र काटने और वक़्त बिताने का इससे अच्छा तरीका और क्या हो सकता है? महिलाओं को यदि इससे परेशानी हो तो कौन क्या कर सकता है? रेल प्रशासन चाह कर भी ऐसी कलाकृति के सृजन पर रोक नहीं लगा सकता क्योंकि कब और कौन इसे सृजित कर गया इसका पता ही नहीं चल पाता.
                
एक सुझाव रेलवे को यह भी दिया जा सकता है कि वह सभी ट्रेनों में शौचालय गार्ड की नियुक्ति करे.इससे हजारों लोगों को रोजगार भी मिल जाएगा और यात्री की सृजनशीलता भी बची रहेगी जो बाद में काम आएगी.क्या पता  इनमे से कोई दूसरा हुसैन निकल आये या मशहूर कवि ही बन जाये.
                
सो रेलवे कई उपायों को आजमा सकता है.हो तो यह भी सकता है कि इसके लिए रेलवे शौचालय गार्ड की नियुक्ति के लिए विज्ञापन निकाले जिसमे स्थानीय युवको को ही प्राथमिकता दे ताकि दूसरे राज्यों में जाकर पिटना नहीं  पड़े.रेलवे चाहे तो इसकी आउटसोर्सिंग भी करवा सकता है,जिससे उसे नियुक्ति का झमेला न सहना पड़े और काम भी हो जाये.इसके लिए रेलवे  शौचालय उपयोग शुल्क भी लगा सकता है,सुलभ शौचालय की तरह.इससे रेलवे की आमदनी भी बढ़ेगी और घाटा पूरा करने में थोड़ी मदद भी.इससे आगामी यात्री किराये में वृद्धि कुछ दिनों के लिए और स्थगित हो सकती है.
                 
विचार और सुझाव तो कई हैं,पर जब तक रेलवे इसे नहीं अपनाता तब तक सफ़र के दौरान ट्रेनों के शौचालयों में व्यक्ति की सृजनशीलता और कल्पनाशीलता को झेलते रहिये.
             

Thursday, June 23, 2011

And How Many Nigmanand ?

The sad demise of Swami Nigmanand at the end of a prolonged fast protesting against mining on the Ganga river bed and its surroundings,raises so may questions.The role of Media along with the Government in this matter is also in question.The Media never highlighted the noble cause for which a 36 years old Sant had to sit for a prolonged fast unto death.
                        When it comes to protests,those by genuine people for genuine causes get ignored and the fakes and hi fi Swamis and Babas  get all the attention.Swami Nigmanand was a true saint.He adopted the Gandhian way of protest and never sought publicity for his noble cause ,was just and his method,most peaceful.And obviously everyone chose to ignore it till the end.

Sunday, June 19, 2011

भगवान कितने धनवान

सोचता हूँ भगवान को भी धन,संपत्ति की आवश्यकता होती है.यदि नहीं होती तो उनके पास इतनी अकूत धन,सम्पदा कहाँ से आती है.हो सकता है भक्तों ने दान में दिया हो.हमारे देश में दान और पुण्य की बड़ी महिमा है.
सभी प्राचीन धर्म ग्रन्थ और पुराण,वेद, उपनिषद इसके उदहारण से भरे पड़े हैं.कहते है राजा बालि ने वामन रूपधारी भगवान विष्णु को अपना राज्य दान में दिया था और वह भी कम पड़ा तो अपना शरीर ही दे दिया.ऐसे में भगवान और भक्तों के बीच दान का आदान प्रदान तो चलता ही रहता  है.भक्त इसी आशा में दान करता है की वह इससे दस गुना ज्यादा भगवान से मांग लेगा.सो भगवान और भक्त के बीच का सम्बन्ध मांग और पूर्ति का भी हो जाता है.अब यदि भगवान के पास धन नहीं हो तो वह भक्तों को क्या देंगे. आजकल तो  लोग भगवान को भी चूना लगा देते हैं.जो चेक भगवान को देते हैं वह बाउंस कर जाता है और भगवान इसकी शिकायत भी नहीं कर सकते.आभूषण,जेवरात भी अब भक्त नकली ही दे देते हैं. भगवान भी 'जग की यही रीत 'समझ कर चुप्पी साध लेते हैं.
 

Sunday, June 12, 2011

Swamis and Babas

Few years ago it was said "India is land of villages." But right now it must be correct to say that "India is
land of Swamis and Babas".And one of them is Swami Ramdev.He puts himself as a YOG Guru.But the kind of exercises he does in his shivirs is really a YOG? Actullay YOG is a personal activity and feeling & not with the mass people.The credit to spread YOG belongs to him but his other activities like selling Aurvedic medicines costlier than others making huge amount of money and property of tousands of crores tells the rest.There are so many Yog sadhaks in India who does his work silently.Founder of Rikhia Ashram,Deoghar and Yoga School of Munger Brahmlin Swami Swaroopanand Sraswati stands high among them.