Thursday, July 31, 2014

अंखियां च तू वसदा

कोई मीठी सी धुन,कोई दिल को छू लेने वाला संगीत,कोई कथानक कब दिल के किसी कोने में बस जाता है,पता नहीं चलता.हमारे मस्तिष्क के असंख्य कोशों में न जाने कितनी यादें छुपी रहती हैं.यदा-कदा इन्हीं स्मृति कोशों से झांकती पुरानी यादें टीस भी दे जाती हैं तो सुखद अहसास भी करा जाती हैं.

शायद 80 के दशक में पहली बार दूरदर्शन पर यह मीठी सी आवाज सुनी थी......

मेरी जां दुखां नी घेरी वे

सुरिंदर कौर जी का यह पहला नज्म ही दिल के किसी कोने में बस गया था. रफ्ता-रफ्ता उनकी अन्य नज्मों से वाकिफ होता गया और कब इन नज्मों ने दिल को छू लिया पता ही नहीं चला.
उनकी एक अन्य नज्म मुझे बहुत पसंद थी,जो शिव कुमार बटालवी ने लिखी थी.....

इन्ना अंखियां च पावन किवे कजला वे
अंखियां च तू वसदा ......
(मैं अपनी आँखों में सुरमा कैसे लगाऊं
मेरी आँखों में तो तुम बसे हो.......)

जदों हसदी, भुलेखा मैनू पैंदा वे
हसेया च तू हसदा ....
(जब मैं हंसती हूं तो भ्रम में पड़ जाती हूँ
मुझे अहसास होता है कि मेरे साथ तुम भी हंस रहे हो....)

इन नज्मों को सुने अरसा हो गया था और शायद विस्मृत भी कर गया था.पिछले दिनों तेज ज्वर में सर दर्द के कारण दो रात सो नहीं पाया.मस्तिष्क में कई विचार आ जा रहे थे.किसी नज्म की कोई अधूरी पंक्तियाँ,कुछ अरसा पहले पढ़ी मजाज लखनवी की छोटी बहन हमीदा सालिम की मजाज पर लिखी आत्मकथात्मक उपन्यास ‘मेरे जग्गन भैया’ का कथानक,शिवानी के चौदह फेरे के पात्र ‘कर्नल पांडे’ का रोबीला व्यक्तित्व सभी आपस में एकाकार हो रहे थे.

ऐसा कई बार हुआ है जब तेज ज्वर में अनिद्रा की स्थिति में बिस्तर पर पड़े हुए कोई नया विचार,कोई कथानक या कोई पंक्तियाँ सूझी हों और तुरत लिख न पाने के कारण अगली सुबह कुछ याद ही न रहा हो.

तेज ज्वर की यह दूसरी रात है,सर दर्द से बैचेनी के कारण बिस्तर पर उठ बैठता हूँ.पास ही पड़े लैपटॉप उठाकर मस्तिष्क में आ जा रहे विचारों को संग्रहित करने का प्रयास करता हूँ.नींद से बोझिल पलकों को खोलने का असफल प्रयास करते हुए कीबोर्ड पर अँगुलियों की रफ़्तार तेज हो जाती है.

कितनी देर बीत चुकी है,पता नहीं.दर्द की एक आब सिर के एक ओर से गुजर जाती है.कीबोर्ड पर अँगुलियों की पकड़ कमजोर होती जा रही है.पूरी शक्ति से एक बार स्क्रीन पर आँखें गड़ाए रखने की असफल कोशिश करता हूँ,पर सफ़ेद काले हर्फ़ के सिवा कुछ नहीं दिखता.

नींद अब अपने आगोश में लेने को ही है कि दूर कहीं मंदिर की घंटियों की आवाज गूंजती है और वही मीठी सी सुर लहरी एक बार फिर सुनाई देती है........
मेरी जां दुखां नी घेरी वे.......

Monday, July 28, 2014

क्रूस के अनसुलझे सवाल

यह एक विचारणीय प्रश्न है कि क्या सचमुच ईसा की मृत्यु क्रॉस पर हुई थी? क्रूस या सलीब उसी को कहा जाता है जो दो शहतीरों से बना होता है,लेकिन प्राचीन यूनानी इतिहास इस बात का साक्षी है कि ईसा को दो शहतीरों से बने क्रूस पर नहीं चढ़ाया गया था बल्कि एक सीधे काठ पर टांगा गया था.इस बात को ‘न्यू टेस्टामेंट’ भी प्रमाणित करता है.’

प्रेरितों के कार्य’ 5:30 और 10:39 में ईसाई धर्म की दो शाखाओं कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट में दोनों बाइबिल के अनुवादों में जो अर्थ बताया गया है,वह काष्ठ है न कि क्रूस.हिंदी में प्रकाशित ‘नया नियम’ में जिस क्रूस शब्द का प्रयोग किया गया है,उसके पृष्ठ के नीचे काष्ठ या काठ शब्द अक्षरशः अर्थ के लिए दिये गए हैं.

ईसा का प्रिय शिष्य पतरस उनके अंतिम क्षणों तक साथ था.उसने ईसा के सिद्धांतों का प्रचार किया और ईसा के काष्ठ पर चढ़ाए जाने की चर्चा भी की.यह काष्ठ एक सीधी लकीर के रूप में लम्बा होता था.यह काष्ठ शब्द ‘जाइलान’ या ‘ज्यूलोन’ शब्द का अनुवाद है.

इन शब्दों के अलावा एक और भी शब्द है ‘स्टौरोस’,जिसका अनुवाद कुछ अनुवादकों ने क्रूस के अर्थ में किया है.’द कम्पेनियन बाइबिल’ के परिशिष्ट में लिखा है कि प्राचीन यूनानी कवि होमर ने ‘स्टौरोस’ शब्द का प्रयोग साधारण डंडे के रूप में या सूली या लकड़ी के एक पृथक टुकड़े के रूप में किया है.

प्राचीन यूनानी साहित्य में ‘स्टौरोस’ शब्द का सही अर्थ किसी कोण से एक-दूसरे के ऊपर रखे हुए काष्ठ के दो शहतीरों से नहीं है,बल्कि उसका अर्थ काष्ठ का एक टुकड़ा मात्र होता है.इसलिए ईसा की मृत्यु के संबंध में ‘ज्यूलोन’ या ‘जाइलोन’ शब्द जिसका अर्थ काष्ठ होता है,का प्रयोग किया जाता है.इसलिए यह बात प्रमाणित लगती है कि ईसा को काष्ठ पर टांगकर मारा गया था,न कि काष्ठ के दो टुकड़ों पर जो किसी भी कोण से एक-दूसरे के ऊपर रखे हुए हों. इस बात के प्रमाण अनेक ग्रंथों में हैं,जिन्हें ईसाई अप्रमाणिक मानते रहे हैं.

बाइबिल का सही और सच्चा अनुवाद करने की दिशा में लोग आज भी प्रयत्नशील हैं और जिस दिन यह कार्य संपन्न होगा,सर्व-साधारण की समझ में आने लगेंगी.फिर सलीब ईसाई धर्म का पवित्र प्रतीक क्यों? काँटों का ताज क्यों नहीं?

उन दिनों रोम में सलीब पर चढ़ाए जाने वाले ख़ास व्यक्तियों के सलीब पर उनसे संबंधित दो चार शब्दों के शीर्षक भी टांगे जाते थे.ईसा के तथाकथित सलीब पर लैटिन में ‘आई.एन.आर.आई’ लिखा रहता है,जिसका पूर्ण रूप ‘आइसस नाजरेनस रेक्स आयोडयोरम’ और अंग्रेजी अनुवाद ‘जीसेस ऑफ़ नजारेथ किंग ऑफ़ द ज्यूस’ अर्थात ‘नासेरस का ईसा यहूदियों का राजा’ है.इसे रोमन राज्यपाल पिलातुस ने लैटिन के अतिरिक्त यूनानी और यहूदी  भाषा में लिखा था.

ईसा को शायद आभास भी नहीं रहा होगा कि उनकी मृत्यु के बाद उस ‘खूनी सलीब’ को,जिस पर उन्हें लटकाया जाएगा,उनके द्वारा रोपित ईसाई धर्म का पवित्र प्रतीक मान लिया जाएगा.इस बात पर विचार किया जाना जरूरी है कि वह कौन सा सलीब था,जिस पर ईसा को लटकाया गया था.

अगर ईसा को सचमुच सलीब पर लटकाया गया था तो अहिंसा के पुजारी ईसा द्वारा चलाए गए अहिंसक धर्म ईसाई धर्म का पवित्र चिन्ह ‘खूनी सलीब’,जिसके नाम में ही हिंसा है,पवित्र प्रतीक चिन्ह क्योंकर माना गया?

Monday, July 21, 2014

प्रतीक चिन्ह कितने पवित्र


विभिन्न समाजों में हिंसा के कई अस्त्र-शस्त्र आज पवित्र प्रतीक माने जाते हैं.त्रिशूल,तलवार,धनुष-वाण,चक्र आदि की पूजा वैदिक काल से ही भारत में होती आ रही है.शायद इसका संबंध शक्ति प्रदर्शन,रक्षा आदि से भी रहा हो.सलीब भी ईसाई धर्म का एक पवित्र प्रतीक है. कई ईसाई परिवारों में,विशेषकर रोमन कैथोलिकों में क्रॉस को एक जंजीर में डालकर लॉकेट के रूप में पहनने की प्रथा है.

आम तौर पर इस बात पर सवाल उठता रहा है कि जिस खूनी सलीब पर ईसा को चढ़ाया गया,उसी सलीब को ईसाई धर्म की पवित्रता का प्रतीक बनाकर उसे पूजा के स्थान पर क्यों रख दिया गया?

डब्ल्यू. ई. वाइन ने अपनी पुस्तक ‘एन एक्सपोजिटरी डिक्शनरी ऑफ़ न्यू टेस्टामेंट वर्ल्ड’ में लिखा है कि क्रॉस का प्रयोग सर्वप्रथम प्राचीन कुसूदिया-बाबुल में हुआ था और तेमूद देवता के प्रतीक चिन्ह के रूप में उसका प्रयोग होता था.उसका स्वरूप रहस्यमयी T के आकर का होता था,जो उस देवता के नाम का पहला अक्षर था.इससे सिद्ध होता है कि क्रूस या सलीब ईसा के जन्म से शताब्दियों पूर्व से ही प्रचलित था.हालाँकि उसका आकार कुछ अलग था.

सलीब पर अपराधियों के चढ़ाए जाने की सजा युद्ध के दिनों में प्राचीन फिनिशियन,कार्बेजीनियन, इजिप्शियन और रोमन लोगो में दी जाती थी.सलीब पर चढ़ाने से पहले अपराधी या कैदी को कोड़े या चाबुक से मारा जाता था और उसे सलीब पर बांधकर उसके हाथ-पाँव में कील ठोक दी जाती थी.फलस्वरूप कील पर चढ़ाए जाने वाले कैदियों और व्यक्तियों की मृत्यु खून की कमी से नहीं,बल्कि आम तौर पर ह्रदयगति रूक जाने से हो जाती थी.

ईसा के संबंध में भी यही धारणा व्यक्त की जाती है कि ईसा को सिपाहियों ने जब भाले से बेधा था तब पानी और खून दोनों उनके शरीर से निकला था.दर्द से छटपटाते हुए शरीर में सलीब पर दो या तीन दिनों से अधिक जान नहीं रह पाती थी.मृत्यु का आगमन शीघ्रता से होता था.उन दिनों भयंकर कैदियों और सैकड़ों युद्धबंदियों को नगर से बाहर सड़क के किनारे एक कतार में सलीब स्थापित कर उस पर चढ़ाया जाता था.इस परंपरा के अनुसार अपराधी की लाश तबतक सलीब पर टंगी रहती थी जब तक मांस-भक्षी पक्षी उसके मांस को नोच-नोचकर अस्थिपंजर के रूप में न बदल देते थे.

यदि आत्मा के अतिरिक्त कोई अन्य बाह्य वस्तु ईश्वर की पूजा के लिए प्रयोग में लाई जाती है तो उसका रूप मूर्ति-पूजा सा होता है.सलीब की पूजा ईसाईयों को मूर्तिपूजक भी घोषित करती है.ईसा आत्मा की शुद्धता पर जोर देते थे और मूर्ति पूजा के साधनों एवं उपादानों को सांसारिक वस्तुओं का मोह-जाल समझते थे,लेकिन ईसा के अनुयायियों ने उनके कथन का अर्थ बहुत कम समझा.उन्होंने अन्य देवी देवताओं की प्रतिमा की पूजा को तो धिक्कारा,लेकिन खुद अपने आराध्य ईसा के लिए क्रूस को पवित्र मानकर उसकी पूजा आरंभ कर दी.उनके अनुसार पवित्र लहू क्रूस पर ही गिरा था और क्रूस ही उनकी मृत्यु का निमित्त होने के कारण शायद चिर-स्मरणीय हो गया.डबल्यू. डी. विलेन ने 'द ऐनसिएंट चर्च’ में लिखा है कि अति दूरवर्ती प्राचीनकाल से मिस्त्र और सीरिया में क्रूस को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था.

किसी भी धर्म को स्थापित करने के लिए अनुयायियों को अपने गुरु का ऐसा ठोस आधार ढूंढना पड़ता है कि जन-साधारण पर उसका असर सीधा और शीघ्र पड़ सके.ईसा के अनुयायियों के लिए बाह्य ठोस आधार के रूप में सलीब से बढ़कर प्रभावकारी शायद कोई दूसरा न था.उन्होंने इस मर्म को समझा और और लकड़ी के क्रूस के चिन्ह को ही ईसाई धर्म के प्रचार का साधन बनाया.

प्रारंभ में यह धारणा बन गई थी कि येरुशलम को जाने वाले यात्री उस असली पवित्र सलीब के छोटे-छोटे बने सलीब ही उनके चर्च के लिए लेते हैं.क्रूस को पवित्र मानकर उसे कलात्मक ढंग से सजाकर रखने की प्रथा भी शायद इसी कारण शुरू हुई.

कालांतर में ज्यों-ज्यों लोगों की धार्मिक भावना बढ़ती गई,त्यों-त्यों सलीब लकड़ी के अतिरिक्त स्वर्ण,चांदी,पीतल,कांस्य,ताम्बा आदि धातुओं के बनने लगे.उन पर रत्न जड़े जाने लगे.ईसा के वचन लिखे जाने लगे.

लेकिन सवाल यह है कि क्या ईसा की मृत्यु क्रूस पर हुई थी?

(अगले अंक में जारी)

Thursday, July 17, 2014

सावन और झूलनोत्सव


झूला झूलने का एक अपना अनोखा आनंद है.झूले पर बैठते ही वयस्क मन एकाएक किशोर हो जाता है.शायद,इसलिए कि झूले के साथ बचपन की अनेक मधुर स्मृतियाँ जुड़ी रहती हैं.पावस ऋतु में झूले की बहार दर्शनीय होती है.अमराइयों में वृक्षों की शाखाओं पर लगे झूले और उन पर पेंगें लेती किशोरियां,युवतियां. झूले का हमारे आराध्यों राम-कृष्ण के साथ भी घनिष्ठ संबंध है.

सावन में मथुरा और वृन्दावन में झूलों की अपनी छटा होती है.अयोध्या में भी झूलों का उत्सव,  झूलनोत्सव सावन महीने भर मनाने की प्रथा थी.परन्तु धीरे-धीरे यह प्रथा कुछ मंदिरों तक सिमट कर रह गयी है.

गोस्वामी तुलसीदास ने गीतावली उत्तरार्द्ध के 18-19 पदों में झूले का वर्णन किया है.उसमें उन्होंने श्रीराम एवं जानकी की मंगलमय झांकी को झूले पर बैठकर निहारा है तथा स्थान विशेष का भी उल्लेख किया है........

झुंड-झुंड झूलन चलीं गज गामिनी बरनारि |
कुसुम चीर तन सोहहीं,भूषण विविध संवारि |
पिक नयनी मृगलोचनी, सारद ससिसमतुंड |
रामसुजसु सब गावहीं,सु-सुरसु, सारंग गुंड |
सारंग,गुंड,मलार,सोरठ,सुहव,सुधरनि बाजहीं |
बहुभांति तान-तरंग सुनि, गंधर्व किन्नर लाजहीं |
अतिमचत छूटत कुटिल कच, छवि अधिक सुंदर पावहीं |
पठ उड़त भूषण खसत,हंसि-हंसि ऊपर सखी झुलावहीं |

भक्त रसिक कवि बिहारी द्वारा ‘राम रसायन’ ग्रंथ की रचना की गई थी,जिसमें उन्होंने देश-काल के अनुसार राम और सीता के रसिक स्वरूप का वर्णन किया है.उन्होंने झूलनोत्सव के समय,स्थान आदि का वर्णन भी विस्तार से किया है.......

सुभग जानकी घाट विशाला, मज्जें अंतरंगिनी बाला |
तहं प्रमोद बन परम सुहावन,कोटिन अमरावती लजावन |

पावस ऋतु में सावन झूला श्रवण शुक्ल तृतीया से मनाये जाने के संबंध में बिहारी कहते हैं....

पावस ऋतु उत्सव समय, वर हिंडोल विहार |

पंद्रहवीं शताब्दी पूर्व,मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के श्रृंगारिक स्वरूप को प्रस्तुत नहीं किया जाता था,साधकों द्वारा स्वांतः सुखाय ही नित्य लीला का स्मरण किया जाता था.श्रृंगारी साधना युगधर्म का स्वरूप धारण करता जा रहा था,जबकि राम कथा में ऐश्वर्य की प्रधानता थी और कृष्ण लीला का विकास बढ़ता ही जा रहा था.कृष्ण के भक्त कवि निरंतर उनकी रासलीला आदि का खुलकर अपने शब्दों में प्रयोग कर रहे थे.

इसी समय स्वामी अग्रदास ने इस विशाल पृष्ठ भूमि पर बिखरे राम-रस-रत्नों को पिरोना शुरू किया.स्वामी अग्रदास ने राम-रसिकों का एक सम्प्रदाय बना कर,उन्हें कृष्ण-भक्तों के गो-लोक से भी अधिक वैभव पूर्ण,दिव्य अयोध्या के लीला बिहारी सीता-राम का ध्यान करने का उपदेश दिया.

अयोध्या में दास-परंपरा के अनुयायियों की संख्या अधिक थी,जिसके कारण श्रीराम की लीलाओं को केवल मर्यादित वातावरण के आवरण से ही ढक दिया गया था,किंतु 16वीं शताब्दी में स्वामी अग्रदास के समय रसिक उपासना का अधिक प्रचार हुआ.

मुग़ल काल में भी धार्मिक उत्सवों का यदा-कदा आयोजन किया जाता था,परन्तु स्वतंत्र रूप से इस झूलन उत्सव के प्रचार-प्रसार का कार्य नबाब वाजिद अली शाह के समय और भी अधिक हुआ.अयोध्या में जहाँ एक ओर एक या दो मंदिरों में इसका आयोजन होता था,वहीँ अयोध्या के महाराज ददुआ ने कई मंदिरों का निर्माण कर इस उत्सव को प्रश्रय दिया.

अयोध्या के महाराजा ने राधा ब्रजराज मंदिर से नागपंचमी के दिन रथ पर श्रीकृष्ण एवं राधा की मूर्ति को ले जाकर अपने महल के बगीचे के झूले में बैठाकर झूलनोत्सव मनाने की प्रथा का सार्वजानिक स्तर पर आरंभ किया.

झूलनोत्सव मनाने की प्रथा का प्रचलन रसिकोपासकों द्वारा 16वीं शती के उत्तरार्द्ध से आरंभ हुआ.जिनमें आज तक अनेक प्रकार के परिवर्तन होते रहे हैं.पहले अष्टयाम विधि से केवल अष्टधातुओं की एवं शिलामूर्ति ही पूजी जाती थी,परन्तु इसी शाखा के उपासक श्रीरामवल्ल्भाशरण द्वारा एक नयी प्रथा का सूत्रपात हुआ जिसे आज अयोध्या के अनेक मंदिरों में देखा जा सकता है.इसमें श्रीराम एवं सीता के सजीव रूप की पूजा-अर्चना तथा बच्चों का श्रृंगार करके उन्हें राम और सीता के रूप में झूले पर बैठाया जाता है.इसके बाद रचिकचार्यों के पदों को गाकर उनमें व्यक्त किया गए भावों के अनुरूप अभिनय कराया जाता है.

पहले किसी भी धार्मिक कृत्य में भक्तों की आस्था सादगीपूर्ण थी,किसी प्रकार के रागरंग में उनकी रुचि नहीं थी,वे साधना  करते थे केवल अपने सुख के लिए,बाहरी आडम्बरों से उनका कोई संबंध नहीं था.

जिस प्रकार से साहित्य में इसके निश्चित देशकाल का वर्णन नहीं मिलता ,उसी प्रकार वर्त्तमान समय में भी इस उत्सव के मनाने का कोई दिन निश्चित नहीं है.विभिन्न मंदिरों में अनेक तिथियों से झूलनोत्सव मनाया जाता है.श्रावण शुक्ल की तृतीया को मणि-पर्वत पर पड़े झूले में बिठाकर आयोजन पूर्वक इसकी शुरुआत की जाती है.

समय के परिपेक्ष्य में प्रथाओं के नित क्षरण होते रहने से मंदिरों में भले ही अब आयोजनों में नीरसता आने लगी हो,परंतु इस उत्सव की सरसता में किसी प्रकार की कमी नहीं आई है.

Monday, July 14, 2014

छठी इंद्री (सिक्स्थ सेंस) बनाम खतरे का संकेतक

सामान्य तौर पर लोग कहते पाये जाते हैं कि अचानक उनकी छठी इंद्री जाग्रत हो उठी और आसन्न खतरे का संकेत मिलते ही सावधानी के कारण बाल-बाल बच गए.लेकिन क्या हर साधारण व्यक्ति में छठी इंद्री वास्तव में जाग्रत की जा सकती है? 

इंद्री के द्वारा हमें बाहरी विषयों - रूप, रस, गंध, स्पर्श एवं शब्द - का तथा आभ्यंतर विषयों - सु:ख दु:ख आदि-का ज्ञान प्राप्त होता है. इद्रियों के अभाव में हम विषयों का ज्ञान किसी प्रकार प्राप्त नहीं कर सकते. इसलिए तर्कभाषा के अनुसार इंद्रिय वह प्रमेय है जो शरीर से संयुक्त, अतींद्रिय (इंद्रियों से ग्रहित न होनेवाला) तथा ज्ञान का करण हो (शरीरसंयुक्तं ज्ञानं करणमतींद्रियम्).

कहा जाता है कि पाँच इंद्रियाँ होती हैं- जो दृश्य, सुगंध, स्वाद, श्रवण और स्पर्श से संबंधित होती हैं. किंतु एक और छठी इंद्री भी होती है जो दिखाई नहीं देती, लेकिन उसका अस्तित्व महसूस होता है. वह मन का केंद्रबिंदु भी हो सकता है या भृकुटी के मध्य स्थित आज्ञा चक्र जहाँ सुषुम्ना नाड़ी स्थित है.

सिक्स्थ सेंस से संबंधित कई किस्से-कहानियाँ किताबों में भरे पड़े हैं. इस ज्ञान पर कई तरह की फिल्में भी बन चुकी हैं और उपन्यासकारों ने इस पर उपन्यास भी लिखे हैं. प्राचीनकाल या मध्यकाल में छठी इंद्री ज्ञान प्राप्त कई लोग हुआ करते थे, लेकिन आज कहीं भी दिखाई नहीं देते तो उसके भी कई कारण हैं.

मस्तिष्क के भीतर कपाल के नीचे एक छिद्र है, उसे ब्रह्मरंध्र कहते हैं, वहीं से सुषुम्ना रीढ़ से होती हुई मूलाधार तक गई है. सुषुम्ना नाड़ी जुड़ी है सहस्रकार से.

इड़ा नाड़ी शरीर के बायीं तरफ स्थित है तथा पिंगला नाड़ी दायीं तरफ अर्थात इड़ा नाड़ी में चंद्र स्वर और पिंगला नाड़ी में सूर्य स्वर स्थित रहता है. सुषुम्ना मध्य में स्थित है, अतः जब हमारे दोनों स्वर चलते हैं तो माना जाता है कि सुषम्ना नाड़ी सक्रिय है. इस सक्रियता से ही सिक्स्थ सेंस जाग्रत होता है।

छठी इंद्री के जाग्रत होने से व्यक्ति के भविष्य में झाँकने की क्षमता का विकास होता है. अतीत में जाकर घटना की सच्चाई का पता लगाया जा सकता है. मीलों दूर बैठे व्यक्ति की बातें सुन सकते हैं. किसके मन में क्या विचार चल रहा है इसका शब्दश: पता लग जाता है. एक ही जगह बैठे हुए दुनिया की किसी भी जगह की जानकारी पल में ही हासिल की जा सकती है. छठी इंद्री प्राप्त व्यक्ति से कुछ भी छिपा नहीं रह सकता और इसकी क्षमताओं के विकास की संभावनाएँ अनंत हैं.

वैज्ञानिक कहते हैं कि दिमाग का सिर्फ 15 से 20 प्रतिशत हिस्सा ही काम करता है। हम ऐसे पोषक तत्व ग्रहण नहीं करते जो मस्तिष्क को लाभ पहुँचा सकें. समस्त वायुकोषों,फेफड़ों और हृदय के करोड़ों वायुकोषों तक श्वास द्वारा हवा नहीं पहुँच पाने के कारण वे निढाल से ही पड़े रहते हैं. उनका कोई उपयोग नहीं हो पाता.

चेकोस्लोवाकिया के परामनोवैज्ञानिक डॉ. मिलान रायजल ने सामान्य व्यक्तियों में अतींद्रिय एवं पराशक्ति जागृत करने के बहुत से सफल प्रयोग किये हैं.इन प्रशिक्षण एवं प्रयोगों में ये शक्तियां सामान्यतः वह सम्मोहन क्रिया द्वारा जागृत करते हैं.

एक दिन प्राग स्थित अपनी प्रयोगशाला में उन्होंने इन प्रयोगों में सहायिका एवं प्रशिक्षण प्राप्त कर रही जोसेफ्का से कहा कि हम यह प्रयास करेंगे कि भविष्य की किसी दुर्घटना को पहले से जानकर उसे बदल सकते हैं.यानि क्या भविष्य की नियति में हम दखल भी दे सकते हैं.यदि आपको यह पता चल जाय कि आपका कोई परिचित भयंकर दुर्घटना का शिकार होने वाला है, तो क्या फिर भी वह दुर्घटना जरूर ही होकर रहेगी या उस व्यक्ति को आपके द्वारा दी गई पूर्व चेतावनी से वह टल भी सकती है? यदि भविष्य को बदला जा सकता है तो कितना,पूरी तरह से या आंशिक रूप में.

रायजल ने जोसेफ्का से अपनी किसी मित्र की ऐसी किसी घटना का भविष्य-दर्शन करने को कहा,जिससे उसे बचना चाहिए.फिर उस मित्र को होने वाली घटना का पूर्व संकेत देकर,परिणाम की प्रतीक्षा करने को कहा.

जिस लड़की के भविष्य की दुर्घटना के पूर्व दर्शन का चयन किया गया वह प्राग से पचास मील दूर रहती थी.तंद्रा की अवस्था में जोसेफ्का रायजल के आदेशों का पालन करती रही.उसने होने वाली घटना के बारे में बताया कि उसकी मित्र कार से शहर से बाहर जा रही है और हाइवे पर एक लॉरी से उसकी कार की जबरदस्त टक्कर हो जाती है और वह गंभीर अवस्था में घायल पड़ी है.

जोसेफ्का को जागृत कर सामान्य अवस्था में लाया गया,जो दर्दनाक दृश्य उसने देखा था,उसके प्रभाव से वह कांप रही थी.उसने सोचा कि वह दिन निकलते ही अपनी सहेली को इसके बारे में संकेत कर देगी. अगली सुबह उसने अपनी सहेली को फोन कर इस बारे में बताना शुरू ही किया था कि उसकी माँ ने कहा-अब क्या फायदा? बहुत देर हो चुकी है और वह अस्पताल में गंभीर अवस्था में पड़ी है.

आश्चर्य की बात यह थी कि जोसेफ्का न तो कोई रूहानी माध्यम थी,न ही अतींद्रिय संपन्न कोई सिद्ध लड़की,जिसे रायजल ने कहीं से खोज निकाला हो.कुछ ही महीने पहले जब रायजल से उसकी मुलाकात हुई थी,तो उसमें इस प्रकार की कोई शक्ति नहीं थी.रायजल ने प्रशिक्षण की जी विलक्षण प्रणाली खोज निकाली उसी से उसे यह क्षमता प्राप्त हो सकी.

डॉ. रायजल ही ऐसे पहले परामनोवैज्ञानिक हैं,जिन्होंने ऐसी प्रणाली खोज निकाली है,जिसके द्वारा किसी भी रास्ता चलते सामान्य व्यक्ति में छठी इंद्री जागृत की जा सकती है.प्रसिद्ध चेक हिंदी लेखक और  कवि ओदोलेन स्मेकल ने भी रायजल के प्रयोगों की प्रशंसा की है.

भविष्य का पूर्वाभास,किसी के मन की बातें पढ़ लेना – इन सब ऋद्धियों-सिद्धियों का भंडार अचेतन मन की किन्हीं परतों में सुरक्षित है.परामनोवैज्ञानिकों का मंतव्य है कि वह प्रशिक्षित व्यक्तियों में इन शक्तियों से संपन्न छठी इंद्री का समुचित विकास कर सकते हैं.

रायजल के कुछ प्रशिक्षित शिष्यों ने अतींद्रिय शक्ति के बल पर उन लोकों में भी झांकना शुरू किया जिन्हें हमारी आँखों से देखना संभव नहीं.

पराशक्ति ऋद्धियों-सिद्धियों के अतिरिक्त मस्तिष्क में असंख्य प्रतिभाएं भी सुरक्षित हैं.अब यह मान्यता जोर पकड़ती जा रही है कि इस चेतन तत्व के हम जीवनभर में एक बहुत ही छोटे से अंश का ही उपयोग कर पाते हैं.यदि विभिन्न प्रतिभाओं को वोक्सित और जाग्रत किया जा सके तो हम समृद्धिशाली प्रतिभाओं के स्वामी हो सकते हैं.

इसी दिशा में रूसी परामनोवैज्ञानिक डॉ. राईकोव ने भी बहुत से सफल प्रयोग किये हैं.परन्तु राईकोव प्रयोग के लिए आगे आए व्यक्ति को गहरे सम्मोहन में उतार देते हैं और फिर इस तरह के संकेत देते हैं कि ‘आप एक बहुत बड़े चित्रकार हैं’ और वह व्यक्ति चित्र बनाने लगता है.

भारतीय आध्यात्म में ऋद्धि-सिद्धियों को जागृत करने की प्रणाली योग एवं समाधि है.समाधि में सम्मोहन की तरह ही,चेतन अवस्था तो लुप्त हो जाती है और साधक अपनी धारणानुसार अचेतन लोक में ही विचरता है,और धीरे-धीरे अचेतन की परतों से ही विभिन्न शक्तियां खींच लेता है.यह दीर्घकालीन और समय साध्य प्रणाली है.यदि परामनोवैज्ञानिकों के प्रयोगों से कोई नई प्रणाली सर्वसुलभ हो गई तो एक दिन सर्वसाधारण व्यक्ति के लिए उन पराशक्तियों को प्राप्त करना संभव हो जाएगा,जो अभी तक सिद्ध योगियों की ही संपत्ति मानी जाती हैं.

Thursday, July 10, 2014

नयनों की भाषा


आँखों को लेकर बेहद संजीदा और उम्दा शायरी की गई है.तमाम नए और पुराने शायरों ने आँखों की भाषा पढ़ने की कोशिश की है और तरह तरह की उपमाएं दी हैं.

जर्मन लेखक और कवि राइनर मारिया रिल्के की एक कविता हैजिसका अनुवाद रामधारी सिंह 'दिनकर' ने किया था.कविता कुछ इस प्रकार है - 'काढ़ लो दोनों नयन मेरेतुम्हारी ओर अपलक देखना तब भी न छोडूंगा'. यहाँ प्रेम अपनी पराकाष्ठा की हद को छू लेता है.आँख न होने के बावजूद भी लगातार देखे जाने की बात वही इंसान कर सकता है,जिसकी अंतर्दृष्टि खुल चुकी हो.जो मात्र बाहरी आँखों के भरोसे जिंदा न हो.सच तो यह है कि प्रेम ही एकमात्र आँख है इस दुनियां में.

एक स्पेनिश कहावत के अनुसार -नीली आँखें कहती हैं - मुझे प्यार करो,नहीं तो मर जाउंगी.काली आँखें कहती हैं - मुझे प्यार करो नहीं तो मार दूँगी.तमाम भाषाओँ में आँखों की खूबसूरती को बयान करने की कोशिश की गई है.लेकिन कहते हैं न कि जो बात कह दी जाय या बयान हो सके वो झूठी हो जाती है क्योंकि सच हमेशा अनकहा,अनगढ़ और कुदरती रूप में होता है.साहित्य में आँख को लेकर काफी कुछ लिखा गया है.

बात अगर ग़ालिब की हो तो बात ही कुछ और होती है.ग़ालिब की शायरी में अनायास ही फलसफा का पुट दिखाई देता है,जब वे कहते हैं -'रगों में दौड़ते रहने के हम नहीं कायल,जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है'. यहाँ आँख से लहू का टपकना इस बात का सबूत है कि ग़ालिब के दामन - ओ - दर्द किस कदर गीले  थे.किस कदर तकलीफ के तकिये पर सर रख कर उम्र भर सोते रहे ग़ालिब और सोच किस आंच पर पकती रही. ग़ालिब का ही एक और शेर है -

'आँख की तस्वीर सरनामे पे खींची है कि ता,
तुझ पे खुल जाए की उसको हसरत - ए - दीदार  है

इस शेर में कहा गया है कि लिफाफे पर आँख की तस्वीर बनाई है ताकि यह पता चले कि  तुम्हें देखना चाहते  हैं .

अपनी शायरी में सियासत की स्याही सहित मुहब्बत की सादगी समोने वाले अहमद 'फराज' कहते हैं..

'सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं,
सो उनके शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं'

महबूब को देखने की आरजू में फराज उसके शहर में कुछ दिन ठहरना चाहते हैं.बहुत ही साधारण ढंग से कही गई बात अपने आप में गहरा रहस्य छुपाए हुए है.

फराज का ही एक शेर है –

तू भी दिल को इक लहू की बूँद समझा है 'फराज'
आँख गर होती तो कतरे में समंदर देखता

कतरे में समंदर देखने के लिए जिस मासूम आँख की जरूरत है वो सबके पास नहीं होती.दरअसल किसी भी चीज को कई नजरिये से देखा जा सकता है.जिस तरह बीज में दरख़्त की संभावना छुपी होती है और उसी बीज में फल, फूल,खुशबू आदि सब कुछ मौजूद होता है.उसी तरह कतरे में समंदर देखने के लिए आध्यात्मिक दृष्टि की आवश्यकता है .

उदास आँखों को पढ़ते हुए एक शायर कहते हैं...

मगर अश्क की खुशबू पहचानता हूँ मैं
खुद से कहीं जियादा तुझको जानता हूँ मैं
कुछ और नहीं तो बस इक बात का हक़ है
उदास आँखों में पानी अजीब लगता है

Monday, July 7, 2014

अपेक्षाओं के बोझ तले सिसकता बचपन


पिछले कई सालों की भांति इस साल भी ग्रीष्मावकाश में मुंबई में था.छोटी बहन वहां के एक प्रतिष्ठित स्कूल में गणित की शिक्षिका है.एक महीने के लम्बे ग्रीष्मावकाश में उसे घर आने और सबों से मिलने-जुलने का अवसर मिल जाता है.वापसी में अक्सर मैं ही उसे पहुँचाने मुंबई जाता हूँ.इस बहाने कुछ घूमना फिरना भी हो जाता है.इस बार दस वर्षीय भांजे ने बताया कि एक प्रतिष्ठित चैनल पर चल रहे जूनियर डांस रियल्टी शो के अंतिम चार में पहुँचने वाली लड़की इसी अपार्टमेंट के पहले तल्ले पर रहती है और उसी के शो जीतने की संभावना है.

बात आयी गयी हो गयी.एक शाम अपार्टमेंट से नीचे उतर कर मुख्य सड़क पर जाने के बारे में सोच ही रहा था कि बिल्डिंग के अहाते में काफी शोरगुल सुनाई दिया.अच्छी खासी भीड़ जमा हो चुकी थी.पूछने पर पता चला एक बच्ची बेहोशी की अवस्था में थी.लगभग एक घंटे बाद वापस लौटने पर छोटी बहन ने बताया कि जूनियर रियल्टी शो वाली बच्ची शो से बाहर हो जाने पर सदमें में थी और कई बार बेहोश हो चुकी थी.

इस घटना से कुछ वर्ष पहले की एक घटना की याद ताजा हो गई.कोलकाता में बच्चों के इसी तरह के एक शो से एक बच्ची के बाहर होने पर,सदमे के कारण उसकी आवाज चली गई थी,जिसे चिकित्सकों के अथक प्रयास के बाद वापस लाया जा सका.ऐसे शो न केवल बच्चों बल्कि उनके माता-पिता एवं अभिभावकों के लिए भी प्रतिष्ठा का प्रश्न बन जाते हैं.बच्चों के मन में यह बात बैठा दी जाती है कि केवल उसे ही जीतना है,और इससे कम कुछ नहीं.नतीजतन, सफल नहीं होने पर ऐसे बच्चे कुंठा के शिकार हो जाते हैं और उन्हें लगता है कि उनकी दुनियां ही समाप्त हो गई है.जबकि इस तरह की कोई भी प्रतियोगिता बच्चों की समुचित प्रतिभा का आकलन करने के लिए पर्याप्त नहीं है.

बच्चों के माता-पिता को ऐसे शो में गर्व के साथ कहते दिखाया जाता है कि हालांकि वे इस विधा में आगे नहीं बढ़ सके लेकिन चाहते हैं उनके बच्चे इस क्षेत्र में आगे बढ़ें.ऐसी महत्वाकांक्षा बुरी नहीं,लेकिन स्वस्थ प्रतियोगिता और असफलता को सामान्य रूप से लेना भी यदि माता-पिता सिखा सकें तो कोई कारण नहीं कि इस तरह की घटना की पुनरावृत्ति हो.

सामान्यतया बच्चे ऐसा कहते पाए जाते हैं कि उनके माता-पिता चाहते हैं कि वह इंजीनियर,डॉक्टर बने,क्योंकि उनके माता या पिता भी इंजीनियर या डॉक्टर हैं,भले ही बच्चों की अभिरुचि का क्षेत्र अलग हो.

सभी बच्चों में एक ही तरह की प्रतिभा एवं रूचि नहीं पायी जाती.जुड़वां बच्चों तक में अलग-अलग तरह की प्रतिभा और रुचियों का पाया जाना सामान्य बात है.ऐसे में यदि बच्चों की रूचि के अनुसार कैरियर का विकल्प मिले तो इससे अच्छी बात कोई नहीं.माता-पिता और अभिभावकों की जिम्मेवारी और भी अधिक है कि बच्चे की अभिरुचि के अनुसार ही शैक्षणिक गतिविधियों को प्रोत्साहन दिया जाय.