Saturday, December 27, 2014

पीता हूं धो के खुसरबे – शीरीं सखुन के पांव

अमीर खुसरो को लोगों ने अलग-अलग दृष्टिकोण से देखा है.किसी ने उन्हें उच्च श्रेणी का योद्धा बताया है तो किसी ने संगीत का प्रगाढ़ प्रेमी.यहाँ तक कि वे सितार के आविष्कर्ता भी माने गये. वे उदारचेता सूफी थे,पर कुछ लोग ऐसे भी हैं जो उन्हें कट्टर मुस्लिम और हिंदुस्तान में इस्लाम का प्रचारक भी बताते रहे हैं.

वास्तविकता यह है कि इनमें से कोई भी रूप अमीर खुसरो का वास्तविक स्वरूप नहीं है.यदि उनका वास्तविक रूप देखना है तो हमें उनकी काव्य-कृतियों में देखना पड़ेगा- खड़ी बोली की उनकी पहेलियों में नहीं,बल्कि उनके फारसी कलामों में.

इस संबंध में एक रोचक वृत्तांत है कि ईरान की एक कुशल कवियित्री की काव्य-कृति पर आसक्त होकर एक शायर ने उसे पत्र लिखा और उसे देखने की इच्छा प्रकट की.वह देखने में अत्यंत सुंदर थी,फिर भी उसे अपने सौन्दर्य पर घमंड नहीं था – गर्व था अपने काव्य पर.अस्तु उसने उत्तर में यह सुंदर शेर लिख भेजा.....

हमचू बू पिनहा शुदम दर-रंगे गुल मानिंदे गुल,
करके दीदन मैल दारद दर सुखन बीनद मरा |

अर्थात,फूल में जिस तरह उसकी गंध छिपी रहती है,उसी तरह मैं अपनी कविता में छिपी हुई हूं.जो मुझे देखने का इच्छुक हो,वह मुझे मेरी शायरी में देखे,क्योंकि मेरा असली रूप उसी में है.फूल में ही उसकी महक पायी जा सकती है.यह कथन अमीर खुसरो पर भी लागू होता है.उनके कलाम ही उनके वास्तविक स्वरूप को प्रदर्शित करते हैं.

अमीर खुसरो का कलाम जिस कदर फ़ारसी में है,उसी कदर ब्रजभाषा में भी है.लेकिन यह अफसोसनाक है कि जहां उनके फ़ारसी कलाम बड़ी संख्या में उपलब्ध हैं,वहीं ब्रजभाषा की रचनाओं का कहीं नामोनिशान नहीं है.जाहिर है कि मुस्लिमों ने तो उनके फ़ारसी कलामों की रक्षा की लेकिन हिन्दुओं ने ब्रजभाषा की उनकी रचनाओं की रक्षा नहीं की.केवल कुछ पहेलियाँ प्रचारित होती रहीं और कुछ दोहे जो उन्होंने अपने गुरु निजामुद्दीन औलिया के निधन पर लिखे थे.

फारसी के उनके कलाम जाहिर करते हैं कि वे कितने ऊँचे दर्जे के शायर थे.किसी ने ठीक ही कहा है कि उनका एक-एक कलाम मोतियों से तोले जाने के काबिल है.

गौरतलब है कि मिर्जा ग़ालिब इस देश के किसी शायर को अपने से बड़ा नहीं मानते थे,सिवा खुसरो के,जिनके संबंध में उन्होंने लिखा भी है.......

ग़ालिब मेरे कलाम में क्योंकर मजा न हो
पीता हूं धो के खुसरबे-शीरीं सखुन के पाँव

उनके कलाम दिल पर गहरे असर करते हैं.इस संदर्भ में एक वाकया काफ़ी चर्चित रहा है.नादिरशाह द्वारा दिल्ली का कत्लेआम इतिहास की एक प्रसिद्ध घटना है.उस समय दिल्ली के तख़्त पर मुहम्मद शाह रंगीला आसीन था.वह एक रंगीनमिजाज व्यक्ति था और सारा समय ऐशोआराम में व्यतीत करता था.उसके शासनकाल में ही मराठों ने सर्वप्रथम सर्वप्रथम दिल्ली में प्रवेश पाया.

तालकटोरे में बाजीराव के साथ मुग़ल सेना की मुठभेड़ हुई,जहाँ उसकी हार हुई.मराठे विजयी हुए,जिसके फलस्वरूप मुहम्मद शाह को नर्मदा तथा चंबल नदियों के बीच का सारा इलाका,मालवा सूबे के साथ-साथ, मराठों को देना पड़ा.

इधर नादिरशाह फारस का तख़्त छोड़कर गजनी,काबुल और कंधार तक अपना आधिपत्य जमा बैठा था और हिंदुस्तान को जितने क स्वप्न देख रहा था.तभी उसे मुहम्मद शाह के मराठों के हाथों हारने तथा उसकी कमजोरियों,विलासिता,दरबार में शोहदों क बोलबाला आदि की ख़बरें मिली और वह 1738 में सिंधु नदी को पार कर हिंदुस्तान आ पहुंचा.इधर शाही फौज के सिपहसालार आपस में लड़ते रहे,उधर फारस की सेना दिल्ली की ओर बढ़ती रही.

पानीपत के आसपास दोनों सेनाओं की मुठभेड़ हुई.मुग़ल सेना बहादुरी के साथ लड़ी,जिसकी नादिरशाह कभी उम्मीद नहीं करता था.नादिरशाह फारस लौटने को तैयार हो गया था,तभी मुहम्मद शाह के मूर्खतापूर्ण हरकत से उसे फिर से साहस हुआ.हुआ यों कि मुहम्मद शाह बिना किसी को बताये,पालकी में बैठकर नादिरशाह से मिलने छावनी में जा पहुंचा.काफी उपहार देने के बाद उसे भरोसा था कि वह उन्हें लेकर फारस लौट जाएगा.नादिरशाह उसके साथ दिल्ली पहुंचा और मुहम्मदशाह को उसके किले में ही बंदी बना डाला .

तभी एक दिन बाजार में अफवाह उड़ी कि नादिरशाह की मृत्यु हो गयी.चांदनी चौक में उसके कुछ सिपाही खरीददारी कर रहे थे कि बाज़ार के कुछ लोगों ने आवेश में आकर उसकी हत्या कर दी.इसकी खबर नादिरशाह तक पहुंची तो वह क्रोध से पागल हो उठा और सिपाहियों को दिल्लीवालों का कत्लेआम करने का आदेश दे दिया.मर्द,औरत,बूढ़े,बच्चे,मवेशी क़त्ल किया जाने लगे.खून की नदी बह चली.वह स्वयं सुनहरी मस्जिद के ऊपर बैठकर इसे देखता रहा.किसी की हिम्मत नहीं हुई कि उससे इसे रोकने का अनुरोध करे.

तभी एक बूढ़े दरबारी ने हिम्मत की और नादिरशाह के पास जाकर अमीर खुसरो के इस शेर को पढ़ा..........

कसे न मांद कि दीगर ब तेगे-नाज कुशी |
मगर कि जिंदा कुनी खल्करा व बाज कुशी ||

(कोई बचा नहीं,सब तुम्हारी कहर के शिकार हो गये,निगाहें-नाज की तलवार से तुमने सबको मार डाला.अब लोगों को लुत्फ़ की निगाह से जिंदा करो ताकि इन्हें फिर मार सको.)

नादिरशाह स्वयं एक शायर था,इस अन्योक्ति को सुनते ही तड़प उठा.आज्ञा दी कि कत्लेआम बंद किया जाय.अमीर खुसरो के इस शेर ने जादू का काम किया.

नादिरशाह इसके बाद किले के खजाने को खाली करके,तख्तेहाउस और कोहिनूर हीरे को साथ लेकर फारस लौट गया.

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Tuesday, December 23, 2014

वह उपहार देने स्वर्ग से आता है

इन दिनों क्रिसमस की धूम है.क्रिसमस के अवसर पर संत निकोलस का बहुत महत्त्व है.बच्चे अभी भी विश्वास करते हैं या यों कहें कि उन्हें विश्वास दिलाया जाता है कि वह क्रिसमस की रात को आता है और उनके लिए उपहार रखकर चला जाता है.उसका महत्त्व देवदूत के समान माना जाता है.उसकी पोशाक साधारणतः सफ़ेद और लाल तथा उसकी दाढ़ी सफ़ेद होती है.उम्र में वह प्रायः प्रौढ़ या वृद्ध होता है.

बच्चों की यह धारणा रहती है कि क्रिसमस के अवसर पर वह स्वयं स्वर्ग से उतरकर उन्हें खुश करने और उपहार देने आता है.वह उनसे विविध प्रकार के प्रश्न पूछता है और उनसे बाइबिल तथा क्रिसमस की प्रार्थनाएं सुनता है.बाद में अच्छे बनने की सलाह देकर उन्हें कैंडी
,फल,खिलौने आदि बांटकर,प्यार कर विदा हो जाता है.

संत निकोलस के प्रति प्रायः सभी यूरोपीय देशों में पर्याप्त आदर एवं श्रद्धा है.बच्चों को संत निकोलस की कथा इस प्रकार बताई जाती है कि निकोलस बचपन में ही अनाथ हो गया था.बाद में अपने अच्छे कार्यों से तथा ईसा के प्रति भक्ति-भावना होने के कारण वह अपने शहर का  मेयर चुन लिया गया.बाद में रोमन सम्राट डायक्लेशियन के समय उसे देश निकाला दे दिया गया,क्योंकि वह सम्राट को नहीं मानता था.अतः संत निकोलस को कई वर्षों तक जगह-जगह भटकना पड़ा तथा भूखे-प्यासे रहने के अलावा और भी यंत्रणाएं सहनी पड़ीं.बाद में कांस्टेटाइन के राज्य में उसके साथ अच्छा व्यवहार किया गया.वह सदा दीन-दुखियों की सहायता करता था,बीमारों की सेवा करता था और बच्चों को विशेष प्यार करता था.

संत निकोलस का ही एक अन्य रूप सांता क्लौसवस्तुतः अमेरिकी देन है.धर्मसुधार आंदोलन के परिणामस्वरूप यूरोप में जो बहुत सी प्रथाएं बंद कर दी गयीं,उनमें संत निकोलस का भी था. अतः निकोलस का स्थान अब सांता क्लौस नामक एक अन्य व्यक्ति को दे दिया गया.फादर क्रिसमस और संत निकोलस का संयुक्त रूप सांता क्लौसहै.उनकी पोषाक एवं वेशभूषा भी निकोलस के समान ही मानी गई है.

आजकल तो सांता क्लौस के बिना बच्चों का क्रिसमस पूरा नहीं होता.बच्चे सांता क्लौस के नाम पत्र भेजते हैं और लिखते हैं कि उन्हें क्रिसमस के अवसर पर क्या चाहिए.बाद में घर का प्रधान व्यक्ति ही सांता क्लौस बनकर बच्चों को उपहार दे जाता है.यूरोप में ठंढ अधिक होने के कारण वहां प्रायः सभी घरों में पहले लकड़ी और कोयले की आग जलाकर कमरे गरम रखे जाते थे.आग का धुंआ बाहर निकलने के लिए घरों के ऊपर चिमनी बनाई जाती थी.

आजकल भी ग्रीक घरों में गैस,लकड़ी या कोयले का उपयोग गरमी के लिए किया जाता है.उनमें धुंआ बाहर निकलने के लिए चिमनी बनी होती है.बच्चों का विश्वास है कि रात को जब वे सो जाते हैं तब सांताचिमनी के रास्ते अंदर आकर उनकी ऐच्छिक वस्तुएं दे जाता है.सुबह उठकर वे अपनी वस्तुओं की तलाश करते हैं.वे चीजें उन्हें कभी जूतों के अंदर रखी मिलती हैं,कभी तकिये के नीचे,कभी अपने कपड़ों की जेबों में और कभी अन्यत्र.

जहाँ-जहाँ क्रिसमस मनाने की प्रथा है,वहां के बच्चों के मुंह पर सांता क्लौस या फादर क्रिसमस का नाम हमेशा रहता है.यूरोप और अब दुनियां भर के देशों में बड़ी-बड़ी दुकानों में खिलौने वाले काउंटर पर दुकान का ही एक व्यक्ति सांता क्लौस की पोशाक पहनकर बैठ जाता है.बच्चे जब उन्हें अपनी इच्छा बताते हैं कि उन्हें क्रिसमस पर क्या चाहिए,तब वह उनका पता पूछ लेता है.बाद में माता-पिता की इच्छानुसार एक सहमति से वह चीज दुकान की और से उनके घर भेज दी जाती है.

बड़े-बड़े स्टोरों में सांता का आगमन बड़े धूम-धड़ाके से होता है.स्टोर की ओर से कई दिन पहले से ही समाचार-पत्रों में विज्ञापन छपने लगते हैं कि अमुक दिन फादर क्रिसमस बड़े साज-सामान के साथ स्टोर में आने वाले हैं.अतः अपने सांता का स्वागत करने के लिए बच्चे अधिक से अधिक की संख्या में स्टोर के बाहर एकत्रित हों.स्टोर में सांता के आगमन के लिए प्रायः छुट्टी का दिन ही चुना जाता है ताकि अधिक से अधिक बच्चे एकत्र हों.

सांता के आगमन के पहले से ही बच्चों की भीड़ स्टोर के बाहर सांता की प्रतीक्षा करती रहती है और नियत समय पर सांता बर्फ पर रेंडियर द्वारा खींची जा रही अपनी गाड़ी में आता है.न तो गाड़ी को खीचने वाले रेंडियर और न ही बर्फ असली होती है.इस विशेष अवसर के लिए गाड़ी में फोम के टुकड़े इस तरह बिछा दिया जाते है कि दूर से देखने पर बर्फ का आभास हो.रेंडियर की शक्ल में प्लास्टिक के बने हुए विशाल जानवर गाड़ी के आगे जोते जाते हैं.इससे लगता है मानो उसे रेंडियर खींच रहा हो.

स्कूलों,ऑफिस,क्लबों आदि में विशेष रूप से आयोजित क्रिसमस-पार्टियों में सांता क्लौस अपना लम्बा झोला लटकाए आता है और पार्टी के अंत में बच्चों को उपहारों के पैकेट बांटता है.क्रिसमस के अवसर पर घर में तथा बाहर होने वाली सजावट में भी फादर किसी न किसी प्रकार अपना स्थान बना ही लेते हैं.

दुकानों में महीनों पहले से ही तरह-तरह के आकार की साबुनें,पैकेट,बॉक्स तथा सांता के चित्र छपे हुए पैकिंग कागज,प्लास्टिक बैग आदि कितनी ही चीजें मिलने लगती हैं.ये केवल क्रिसमस के लिए ही विशेष रूप से तैयार की जाती हैं और प्रतिवर्ष लाखों की संख्या में बिकती हैं.स्टोरों,ऑफिसों,क्लबों तथा अस्पतालों में भी सांता की आदमकद मूर्तियाँ रखी जाती हैं.बधाई कार्डों पर सांता के तरह-तरह के चित्र छपते हैं तथा इस दिन आप कहीं भी निकल जाएं,सांता से किसी न किसी रूप में अवश्य भेंट हो जाएगी.

Keywords खोजशब्द :- Christmas Gifts,Christmas Stores,Santa Claus,Saint Nicholas

Thursday, December 18, 2014

आदि ग्रंथों की ओर - दो शापों की टकराहट

हमारे वेद,पुराण और उपनिषद कथाओं के अनंत स्रोत हैं.इन कथाओं में तत्कालीन समाज,सभ्यता,संस्कृति का ही वर्णन नहीं मिलता बल्कि कई सीख भी दे जाती हैं.जितना उनमें गहरे पैठें,उतने ही ज्ञान की प्राप्ति.विद्वता,ज्ञान,तप,योग आदि के अहंकार और फिर इससे पतन के गर्त में जाने की असंख्य कथाएँ मिलती हैं.

ऋषियों,मुनियों के तप,तेज और ज्ञान के अहंकार तथा श्राप की अनेक कथाएँ प्रचलित हैं लेकिन एक क्षत्रिय के ब्राहमण को श्राप देने की कथा बिरले ही मिलती है.इस सन्दर्भ में निमि की कथा बहुत रोमांचक,शाश्वत,और गहरे अर्थवाली है,प्रगतिशीलता और युगधर्मिता से जुड़ी है.श्रीमद्भागवत और देवीपुराण में इस कथा को विस्तार मिला है.इसमें दो शापों की टकराहट है.संभवतः पहली बार किसी जागरूक क्षत्रिय ने पलटकर ब्राह्मण को शाप दिया था.

निमिजनक के पूर्व-पुरुष हैं.ये ही विदेह हैं,ये ही मिथिल हैं,ये ही हमारी पलकों पर निमिष बनकर निवास करते हैं.निमि इक्ष्वाकु के पुत्र थे.हिमालय के पद प्रांत को उन्होंने अपनी राजधानी बनाया और सिंहासन-संस्कृति के स्थान पर कृषि-संस्कृति का पोषण किया.

एक बार राज्य में पानी के अभाव में जब अकाल की स्थिति उत्पन्न हुई,तब बादलों को आकर्षित करने के लिए निमि ने एक महायज्ञ का प्रस्ताव कुलगुरु वसिष्ठ के सामने रखा.सृष्टिकर्त्ता के मानस पुत्र वसिष्ठ उस समय इंद्र द्वारा आयोजित यज्ञ में ऋत्विक बनकर जा रहे थे,अतः उन्होंने निमि के संकल्प की अवहेलना की और कुछ दिन प्रतीक्षा करने को कहा.

निमि को समय-बोध था.वे जाग्रत थे,दीर्घसूत्री नहीं थे.वे जानते थे कि जीवन में समय का मूल्य कितना है.उनका यज्ञ धरती-पुत्रों की अभिलाषा की पूर्ति के लिए था,जबकि वसिष्ठ देवताओं को संतुष्ट करना चाहते थे.ब्राह्मणत्व जब विशिष्ट बनता है,तब वह धरती की बजाय स्वर्ग को महत्त्व देने लगता है.निमि ने सोचा कि वर्षा के बिना पूरा जनपद स्वाहा हो जाएगा.फिर देवताओं का दिन मानव के छह महीने के बराबर होता है.गुरु वसिष्ठ का कुछ दिनों में लौटने का अर्थ वे जानते थे.उत्तम संकल्प विलंबित नहीं होना चाहिए,ऐसा निश्चय करके उन्होंने तत्काल यज्ञ का  ऋत्विक बदल दिया और महर्षि गौतम को पुरोहित बनाकर यज्ञ प्रारंभ कर दिया.

वह जन-यज्ञ था,कृषि-यज्ञ था, और था उसमें मिट्टी का कण-कण निमंत्रित.लेकिन जैसे ही पूर्णाहुति की लपट ऊपर उठी,लोगों ने देखा कि वसिष्ठ आकाशमार्ग से लौट रहे हैं.वे संभवतः मानव की आहुतियों की गरमी को सह नहीं पाये थे.उन्होंने आते ही निमि को श्राप दिया,”अपने को विद्वान् एवं दूरदर्शी मानने वाले निमि ! तू मेरी जरा भी प्रतीक्षा नहीं कर सका? गौतम को ऋत्विक बनाकर मेरा अपमान करने वाले कुल-कलंकी निमि ! तेरा यहीं देह्पात हो जाए.

और उसी क्षण मानव-जाति की सबसे अनोखी और अभूतपूर्व घटना घटी.पहली दफा एक निरपराध एवं कर्तव्यनिष्ठ क्षत्रिय ने सर ऊँचा करके दंभी एवं क्रोधी ऋषि के शाप का विरोध किया और धीर-गंभीर स्वर में कहा,”गुरुदेव ! क्रोध एवं लोभवश आपने तथ्य को न समझ,मुझे शाप दिया है.अभी तक किसी क्षत्रिय ने पलटकर ब्राह्मण को शाप नहीं दिया,पर आज मैं दे रहा हूं.ब्राह्मण आकाश की दुहाई देकर शाप देते रहे हैं,मैं धरती की धूलि हाथ में लेकर शाप देता हूं  कि आपकी इसी क्षण मृत्यु हो जाए.

श्रीमद्भागवत में व्यास कहते हैं.......

निमि प्रतिददौ शापं गुरवेऽ धर्मवर्तिने |
तथापि पतताद्देहो लोभाद् धर्मनजानतः ||

मानव जीवन के इतिहास में संभवतः यह पहला अवसर था,जब किसी जागरूक क्षत्रिय ने पलटकर अपराधी ऋषि को शाप दिया हो.

यह दो शापों की टकराहट थी.यह ब्राह्म-तेज और क्षात्र-तेज का विध्वंसात्मक मंत्रयुद्ध था.वसिष्ठ का शाप लगा और निमि की देह उखड़े महावृक्ष की तरह मुठ्ठियों में धरती की धूल थामे धराशायी हो गयी.निमि का भी शाप लगा और वसिष्ठ के आसपास मौत का कुहासा घिरने लगा.वे महायोगी थे,अतः तत्काल समाधि में बैठ गये और मन-प्राणों को ब्रह्मरंध्र में केंद्रित करने के प्रयत्न में देह छोड़कर देवलोक पहुँच गये.

वहां कर्म,संस्कार एवं अभीप्सा के परिणामस्वरूप मित्र और वरुण के सम्मिलित तेजोमय अंश तथा उर्वशी के गर्भ से पुनः वसिष्ठ के रूप में अवतीर्ण हुए,लेकिन ये अभिनव वसिष्ठ एकदम बदले हुए थे.कहाँ तो क्रोधी,दंभी एवं यशलोलुप ज्वालामुखी की तरह जीने वाले पुराने वशिष्ठ और कहाँ ये शांत,मौन,सुस्थिर,प्रसन्न एवं शिष्ट वसिष्ठ,जो मर्यादापुरुषोत्तम राम के गुरु बने.

वसिष्ठ ने अपने पूर्व-जीवन से बहुत कुछ सीखा.फिर उन्होंने कभी क्रोध नहीं किया.निमि के शाप का यही औचित्य है कि गुरु वसिष्ठ गुरुतम विशिष्ट बन गये.

उधर निमि की देह यज्ञ-वेदिका के सिरहाने पड़ी थी.महर्षि गौतम बड़े दुखी थे कि –“हाय, मैं कैसा ऋत्विक बना,कैसा पुरोहित बना ! अब मेरे जीवन की सम्पूर्ण कामना का प्रतिफल यही हो सकता है कि निमि पुनः जीवित हो जाए.

उन्होंने उसी क्षण सभी देवताओं का आह्वान किया.इंद्र ने प्रणाम किया और पुछा.ऋषिवर हमें क्या आज्ञा है?” गौतम ने भर्राए कंठ से कहा .मेरे यजमान को समय-बोध और मनुष्यत्व के पोषण की कितनी कठोर सजा मिली है.लेकिन निमि अब दूसरा शरीर ग्रहण नहीं करेगा.वह इसी शरीर में पुनः जीवित होगा.आप उसे पुनर्जीवित करें.

मृत-शरीर को पुनः जीवित करने का यह मानवीय आग्रह इतिहास की दुर्लभ घटना है.इधर सूक्ष्म देहधारी निमि ने देह ग्रहण करने से साफ़ इनकार कर दिया.मुझे न स्थूल देह चहिए न सूक्ष्म देह.मैं तो जीवमात्र के पलकों पर निवास करना चाहता हूं,ताकि अहर्निशि उनके हास्य-रूदन के साथ जुड़ सकूं.मैं महाकाल के सर पर निमिष बनकर बैठना चाहता हूं.मिट्टी के पुतले को क्षण-बोध की शिक्षा देता रहूँगा.मैं पलकों पर धनुष की तरह पड़ा रहूँगा.जब कोई जनक सिंहासन से उतारकर खेत में हल चलाएगा और धरती की पुत्री सीता को प्राप्त करेगा,जब सीता की जयमाला ऊपर उठेगी,तब मैं शिवधनुष की तरह खंड-खंड हो जाऊँगा.

और यही हुआ.निमि नेत्र-पलकों ने उन्मीलन का अधिदेवता बन गया.पर उसके निर्जीव शरीर का क्या किया जाए? गौतम ने सब ऋषियों से कहा,”हमारे रहते निमि का वंश समाप्त हो,यह गौरव की बात नहीं है.हम इस शरीर को मथकर नया निमि पैदा कर लेंगे.यह एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है कि विभिन्न दिव्यौषधियों के लेप एवं विधि-विधान से शरीर मंथन के बाद इसी देह से नया पुरुष उत्पन्न किया जा सकता है.आदिकाल में पहले भी वेन को मथकर पृथु पैदा किया गया था.

मृत शरीर से मंथन क्रिया द्वारा पुनः जीवित करने की घटना आज के संदर्भ में कितनी प्रेरणादायक एवं रोचक हो सकती है.गौतम के नेतृत्व में मंथन-कार्य शुरू हुआ.समुद्र-मंथन का-सा दृश्य था.अंत में निमि की देह से बाल अरूण की तरह परम तेजस्वी युवक उत्पन्न हुआ.इसका नाम मिथिलपड़ा क्योंकि यह मंथन से उत्पन्न हुआ था.इसे जनकभी कहा जाता है,क्योंकि इसने खुद में से खुद को जन्म दिया था.यह विदेहनाम से भी प्रसिद्ध हुआ,क्योंकि देह-संयोग के बिना ही इसने जन्म लिया था.

मिथिला को इसने राजधानी बनाया.फिर तो,निमि-वंश के सभी राजाओं की उपाधि जनकऔर विदेहहो गयी.निमि की इक्कीसवीं पीढ़ी में सौरध्वज जनक हुए.जिन्होंने सीट(हल) चलाकर धरती की पुत्री-जानकी को प्राप्त किया था.

यह एक क्षत्रिय की कथा नहीं बल्कि एक जागरूक मनुष्य की कथा है,जिसने ब्राह्मणत्व एवं देवत्व को ललकारा और स्वयं में से स्वयं को पैदा करके सर्जना के नए आयाम खोले. 

Keywords खोजशब्द :- Story of Nimi,Mithila,Shrimad bhagvat,Bhagvat Puran,Devi Puran

Saturday, December 13, 2014

गया से पृथुदक तक


श्राद्ध और तर्पण के लिए जितना बिहार का गया शहर विख्यात रहा है उतना कोई अन्य शहर नहीं.पितृपक्ष में देश,विदेश के लाखों लोग पिंड दान,तर्पण के लिए गया पहुँचते हैं.लेकिन गया की महत्ता के कारण पृथुदक उपेक्षित ही रहा है.

आर्य संस्कृति का प्राचीनतम केंद्र कुरुक्षेत्र अपनी धार्मिक उपलब्धियों के कारण ही विशेष प्रसिद्ध है.पृथुदक इसी कुरुक्षेत्र का एक अविभाज्य अंग है.कुरुक्षेत्र के कारण ही पृथुदक की भी धार्मिक महत्ता बढ़ी है.

प्राचीन पृथुदक जिसे आज हम पेहोवा के नाम से जानते हैं,कुरुक्षेत्र से 25 किलोमीटर की दूरी पर पश्चिम में स्थित है.प्राचीन सरस्वती नदी के तट पर बसे इस स्थल का नामकरण ऋग्वेद में वर्णित राजा वेन के पुत्र पृथु के नाम पर किया गया है.राजा पृथु ने इस स्थान पर अपने पिता का श्राद्ध और तर्पण किया था.ऐसी पौराणिक धारणा है कि इस स्थान पर प्राण त्यागने से मोक्ष की निश्चित प्राप्ति होती है.

इस स्थल की प्राचीनता का परिचय हमें इसके पुराने टीलों से प्राप्त होता है,जहाँ पर काफी बड़ी ईटें,विभिन्न प्रकार के सिक्के तथा मिट्टी की मूर्तियाँ आदि प्राप्त हुई हैं.पृथुदक के पास उरन्य से 2 कि.मी. की दूरी पर नंदन खेड़ा में परवर्त्ती हड़प्पा संस्कृति के मृद्भांड अवशेष प्राप्त हुए हैं,जिन्हें विद्वानों ने सन 1500 के आस-पास रखा है.इसके बाद इस स्थल पर आर्यों का  आगमन हुआ,जिसकी पुष्टि वैदिक साहित्य से प्राप्त होती है.पृथुदक से संबंधित अनेक राजाओं जैसे ययाति,पृथु,आर्ष्टिषेण,देवापि,धृतराष्ट्र,विश्वामित्र,वशिष्ठ,शुक्र आदि नाम वैदिक ग्रंथों में भी पाये जाते हैं.

महाभारत में तो पृथुदक के माहात्म्य का विशेष वर्णन प्राप्त होता है,जो महाभारतकालीन संस्कृति से पृथुदक को जोड़ता है.महाभारत में कौरव और पांडवों के शिविरों का भी वर्णन मिलता है.इसके अनुसार सरस्वती के किनारे-किनारे पश्चिम में पांडवों के शिविर थे.इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि पांडवों की सैन्य शक्ति थानेश्वर और पृथुदक तक फैली हुई थी.शल्य-पर्व तथा वन-पर्व में पृथुदक के तीर्थों का विशेष वर्णन प्राप्त होता है.

सातवीं शताब्दी में थानेश्वर के वर्धनों के शासनकाल में पृथुदक और उसके आस-पास के प्रदेशों का महत्त्व अवश्य ही रहा होगा.सरस्वती के किनारे हर्षवर्धन ने अपने दिवंगत पिता प्रभाकरवर्धन को श्रद्धांजलि अर्पित की थी.पृथुदक श्राद्ध और तर्पण के लिए विशेष महत्त्व का स्थान था और यह असंभव नहीं कि हर्षवर्धन ने वहां जाकर अपने पिता की आत्मा की शांति के लिए कुछ अनुष्ठानों का आयोजन किया हो. चीनी यात्री ह्वेनशांग ने इस प्रदेश को धर्मक्षेत्र कहा है.सातवीं सदी के अंत में कन्नौज के राजा यशोवर्मन की सेनाओं ने श्रीकंठ जनपद के महाभारत से संबंधित स्थानों की यात्रा की थी.

कोरियन यात्री हुई-चाओ से हमें पता चलता है कि पश्चिमी भारत में यशोवर्मन ने अरबों को रोका था.यशोवर्मन के बाद पृथुदक और आस-पास का प्रदेश कन्नौज और राजस्थान के गुर्जर प्रतिहारों के साम्राज्य का निश्चित रूप से अंग बना.यहीं से हमें उनके दो अभिलेख प्राप्त हुए हैं.प्रथम गरीबनाथ के मंदिर की दीवार में लगा हुआ है,जो राजा भोज के संवत 276 अर्थात् सन 882-83 का है.यहाँ का दूसरा अभिलेख प्रतिहार सम्राट महेन्द्रपाल का है,जिसमें स्थानीय तोमर वंश की वंशावली दी गई है.राजा भोज के अभिलेख में घोड़ों के अनेक व्यापारियों का वर्णन मिलता है.

पेहोवा से प्राप्त दूसरा अभिलेख प्रतिहार सम्राट महेन्द्रपाल के समय का है. यहाँ के बाजार के मध्य सिद्धगिरि की हवेली की दीवारों पर यह लगाया गया था.इस अभिलेख से पता चलता है कि तोमर वंश के गोग्ग,पूर्णराज और देवराज बंधुओं ने पृथुदक में सरस्वती के तट पर तीन मंदिर बनवाये थे.संभव है कि कुरुक्षेत्र तथा पृथुदक में शासन करने वाला यह तोमर परिवार दिल्ली के तोमरों से संबंधित रहा हो.बारहवीं शताब्दी के मध्य तक तोमरों का शासन हरियाणा में चलता रहा.इसके बाद चौहान विग्रहराज ने उनके स्वतंत्र अस्तित्व को समाप्त कर दिया.

सन 1014 में महमूद गजनवी के थानेश्वर पर आक्रमण के समय थानेश्वर का विष्णु मंदिर तोड़ दिया गया था.इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि उसने पृथुदक के मंदिरों को भी तहस-नहस कर डाला हो.महमूद गजनवी मूर्तिभंजक के रूप में कुख्यात था.जिस बर्बरता के साथ थानेश्वर और पृथुदक के मंदिरों का विनाश हुआ है,वह संभवतः उसी समय की ओर संकेत करता है. तोमरों और चौहानों ने इस प्रदेश में मुस्लिम आक्रांताओं के प्रतिरोध की जी-जान से कोशिश की, लेकिन तराई के दुसरे युद्ध में पृथ्वीराज चौहान की गोरी से हार के बाद इस क्षेत्र का भविष्य मुस्लिमों के हाथ में चला गया.मराठों के आगमन के बाद ही इस स्थिति में परिवर्तन आया.स्थानीय परंपरा के अनुसार अनेक तीर्थों का जीर्णोद्धार मराठों ने किया था.

वैसे तो पेहोवा के सभी पुराने मंदिर मुस्लिम शासनकाल में धराशायी हो गये थे,पर उसके बाद नए मंदिर गत शताब्दियों में ही निर्मित हुए हैं.सिखों के बाद पेहोवा कैपल के शासकों के हाथ में चला गया,उसके बाद अंग्रेजों के शासन में.पृथुदक के धार्मिक महत्त्व की स्थापना सही रूप से मराठों ने की थी.उन्होंने ही प्रिथुदकेश्वर,प्रिथकेश्वर,सरस्वती एवं कार्तिकेय के मंदिरों का जीर्णोद्धार कराया.इस स्थान की धार्मिक महत्ता आज भी बनी हुई है.आज भी यहाँ देश के विभिन्न भागों से लोग श्राद्ध और तर्पण बहुत श्रद्धा के साथ करते हैं.

Keywords खोजशब्द :- Importance of Prithudak,Pehova,Kurukshetra

Tuesday, December 9, 2014

इच्छा मृत्यु बनाम संभावित मृत्यु की जानकारी


हाल के वर्षों में इच्छा मृत्यु संबंधी विवादों को काफी हवा मिली है और संबंधित व्यक्ति इस मांग को लेकर कानून में संशोधन की मांग को लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक गए हैं.पक्ष एवं विपक्ष के सम्बन्ध में अनेक तर्क दिए जाते रहे हैं और पीड़ित पक्ष की व्यथा को भी नजरंदाज नहीं किया जा सकता.

मृत्यु जीवन का एक ऐसा कटु सत्य है जो सृष्टि के आरंभ से अभी तक रहस्य बना है.विभिन्न समय एवं देशों में बहुत से लोगों ने प्रयत्न किया परंतु गुत्थी सुलझी नहीं.मृत्यु की सच्चाई ने मनुष्यों को भौतिक संसार से विमुख कर ईश्वर की ओर अग्रसर किया तो बहुत से लोगों को भौतिक सुख को ही अंतिम सत्य मानने की प्रेरणा प्रदान की.

मृत्यु केवल मरने वाले कही जीवन नहीं हरती,वह मृतक के परिवार पर भी अमिट प्रभाव छोड़ जाती है.मनुष्य ने धर्म और दर्शन के जरिये मृत्यु को समझने की चेष्टा की परंतु मृत्यु की भयावहता कम न हो सकी.वैज्ञानिकों ने मृत्यु पर विजय पाने के लिए हाथ-पैर मारे,वे भी असफल रहे.

कहीं-कहीं मृत्यु का आघात इतना गहरा होता है कि व्यक्ति का जीवन असामाजिक बन जाता है.इस आघात का प्रभाव कम करने के लिए एवं मृत्यु की सच्चाई को सामान्य एवं सहज रूप से स्वीकार करने के लिए पाश्चात्य मनोवैज्ञानिकों ने बहुत से प्रयत्न किये हैं.अब तो इस विषय की एक नयी शाखा ही बन गई है जिसे ‘थैनेटोलॉजी’ या ‘मृत्यु का अध्ययन’ कहा जाता है.

थैनेटोलॉजी का मुख्य उद्देश्य है,रोगी एवं रोगी के पारिवारिक सदस्यों के लिए मृत्यु की भयावहता कम करना.अमेरिका के डॉ. कुबलर ने इस विषय पर काफी काम किया है और अनेक लेख लिखे हैं तथा कई स्कूलों,अस्पतालों,धार्मिक संस्थाओं में व्याख्यान भी दिये हैं.उनकी प्रसिद्ध पुस्तक ‘ऑन डेथ एंड डाईंग’ इस विषय की प्रमुख पुस्तक है.इस विषय पर अध्ययन सत्रों,व्याख्यानों से लोगों को काफी लाभ हुआ है.

मनोवैज्ञानिकों का कहना है की परिवार में हुई मृत्यु का प्रभाव कम करने का एक तरीका यह है कि परिवार के सभी सदस्य इस विषय पर ईमानदारी बरतें.कहने का आशय यह है कि रोगी को उसकी बीमारी की गंभीरता के विषय में जानकारी दी जाय और दूसरे सदस्यों को भी इस बारे में अपनी भावनाएं खुलकर व्यक्त करने का अवसर मिले.रोगी की बीमारी की गंभीरता के विषय में बता देने से रोगी मृत्यु के सबसे बड़े दुःख ‘भयानक-अकेलेपन’ की भयानकता कम महसूस करेगा.

मनोवैज्ञानिकों के अनुसार सबसे आदर्श स्थिति तो यह है कि रोगी ही वह पहला व्यक्ति हो जिसे मालूम हो कि उसकी मृत्यु निकट है.रोगी को उसकी भावी मृत्यु के सम्बन्ध में बता देने से वह दूसरों से सहायता मांगने या उसकी सेवा-सुश्रुषा स्वीकार करने में अपराधी-भावना महसूस नहीं करेगा और साथ ही,अपनी भावनाएं एवं दुःख रो कर या अन्य माध्यम से खुल कर व्यक्त कर सकेगा.

लेकिन प्रश्न यह है कि रोगी को उसकी भावी मृत्यु का संदेश कैसे दिया जाय? इस सम्बन्ध में यह जरूरी है कि रोगी को उसकी बीमारी की गंभीरता के विषय में बताने से पूर्व चिकित्सक से उसकी स्थिति के विषय में निर्णयात्मक रूप से पूछ लिया जाना चाहिए.दूसरा ध्यान यह रखा जाय कि रोगी को उसकी निकट मृत्यु के विषय में धीरे-धीरे एवं बहुत ही मनोवैज्ञानिक ढंग से से बताना चाहिए क्योंकि जीवन से निराशा की स्थिति में कभी-कभी रोगी आत्महत्या करने पर उतारू हो जाता है.यह भी ध्यान देने की बात है कि रोगी को अपनी सही स्थिति जानने की उत्सुकता है या नहीं?

मनोवैज्ञानिको का एक दूसरा वर्ग इसे उपयुक्त नहीं मानता,क्योंकि आसन्न मृत्यु की जानकारी देने से रोगी जीने की आशा छोड़ सकता है.रोगी को जीवन के अंतिम क्षण तक बीमारी से ठीक होने की आशा रहती है.ऐसी स्थिति में व्यर्थ की आशा नहीं तोड़नी चाहिए.रोगी स्वयं प्रश्न करे तो सारी स्थिति सही-सही बता देनी चाहिए.

अमेरिका की मानसिक स्वास्थ्य के मशहूर मनोवैज्ञानिक डॉ. गोल्डस्टीन का कहना है कि पारिवारिक सदस्यों को मृत्यु के निकट पहुँच रहे रोगी के सामने कभी झूठी हंसी या ख़ुशी व्यक्त नहीं करनी चाहिए,क्योंकि इससे रोगी का डर और चिंता बढ़ जाती है.पारिवारिक सदस्यों को ऐसे रोगी जिसे मालूम हो कि वह बचेगा नहीं,इच्छाएं पूरी करनी चाहिए.

मनोविश्लेषक प्रायः इस विषय पर एक मत हैं कि यदि रोगी माता-पिता घातक बीमारी से पीड़ित हैं तो बच्चों को बीमारी के विषय में जितना संभव हो और जितना वे समझ सकें,बता देना चाहिए.इससे मृत्यु का आघात उनके लिए आकस्मिक तुषारापात नहीं होगा.सभी देशों में लोग प्रायः यही चाहते हैं कि बच्चों को माँ-बाप की मृत्यु की भनक न पड़ने पाये क्योंकि वे इतने छोटे हैं कि माँ-बाप की मृत्यु का दर्द नहीं सह सकेंगे.जबकि कुछ विख्यात मनोवैज्ञानिको के अनुसार,बच्चों को दाह-संस्कार में भी शामिल करना चाहिए जिससे मृत्यु उनके लिए भीषण रहस्य न बनी रहे और वे भी सबके दुःख में अपना दुःख बंटा सकें.बच्चे कभी-कभी बड़ों से ज्यादा समझ से काम लेते है.

आशय यही है कि मृत्यु अवश्यंभावी है और देर-सबेर सभी को एक न एक दिन जाना है तो क्यों न प्रारंभ से ही ऐसे प्रयत्न हो कि कोई व्यक्ति ज्यादा विचलित न हों.मृत्यु जीवन का एक धर्म है और हर व्यक्ति शिशु,युवा,वृद्ध में मृत्यु और मृत्यु के परिणामों को समझने एवं सह सकने की पूर्ण क्षमता होनी चाहिए.मृतक की याद में घुलते रहने से परिवार के सदस्य न केवल स्वयं का जीवन नष्ट करते हैं बल्कि परिवार पर भी बुरा असर पड़ता है.मृत्यु को सामान्य एवं सहज रूप से समझने का प्रयास हो.

Wednesday, October 22, 2014

दीपावली,गणपति और तंत्रोपासना

तांत्रिक गणपति 
दीपावली अंधकार में प्रकाश का पर्व है,लेकिन इसका महत्व इतने से ही कम नहीं हो जाता. दीपावली को कालरात्रि कहा गया है,इसलिए जितने तांत्रिक और सिद्धिदायक अवयव हैं,उनका प्रयोग दीपावली की रात्रि को ही किया जाता है.इसके लिए मध्यरात्रि और परम एकांत जरूरी है.हमारे वेद,पुराण और संहिताओं सभी में मंत्र की महत्ता को बताया गया है.ऋग्वेद की हर ऋचा अपने आप में एक मंत्र है.स्वयं गायत्री मंत्र ऋग्वेद की धरोहर है.

किसी भी शुभ कार्य को प्रारंभ करने से पहले गणेश की वंदना करना,उन्हें नमन करना आज भी सर्वमान्य लोकरीति है.संभवतः इसीलिए किसी भी कार्य को प्रारंभ करना ‘श्री गणेश’ करना कहा जाता है.गणेश हमारे देवमंडल में अग्रपूजा का सम्मान पाने वाले देवता हैं.

गणेश की इस महत्ता के पीछे उनमें सन्निहित अनेक गुण हैं जिनसे उपासक को अनेकानेक लाभ प्राप्त होते हैं.उन्हें विघ्नविनाशक,बुद्धिप्रदाता,मांगल्य के देवता,ऋद्धि –सिद्धि के प्रदाता आदि रूपों में पूजा जाता है.वे विघ्नविनाशक हैं,इसलिए प्रत्येक शुभ कार्य के प्रारंभ में उनका आवाहन – पूजन किया जाता है ताकि वह कार्य निर्विघ्न संपन्न हो.

जिस प्रकार किसी मंत्र के उच्चारण के पूर्व ॐकार का उच्चारण आवश्यक माना जाता है,उसी प्रकार किसी भी शुभ कार्य के पहले गणेश-पूजा अनिवार्य मानी जाती है.

गणेश के दैवत्व पर तथा उनसे संबंधित आख्यानों के लिए याज्ञवलक्यसंहिता,प्राणतोषिनी,       परशुराम कल्पसूत्र,तंत्रसार,शारदातिलक,मैत्रायिणी संहिता,ब्रह्मवैवर्त,विष्णुधर्मोत्तर आदि पुराणों में प्रचुर सामग्री मिलती है.इन ग्रंथों के विवरण से गणेश के महात्मय में निरंतर वृद्धि होती है.

प्रायः विद्वान ऐसा मानते हैं कि गणेश उपासना में नवीं दशवीं शती ई. तक तंत्र का समावेश हो चुका था. गणेश का उद्भव शिव – परिवार में होने की कथा के आधार पर उन पर शैव प्रभाव प्रारंभ से ही बना था.भारतीय मूर्तिकला इस बात की साक्षी है.गणेश की मूर्तियों में उर्घ्व लिंग,त्रिनेत्र, मुंडमाल,अर्धचंद्र मौलि,सर्वयज्ञोपवित और व्याघ्रचर्माम्बर उन्हें शिव के निकट सिद्ध करते हैं.

शायद शैव प्रभाव के कारण ही गणेश का घनिष्ट संपर्क शाक्त संप्रदाय से हो गया.गणपति संप्रदाय में गणेश की पूजा के बाद शक्ति की पूजा का विधान है.तंत्राचार में गणेश का इन शक्तियों के साथ विशेष संबंध हो गया था.

व्याकरण के अनुसार ‘मात्रिका’ शब्द का अर्थ होता है ‘माता इव’ अर्थात माता के तुल्य. मातृकाएं क्रूर स्वभाव की मानी गई हैं.परन्तु इन्हें प्रसन्न करने पर ये मातृवत पालन करती हैं.मातृकाओं का यह स्वभाव विघ्नेश्वर गणेश के स्वभाव से मेल खाता  है. 

ऐसा माना जाता है कि गणेश भी स्वभाव से विघ्नकर्ता थे,तभी उन्हें विघ्नेश्वर और विघ्नेश कहा गया है.किन्तु पूजा करने पर वही गणेश सभी विघ्नों का नाश कर देते हैं.शायद इसी स्वभाव साम्य के कारण गणेश का संबंध मातृकाओं से स्थापित हो गया.देश के विभिन्न स्थानों से मिले सप्तमात्रिका – फलकों पर प्रायः गणेश का पहला स्थान है.

15वीं शती के शिल्पग्रंथ ‘रूपमंडन’ में गणेश के मंदिर में विभिन्न शक्तियों की मूर्तियों की स्थापना का निर्देश है.इनमें गौरी,बुद्धि,सरस्वती,सिद्धि आदि के नाम सम्मिलित हैं.उत्तर प्रदेश के फतेहगढ़ के चित्रगुप्त मंदिर में उसकी एक भित्ति पर प्रतिहार कालीन नृत्यरत गणेश की मूर्ति सीमेंट से जड़ी हुई है. इस मूर्ति के दोनों पार्थों में सरस्वती,अम्बिका,लक्ष्मी,दुर्गा और मातृका की मूर्तियाँ भी उकेरी गई हैं.

उड़ीसा में रत्नागिरी की पहाड़ी पर एक विशाल बौद्ध विहार के अवशेष पाए गए हैं जो वहां तंत्रयान का साक्ष्य समुपस्थित करते हैं. इन अवशेषों में महाकाल का एक मंदिर और गणेश की कुछ मूर्तियाँ मिली हैं.तिब्बत और हिमाचल प्रदेश में वज्रयान एवं तंत्रयान से प्रभावित बौद्ध मठों और विहारों में भी गणेश की मूर्तियाँ मिली हैं.

तंत्राचार में गणेश या गणेश – उपासना में तंत्राचार की परिपुष्टि करने वाले कुछ उदाहरण भारतीय मूर्तिकला में मिलते हैं.बिहार से प्राप्त दो चतुर्मुखी शिवलिंगों पर भी गणेश का महत्वपूर्ण अंकन पाया गया है और ऐसा ही प्रतिहारयुगीन शिवलिंग काशी नरेश,वाराणसी के संग्रह में बताया जाता है.जावा में भी मिले एक शिवलिंग पर गणेश की मूर्ति है जो हौलेंड में है. इस प्रसंग में पद्मपुराण में कहा गया है कि ब्रह्मपुत्र नदी के तट पर लिंगरुपी विनायक का उल्लेख है........

देशे च भारतवर्षे वनितापूर्ण सन्निधौ |
लौहित्यदक्षिणे तीरे लिंगरुपी विनायकः ||

शिवलिंगों की योनिपीठ पर गणेश के ये अंकन निश्चित ही उन्हें तंत्रोपासना से संबंध ठहराते हैं.श्रीगणेशपुराण के अंतर्गत उपासना खंड में आए गणपति अष्टोत्तर शतनामस्रोतम के श्लोक 
कहते हैं .... 

कामिनीकामनाकाम मालिनिकेलिला लितः |
अमोघसिद्धिराधार आधाराधेयवर्जितः ||

गणेश की कई विचित्र प्रतिमाएं जावा से मिली हैं,जिन पर गणेश का कापालिक स्वरूप दर्शाया गया है.सिंगसिरी से मिली एक प्रतिमा यूरोप में लीडेन संग्रहालय में है.इस प्रतिमा में गणेश के मुकुट की मध्य मणि तथा दोनों वक्षों पर कपाल बने हुए हैं और जिस आसन पर वे बैठे हैं,वह भी कपाल पंक्ति से सजाया गया है.बोरा से मिली दूसरी प्रतिमा के आसन पर भी कपाल बने हैं और उसके पृष्ठ भाग पर विशाल और विकराल कीर्तिमुख बना है.ये सभी प्रतिमाएं गणेश उपासना में तंत्राचार की परिचायक हैं.

Tuesday, October 7, 2014

बुजुर्ग या वरिष्ठ नागरिकों की उपेक्षा क्यों ?

आज के तथाकथित अत्याधुनिकता के इस युग में बुजुर्गों की उपेक्षा अधिक बढ़ी है.जबकि बुजुर्ग कभी उपेक्षा के पात्र नहीं हो सकते.किसी भी समाज के लिए उनकी भूमिका न केवल महत्वपूर्ण होती है बल्कि सामाजिक धरोहर के रूप में भी सामने आती है.

पीढ़ियों के अंतराल के कारण वैचारिक मतभेद या टकराव का सिलसिला तो हजारों साल पुराना है ही,परंतु आजकल महानगरीय जीवन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका को ही हम भूलने लगे हैं.उनके साथ होने वाले दुर्व्यवहार से लगता है मानो उनके अस्तित्व को ही नकारा जा रहा हो.यह परिस्थिति भारत जैसे देशों के  के लिए अत्यंत त्रासदीपूर्ण है क्योंकि हमारा देश प्रारंभ से ही संस्कृतिप्रधान देश रहा है.

पूरी दुनियां का आध्यात्मिक गुरु माने जाने वाले भारत ने दुनियां को तो प्रेम का पाठ पढ़ाया लेकिन अपनी ही भूमि में अब प्रेम की संस्कृति समाप्त होने लगी है.हमारा पालन-पोषण करने वाले बुजुर्गों की उपेक्षा इसी त्रासदीपूर्ण परिस्थिति का उदहारण है.उनके साथ अमानवीय व्यवहार दुखदायी है.बुजुर्गों के प्रति उपेक्षा की भावना की शुरुआत पूरी दुनियां में दूसरे विश्वयुद्ध के बाद से हुई,जो कि अब व्यापक रूप से समाज में फ़ैल गई है.

सबसे पहले इस अमानवीय व्यवहार पर विचार करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर 1981 में जिनेवा में हुए सम्मेलन में 1 अक्तूबर को ‘अंतर्राष्ट्रीय वृद्ध दिवस’ के रूप में मनाने का निर्णय किया गया.इसी के साथ विश्व समुदाय ने वृद्धों की बढ़ती संख्या तथा उनकी बदलती हुई सामाजिक दशा पर चिंता व्यक्त की.बुजुर्गों की देखभाल करना तथा उन्हें सामाजिक सुरक्षा प्रदान करना एक परम पवित्र कार्य है जिन्हें पूरा करने की जिम्मेवारी वर्तमान पीढ़ी के कंधे पर ही है.

इस बात पर भी विचार किया जाना जरूरी है कि वृद्धावस्था की शुरुआत किस उम्र से होती है.सरकारी तौर पर यह 58 या 60 वर्ष की आयु है लेकिन देश में ऐसे लोग भी हैं जीवन की शतकीय पारियां खेली हैं.प्रसिद्ध क्रिकेट खिलाड़ी स्व. प्रो. देवधर(101 वर्ष),प्रसिद्ध चित्रकार स्व. विश्वनाथ सारस्वत तथा स्व. मोरारजी देसाई जैसे महान शख्सियत की उम्र को देखते हुए 58-60 वर्ष की आयु बहुत कम लगती है.अतः बुढ़ापे की आयु क्या होनी चाहिए यह एक बड़ी गुत्थी है.वैसे 
वृद्धावस्था की सबसे प्रचलित परिभाषा शायद यह है कि जब मानव शरीर की शक्ति तथा सक्रियता क्षीण होने लगे तो समझा जाना चाहिए कि बुढ़ापे की दस्तक आ चुकी है.

शरीर में रक्त संचार की गति ही वृद्धावस्था को निर्धारित करने वाला प्रमुख आधार है.प्रत्येक मानव के शरीर में 40 से 50 वर्ष की आयु तक विशेष परिवर्तन आ जाते हैं.यह कहा जा सकता है कि वृद्धावस्था के आने पर मानव शरीर में रक्त बनने की प्रक्रिया बंद होने लगती है.जब शरीर में ताजा रक्त का संचार बंद हो जाता है तब शरीर की असंख्य कोशिकाओं को ऑक्सीजन एवं दूसरे तत्वों की आपूर्ति बंद हो जाती है.इसके फलस्वरूप शरीर के आकार में कमी आ जाती है तथा शरीर की त्वचा में झुर्रियां आने लगती हैं.परंतु त्रासदी इस बात की भी है कि इस प्रकार की प्राकृतिक प्रक्रिया के कारण होने वाले शारीरिक परिवर्तनों को आयुवाद की सीमा में बंद करने की चेष्टा की जा रही है.यह प्रवृत्ति एक प्रकार का  सामाजिक तथा मानसिक अपराध ही है.

किसी भी व्यक्ति की उम्र का बढ़ना उसके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है.मानव के पैदा होते ही उसकी प्रक्रिया शुरू हो जाती है.अतः वृद्ध होने पर ही इसका आतंक क्यों बढ़ता है? एक समय था जब भारत के गांवों में यह कहावत प्रचलित थी कि जहाँ बुजुर्ग लोग नहीं होते हैं वहां काम नहीं बन पाता है.दूसरी ओर आज की परिस्थिति यह है कि सामाजिक विघटन की वजह से ऐसी कहावतों को न कोई मानता है और न ही महत्त्व देता है.

इन परिस्थितियों के लिए शायद बढ़ती महंगाई भी कुछ हद तक जिम्मेवार है.संयुक्त परिवार को केंद्रित परिवार में परिवर्तित करने में भी इसकी भूमिका रही है.इसी वजह से निर्धन तथा मध्य वर्ग के परिवारों के लिए अपने बुजुर्गों पर होने वाले मामूली खर्चे को भी बोझ महसूस किया जाता है.बुजुर्गों की उपस्थिति को ही वे मानसिक तनाव का स्रोत समझने लगते हैं.हालाँकि सरकारी सेवा से निवृत्त व्यक्ति तो फिर भी पेंशन से अपना गुजारा कर लेते हैं,परंतु उनकी दशा सोचनीय रहती है जिनके पास कोई वित्तीय साधन या सहारा नहीं होता.

बुजुर्गों की समस्याएँ न केवल भारत एवं अन्य विकासशील देशों में हैं बल्कि पूरी दुनियां में उनकी समस्याएँ बढ़ रही है.विकसित देशों में तो ‘ओल्ड एज होम’ बहुत पहले से रहा है,अब भारत जैसे देशों में भी इनकी स्थापना हो चुकी है,जहाँ बेसहारा एवं अपनों से उपेक्षित बुजुर्गों की संख्या बढ़ रही है.

महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी है कि जिन्होंने अपना उर्जावान समय समाज को दिया,आज उन्हीं को प्रेम तथा आदर-सत्कार से वंचित रखना अपराध नहीं.यह तो उनका अधिकार ही है.वर्तमान समय में यह जरूरी है की बुढ़ापे को सक्रिय तथा गतिशील बनाया जाए.साथ ही इस बात की भी आवश्यकता है कि वरिष्ठ नागरिकों या बुजुर्गों को उचित सम्मान एवं अधिकार मिले.उनको संरक्षण प्रदान करना न केवल जरूरी है बल्कि समाज की जिम्मेवारी भी है.

Friday, October 3, 2014

इतिहास के बिखरे पन्ने : आंसुओं में डूबी गाथा

श्रीकृष्ण वाटिका 
हमारे आस-पास ऐतिहासिक महत्त्व की ऐसी अनेक वस्तुएं,स्मारक,चिन्ह यत्र-तत्र बिखरे पड़े मिलते  हैं,जिनकी ओर बरक्श हमारा ध्यान नहीं जाता.उन्हीं महत्वपूर्ण वस्तुओं,इमारतों,स्मारकों के बारे में जब कोई अन्य व्यक्ति ध्यान दिलाता है तब सोचते हैं कि इस बारे में तो हमें पता ही नहीं था.

बिहार के मुंगेर शहर का ऐतिहासिक मीर कासिम का किला ही महत्वपूर्ण ऐतिहासिक धरोहर नहीं है, बल्कि अन्य महत्वपूर्ण स्मारकों, गंगा के घाट,चंडी स्थान,योग विद्यालय आदि के लिए भी यह शहर जाना जाता है.कष्टहरणी घाट के ऊपर बने टीले से गंगा का नजारा अद्भुत लगता है तो बरसात के दिनों में यहाँ से उफनती गंगा भयावह दृश्य उत्पन्न करती है.

कष्टहरणी घाट के सामने श्रीकृष्ण वाटिका में बंगाल(बिहार,उड़ीसा) के अंतिम नवाब मीर कासिम के दो जांबाज बच्चों गुल और बहार की जीर्ण-शीर्ण मजार ब्रिटिश हुकूमत के जुल्मोसितम की दास्तां बयां करती है.आज भले ही हम उन जांबाज बच्चों की कुरबानी को भूल चुके हैं लेकिन ब्रिटिश हुकूमत भी उन बच्चों की जांबाजी के इतने कायल थी कि जब तक हिंदुस्तान में रहे,तब तक उन बच्चों के सम्मान में मजार पर बंदूक की सलामी दी जाती रही.रोजाना सुबह-शाम अंग्रेज अधिकारी और सिपाही मजार पर सलामी देते रहे.

‘मुंगेर गजेटियर’ के लेखक पी. सी. राय चौधरी ने लिखा है की नवाब मीर कासिम की पराजय के बाद ब्रिटिश हुकूमत की नींव मजबूत हो गई थी.उसी दौर में नवाब के दो बच्चों की हत्या भूलवश हो गई.इसके लिए अंग्रेज शासक अपने को जिम्मेदार मान रहे थे.इसी कारण उन बच्चों के सम्मान में मजार पर रोजाना बंदूक की सलामी देने का आदेश दे रखा था.

इन जिंदादिल बच्चों की दास्तां भी कम रोचक नहीं.ब्रिटिश हुकूमत अपनी ‘फूट डालो राज करो’ की नीति को अंजाम देते हुए बंगाल पर अपना आधिपत्य कायम कर चुकी थी और आगे बढ़ने की योजना बना रही थी.नवाब मीर कासिम को यह मंजूर नहीं था कि व्यावसायिक का चोला फेंक कर अंग्रेज हिंदुस्तान पर हुकूमत करें.इसलिए उन्होंने अंग्रेजों को समुद्र पार खदेड़ने का फैसला किया.उन्होंने मुर्शिदाबाद से दूर मुंगेर में अपनी नयी राजधानी बनाई और मुंगेर किले का जीर्णोद्धार कर आयुधशाला की स्थापना की.फौज को सुसंगठित कर फिरंगी हुक्मरान के साथ जंग का ऐलान किया.मीर कासिम ने मुंगेर राजधानी एवं किले की सुरक्षा का भार अपने वफ़ादार अरबली खां को सौंप कर फौज के साथ कूच किया.उधवा नाला के पास फिरंगी फौजों से मुकाबले में मीर कासिम की पराजय हुई और वे किसी तरह बचकर निकले.

मेजर एसम्स के नेतृत्व में ब्रिटिश फौजों ने मुंगेर किले को चारों तरफ से घेर कर तोपों से जबर्दस्त गोलाबारी की.इसके विरुद्ध नवाब की सुरक्षित सेना टिक नहीं सकी.स्थिति को भांपकर नवाब के वफ़ादार अरबली खां ने मीर कासिम के दो युवा बच्चों गुल और बहार को सुरक्षित भूमिगत सुरंग से बाहर निकाला.मेजर एसम्स के सामने अरबली खां के आत्मसमर्पण करते ही ब्रिटिश फौजों ने गुस्से में उसकी हत्या कर दी और किला क्षेत्र मुंगेर में जुल्म-अत्याचार की सीमा पार कर दी.काफी रक्तपात के बाद अंग्रेजों का मुंगेर पर अधिकार हो सका था.

‘मुंगेर गजेटियर’ के लेखक पी. सी. राय चौधरी  ने लिखा कि अक्टूबर 1764 में दो दिनों तक मुंगेर एवं किले पर बरतानी फौज गोले बरसाते रहे.किला क्षेत्र में अफरातफरी मच गई थी.हताहतों एवं मृतकों की संख्या काफी थी.

मीर कासिम के दोनों युवा बेटे-बेटियों ने अपने वतन से मुहब्बत के कारण सुरंग में रहकर अपने वफ़ादार साथियों को एकजुट कर अंग्रेजों से मुंगेर को आजाद कराने की ठानी.मेजर एसम्स ने मुंगेर में मीर कासिम के वफ़ादार लोगों को फांसी पर लटकाने का आदेश दे रखा था.ऐसे सैकड़ों लोगों को किला क्षेत्र में ही फांसी दे दी गई.दूसरी ओर नवाब के बच्चों की सरगर्मी से तलाश जारी थी.यह सूचना नवाब के बच्चों को भी मिल रही थी.इसलिए मीर कासिम के बेटे बहार रात में बाघ की खाल पहनकर अपने वफादारों से मिलते थे.

अंग्रेज अफसरों को विश्वास था कि मीर कासिम के दोनों बच्चे मुंगेर में ही कहीं छिपे हैं,इसलिए फौज की एक टुकड़ी उनकी तलाश में घरों,जंगलों,पहाड़ों की खाक छान रही थी.एक रात बाघ की खाल में बहार सुरंग के पास गंगा नदी के किनारे टहल रहे थे कि एक अंग्रेज अफसर की नजर पड़ गई और उसने बाघ समझकर उसी क्षण गोली मार दी.उसकी बहन गुल को विश्वास नहीं था की गोली उसी के भाई को मारी गई.देर रात बहार के नहीं लौटने पर सुबह भिखारिन के वेश में सुरंग से बाहर निकली तो थोड़ी दूर गंगा के किनारे भीड़ देखी.उत्सुकतावश जब वहां पहुंची तो अपने भाई को मृत पाया.बाघ की खाल में बहार की लाश को देखकर अंग्रेज अफसर भी हैरत में थे.उनके अंतर्मन को यह बात छू गई.मुंगेर वासियों को उनकी हत्या से काफी आघात लगा.गुल ने उस वक्त तो सीने पर पत्थर रख लिया लेकिन सुरंग में वापस लौटकर जी भर रोई.भाई की मौत ने उसे झकझोर कर रख दिया था.

अंग्रेज अफसरों ने बहार को ससम्मान पीर साहनसफा गुल के दरगा द्वारा कष्टहरणी घाट के पास दफ़नाया.वहां बड़ी संख्या में अंग्रेज अफसर एवं फौज ने बंदूक की सलामी दी थी और रोजाना बंदूक की सलामी देने का आदेश जारी कर दिया था.

अपने जान से अजीज छोटे भाई की मौत ने गुल को इतना आहत किया कि दूसरी रात भाई की मजार से लिपटकर ख़ुदकुशी कर ली.सुबह तड़के जब अंग्रेज फौज एवं अफसर सलामी देने आये तो गुल को हथियारबंद युवक की पोशाक में मृत पाया.सब उस जांबाज बच्ची की क़ुरबानी पर फफ़क पड़े थे.अंग्रेज अफसरों की भी आँखे छलछला गई थीं.गुल को भी उसी मजार के पास दफना दिया गया.

कुछ इतिहासकारों क मानना है कि अपने भाई की निर्मम हत्या का बदला लेने के लिए गुल जो अचूक निशानेबाज थी,ने मर्द की पोशाक में बंदूक लेकर किले के अंदर अंग्रेजी फौजों को ललकारा और मरते-मरते अपनी जांबाजी क ऐसा करिश्मा दिखाया कि दर्जनों फौजी उनकी गोली से मारे गये और खुद मेजर एसम्स बुरी तरह घायल हो गया था.आख़िरकार किले के अंदर अंग्रेज फौज ने घेर कर गुल की गोली मारकर हत्या कर दी थी.

आजादी से पहले तक जांबाज बच्चों की मजार की सुरक्षा अंग्रेज फौज के जिम्मे थी.आजाद हिंदुस्तान में उन बहादुर बच्चों की क़ुरबानी को भुला दिया गया.आज भी उनकी जीर्ण-शीर्ण मजार मुंगेर किला क्षेत्र के कष्टहरणी घाट स्थित श्रीकृष्ण वाटिका में स्थित है,मानो कह रही हों.......

ख़मोशी में निहां खूं गशता लाखों आरजुएं हैं
चिरागे मुरदा हूं मैं बेजबां गोरे गरीबां का

(मेरे मन में लाखों कामनाएं खून हो-होकर प्रच्छन्न हो गई हैं.मैं बेजबान परदेशियों की कब्र का बुझा हुआ दीपक हूं.)