Thursday, April 24, 2014

मूक पशुएं और सौदर्य प्रसाधन















फैशन और सौंदर्य के दिखावे के कारण आज मानव इतना निर्दयी हो गया है कि उसको किसी भी प्राणी को बेरहमी से मारने में कोई हिचक नहीं होती.‘फर’ और ‘मखमली’ कोटों,सुगंधित शैम्पू,खाल से बने पर्स आदि की मांग लगातार बढ़ती जा रही है.यह सब अनेक मूक प्राणियों को बर्बरतापूर्वक वध करके प्राप्त किया जाता है.आख़िर इन मूक और बेजुबान पशुओं का कसूर क्या है?

खरगोश,लोमड़ी आदि को फार्मों में तब तक पाला जाता है जब तक कि इनकी खाल उतरने लायक न हो जाए.इनको क्लोरोफॉर्म युक्त एयरटाइट चैम्बरों में रखा जाता है.साँस न ले पाने के कारण यह धीरे-धीरे मर जाते हैं और फिर इनसे फर कोट तैयार किया जाता है.पानी में रहने वाला ‘मिंक’ नामक जानवर, कभी-कभी बाहर आते ही अपनी नरम और मुलायम खाल के कारण मौत का शिकार हो जाता है.दक्षिण अफ्रीका में पाया जाने वाला ‘चिनचिल’ नामक जानवर भी अकारण मौत का शिकार होता है.इनकी खालों से कोट बनाया जाता है.

‘फर’ उद्योग में काफी मूल्यवान समुद्री ‘सील’ मछली लगभग 450 कि.ग्रा. तक की होती है,लेकिन इसके छोटे –छोटे बच्चों का ‘फर’ काफी मुलायम तथा मूल्यवान होता है.इसके दो हफ्ते के बच्चे को माँ से अलग कर दिया जाता है.उसको डंडों से तब तक मारा जाता है जब तक कि वह मर न जाए.फिर एक सलाख बच्चे के सिर में घुसा दी जाती है.

चमड़ा ख़राब होने के डर से इसको गोली नहीं मारी जाती.कभी-कभी तो मरने से पहले बेहोशी की हालत में ही तुरंत खाल उतारने के लिए उसको चीर दिया जाता है.बेबस और लाचार सील अपने बच्चे का करूण क्रंदन सुनती और देखती रहती है.खाल उतारने के बाद खून से लथपथ मांस के लोथड़े को सूंघती है.लेकिन उसी के ‘फर से बना कोट कितने शौक से पहना जाता है.एक ‘फर’ कोट के लिए 5-6 सील,4-5 चीते,35 मिंक,उदबिलाव या खरगोश,10 बनविलाव,40 अमेरिकी रेकुम भालू चाहिए.

उदबिलाव को पकड़ने के लिए नुकीले दांतों वाला लोहे का पिंजरा होता है.ये पिंजरे काफी मात्रा में जंगल में बिछा दिये जाते हैं.इन पिंजरों मरण पैर फंसने पर उदबिलाव छोटने के लिए तड़पते रहते हैं.इसी हालत में लगभग 15-20 दिन भूखे-प्यासे रहते हैं.मरने पर उनके शरीर की खाल उधेड़ कर ‘फर’ कोट बनाये जाते हैं.

इसी प्रकार व्हेल मछली का शिकार एक ऐसे ‘हार्पून ग्रिनेड’ की मदद से किया जाता है जो इसके शरीर में जाकर फटते हैं.मरते समय अत्यधिक वेदना की वजह से एक विचित्र सी चीख की आवाज आती है.कुछ लोग इसका मांस खाते हैं.इसकी खाल से निकलने वाला तेल मिसाइल के पुर्जों में डाला जाता है.

सुगंधित तेल एवं अन्य प्रसाधन सामग्री के लिए कछुओं को भी नहीं छोड़ा जाता.समुद्र और नदियों से पकड़कर उन्हें बोरों में भरकर ट्रकों और ट्रेनों में लाड दिया जाता है.जीवित हालत में ही इनका मांस निकल लिया जाता है और वे बहुत धीरे-धीरे मरते हैं.इससे ‘टार्टिल ओडल’ बनता है जो मास्चराइजर्स के काम आता है.कछुओं की तस्करी भी की जाती है.दुनियां का तमाम हिस्स्नों में वन्य जीव अधिनियम लागू होने के बाद भी इन पधुओं का अवैध कारोबार चलता रहता है.

शैम्पू के लिए खरगोशों को मारा जाता है.शैम्पू की दो-तीन बूंदें खरगोश की आँखों में डाली जाती हैं,जिससे पता चल जाए कि उसको कितनी जलन एवं खुजली होती है.कुछ देर तक वह यों ही पड़ा रहता है.उसकी आँखों में छाले पड़ जाते हैं और वह पूरी तरह अँधा हो जाता है.इसके बाद वह मर जाते हैं.यह सब सिर्फ शैम्पू के परीक्षण के लिए किया जाता है जिससे इंसानों के बाल मुलायम और चमकीले रह सकें.इसी प्रकार आफ्टर शेव लोशन का भी सूअर पर परीक्षण किया जाता है.सुअरों के बालों का प्रयोग विविध प्रकार की वस्तुएं बनाने में किया जाता है.

जंगलों में रहने वाले साँपों को भी जिंदा मारा जाता है.सांप के सर पर एक बड़ी कील रखकर हथौड़े से वार किया जाता है.कुछ ही क्षणों में सांप तड़पने लगता है.तब एक आदमी सांप की पूँछ को पैर से दबाकर ब्लेड से चीरता है.एक चीरा गले पर लगाया जाता है.सांप की खाल जिंदा रहते ही उतार ली जाती है.सांप के लोथड़े से प्राण उसके बाद भी नहीं निकलते.कुत्ते या अन्य जानवर उसे जिंदा नोच-नोचकर खाते रहते हैं,सिर्फ इसलिए कि इससे आकर्षक लेडीज बैग,पर्स आदि बनाया जा सके.

नेवला,जो साधारणतया किसी को नुकसान नहीं पहुंचाता,इसे भी लोहे की गरम चदों से पीत-पीटकर अधमरा किया जाता है या फिर बिल से बाहर आते ही शिकंजे में इसकी गर्दन फंसाकर जरा सी मोड़ दी जाती है और वह मर जाता है.यह सब इसकी खाल के लिए किया जाता है.
कंगारू के मरते ही,उसके मृत शरीर के सारे अंग काम में ले लिए जाते हैं.सिर्फ अंडकोष वाला हिस्सा बेकार रहता है.

आस्ट्रेलिया के इयान बर्ट्स ने इससे पर्स बनाकर बेचने का इरादा किया और ऐसी विधि विकसित कर ली कि इसे रेजगारी रखने के पारंपरिक बटुओं के रूप में लोकप्रियता मिल गई. इन बटुओं को खरीदने वाले जापानी पर्यटक इसे सुख और समृद्धि का प्रतीक मानते हैं.इसलिए जापानी लोग उर्वरता की देवी की पूजा करने की सारी सामग्री इन्हीं बटुओं में रखने लगे.

धीरे-धीरे इयान के बटुए ने उन्हें करोड़पति बना दिया.अपनी दौलत तथा समृद्धि को जापानियों की कृपा मानने वाले इयान ने जापान में कंगारू फार्म खोला और कंगारू की दुम का सूप बेचने लगा.अनेक कंगारू असमय ही कालकवलित होने लगे.

हाथी दांत को प्राप्त करने के लिए प्रतिवर्ष कितने हाथी मारे जाते थे.हालाँकि वन्य जीव अधिनियम का कड़ाई से पालन होने पर इनकी मौतों पर रोक लगी है लेकिन दुनियां के कई हिस्सों में उस सिलसिला बदस्तूर जारी है.जानवरों में सबसे वफादार कुत्ता है.हंगरी के ‘शेफर्ड’ एवं ‘डलमेशियन’,’मास्टिफ’,विश्व का सबसे विशालकाय कुत्ता ‘जोरबा’,आस्ट्रेलियन कुत्ता ‘जोरबा’ जैसी कई नस्लें हैं.लेकिन इंसान ने इसे भी नहीं छोड़ा.एक विशेष नस्ल के कुत्तों को एक साथ खड़ा करके करेंट प्रवाहित कराया जाता है और भयंकर पीड़ा से छटपटाते कुत्तों का झुंड दम तोड़ देता है.इनके कानों का उपयोग पर्स बनाने के लिए होता है.

खाल के लालच में बाघ,कस्तूरी के लिए प्रति वर्ष कई हजार कस्तूरी मृग मारे जाते हैं.कस्तूरी एक सुगंधित पदार्थ है जो नर कस्तूरी मृग के पेट में लटक रहे अंडे के आकार की एक गिल्टी से प्राप्त होती है.ऐसा समझा जाता है कि वह अपने शरीर में पाए जाने वाली कस्तूरी की सुगंध से बेचैन पूरे जंगल में इसको खोजता रहता है.यह मृग इतना संगीत प्रेमी होता है कि बांसुरी या किसी सुरीली आवाज से मुग्ध होकर एकांत में खड़ा हो जाता है और शिकारी इस तन्मयता का लाभ उठाकर इसे मार डालते हैं.

स्वेटरों के लिए ऊन भेड़ के बालों से बनाया जाता है,लेकिन कराकुल भेड़ के बाल काफी बड़े और नरम तथा घुंघराले होते हैं.मेमने के जन्म लेते ही उस भेड़ के बाल कम मुलायम रह जाते हैं.इसलिए मादा भेड़ पर गर्भावस्था में ही लाठी-डंडों से तब तक प्रहार किया जाता है जबतक कि वह मर न जाए.मरते ही उसके पेट से मेमने को बाहर निकाल लिया जाता है.कभी-कभी तो मरने का इंतजार किये बिना ही उसके शरीर से खाल उतार ली जाती है जिससे कपड़े,टोपी आदि तैयार होती है.

एक स्वस्थ पर्यावरण के लिए मानव समाज के साथ पशुओं का होना भी जरूरी है.कई जानवरों की संख्या में आई कमी के मद्देनजर इनकी सुरक्षा के लिए कार्यक्रम लागू किये गए हैं.लेकिन पर्याप्त जागरूकता,मूक पशुओं के प्रति संवेदनशीलता के अभाव के कारण बेजुबान पशुओं का मारा जाना बदस्तूर जारी है,यह चिंता का विषय है.

Sunday, April 20, 2014

दहकते शोलों पर जिंदगी

        









दहकते अंगारों पर नंगे पैर चलकर अग्नि-परीक्षा देने का चलन दुनियां के बहुत से हिस्सों में सदियों से चला आ रहा है.भारत,स्पेन,बुल्गारिया और फिजी के अनेक संप्रदायों में यह धार्मिक क्रियाकलापों का एक अंग है.आत्मशुद्धि और व्याधियों के उपचार के तरीके और श्रद्धा के प्रतीक रूप में दहकते अंगारों पर नंगे पैर चलना सदियों से यूनान और दुनियां के कुछ अन्य देशों में देवताओं की पूजा के साथ जुड़ा है.

‘प्लिनी दि एल्डर’ ने लिखा है कि रोम में कुछ परिवारों के सदस्य दहकते कोयलों पर नंगे पैर चलने का कमाल दिखाते थे और इसके बदले में उन्हें शासकीय करों से मुक्त कर दिया जाता था.मध्यकालीन यूरोप में फ्रांस के फ्लोरेंस नगर के एक साधू ने नंगे पैर अंगारों पर चलने का प्रदर्शन किया था.इसके पुरस्कार-स्वरूप उसे ‘सेंट पीटर इग्नियस’ की उपाधि से सम्मानित किया गया.

यूनान में आज भी देखने को मिलता है,नंगे पाँव दहकते अंगारों पर चलने का यह करिश्मा.वहां आइया एलेनी ग्राम में हर वर्ष संत कांस्टेटाइन और संत हेलेन के सम्मान में कई दिन तक चलने वाले उत्सव का आयोजन होता है.समापन दिवस पर जब दिन डूब जाता है और अँधेरा घिर आता है तो अंगारों पर चलने का क्रम आता है.

अंगारों पर चलने वाले करीब दरजन भर स्त्री-पुरुष,जिन्हें वहां ‘अनास्ते नैराइड्स’ कहा जाता है,पहले कई घंटों तक नाचते हैं,तीन तारों की थ्रेस की वीणा की धुनों पर.नाचते-नाचते उन्हें तंद्रा सी आ जाती है.तब वे अपने हाथों में देवताओं की मूर्तियाँ उठाकर लाल-अंगारों से दहकते लम्बे-चौड़े अलाव में कूद पड़ते हैं, एकदम नंगे पाँव.

हजारों दर्शक देखते रहते हैं और वे भक्त दहकते अंगारों पर दौड़ते हैं,नाचते थिरकते हैं,चक्कर लगते हैं.जोश के नशे में गला फाड़कर चिल्लाते रहते हैं.उस समय तक लगातार जारी रहता है,देवभक्तों का अग्नि-नृत्य,जब तक दहकते अंगारे राख के ढेर में तब्दील नहीं हो जाते.

आश्चर्य की बात यह है कि ये भक्त अपनी अग्नि-परीक्षा से बिल्कुल सही सलामत निकल आते हैं और कोई फफोला तक नहीं पैरों में.वे कहते हैं कि संत कांस्टेटाइन की दैवी शक्ति उनकी रक्षा करती है.वे यह भी मानते हैं कि यह शक्ति उन्हें रोगों से अच्छा करती है और उन्हें दूसरों को भी रोगमुक्त करने की क्षमता प्रदान करती है.

शरीर के अग्नि-स्पर्शी कृत्यों में अंगारों पर चलने के अलावा और भी बातें आती हैं.रामायण में सीता ने अपनी अग्नि-परीक्षा लपटों में प्रवेश करके जहाँ स्वयं दी थी,वहीँ हनुमान की अग्नि-परीक्षा रावण ने उनकी पूँछ में आग लगाकर ली थी और नतीजे में सोने की लंका जलकर खाक हो गई थी.सुमात्रा में जिन लोगों पर ‘हाल’ आते हैं,वे अपने मुंह में दहकते कोयले भर लेते हैं.मिस्त्र और अल्जीरिया के कई दरवेश दहकते अंगारों को अंगूरों जैसे निगल जाते हैं.अल्जीरिया के फ़क़ीर तो अपना शरीर लोहे की दहकती–सलाखों से दगवाते भी हैं.

इस सिलसिले में कई तरह की बातें सामने आई हैं.कभी-कभी कहा जाता है कि अंगारों पर चलने वाले मानसिक रूप से तंद्रा की स्थिति में होते हैं,इसलिए दर्द का अहसास उन्हें नहीं होता.लेकिन,कई मामलों में ऐसा नहीं लगता कि शरीर को कोई आघात नहीं पहुँचने के पीछे बस तंद्रा की स्थिति है.यह भी कहा जाता है कि पैर के तलवों पर पसीने की परत बन जाती है जो तापरोधक का काम करती है.कुछ लोगों के अनुसार यही काम राख करती है.

कहा जाता है कि फिजी में अंगारों पर चलने के लिए लावा से बनी जो रंध्रदार पत्थर काम में आती है. वह ताप की इतनी कमजोर प्रचालक है कि वहां के कबीलों के लिए डर का कोई कारण ही नहीं रहता. आग से शरीर के सीधे संपर्क की इन धार्मिक क्रीड़ाओं के बारे में आमतौर पर यही धारणा है कि यह सब धूर्तों का मायाजाल है और अग्नि-भक्त जब इसे दैवी चमत्कार कहते हैं तो शंकालुओं की शंका और भी बढ़ जाती है.

इस चमत्कार का रहस्य खोजने में लगे पश्चिमी जर्मनी के अनुभौतिकिविद फ्रेडबर्ट कारगर ने फिजी द्वीपों पर अंगारों पर चलने वाले आदिवासियों के तलवों पर एक ऐसा रंग पोत दिया,जो बढ़ते तापमान के साथ रंग बदलता जाता है.ये आदिवासी चार सेकेंड दहकते अंगारों पर चले और सात सेकेंड उनपर खड़े रहे.कारगर ने अपने रंग का घोल अंगारों पर डाला तो 600 डिग्री फॉरनहाईट का रंग आया.लेकिन आदिवासियों के पैरों पर कोई असर नहीं हुआ.अगरों पर राख की परत भी नहीं आई थी.कारगर ने एक आदिवासी के तलुए से थोड़ी-सी पपड़ी निकालकर अंगारों पर डाली तो वह जलकर कोयला बन गयी.

कारगर का कहना था कि बहुत सी बातें हो सकती हैं.कोई न कोई अवरोधक शक्ति जरूर काम करती है और इस प्रक्रिया में अग्नि-भक्त के शरीर का भार कम हो जाता है.स्वयं अग्नि-भक्त महसूस करते है कि कोई शक्ति उन्हें ऊपर उठाए है.शायद भौतिक-शास्त्र में इसका समाधान नहीं.
शायद मनोविज्ञान इस पर कुछ प्रकाश डाल सकता है.स्टीवन कैने ने इसी विषय पर कई प्रयोग कर अपने शोध पत्र में बताया  कि ये अग्नि-भक्त विनाशक और आग्नेय प्रक्रियाओं पर विजय के परिचायक हैं.कैने के अनुसार कृत्य के समय ये लोग तंद्रा जैसी स्थिति में होते हैं और ऐसी स्थिति में इन्हें गोली लग जाए तो भी पता नहीं चले.

कैने ने अपने प्रयोग में देखा कि सम्मोहन की स्थिति में व्यक्ति को आग के संसर्ग से जलन महसूस नहीं होती.जब दूसरे के द्वारा किया गया सम्मोहन इतना असरकारी हो सकता है तो अग्नि-भक्त का अपना सम्मोहन तो और भी रंग दिखा सकता है.लेकिन शरीर की कोशिकाओं को विनाश से रोकने की केन्द्रीय स्नायु प्रणाली की क्षमता सीमित है.किसी अग्नि-भक्त ने अपने शरीर को एक बार में लगातार दस-पंद्रह सेकेंड से ज्यादा आग के संपर्क में नहीं रखा.यही शरीर के सहने की सीमा है.

अमेरिकन सर्जन फेईन ने दक्षिणी समुद्र के बोरा-बोरा द्वीप में अंगारों पर चलने का आयोजन देखा.वे भी अग्नि-भक्त के साथ अग्निकुंड में आगे बढ़े.उन्हें पैरों के ऊपर तेज किंतु सही जा सकने वाली गर्मी महसूस हुई और पैर में ठंढ लगी.वे साढ़े क़दमों से नीचे देखते हुए बढ़ते रहे.अगरे सैंडपेपर जैसे लग रहे थे और पैरों में झुनझुनी थी,दिमाग सुन्न पड़ गया था.बाहर निकलने पर लगा कि वे सोते से जाग उठे हैं.

वैज्ञानिक पता लगाने में लगे हैं कि ऐसा क्यों होता है.अब वे और संवेदशील उपकरण लेकर जाना चाहते हैं और पता लगाना चाहते हैं कि तलुओं और अंगारों का तापमान किस तरह बदलता है और क्या शरीर के भार में कमी होती है.

Thursday, April 17, 2014

सृष्टि का नियंता : स्त्री या पुरुष












मनुष्य जाति की उत्पति के दो आदिम स्रोत हैं – आदम और हौवा.यही किसी देश में शिव और शक्ति के रूप में,किसी देश में पृथ्वी और आसमान के नाम से,ज्यूस तथा हेरा तथा कहीं यांग और यिन जैसे विभिन्न प्रतीकों से जाने जाते हैं.भिन्न-भिन्न नामों एवं प्रतीकों के बावजूद मानव जाति की उत्पति की मूल कल्पना एक है.

ईसाईयों के प्रख्यात धर्मग्रंथ ‘ओल्ड टेस्टामेंट’ में कहा गया है.......

‘ईश्वर बोला....
यह सही नहीं है
पुरुष अकेला रहे
रचूंगा मैं
इसका कोई सहयोगी
और रीढ़
जिसको ईश्वर ने लिया
पुरुष से रचना की उसने उससे
केवल नारी की’

आज भी हमारा देश पुरुष-प्रधान है.शरीर विज्ञानियों के मत में प्रकृति ने पुरुष को चार लीटर वाली और स्त्री को तीन लीटर वाली कार  के रूप में निर्मित किया है.स्त्री की अपेक्षा पुरुष अधिक बड़ा और बलवान होता है.इसलिए इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि सदियों से पुरुषों ने स्त्रियों पर प्रभुत्व जमाया है,जब आरंभिक काल में आर्य-पूर्वजों ने उत्तरी भारत पर हमला किया था.

सदियों बाद ऋषि और हिन्दू धर्म के नियामक मनु ने व्यस्था दी थी कि बीज(पुरुष),मिट्टी(स्त्री)से श्रेष्ठ है.मनु की संहिता हिंदू समाज को शासित करती रही है.इस युग से पहले,पाषाण युग में स्त्री का स्तर पुरुष की अपेक्षा ऊँचा था और उन्हें प्रसव की देवी के रूप में सम्मान प्राप्त था.पुरुष को आक्रामक और प्रभावी माना जाता है और वह अपनी भावनाओं को नियंत्रित कर सकता है.पुरुष परंपरा को जारी रखते हुए कहा गया कि स्त्री दुर्बल पात्र है जो आक्रामक नहीं होती,वह पर निर्भर और विचारों से व्यक्तिनिष्ठ होती है.

लेकिन प्रश्न उठता है कि पुरुष समाज का वर्चस्व कैसे आया? क्या माँ की प्रकृति का ढांचा ही ऐसा है कि वह मादा की अपेक्षा नर को अधिक शक्ति प्रदान करती है या क्या यह सब पुरुष का ही काम है.अतीत में झांकने पर पता चलता है कि साधारणतया पेड़ों पर रहने वाले बंदरों ने धरती पर सीधे खड़े होकर चलने की कोशिश की और वे चलने में सफल भी हुए.प्रकृति ‘योग्यतम की अतिजीविता’ के सिद्धांत की पक्षधर है और बंदर तथा उनके विकसित प्रतिरूपों,आधुनिक मनुष्य के पूर्वज अर्थात् आदिमानवों को अन्य स्तनपायियों की अपेक्षा अधिक सुविधाएं थी.

पहली सुविधा तो यह है कि वस्तुओं को पकड़ने के लिए उनके हाथ अधिक स्वतंत्र हैं.मनुष्य ही एकमात्र ऐसा प्राणी है जिसका अंगूठा हथेली से समकोण बनाते हुए स्थित होता है,जिसकी वजह से वह चीजों को अंगूठे और अँगुलियों के बीच पकड़ सकता है.अन्य प्राणियों के अंगूठे और अंगुलियाँ एक सीध में होते हैं.दूसरी सुविधा यह है कि अन्य स्तनपायी प्राणियों की अपेक्षा बंदर और मनुष्य में बेहतर वृद्धि होती है.हॉबेल का कहना है कि ‘मनुष्य अपने मस्तिष्क के कारण ही मनुष्य है.’

आदिमानव के वंशज – गुफाओं में रहने वाले नर और मादा जंगल में स्वतंत्र विचरते थे.नर,अभी तक मादा के ह्रदय और घर का स्वयंभू रक्षक नहीं बन पाया था.दोनों ही अपने भोजन की खोज स्वतंत्र करते थे.पुरुष की शारीरिक श्रेष्ठता और नारी की तथाकथित हीनता उस दिन से शुरू हुई जिस दिन पुरुष ने आग की खोज की.ऐसा विश्वास किया जाता है कि चार लाख वर्ष पूर्व मनुष्य के पूर्वज ने रोडेशिया में जंगल की आग या ज्वालामुखी का विस्फोट देखा था.तब उसने कोई लकड़ी जलाई होगी और अपनी समीपस्थ गुफा में ले गया होगा,जहाँ उसने सुखद गर्मी प्राप्त करने के लिए उस आग को लकड़ियाँ जला-जलाकर बनाये रखा होगा.प्राणिशास्त्री कार्लस्टन कून के अनुसार ’आग के उपयोग के आधार पर ही मनुष्य और अन्य प्राणियों में अंतर किया जा सकता है.

चौथे हिमयुग में जीवित रहने के लिए मनुष्य को आग का इस्तेमाल करना पड़ा जिसकी जानकारी उसने अपने अन्य साथियों को दी होगी.आग को जलाये रखने के लिए,किसी न किसी को हर समय गुफा में ही रहना पड़ता और यह दायित्व स्त्रियों पर ही आ पड़ा होगा.आदि पुरुष अपनी स्त्री के लिए भोजन खोजने और और जुटाने वाला बन गया.वह घर के बाहर सक्रिय जीवन बिताता और स्त्री घर में ही सीमित रह गई.शताब्दियों तक अभ्यास की कमी के कारण वह दुर्बल पक्ष बन गई,जबकि अन्य स्तनपायी प्राणियों की मादाएं भोजन की खोज करती हैं और नर की अपेक्षा दुर्बल नहीं मानी जातीं.फिर भी,प्राणियों में पुरुष ने भोजन जुटाने वाले और संरक्षक का ताज पहन लिया.


नृवंशशास्त्रियों ने पुरुष की बेहतर शारीरिक क्षमता के सन्दर्भ में एक चतुराई पूर्ण तर्क प्रस्तुत किया है-पुरुष का स्त्री पर अधिकार जमाना.इस भावना की पूर्ति के लिए वह अन्य पुरुषों से लगातार युद्ध करता रहा.उसने स्त्रियों को हासिल करने या शत्रुओं द्वारा चुराई गई अपनी स्त्रियों की मुक्ति के लिए भी युद्ध किये.

शारीरिक संरचना की दृष्टि से देखें तो किशोरावस्था में अक्सर खामोश रहने वाला किशोर या तो स्वयं को मानसिक रूप से प्रताड़ित करने वाले उपेक्षित नवयुवक के रूप में परिवर्तित हो जाता है या फिर बेहद आत्मविश्वासी बलिष्ठ युवक के रूप में.

इसके विपरीत,एक युवती अपनी किशोरावस्था को बिना किसी मानसिक उद्वेलन के सहजता से व्यतीत कर लेती हैं.वह अधिक समझदार,सही खान-पान के प्रति सचेत होती हैं.उसके मादा हारमोन उसे उच्च रक्तचाप,ह्रदय रोग तथा आघात जैसे प्रौढ़ावस्था के शत्रुओं से बचाते हैं.इसके अलावा वह तनावों को अच्छी तरह झेल लेती हैं.

चिकित्सा विज्ञानियों के अनुसार - इसके पीछे दो महत्वपूर्ण कारक हैं- उनकी अश्रु-ग्रंथि,जिसे विश्व की सर्वाधिक प्रभाव वाली जल-शक्ति कहा गया है,और उनकी जीभ जो तनाव-प्रतिरोधक का काम करती हैं.स्त्रियाँ तनाव से ग्रस्त नहीं रहतीं.वे पुरुषों की तुलना में तनाव को भी भली प्रकार सहन भी कर लेती हैं.इसके विपरीत पुरुष सहज ही प्रौढ़ावस्था की व्याधियों का शिकार हो जाता है और आसानी से तनावग्रस्त हो जाता है.   

Thursday, April 10, 2014

सूफी और कलंदर















‘दमादम मस्त कलंदर...... अली दा पैला नंबर’,यूँ तो सिंधी समुदाय के प्रसिद्द संत झूलेलाल के सम्मान में गाया जाने वाला यह भक्ति गीत समुदाय विशेष की सरहदों को पार कर सबों में समान रूप से लोकप्रिय है.इसे नामचीन फ़नकारों ने अलग-अलग अंदाज में, अपने सुरों से नवाजा है. उस्ताद नुसरत फतह अली खान,रेशमा,रुना लैला,राहत फतह अली खान,आबिदा परवीन या फिर कैलाश खेर द्वारा गाए इस गीत से माहौल रूहानी हो जाता है.कोई भी सूफी आयोजन इस भक्ति गीत के बिना पूरा नहीं होता.

भारत में सूफी संतों और कलंदरों की समृद्ध परंपरा रही है और वे किसी समुदाय विशेष के श्रद्धेय न होकर सभी समुदायों में समान रूप से आराध्य रहे हैं.इनके दरगाह पर ज़ियारत के लिए सभी संप्रदाय के लोग पहुँचते हैं और मन्नतें मांगते हैं.गंगा-जमुनी संस्कृति के इस देश में सर्वधर्म समभाव की यह अनूठी मिसाल पेश करता रहा है.

सूफी प्रेम का मार्ग है. यह मनुष्य की आंतरिक यात्रा को प्रकट करने वाली जीवनशैली है. अरबी में सूफीवाद को तसव्वुफ कहा जाता है. यह शब्द 'सौफसे बना माना जाता है, जिसका अर्थ होता है, ऊनी कपड़ा पहनने वाला. सूफियों और संतों द्वारा पहने जाने वाला  मोटा ऊनी वस्त्र पवित्रता, सादगी, सहनशीलता, सेवा और परमात्मा के प्रेम में डूब जाने का प्रतीक है. यही गुण सूफी जीवन चर्या के सबसे आवश्यक अंग हैं. सूफियत का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है परमात्मा से एकांतिक प्रेम.सूफी दृष्टि से परमात्मा ही एकमात्र  सत्ता है. इसी सिद्धांत को अरबी में 'हमावुस्त कहते हैं. हमावुस्त यानी सबकुछ वही है.

फारसी शब्दकोष के अनुसार कलंदर का अर्थ है – लकड़ी का अनगढ़ा लट्ठा.यह शब्द ऐसे व्यक्ति के लिए भी प्रयोग किया जाता है जो चिंता रहित हो तथा परिणामों की चिंता नहीं करता हो.यह उन व्यक्तियों के लिए भी प्रयुक्त होता है, जो आध्यात्मिक विकास की उस अवस्था में पहुँच चुके हों,जिसमें वे स्वयं के तथा सांसारिक वस्तुओं के प्रति पूर्णतया उदासीन हो चुके हैं तथा पूर्णतया ईश्वर में लीन हैं.ऐसे व्यक्तियों को किसी वस्तु या व्यक्ति से लगाव नहीं होता जो उनके तथा ईश्वर के बीच में आए.

कहा गया है कि,’कलंदर वह है जो सूफी के आध्यात्मिक विकास के समस्त सोपान पार कर चुका हो’. सामान्यतया,आध्यात्मिक विकास की पराकाष्ठा पर पहुँच जाने वाले सूफी को कलंदर कहते हैं.चिश्ती संप्रदाय के प्रसिद्द सूफी संत जमाल हांसवी  के अनुसार ‘अबदल’ के ओहदे को प्राप्त कर लेने वाले सूफी कलंदर हैं.

इस्लाम के विश्वकोश में कलंदरों के संबंध में कहा गया है कि कलंदर एक सूफी संप्रदाय है और कलंदरी,कलंदारिया संप्रदाय के संस्थापक थे.वास्तव में कलंदरिया एक संप्रदाय है. संप्रदाय के हर सदस्य के लिए आध्यात्मिक विकास की पराकाष्ठा पर पहुंचना संभव नहीं है.इसलिए हर कलंदर, कलंदरी नहीं प्राप्त कर सकता है.इसके विपरीत आध्यात्मिक विकास की पराकाष्ठा पर पहुँचने वाला किसी भी संप्रदाय का सूफी, कलंदर कहा जा सकता है.

कलंदरों के संबंध में कई प्रकार की भ्रांतियों के बारे में प्रसिद्द इतिहासवेत्ता प्रोफ़ेसर मो. हबीब ने जिक्र किया है कि कलंदरों के उद्गम स्थान तथा समय के बारे में काफी मतभेद हैं.अनेक व्यक्तियों का मानना है कि इस संप्रदाय का जन्म एशिया में हिजरी की छठी शताब्दी में हुआ तथा शेख़ जमालुद्दीन सौजी इस संप्रदाय के प्रवर्त्तक थे.इस संप्रदाय की कुछ विशिष्टताएं अन्य संप्रदायों से अलग करती हैं.इसके सदस्यों के लिए सिर,दाढ़ी,मूंछ तथा भौहें मुंडवाना आवश्यक था.इसके सदस्य अन्य सूफियों की भांति रंगबिरंगे कपड़ों का लबादा ‘सिरका’ नहीं पहनते थे,वे साधारण कंबल लपेटे रहते थे तथा कमर पर भी कंबल या मोटा सूती वस्त्र बंधते थे.शरीर पर कंबल लपेटने वाले जबालीक कहलाते थे.इनमें कुछ गले एवं हाथों में कड़े पहनते थे.सूफियों के विपरीत वे न तो भक्त थे न तपस्वी.

प्रो. हबीब के अनुसार कलंदरों के कुछ आचरणों में हिंदू तथा हीनयान बौद्धों की परंपराओं की झलक है.इस संप्रदाय की कुछ विशिष्टताएं हैं,जो अन्य सूफी संप्रदायों में नहीं मिलती हैं.उसके सदस्यों के लिए सिर,भौहें,दाढ़ी तथा मूंछ मुंडाना जरूरी था.यह परंपरा शेख़ जमालुद्दीन सौजी के समय से प्रारंभ हुई.

कलंदर अन्य सूफियों की भांति रंगबिरंगे टुकड़ों से बना खिरका नहीं पहनते थे.उनमें से कुछ कमर पर कंबल या अन्य कपड़ा लपेटे रहते थे तथा दूसरों से मिले सामान से गुजारा करते थे.ईरान निवासी हसन अल जबलीकी भी एक महान कलंदर थे.उन्होंने काहिरा में कलंदरों के लिए एक मठ की स्थापना की.सूफी मत की पुस्तकों में जबलीकियों को भी कलंदर माना है.

कलंदरों तथा अन्य सूफियों में एक बुनियादी भेद है.अन्य सूफी संतों की आध्यात्मिक गतिविधियों का केंद्र- बिंदु उनके खानकाह होते थे.खानकाह एक बड़ा कमरा होता था.जिसमें सूफी संत अपने समस्त शिष्यों के साथ रहते थे.सूफियों की मान्यता थी एकाकी चिंतन सूफी को अंतर्मुखी बना देता है.उसकी सहानुभूति को सीमित कर देता है,जबकि खानकाह के सामूहिक जीवन से सूफियों की व्यक्तिगत कुंठाएं समाप्त हो जाती हैं तथा उनकी सहानुभूति का क्षेत्र बढ़ जाता है.

कलंदर खानकाहों के शांत जीवन के विरूद्ध थे.अन्य कलंदरों की भांति जबलीकी भी अपने चमत्कारों के लिए प्रसिद्द थे,जैसे आग पर चलाना,अंगारे खाना तथा एक ही घूंसे के प्रहार से दीवार गिरा देना.कलंदरिया संप्रदाय की एक शाखा हैदरिया के प्रवर्तक हैदर नाम के एक तुर्की संत थे.मस्ती में वे लोहे की गरम सलाख हाथों में ऐसे पकड़ लेते ,जैसे वे मोम की हो,उसको मोड़कर उसके कड़े तथा हंसुली बनाकर हाथों में तथा गले में पहन लेते थे.उनके शिष्य गले,हाथों,पैरों में लोहे के कड़े पहनते थे,किंतु आध्यात्मिक क्षेत्र में कोई भी हैदर की ऊँचाइयों तक नहीं पहुँच सके.भारत के नाथ योगियों तथा कनफटा योगियों के संपर्क में आकर उन्होंने कानोँ में कुंडल भी पहनना शुरू कर दिया.

सूफियों और कलंदर में एक अंतर यह है कि अंतिम अवस्था में पहुंचकर एक सूफी कलंदर बन जाता है.उसका धन समस्त ज्ञान है तथा वह हर वस्तु को अपनी आध्यात्मिक शक्ति से जीत लेता है.कलंदर ईश्वरीय प्रेम में लीन रहता है.

Thursday, April 3, 2014

मिथकों में प्रकृति और पृथ्वी


















साहित्य में रूपक या प्रतीकों के माध्यम से अपनी बात कहने की शैली पाई जाती है.साहित्य में जिसे रूपक या प्रतीक कहा जाता है,वही आदिम लोक-साहित्य में समानांतर बिंब प्रस्तुत करते हुए मिथक के नाम से प्रसिद्द रहे हैं. यह भी एक आश्चर्यजनक संयोग की बात है कि मिथक में जो कल्पनाएँ संजोयी गयी हैं, वे ही प्रतीकात्मक स्वरूप में ऋग्वेद में पायी जाती हैं,और बाद में उन्हीं का रोचक स्वरूप पुराण में मिलता है.

मिथक एक ऐसी कथा है जिसमें अनेक प्रतीक एवं बिंब एकसाथ जुड़े हैं.यह मनुष्य की आदिम कल्पनाओं का मूर्त रूप है.कहानी और गल्प कथाओं का संभवतः इसी से सृजन हुआ होगा.

आदिकाल का आदि मानव जब घनघोर अंधेरी रात में,सुनसान जंगल में,भयंकर तूफ़ान वर्षा से घिर जाता तो बादलों की गड़गड़ाहट और बिजली की चमक उसमें भय जगाती थी.उसमें उसे दैवी प्रकोप का आभास होता था.चंद्रमा का घटता-बढ़ता स्वरूप,ग्रहण लगने तथा छूटने की प्रक्रिया,बिना अवलंबन का टिका इन्द्रधनुष और सूर्योदय और सूर्यास्त का दृश्य भी उसके लिए रहस्य का विषय रहा होगा.

जैसे-जैसे वह प्रकृति के निकट संपर्क में आता गया,भय का स्थान पूजा-भावनाओं ने ले लिया और तब उसने चाँद,सूरज,बादल,बिजली,अग्नि और जल आदि प्रकृति के समस्त उपादानों का मानवीयकरण कर,उनके संबंध में ऐसी मनोरम रंगीन कल्पनाएँ बनीं जो जीवंत होकर बोलने-बतियाने सी लगीं.मनुष्य की व्यक्तिगत कल्पनाओं ने जब समष्टिगत आस्था का रूप लिया तो वे मिथक बनकर जनमानस में छा गयीं.

इन मिथकों को मानव की अविकसित बुद्धि में कल्पना की उपज या आदिम लोक-कथाओं के संसार के रूप में देखा जा सकता है.प्रख्यात फ्रांसीसी विचारक और दार्शनिक कॉम्ट ने भी मानवीय बुद्धि के विकास क्रम के तीन स्तरों का उल्लेख किया है-आध्यात्मिक,तात्विक और प्रत्यक्ष या वैज्ञानिक स्तर.इन मिथकों को मानवीय बुद्धि के इन्हीं विकास क्रम के सन्दर्भ में समझा जा सकता है.

आदिमानव ने जब आकाश से पानी को बरसते और आग को लकड़ी में पैदा होकर उसी में छिप जाते देखा,तो उसके मन में प्रश्न उत्पन्न हुआ,’ऐसा क्यों होता है.’यह क्यों ही मिथक का जनक रहा है.

पानी बरसने के संबंध में ‘अका’ जनजाति का एक मिथक इस प्रकार है कि ‘पहले पानी नहीं था.
सभी प्राणी प्यास से तड़पते थे.एक दिन सबने विचार किया कि पानी की खोज करनी चाहिए.सवाल उठा कि उसे कौन खोजे? सबने अपनी लाचारी जतायी.इतने में एक नन्हीं चिड़िया ने कहा,’मुझे मालूम है कि पानी कहाँ है’.सबके चेहरे पर ख़ुशी छा गयी और उन्होंने चिड़िया से पुछा,’वह कहाँ है.’उसने कहा,’जहाँ से सूरज उगता है, वहां पानी का एक सरोवर है.सरोवर के चारों ओर एक बहुत बड़ा सांप कुंडली मारकर बैठा है.अगर उसकी कुंडली खुलवा दी जाय तो पानी बह निकलेगा.सबने कहा कि यह काम तो कठिन है.उसने कहा कि वह यह कार्य कर सकती है.वह उड़ती-उड़ती सरोवर के पास पहुंची और सांप को देखकर पहले तो डरी,फिर रात होने की प्रतीक्षा करने लगी.जब रात हुई तो सांप सो गया.उसने झपटकर उसकी आँखें नोंच लीं.सांप दर्द से तड़प उठा और उसकी कुंडली खुल गई.कहते हैं,तभी से सरोवर का पानी नदी बनकर बह रहा है.

जितनी जनजातियाँ हैं पानी बरसने के संबंध में सबकी अलग-अलग मान्यताएं हैं.’मिरी’ नामक पहाड़ी जाति का कहना है कि – पानी का दुरूपयोग करने से ही पानी की कमी है.इसे एक रोचक कथा के रूप में कहा गया है कि स्त्री-पुरुष का एक जोड़ा आसमान में रहता है.उनके घर में एक बड़ी सी टंकी है और एक नदी है जो जमीन से आसमान तक चली गई है.उसी से यह टंकी भरती है.जब कभी यह टंकी बह निकलती है तभी धरती पर बरसात होती है.

कभी-कभी टंकी में पानी कम हो जाता है तो पति-पत्नी झगड़ने लगते हैं.पति अपनी पत्नी से कहता है,’तुम इतना पानी क्यों खर्च करती हो कि टंकी खाली हो जाए.’ पत्नी कहती है-‘तुम्हीं तो चावल की शराब पीते हो और उसी को बनाने में सारा पानी खर्च हो जाता है.’बात-बात में झगड़ा बढ़ जाता है और पत्नी गुस्से में अपने कपड़े उतर फेंककर घर से भाग जाती है.उसका पति उसका पीछा करता है.दोनों में युद्ध ठन जाता है.जिसे हम बिजली कहते हैं,वह बरसात में, उस सुंदर स्त्री की देह की चमक है और जिसे हम बादलों की गरज कहते हैं,वह उसके पति की हुंकार है.दोनों का यह युद्ध आज भी चल रहा है.

पृथ्वी और आकाश की रचना कैसे हुई इस संबंध में ‘खोआ’ मिथक में कहा गया है – कहते हैं,पहले न धरती थी न आकाश.तब भगवान अपने दो बेटों के साथ रहा करता था.एक दिन खेल-खेल में दोनों बेटों ने धरती और आकाश बना डाले.जब दोनों बन गए एक ने धरती पर आकाश का ढक्कन लगाना चाहा,लेकिन उसने देखा कि धरती इतनी बड़ी थी कि उस पर आकाश का ढक्कन लगता ही नहीं था.अतएव उसने दूसरे से कहा कि जरा अपनी धरती को छोटी कर दो ना. दूसरे ने मिटटी को दबाकर धरती को इतना छोटा कर दिया कि उस पर आकाश का ढक्कन लग गया.कहते हैं उसने जहाँ-जहाँ से मिट्टी को दबाया था,उसका उभरा हुआ हिस्सा पहाड़ कहलाया और दबा हुआ हिस्सा घाटियाँ एवं नदियाँ बनीं.

इस मिथक में भगवान के दो बेटों द्वारा खेल-खेल में धरती और आकाश बना डालने की बात कही गई है.पृथ्वी चाहे जैसे बनी हो,लेकिन दोनों के पीछे मनुष्य की भव्य विराट कला को देखा जा सकता है.

आकाश और पृथ्वी की इन्हीं कथाओं में से एक दिन ‘भारत-माता’ की कल्पना का जन्म हुआ होगा.एक ‘आपातानी’ मिथक में पहली बार पृथ्वी कि कल्पना औरत के रूप में की गई है.इसके अनुसार-‘पहले पृथ्वी एक औरत जैसी थी.उसका सिर था,हाथ-पाँव थे,और तोंद थी.जिस पर मनुष्य जाति रहती थी.इसी से वह हमेशा लेटी रहती थी.उसने सोचा कि अगर मैं बड़ी हुई तो मेरे सब बच्चे गिर कर मर जाएंगे.इस बात से वह इतना डरी कि आत्महत्या कर ली.कहते हैं,उसके सिर से पहाड़ बने,हड्डी एवं पसलियों से पहाड़ियां बनी,गर्दन से उत्तरी प्रदेश बना,पीठ  से आसाम का हरा-भरा मैदान बना और उसकी आँखों से चाँद और सूरज बने,जिसे उसने आकाश में चमकने को भेज दिया है.’

धरती की देवता आग छिप कर क्यों रहती है.इस संबंध में डाफला जनजाति में एक मिथक बहुत प्रसिद्द है-कहते हैं एक बार आग और पानी में लड़ाई छिड़ गई.चूँकि पानी की सबको जरूरत थी,इसलिए सब ने पानी का साथ दिया.लाचार आग अपनी जान बचाकर भागी.पानी ने उसका पीछा किया.वह पहाड़ की सबसे ऊँची चोटी पर पहुंची.पानी वहां भी बादल बनकर जा पहुंचा.बचने के लिए आग कूदकर पत्थरों में समा गई.पत्थरों में जाने की शक्ति पानी में नहीं थी.तब से आग छिपकर वहां बैठी है.जब आदमी को उसकी जरूरत पड़ती है वह दो पत्थरों को रगड़कर उसे बुला लेता है.बाद में वह पुनः उसी में छिप जाती है.

चाहे वैदिक युग में ऋषियों द्वारा दो अरणियों को रगड़ने से उत्पन्न यज्ञ की अग्नि हो या आदिम युग में शिकार के लिए पत्थर की रगड़ से उत्पन्न शिकार की आग,दोनों में छिपकर रहने का इतिहास छिपा है.वह छिपकर क्यों रहती है.इसी को लेकर इस मिथक की रचना हुई है.
आदिम जातियों के लिये सबसे बड़ा आश्चर्य चाँद और सूरज का ग्रहण लगना है.

इस ग्रहण लगने की प्रक्रिया को अपनी गरीबी से जोड़कर उन्होंने ऐसा मिथक तैयार किया कि उसके सामने समूचा कथा साहित्य फीका पड़ जाता है.कहते हैं-एक बार आदिवासियों के इलाके में अकाल पड़ा.उन्होंने मदद के लिए भगवान से प्रार्थना की.भगवान ने कर्जे से अनाज लाकर उनकी मदद की.दूसरे साल फिर अकाल पड़ा.भगवान ने फिर कर्जे से अनाज लाकर उनकी मदद की.    देखते-देखते कर्जा बढ़ता गया.साहूकार को यह सहन नहीं हुआ.उसने अपने कर्जे की वसूली के लिए भगवान को पकड़ लिया.चाँद और सूरज से यह अन्याय देखा नहीं गया तो उन्होंने अपनी आँखें बंद कर लीं.इसी को ग्रहण लगना कहते हैं.

इस तरह मिथक और पौराणिक कथाओं में न केवल वर्तमान बल्कि आने वाले जीवन की कल्पना की गई है जिसका संबंध मानवीय जगत से रहा है.