Tuesday, October 17, 2017

बुरांस के फूल

Top post on IndiBlogger, the biggest community of Indian Bloggers
बसंत और फूल एक दूसरे के पूरक हैं.जहां फूल हैं, वहां बारहों महीने बसंत है. बसंत है, तो फूल हैं. फूल बसंत ऋतु के द्योतक है.वनों को प्रकृति का श्रृंगार कहा जाता है.वनों के श्रृंगार से आच्छादित प्रकृति बसंत ऋतु में रंग-बिरंगे फूलों के नायाब गहनों से सज-संवर जाती है. फूलों का यह गहना प्रकृति के सौंदर्य में चार चांद लगा देता है. फूल को सौन्दर्य, कमनीयता, प्रेम, अनुराग और मासूमियत का प्रतीक माना जाता है. फूल का रंग उसकी सुन्दरता को बढा़ता है. प्रकृति के हरे परिवेश में सूर्ख लाल रंग के फूल खिल उठे हों तो यह दिलकश नजारा हर किसी का मन मोह लेता है.

उत्तराखण्ड के हरे-भरे जंगलों के बीच चटक लाल रंग के बुरांस के फूलों का खिलना पहाड़ में बसंत ऋतु के यौवन का सूचक है. बसंत के आते ही पहाड़ के जंगल बुरांस के सूर्ख लाल फूलों से मानो लद जाते हैं. बुरांस बसन्त में खिलने वाला पहला फूल है बुरांस धरती के गले को पुष्पाहार से सजा सा देता है. बुरांस के फूलने से प्रकृति का सौंदर्य निखर उठता है.
बुरांस का पेड़ उत्तराखंड का राज्य वृक्ष है, तथा नेपाल में बुरांस के फूल को राष्ट्रीय फूल घोषित किया गया है। गर्मियों के दिनों में ऊंची पहाड़ियों पर खिलने वाले बुरांस के सूर्ख फूलों से पहाड़ियां भर जाती हैं. हिमाचल प्रदेश में भी यह काफी पाया  जाता है.
उत्तराखण्ड के हरे-भरे जंगलों के बीच चटक लाल रंग के बुरांस के फूलों का खिलना पहाड़ में बसंत ऋतु के यौवन का सूचक है.बसंत के आते ही पहाड़ के जंगल बुरांस के सूर्ख लाल फूलों से मानो लद जाते हैं.बुरांस बसन्त में खिलने वाला पहला फूल है.बुरांस के खिलते ही धरती के गले को मानो पुष्पाहार सा मिल जाता है. बुरांस के फूलने से प्रकृति का सौंदर्य निखर उठता है.एक गढ़वाली लोकगीत में इसकी जीवंतता दिखाई देती है....

फूलों की हंसुली

पय्याँ ,धौलू ,प्योंली,आरू
लया फूले बुरांस

(पदम्,धौलू,प्योंली,आड़ू ,सरसों और बुरांस के फूल इस तरह खिले हुए हैं जैसे कोई दरांती हो)

बुरांस जब खिलता है तो पहाड़ के जंगलों में बहार आ जाती है. घने जंगलों के बीच अचानक चटक लाल बुराँस के फूल के खिल उठने से जंगल के दहकने का भ्रम होता है. जब बुराँस के पेड़ लाल फूलों से ढक जाते हैं तो ऐसा आभास होता है कि मानो प्रकृति ने लाल चादर ओढ़ ली हो. बुराँस को जंगल की ज्वाला भी कहा जाता है. उत्तराखण्ड के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में बुराँस की महत्ता महज एक पेड़ और फूल से कहीं बढ़कर है. बुराँस उत्तराखण्ड के लोक जीवन में रचा-बसा है. बुराँस महज बसंत के आगमन का सूचक नहीं है, बल्कि सदियों से लोक गायकों, लेखकों, कवियों, घुम्मकड़ों और प्रकृति प्रेमियों की प्रेरणा का स्रोत रहा है. बुराँस उत्तराखण्ड के हरेक पहलु के सभी रंगों को अपने में समेटे है.

सौंदर्य के प्रतीक इन पुष्पों का दर्शन नारी को भी सुंदर एवं आकर्षक बनने के लिए प्रोत्साहित करता है.एक प्रेयसी इन पुष्पों की कमनीयता पर इतना आकृष्ट हो जाती है कि अपने प्रेमी से अपने लिए बुरांस प्रसून की भांति चित्ताकर्षक परिधान की कामना करती है.......
मेरा विमरैल को जागो सी देवे 
बुरांस फूल को जामो सी 

(बुरांस के रक्त वर्ण के फूलों जैसे रंग के परिधान )
हिमालय के अनुपम प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन, प्रियसी की उपमा, प्रेमाभिव्यक्ति, मिलन हो या विरह सभी प्रकार के लोक गीतों की भावाभिव्यक्ति का माध्यम बुराँस है. उत्तराखण्ड के कई लोक गीत बुराँस के इर्द-गिर्द रचे गये है. विरह गीतों की मुख्य विषय-वस्तु बुराँस ही है. पहाड़ में बुराँस के खिलते ही कई भूले-बिसरे लोक गीत एकाएक स्वर पा जाते है-
उ कुमू य जां एक सा द्यूं प्यार सवन धरती मैं,
उ कुमू य जां कुन्ज, बुंरूस, चम्प, चमेलि, दगडै़ फुलनी

बुराँस का खिलना प्रसन्नता का द्योतक है. बुराँस का फूल यौवन और आशावादिता का सूचक है. प्रेम और उल्लास की अभिव्यक्ति है. बुराँस का फूल मादकता जगाता है. बुराँस का गिरना विरह और नश्वरता का प्रतीक है. बुराँस रहित जंगल कितने उदास और भावशून्य हो जाते है. इस पीडा़ को लोकगीतों के जरिये बखूबी महसूस किया जा सकता है.  बसन्त ऋतु में जंगल को लाल कर देने वाले इस फूल को देखकर नव विवाहिताओं को मायके और रोजी-रोटी की तलाश में पहाड़ से पलायन करने को अभिशप्त अपने पति की याद आ जाती है. अपने प्रियतम् को याद कर वह कहती है-
 अब तो बुरांश भी खिल उठा है, पर तुम नहीं आए
बुरांस के फूल में हिमालय की विराटता है. सौंदर्य है. शिवजी की शोभा है. पार्वती की झिलमिल चादर है. शिवजी सहित सभी देवतागण बुराँस के फूलों से बने रंगों से ही होली खेलते है. बुराँस आधारित होली गीत लोक जीवन में बुराँस की गहरी पैठ को उजागर करता है-

बुरूंसी का फूलों को कुम-कुम मारो,
डाना-काना छाजि गै बसंती नारंगी
पारवती ज्यूकि झिलमिल चादर,
ह्यूं की परिन लै रंगै सतरंगी

बुरांस ने लाल होकर भी क्रान्ति के गीत नहीं गाए. वह हिमालय की तरह प्रशंसाओं से दूर एक आदर्शवादी बना रहा. फिर भी बुरांस ने लोगों को अपनी महिमा का बखान करने पर मजबूर किया है. बुराँस ने लोक रचनाकारों को कलात्मक उन्मुक्तता, प्रयोगशीलता और सौंदर्य बोध दिया. होली से लेकर प्रेम, सौंदर्य और विरह सभी प्रकार के लोक गीतों के भावों को व्यक्त करने का जरिया बुराँस बना.
पहाड़ के लोक गीतों में सबसे ज्यादा जगह बुराँस को ही मिली है. एक पुराने कुमाऊँनी लोक गीत में जंगल में झक खिले बुराँस को देख मां को ससुराल से अपनी बिटिया के आने का भ्रम होता है. वह कहती है –

'वहां उधर पहाड़ के शिखर पर बुरूंश का फूल खिल गया है. मैं समझी मेरी प्यारी बिटिया हीरू आ रही है. अरे! फूले से झक-झक लदे बुरूंश के पेड़ को मैंने अपनी बिटिया हीरू का रंगीन कपडा़ समझ लिया.'

एक कवि नायिका के होठों की लालिमा का जिक्र करते हुए कहता है –

चोरिया कना ए बुरासन आंठे तेरा नाराणा

(बुराँश के फूलों ने हाय राम तेरे ओंठ कैसे चुरा लिये)

संस्कृत के अनेक कवियों ने बुराँस की महिमा को लेकर श्लोकों की रचना की है।

सुमित्रा नन्दन पंत भी बुराँस के चटक रंग से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके. उन्होंने बुराँस पर कुमाऊँनी कविता लिखी थी –

सल्ल छ, दयार छ, पई छ, अंयार छ
सबनाक फागन में पुग्नक भार छ
 पे त्वी में ज्वानिक फाग छ
रंगन में त्यार ल्वे छ
प्यारक खुमार छ

(जंगल में साल है, देवदार है, पईया है, और अयार समेत विभिन्न् प्रजातियों के पौधें है. सबकी शाखाओं में कलियों का भार है. पर तुझमें जवानी का फाग है. तेरे रंगों में लौ है, प्यार का खुमार है)

पहाड़ के रोजमर्रा के जीवन में बुराँस किसी वरदान से कम नहीं है. बुराँस के फूलों का जूस और शरबत बनता है. इसे हृदय रोग और महिलाओं को होने वाले सफेद प्रदर रोग के लिए रामबाण दवा माना जाता है. बुराँस की पत्तियों को आयुर्वेदिक औषधियों में उपयोग किया जाता है. बुराँस की लकडी़ स्थानीय कृषि उपकरणों से लेकर जलावन तक सभी काम आती है. चौडी़ पत्ती वाला वृक्ष होने के नाते बुराँस जल संग्रहण में मददगार है. पहाडी़ इलाकों के जल स्रोतो को जिंदा रखने में बुराँश के पेड़ों का बडा़ योगदान है। इनके पेड़ों की जड़ें भू-क्षरण रोकने में भी असरदार मानी जाती है. बुराँस का खिला हुआ फूल करीब एक पखवाड़े तक अपनी चमक बिखेरता रहता है. बाद में इसकी एक-एक कर पंखुड़िया जमीन पर गिरने लगती है.पलायन के चलते वीरान होती जा रही पहाड़ के गाँवों की बाखलियों की तरह.

लेकिन दुर्भाग्य से पहाड़ में बुराँस के पेड़ तेजी के साथ घट रहे हैं. अवैध कटाई के चलते कई इलाकों में बुराँस लुप्त होने के कगार पर पहुँच गया है. नई पौधें उग नहीं रही हैं. जानकारों की राय में पर्यावरण की हिफाजत के लिए बुराँस का संरक्षण जरूरी है. अगर बुराँस के पेड़ों के कम होने की मौजूदा रफ्तार जारी रही तो आने वाले कुछ सालों के बाद बुराँस खिलने से इंकार कर देगा. नतीजन आत्मीयता के प्रतीक बुरांस के फूल के साथ पहाड़ के जंगलों की रौनक भी खत्म हो जाएगी. बुरांस सिर्फ पुराने लोकगीतों में ही सिमट कर रह जाएगा. बसंत ऋतु फिर आएगी.फिर किसी पहाड़ी युवती  के स्वर फूटेंगे.......

मेरा मैत्यों का डांडा बुरांस फूल्यां
हिलासी जाण दे मैत

(मेरे मायके में बुरांस के फूल खिले हुए होंगे इसलिए हे पक्षी हिलांसी,मुझे अपने मायके जाने दे.)

Tuesday, October 10, 2017

जीवन की दिशा

Top post on IndiBlogger, the biggest community of Indian Bloggers
स्ट्राउड
व्यक्तियों के जीवन में कई पल ऐसे भी आते हैं जहाँ से उसके जीवन की दिशा ही बदल जाती है.ऐसा कई प्रमुख और नामचीन व्यक्तियों के साथ हुआ है.अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को की खाड़ी का एक छोटा सा द्वीप ‘अलकेटराज’ जो बंद मुट्ठी के आकर का है,पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है .इसका स्पेनी भाषा में अर्थ है-सारस. पहले यहाँ एक कारागार हुआ करता था जिसमें खतरनाक बंदी रखे जाते थे.

हाँ बंद कई खतरनाक कैदियों ने 2 मई 1946 को विद्रोह कर दिया.कुछ बंदियों ने पहरेदारों पर आक्रमण कर उसे बंदी बना लिया और उससे चाबियाँ छीन कर अपने साथियों को छुड़ा लिया.लेकिन एक बंदी ऐसा भी था जिसने जिसने इस विद्रोह में भाग लेने से इनकार कर दिया.ऊँचे-पूरे हरी आँखों वाले इस 56 वर्षीय बंदी का नाम था – रॉबर्ट एफ. स्ट्राउड.

      अलकेटराज का कारागार 
स्ट्राउड को एक झगड़े मेंएक व्यक्ति को गोली मार देने के आरोप में बारह वर्ष के कैद की सजा हुई थी.जब वह कनास के लेनवर्थ कारागार  में बंदी था तो वहां के क्रूर पहरेदार को चाकू मारकर हत्या करने के आरोप में फांसी की सजा पाकर अपने जीवन के अंतिम दिन गिन रहा था.बाद में अमेरिकी राष्ट्रपति वुडरो विलसन ने उसके प्राणदंड को आजीवन कारावास में बदल दिया था.इस तरह स्ट्राउड मौत के मुंह में जाते-जाते जीवन की बांहों में लौट आया था.

जीवनदान मिलने के बाद स्ट्राउड ने आत्मचिंतन किया और पाया कि अपने क्रूर और शराबी पिता के कारण ही वह चिड़चिड़ा और आक्रामक बन गया था.उसकी मां के साथ विश्वासघात कर उसके पिता ने उन दोनों को छोड़ दिया था. स्ट्राउड ने अब भले व्यक्तियों की भांति जीवन बिताने का निश्चय किया .वह अपनी कोठरी में ग्रीटिंग कार्ड चित्रित करता और मां के माध्यम से बाजार में बिकने के लिए भेज देता.

चानक 1920 में उसके जीवन में एक परिवर्तन आया. स्ट्राउड ने देखा कि व्यायाम के लिए बने अहाते में चिड़ियों का एक घोंसला है,जिसमें नन्हें नन्हें बीमार बच्चे हैं. स्ट्राउड उन बीमार बच्चों को अपनी कोठरी मरण ले आया और शाकाहारी सूप में ब्रेड के टुकड़े-टुकड़े भिगो-भिगो कर उन्हें खिलने लगा.शीघ्र ही ये बच्चे स्वस्थ हो गए.

स्ट्राउड के जीवन को अब एक नयी दिशा मिल गयी.उसने कारागार के पुस्तकालय में उपलब्ध पक्षियों की आदतों से संबंधित पुस्तकों को पढ़ना शुरू किया.वह चोरी छिपे कुछ अपनी कोठरी मरण कुछ पक्षी भी ले आता. धीरे – धीरे पक्षियों के संबंध में उसका ज्ञान बढ़ता गया.अब वह बीमार पक्षियों की चिकित्सा करने में भी दक्ष हो गया.धीरे-धीरे उसकी कोठरी ‘पक्षियों का अस्पताल ही बन गया.

स्ट्राउड की किताब 
जेल अधिकारियों ने भी उसे प्रोत्साहित किया और इसी के फलस्वरूप स्ट्राउड पक्षियों के संबंध में एक ज्ञानवर्द्धक पुस्तक लिखने में भी सफल हुआ.1943 में प्रकाशित उसकी इस पुस्तक का नाम था ‘डाईजेस्ट ऑन दी डिसिसेस ऑफ़  बर्ड्स’.इसमें उसके द्वारा बनाए गए पक्षियों के चित्र भी थे.समय बीते के साथ ही स्ट्राउड की ख्याति पक्षी विशेषज्ञ के रूप में होती गयी.एक दिन ‘अमेरिकी फेडरल ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टिगेशन’ के प्रमुख एक्गर हूवर ने उससे मुलाकात की और अपनी मां को भेंट देने के लिए पक्षी का एक चित्र भी खरीदा.

स्ट्राउड का जीवन शांति पूर्वक बीत रहा था,तभी कारागार में अन्य बंदियों के विद्रोह के दौरान उसने बंदियों को समझाने की कोशिश की एवं घायल बंदियों की सेवा भी की .

कारागार में ही 1963 में स्ट्राउड की की मृत्यु हो गयी .परिस्थितिवश स्ट्राउड से कुछ गलतियाँ हुई थी लेकिन विवेक ने उसका साथ नहीं छोड़ा,इसलिए कारागार में रहते हुए भी उसके जीवन को एक नई दिशा मिल गयी.