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Thursday, January 14, 2016

उपनाम का क्रेज


कवियों और साहित्यकारों में उपनाम रखने की एक लंबी परंपरा रही है.लेकिन ख़त्म होती परंपराओं के साथ इसका भी नाम जुड़ गया है.कभी हम इन कवियों और साहित्कारों को उपनाम से ही जानते थे.आम बोलचाल में भी उपनाम का ही प्रयोग होता था.

कई लोगों का विचार है कि कवियों द्वारा उपनाम रखने की परंपरा फ़ारसी और उर्दू कवियों की देन है.उन्हीं की देखादेखी हिंदी कवियों ने भी उपनाम रखने की परंपरा कायम की.हालांकि उपनाम रखने की परंपरा यहाँ प्राचीन संस्कृत कवियों में भी रही है.संस्कृत के अनेक कवि अपने उपनामों से ही अपनी पहचान बनाए हुए हैं.उपनामों की परंपरा वैदिक ऋषियों तक जाती है.आदिकवि वाल्मीकि के ही उपनाम हैं.शुनः शेप,शुनः पुच्छ,लोपामुद्रा उपनाम ही प्रतीत होते हैं.

हिंदी के प्रायः सभी कवि अपने उपनामों से ही प्रसिद्ध हैं.कहा तो यह भी जाता है कि इस परंपरा में विदेशी प्रभाव के साथ ही साहित्यिक चोरी भी इसका कारण रही है.अपनी कविता के बीच में अपना नाम दे देने से चोरी की आशंका कम हो जाती थी.

प्राचीन कवि उपनाम रखते थे तो अपने नाम के पूर्वांश या उत्तरांश को अपना उपनाम बनाते थे.बाद में कुछ कवियों ने अपने स्वभाव,नगर या गांव के नाम के आधार पर उपनामों का चुनाव किया.इससे अलग एक धारा के लोगों ने सुर्खियां बटोरने के लिए ‘लुच्चेश’,’धूर्त’,’बेहया’ जैसे उपनामों को अपनाया.पुराने हिंदी कवियों के कुछ उपनाम राजाओं द्वारा उपाधि के रूप में दिए गये हैं.इनमें महाकवि भूषण और भारतेंदु का नाम लिया जा सकता है.

संस्कृत के उपनाम वाले ऐसे अनेक कवि हैं जिनका वास्तविक नाम तक ज्ञात नहीं हैं. यथा,भिक्षाटन, निद्रादरिद्र,राक्षस,घटखर्पर,धाराकदंब,अश्वघोष,कपोलकवि,मूर्खकवि,मयूर,कपोत,कापालिक जैसे अनगिनत नाम हैं.

उपनामधारी संस्कृत कवियित्रियों में ‘विकटनितंबा,अवंतीसुंदरी,कुलटा,रजक सरस्वती, जघन-चपला जैसे अनेक उपनाम शामिल है.इनमें से अनेक ऐसे हैं जिनकी शायद ही कोई रचना पुस्तक के रूप में उपलब्ध हो.अधिकतर की छिटपुट रचना या संग्रह के रूप में संकलित हैं.जिनकी रचनाएं उपलब्ध हैं उनमें, अश्वघोष,घटखर्पर और अवन्तीसुंदरी शामिल हैं.

अज्ञात कवियों के साथ ही कालिदास,माघ,भारवि,भवभूति जैसे प्रख्यात कवियों के नाम भी उपनाम ही माने जाते हैं. महाकवि कालिदास का वास्तविक नाम कुछ लोगों के अनुसार मातृगुप्त है.माघ और भारवि के संबंध में कहा जाता है कि आपसी प्रतिद्वंदिता के कारण इन्होंने अपने उपनाम रखे.’भा रवि’ का अर्थ  है – सूर्य की तेजस्विता.यह नामकरण देख माघ उपनाम वाले कवि ने घोषित किया कि वह भारवि हैं तो मैं ‘माघ’ हूं.माघ महीने में सूर्य की तेजी क्षीण हो जाती है.

अश्वघोष संस्कृत के प्रख्यात महाकवि हैं.इनकी बुद्धचरित प्रख्यात रचना है.अश्वघोष का अर्थ है-घोड़े की आवाज.कहा जाता है कि वैदिक ब्राह्मण कुल में जन्म लेने और वेद के विद्वान बौद्ध धर्म में दीक्षित हो गए थे.घूम-घूमकर बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार करते थे.इससे चिढ़कर वैदिक ब्राह्मणों ने मजाक उड़ाना शुरू कर दिया कि जिधर देखो घोड़े की तरह हिनहिनाता रहता है.

कुछ लोगों का कहना है कि इनके प्रवचन इतने रोचक,सरस और मधुर होते थे कि हिनहिनाता घोड़ा भी तन्मयता से इनका प्रवचन सुनने लगता था.इन्हीं मनोमुग्धकारी प्रवचनों के कारण इनका नाम अश्वघोष हो गया.यह नाम इतना प्रचलित हो गया कि कवि ने भी इसे स्वीकार कर लिया.

संस्कृत के एक प्रसिद्ध कवि रहे हैं ‘भर्तृमेंठ’.इसका अर्थ है – पीलवानों का स्वामी.पिकनिकर उपनाम वाले कवि भी उक्ति विशेष के कारण उपनाम अलंकरण के रूप में प्राप्त हो गया.वे बेचारे जंगलों में भटकते हुए बिलखते हुए घूम रहे थे कि यदि वसंत की आग में झुलसकर मेरी चिर विरहणी प्रिया प्राण त्याग दे तो उसके वध के पाप का भागी कौन होगा? उसकी युवावस्था,स्नेह या कामदेव? कवि के यह प्रश्न करते ही कोकिलों की झंकार सुनायी दी कि ‘तू-तू तू तू ही’.

पुराने कवि चाहे उर्दू,फारसी या हिंदी के हों उपनाम जरूर रखते थे.हिंदी के कवि प्रसाद,निराला एवं कुछ और कवियों ने इस परंपरा का पालन नहीं किया.आधुनिक कविताओं,छंदों में उपनाम की गुंजाईश ही नहीं होती.अब नए लेखक और कवि उपनाम नहीं रखते.


Saturday, September 5, 2015

नाम ही तो है

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शेक्सपियर ने जब यह कहा था कि,’नाम में क्या रखा है?’ तो उसके जरूर गहरे अर्थ रहे होंगे.अक्सर लोग यह कहते देखे जाते हैं कि ‘नाम में क्या रखा है?’ उसके गुणों को देखा जाना चाहिए.हकीकत यही है कि आज भी नाम और गुण मेल नहीं खाते.अतीत के चरित्रों के गुण-अवगुण को भी लोग नाम रखते  समय याद करते हैं.दुर्योधन का अर्थ है सबसे बड़ा योद्धा,लेकिन कोई भी माता-पिता अपने पुत्र का नामकरण इस नाम पर नहीं करना चाहते.

भारतीय पुरा साहित्य में ऐसे अनेक चरित्रों का वर्णन मिलता है.इन चरित्रों के माध्यम से जहाँ भारतीय संस्कृति की मूल भावना एवं जीवन मूल्य उजागर हुए हैं,वहीँ उनका आधुनिक चिंतन से मेल भी व्यक्त होता है.ऐसा ही एक अद्भुत चरित्र है – राजा अलर्क का.राजा अलर्क का विवरण मार्कंडेय पुराण में मिलता है.

अलर्क महाराज ऋतुध्वज के पुत्र थे.वस्तुतः ऋतुध्वज के प्रथम पुत्र विक्रांत,दूसरे पुत्र सुबाहु तथा तीसरे पुत्र शत्रुमर्दन हुए.उनकी पत्नी का नाम था मदालसा.जब राजा को चौथा पुत्र हुआ तो राजा ने उनका नामकरण करना चाहा.रानी मदालसा हंस पड़ी,क्योंकि नाम के अर्थों के अनुरूप कुछ भी तो नहीं था,अतः व्यर्थ में अर्थों वाले नाम देने की क्या जरूरत है?

राजा को रानी मदालसा की हंसी अखरी.राजा का यह विश्वास था कि क्षत्रियों के नाम वीरतासूचक होने चाहिए.इसलिए पुत्रों के नाम विक्रांत,सुबाहु और शत्रुमर्दन रखा था.रानी इन तीनों के नामकरण संस्कार पर हंसी थी.अतः राजा ने पुनः कहा कि तुम्हारे विचार में ये नाम उपयुक्त नहीं हैं तो चौथे पुत्र का नाम तुम ही रखो.

रानी मदालसा ने चौथे पुत्र का नाम रखा अलर्क.इस नाम का कोई अर्थ नहीं है.पूछने पर रानी ने कहा कि नाम का प्रयोजन तो व्यवहारिक जीवन में पहचान के लिए होता है.आत्मा तो सर्वव्याप्त है,अतः इस शरीर का कोई नाम हो ही नहीं सकता.जो नाम दिया जाएगा,वह अर्थ की दृष्टि से निरर्थक होगा,अतः अलर्क नाम का कोई अर्थ नहीं है.

रानी मदालसा एक उत्तम मां थी,वह जानती थी कि जीवन में धन के अतिरिक्त भी बहुत कुछ सार्थक है.अतः तीन पुत्रों का नामकरण संस्कार भले ही राजा ने किया हो,प्रथम गुरु की तरह शिक्षा मां ने ही दी.राजा के पुत्रों को राज धर्म की शिक्षा माता ने नहीं दी.माता मदालसा ने तीनों पुत्रों को ज्ञानोपदेश देकर गृहस्थ धर्म से विरक्त कर दिया.

तब राजा ऋतुध्वज ने रानी से ने कहा कि ‘यदि तुम मेरे वंश का हित चाहती हो तो इस पुत्र अलर्क को राजधर्म की शिक्षा दो ताकि यह क्षत्रियोचित धर्म का पालन कर सके.रानी मदालसा ने पति की आज्ञा का पालन करते हुए संसार के कल्याण के लिए प्रवृत्ति मार्ग और राजधर्म की शिक्षा दी.माता की शिक्षा के अनुसार तीन पुत्र वैराग्य मार्ग पर गए और अलर्क राजमार्ग पर.

राजा अलर्क यथासमय अपने पिता के आदेशानुसार गद्दी पर बैठे,राजा बने और न्यायोचित ढंग से राज्य का संचालन किया.लेकिन उनके बड़े भाई सुबाहु को लगा कि उनका अनुज सांसारिक सुखों में लिप्त हो गया है.अलर्क को आत्मज्ञान कराने के लिए सुबाहु ने काशी नरेश से सहायता मांगी.काशी नरेश को तो इसी दिन का इंतजार था.उन्होंने राजा अलर्क को संदेश भेजा कि या तो राज्य बड़े भाई सुबाहु को सौंप दें या युद्ध के लिए तैयार रहें.अलर्क ने जवाब में कहा कि यदि सुबाहु स्वयं राज्य मांगते हैं तो वे सहर्ष तैयार हैं,किंतु युद्ध के भय से राज्य त्यागने के लिए तैयार नहीं हैं.

युद्ध में अलर्क की पराजय हुई.उसका सैन्यबल और कोष समाप्त हो गया और उसे वैराग्य हो गया.काशी नरेश ने सुबाहु को राज्य ग्रहण करने को कहा किंतु उसने इंकार करते हुए कहा कि उसका उद्देश्य तो सिर्फ अलर्क को आत्मज्ञान कराना था.अलर्क को सचमुच आत्मज्ञान प्राप्त हो गया.उसने भी राज्य वापस लेने से इंकार कर दिया.अंततः जब कोई राज्य ग्रहण करने को सहमत नहीं हुआ तो अलर्क के बड़े पुत्र को राज्य सौंप दिया गया.

इस प्रकार विश्व का प्रथम दल-बदल हुआ.सत्ता के लिए शत्रु की शरण में जाकर युद्ध लड़ा गया किंतु सत्ता प्राप्ति के लिए कोई उत्सुक नहीं मिला.इस युद्ध और सत्ता संघर्ष का एकमात्र उद्देश्य आत्मज्ञान की प्राप्ति रहा.

अलर्क महान त्यागी,तपस्वी और न्यायी शासक हुए.उन पर उनकी प्रथम गुरुमाता मदालसा का प्रभाव अंत तक रहा.जब तक सत्ता में रहे राज्य के कल्याण में रत रहे और जब राज्य का त्याग किया तो राज्य की और देखा तक नहीं.राजा अलर्क अपने समस्त गुणों के साथ विश्व के प्रथम नेत्रदानी भी कहे जा सकते हैं.उनके सम्बन्ध में वाल्मिकी रामायण में कहा गया है कि ‘राजा अलर्क ने एक अंधे ब्राह्मण को अपने दोनों नेत्रों का दान कर दिया.’