Wednesday, October 22, 2014

दीपावली,गणपति और तंत्रोपासना

तांत्रिक गणपति 
दीपावली अंधकार में प्रकाश का पर्व है,लेकिन इसका महत्व इतने से ही कम नहीं हो जाता. दीपावली को कालरात्रि कहा गया है,इसलिए जितने तांत्रिक और सिद्धिदायक अवयव हैं,उनका प्रयोग दीपावली की रात्रि को ही किया जाता है.इसके लिए मध्यरात्रि और परम एकांत जरूरी है.हमारे वेद,पुराण और संहिताओं सभी में मंत्र की महत्ता को बताया गया है.ऋग्वेद की हर ऋचा अपने आप में एक मंत्र है.स्वयं गायत्री मंत्र ऋग्वेद की धरोहर है.

किसी भी शुभ कार्य को प्रारंभ करने से पहले गणेश की वंदना करना,उन्हें नमन करना आज भी सर्वमान्य लोकरीति है.संभवतः इसीलिए किसी भी कार्य को प्रारंभ करना ‘श्री गणेश’ करना कहा जाता है.गणेश हमारे देवमंडल में अग्रपूजा का सम्मान पाने वाले देवता हैं.

गणेश की इस महत्ता के पीछे उनमें सन्निहित अनेक गुण हैं जिनसे उपासक को अनेकानेक लाभ प्राप्त होते हैं.उन्हें विघ्नविनाशक,बुद्धिप्रदाता,मांगल्य के देवता,ऋद्धि –सिद्धि के प्रदाता आदि रूपों में पूजा जाता है.वे विघ्नविनाशक हैं,इसलिए प्रत्येक शुभ कार्य के प्रारंभ में उनका आवाहन – पूजन किया जाता है ताकि वह कार्य निर्विघ्न संपन्न हो.

जिस प्रकार किसी मंत्र के उच्चारण के पूर्व ॐकार का उच्चारण आवश्यक माना जाता है,उसी प्रकार किसी भी शुभ कार्य के पहले गणेश-पूजा अनिवार्य मानी जाती है.

गणेश के दैवत्व पर तथा उनसे संबंधित आख्यानों के लिए याज्ञवलक्यसंहिता,प्राणतोषिनी,       परशुराम कल्पसूत्र,तंत्रसार,शारदातिलक,मैत्रायिणी संहिता,ब्रह्मवैवर्त,विष्णुधर्मोत्तर आदि पुराणों में प्रचुर सामग्री मिलती है.इन ग्रंथों के विवरण से गणेश के महात्मय में निरंतर वृद्धि होती है.

प्रायः विद्वान ऐसा मानते हैं कि गणेश उपासना में नवीं दशवीं शती ई. तक तंत्र का समावेश हो चुका था. गणेश का उद्भव शिव – परिवार में होने की कथा के आधार पर उन पर शैव प्रभाव प्रारंभ से ही बना था.भारतीय मूर्तिकला इस बात की साक्षी है.गणेश की मूर्तियों में उर्घ्व लिंग,त्रिनेत्र, मुंडमाल,अर्धचंद्र मौलि,सर्वयज्ञोपवित और व्याघ्रचर्माम्बर उन्हें शिव के निकट सिद्ध करते हैं.

शायद शैव प्रभाव के कारण ही गणेश का घनिष्ट संपर्क शाक्त संप्रदाय से हो गया.गणपति संप्रदाय में गणेश की पूजा के बाद शक्ति की पूजा का विधान है.तंत्राचार में गणेश का इन शक्तियों के साथ विशेष संबंध हो गया था.

व्याकरण के अनुसार ‘मात्रिका’ शब्द का अर्थ होता है ‘माता इव’ अर्थात माता के तुल्य. मातृकाएं क्रूर स्वभाव की मानी गई हैं.परन्तु इन्हें प्रसन्न करने पर ये मातृवत पालन करती हैं.मातृकाओं का यह स्वभाव विघ्नेश्वर गणेश के स्वभाव से मेल खाता  है. 

ऐसा माना जाता है कि गणेश भी स्वभाव से विघ्नकर्ता थे,तभी उन्हें विघ्नेश्वर और विघ्नेश कहा गया है.किन्तु पूजा करने पर वही गणेश सभी विघ्नों का नाश कर देते हैं.शायद इसी स्वभाव साम्य के कारण गणेश का संबंध मातृकाओं से स्थापित हो गया.देश के विभिन्न स्थानों से मिले सप्तमात्रिका – फलकों पर प्रायः गणेश का पहला स्थान है.

15वीं शती के शिल्पग्रंथ ‘रूपमंडन’ में गणेश के मंदिर में विभिन्न शक्तियों की मूर्तियों की स्थापना का निर्देश है.इनमें गौरी,बुद्धि,सरस्वती,सिद्धि आदि के नाम सम्मिलित हैं.उत्तर प्रदेश के फतेहगढ़ के चित्रगुप्त मंदिर में उसकी एक भित्ति पर प्रतिहार कालीन नृत्यरत गणेश की मूर्ति सीमेंट से जड़ी हुई है. इस मूर्ति के दोनों पार्थों में सरस्वती,अम्बिका,लक्ष्मी,दुर्गा और मातृका की मूर्तियाँ भी उकेरी गई हैं.

उड़ीसा में रत्नागिरी की पहाड़ी पर एक विशाल बौद्ध विहार के अवशेष पाए गए हैं जो वहां तंत्रयान का साक्ष्य समुपस्थित करते हैं. इन अवशेषों में महाकाल का एक मंदिर और गणेश की कुछ मूर्तियाँ मिली हैं.तिब्बत और हिमाचल प्रदेश में वज्रयान एवं तंत्रयान से प्रभावित बौद्ध मठों और विहारों में भी गणेश की मूर्तियाँ मिली हैं.

तंत्राचार में गणेश या गणेश – उपासना में तंत्राचार की परिपुष्टि करने वाले कुछ उदाहरण भारतीय मूर्तिकला में मिलते हैं.बिहार से प्राप्त दो चतुर्मुखी शिवलिंगों पर भी गणेश का महत्वपूर्ण अंकन पाया गया है और ऐसा ही प्रतिहारयुगीन शिवलिंग काशी नरेश,वाराणसी के संग्रह में बताया जाता है.जावा में भी मिले एक शिवलिंग पर गणेश की मूर्ति है जो हौलेंड में है. इस प्रसंग में पद्मपुराण में कहा गया है कि ब्रह्मपुत्र नदी के तट पर लिंगरुपी विनायक का उल्लेख है........

देशे च भारतवर्षे वनितापूर्ण सन्निधौ |
लौहित्यदक्षिणे तीरे लिंगरुपी विनायकः ||

शिवलिंगों की योनिपीठ पर गणेश के ये अंकन निश्चित ही उन्हें तंत्रोपासना से संबंध ठहराते हैं.श्रीगणेशपुराण के अंतर्गत उपासना खंड में आए गणपति अष्टोत्तर शतनामस्रोतम के श्लोक 
कहते हैं .... 

कामिनीकामनाकाम मालिनिकेलिला लितः |
अमोघसिद्धिराधार आधाराधेयवर्जितः ||

गणेश की कई विचित्र प्रतिमाएं जावा से मिली हैं,जिन पर गणेश का कापालिक स्वरूप दर्शाया गया है.सिंगसिरी से मिली एक प्रतिमा यूरोप में लीडेन संग्रहालय में है.इस प्रतिमा में गणेश के मुकुट की मध्य मणि तथा दोनों वक्षों पर कपाल बने हुए हैं और जिस आसन पर वे बैठे हैं,वह भी कपाल पंक्ति से सजाया गया है.बोरा से मिली दूसरी प्रतिमा के आसन पर भी कपाल बने हैं और उसके पृष्ठ भाग पर विशाल और विकराल कीर्तिमुख बना है.ये सभी प्रतिमाएं गणेश उपासना में तंत्राचार की परिचायक हैं.

Tuesday, October 7, 2014

बुजुर्ग या वरिष्ठ नागरिकों की उपेक्षा क्यों ?

आज के तथाकथित अत्याधुनिकता के इस युग में बुजुर्गों की उपेक्षा अधिक बढ़ी है.जबकि बुजुर्ग कभी उपेक्षा के पात्र नहीं हो सकते.किसी भी समाज के लिए उनकी भूमिका न केवल महत्वपूर्ण होती है बल्कि सामाजिक धरोहर के रूप में भी सामने आती है.

पीढ़ियों के अंतराल के कारण वैचारिक मतभेद या टकराव का सिलसिला तो हजारों साल पुराना है ही,परंतु आजकल महानगरीय जीवन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका को ही हम भूलने लगे हैं.उनके साथ होने वाले दुर्व्यवहार से लगता है मानो उनके अस्तित्व को ही नकारा जा रहा हो.यह परिस्थिति भारत जैसे देशों के  के लिए अत्यंत त्रासदीपूर्ण है क्योंकि हमारा देश प्रारंभ से ही संस्कृतिप्रधान देश रहा है.

पूरी दुनियां का आध्यात्मिक गुरु माने जाने वाले भारत ने दुनियां को तो प्रेम का पाठ पढ़ाया लेकिन अपनी ही भूमि में अब प्रेम की संस्कृति समाप्त होने लगी है.हमारा पालन-पोषण करने वाले बुजुर्गों की उपेक्षा इसी त्रासदीपूर्ण परिस्थिति का उदहारण है.उनके साथ अमानवीय व्यवहार दुखदायी है.बुजुर्गों के प्रति उपेक्षा की भावना की शुरुआत पूरी दुनियां में दूसरे विश्वयुद्ध के बाद से हुई,जो कि अब व्यापक रूप से समाज में फ़ैल गई है.

सबसे पहले इस अमानवीय व्यवहार पर विचार करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर 1981 में जिनेवा में हुए सम्मेलन में 1 अक्तूबर को ‘अंतर्राष्ट्रीय वृद्ध दिवस’ के रूप में मनाने का निर्णय किया गया.इसी के साथ विश्व समुदाय ने वृद्धों की बढ़ती संख्या तथा उनकी बदलती हुई सामाजिक दशा पर चिंता व्यक्त की.बुजुर्गों की देखभाल करना तथा उन्हें सामाजिक सुरक्षा प्रदान करना एक परम पवित्र कार्य है जिन्हें पूरा करने की जिम्मेवारी वर्तमान पीढ़ी के कंधे पर ही है.

इस बात पर भी विचार किया जाना जरूरी है कि वृद्धावस्था की शुरुआत किस उम्र से होती है.सरकारी तौर पर यह 58 या 60 वर्ष की आयु है लेकिन देश में ऐसे लोग भी हैं जीवन की शतकीय पारियां खेली हैं.प्रसिद्ध क्रिकेट खिलाड़ी स्व. प्रो. देवधर(101 वर्ष),प्रसिद्ध चित्रकार स्व. विश्वनाथ सारस्वत तथा स्व. मोरारजी देसाई जैसे महान शख्सियत की उम्र को देखते हुए 58-60 वर्ष की आयु बहुत कम लगती है.अतः बुढ़ापे की आयु क्या होनी चाहिए यह एक बड़ी गुत्थी है.वैसे 
वृद्धावस्था की सबसे प्रचलित परिभाषा शायद यह है कि जब मानव शरीर की शक्ति तथा सक्रियता क्षीण होने लगे तो समझा जाना चाहिए कि बुढ़ापे की दस्तक आ चुकी है.

शरीर में रक्त संचार की गति ही वृद्धावस्था को निर्धारित करने वाला प्रमुख आधार है.प्रत्येक मानव के शरीर में 40 से 50 वर्ष की आयु तक विशेष परिवर्तन आ जाते हैं.यह कहा जा सकता है कि वृद्धावस्था के आने पर मानव शरीर में रक्त बनने की प्रक्रिया बंद होने लगती है.जब शरीर में ताजा रक्त का संचार बंद हो जाता है तब शरीर की असंख्य कोशिकाओं को ऑक्सीजन एवं दूसरे तत्वों की आपूर्ति बंद हो जाती है.इसके फलस्वरूप शरीर के आकार में कमी आ जाती है तथा शरीर की त्वचा में झुर्रियां आने लगती हैं.परंतु त्रासदी इस बात की भी है कि इस प्रकार की प्राकृतिक प्रक्रिया के कारण होने वाले शारीरिक परिवर्तनों को आयुवाद की सीमा में बंद करने की चेष्टा की जा रही है.यह प्रवृत्ति एक प्रकार का  सामाजिक तथा मानसिक अपराध ही है.

किसी भी व्यक्ति की उम्र का बढ़ना उसके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है.मानव के पैदा होते ही उसकी प्रक्रिया शुरू हो जाती है.अतः वृद्ध होने पर ही इसका आतंक क्यों बढ़ता है? एक समय था जब भारत के गांवों में यह कहावत प्रचलित थी कि जहाँ बुजुर्ग लोग नहीं होते हैं वहां काम नहीं बन पाता है.दूसरी ओर आज की परिस्थिति यह है कि सामाजिक विघटन की वजह से ऐसी कहावतों को न कोई मानता है और न ही महत्त्व देता है.

इन परिस्थितियों के लिए शायद बढ़ती महंगाई भी कुछ हद तक जिम्मेवार है.संयुक्त परिवार को केंद्रित परिवार में परिवर्तित करने में भी इसकी भूमिका रही है.इसी वजह से निर्धन तथा मध्य वर्ग के परिवारों के लिए अपने बुजुर्गों पर होने वाले मामूली खर्चे को भी बोझ महसूस किया जाता है.बुजुर्गों की उपस्थिति को ही वे मानसिक तनाव का स्रोत समझने लगते हैं.हालाँकि सरकारी सेवा से निवृत्त व्यक्ति तो फिर भी पेंशन से अपना गुजारा कर लेते हैं,परंतु उनकी दशा सोचनीय रहती है जिनके पास कोई वित्तीय साधन या सहारा नहीं होता.

बुजुर्गों की समस्याएँ न केवल भारत एवं अन्य विकासशील देशों में हैं बल्कि पूरी दुनियां में उनकी समस्याएँ बढ़ रही है.विकसित देशों में तो ‘ओल्ड एज होम’ बहुत पहले से रहा है,अब भारत जैसे देशों में भी इनकी स्थापना हो चुकी है,जहाँ बेसहारा एवं अपनों से उपेक्षित बुजुर्गों की संख्या बढ़ रही है.

महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी है कि जिन्होंने अपना उर्जावान समय समाज को दिया,आज उन्हीं को प्रेम तथा आदर-सत्कार से वंचित रखना अपराध नहीं.यह तो उनका अधिकार ही है.वर्तमान समय में यह जरूरी है की बुढ़ापे को सक्रिय तथा गतिशील बनाया जाए.साथ ही इस बात की भी आवश्यकता है कि वरिष्ठ नागरिकों या बुजुर्गों को उचित सम्मान एवं अधिकार मिले.उनको संरक्षण प्रदान करना न केवल जरूरी है बल्कि समाज की जिम्मेवारी भी है.

Friday, October 3, 2014

इतिहास के बिखरे पन्ने : आंसुओं में डूबी गाथा

श्रीकृष्ण वाटिका 
हमारे आस-पास ऐतिहासिक महत्त्व की ऐसी अनेक वस्तुएं,स्मारक,चिन्ह यत्र-तत्र बिखरे पड़े मिलते  हैं,जिनकी ओर बरक्श हमारा ध्यान नहीं जाता.उन्हीं महत्वपूर्ण वस्तुओं,इमारतों,स्मारकों के बारे में जब कोई अन्य व्यक्ति ध्यान दिलाता है तब सोचते हैं कि इस बारे में तो हमें पता ही नहीं था.

बिहार के मुंगेर शहर का ऐतिहासिक मीर कासिम का किला ही महत्वपूर्ण ऐतिहासिक धरोहर नहीं है, बल्कि अन्य महत्वपूर्ण स्मारकों, गंगा के घाट,चंडी स्थान,योग विद्यालय आदि के लिए भी यह शहर जाना जाता है.कष्टहरणी घाट के ऊपर बने टीले से गंगा का नजारा अद्भुत लगता है तो बरसात के दिनों में यहाँ से उफनती गंगा भयावह दृश्य उत्पन्न करती है.

कष्टहरणी घाट के सामने श्रीकृष्ण वाटिका में बंगाल(बिहार,उड़ीसा) के अंतिम नवाब मीर कासिम के दो जांबाज बच्चों गुल और बहार की जीर्ण-शीर्ण मजार ब्रिटिश हुकूमत के जुल्मोसितम की दास्तां बयां करती है.आज भले ही हम उन जांबाज बच्चों की कुरबानी को भूल चुके हैं लेकिन ब्रिटिश हुकूमत भी उन बच्चों की जांबाजी के इतने कायल थी कि जब तक हिंदुस्तान में रहे,तब तक उन बच्चों के सम्मान में मजार पर बंदूक की सलामी दी जाती रही.रोजाना सुबह-शाम अंग्रेज अधिकारी और सिपाही मजार पर सलामी देते रहे.

‘मुंगेर गजेटियर’ के लेखक पी. सी. राय चौधरी ने लिखा है की नवाब मीर कासिम की पराजय के बाद ब्रिटिश हुकूमत की नींव मजबूत हो गई थी.उसी दौर में नवाब के दो बच्चों की हत्या भूलवश हो गई.इसके लिए अंग्रेज शासक अपने को जिम्मेदार मान रहे थे.इसी कारण उन बच्चों के सम्मान में मजार पर रोजाना बंदूक की सलामी देने का आदेश दे रखा था.

इन जिंदादिल बच्चों की दास्तां भी कम रोचक नहीं.ब्रिटिश हुकूमत अपनी ‘फूट डालो राज करो’ की नीति को अंजाम देते हुए बंगाल पर अपना आधिपत्य कायम कर चुकी थी और आगे बढ़ने की योजना बना रही थी.नवाब मीर कासिम को यह मंजूर नहीं था कि व्यावसायिक का चोला फेंक कर अंग्रेज हिंदुस्तान पर हुकूमत करें.इसलिए उन्होंने अंग्रेजों को समुद्र पार खदेड़ने का फैसला किया.उन्होंने मुर्शिदाबाद से दूर मुंगेर में अपनी नयी राजधानी बनाई और मुंगेर किले का जीर्णोद्धार कर आयुधशाला की स्थापना की.फौज को सुसंगठित कर फिरंगी हुक्मरान के साथ जंग का ऐलान किया.मीर कासिम ने मुंगेर राजधानी एवं किले की सुरक्षा का भार अपने वफ़ादार अरबली खां को सौंप कर फौज के साथ कूच किया.उधवा नाला के पास फिरंगी फौजों से मुकाबले में मीर कासिम की पराजय हुई और वे किसी तरह बचकर निकले.

मेजर एसम्स के नेतृत्व में ब्रिटिश फौजों ने मुंगेर किले को चारों तरफ से घेर कर तोपों से जबर्दस्त गोलाबारी की.इसके विरुद्ध नवाब की सुरक्षित सेना टिक नहीं सकी.स्थिति को भांपकर नवाब के वफ़ादार अरबली खां ने मीर कासिम के दो युवा बच्चों गुल और बहार को सुरक्षित भूमिगत सुरंग से बाहर निकाला.मेजर एसम्स के सामने अरबली खां के आत्मसमर्पण करते ही ब्रिटिश फौजों ने गुस्से में उसकी हत्या कर दी और किला क्षेत्र मुंगेर में जुल्म-अत्याचार की सीमा पार कर दी.काफी रक्तपात के बाद अंग्रेजों का मुंगेर पर अधिकार हो सका था.

‘मुंगेर गजेटियर’ के लेखक पी. सी. राय चौधरी  ने लिखा कि अक्टूबर 1764 में दो दिनों तक मुंगेर एवं किले पर बरतानी फौज गोले बरसाते रहे.किला क्षेत्र में अफरातफरी मच गई थी.हताहतों एवं मृतकों की संख्या काफी थी.

मीर कासिम के दोनों युवा बेटे-बेटियों ने अपने वतन से मुहब्बत के कारण सुरंग में रहकर अपने वफ़ादार साथियों को एकजुट कर अंग्रेजों से मुंगेर को आजाद कराने की ठानी.मेजर एसम्स ने मुंगेर में मीर कासिम के वफ़ादार लोगों को फांसी पर लटकाने का आदेश दे रखा था.ऐसे सैकड़ों लोगों को किला क्षेत्र में ही फांसी दे दी गई.दूसरी ओर नवाब के बच्चों की सरगर्मी से तलाश जारी थी.यह सूचना नवाब के बच्चों को भी मिल रही थी.इसलिए मीर कासिम के बेटे बहार रात में बाघ की खाल पहनकर अपने वफादारों से मिलते थे.

अंग्रेज अफसरों को विश्वास था कि मीर कासिम के दोनों बच्चे मुंगेर में ही कहीं छिपे हैं,इसलिए फौज की एक टुकड़ी उनकी तलाश में घरों,जंगलों,पहाड़ों की खाक छान रही थी.एक रात बाघ की खाल में बहार सुरंग के पास गंगा नदी के किनारे टहल रहे थे कि एक अंग्रेज अफसर की नजर पड़ गई और उसने बाघ समझकर उसी क्षण गोली मार दी.उसकी बहन गुल को विश्वास नहीं था की गोली उसी के भाई को मारी गई.देर रात बहार के नहीं लौटने पर सुबह भिखारिन के वेश में सुरंग से बाहर निकली तो थोड़ी दूर गंगा के किनारे भीड़ देखी.उत्सुकतावश जब वहां पहुंची तो अपने भाई को मृत पाया.बाघ की खाल में बहार की लाश को देखकर अंग्रेज अफसर भी हैरत में थे.उनके अंतर्मन को यह बात छू गई.मुंगेर वासियों को उनकी हत्या से काफी आघात लगा.गुल ने उस वक्त तो सीने पर पत्थर रख लिया लेकिन सुरंग में वापस लौटकर जी भर रोई.भाई की मौत ने उसे झकझोर कर रख दिया था.

अंग्रेज अफसरों ने बहार को ससम्मान पीर साहनसफा गुल के दरगा द्वारा कष्टहरणी घाट के पास दफ़नाया.वहां बड़ी संख्या में अंग्रेज अफसर एवं फौज ने बंदूक की सलामी दी थी और रोजाना बंदूक की सलामी देने का आदेश जारी कर दिया था.

अपने जान से अजीज छोटे भाई की मौत ने गुल को इतना आहत किया कि दूसरी रात भाई की मजार से लिपटकर ख़ुदकुशी कर ली.सुबह तड़के जब अंग्रेज फौज एवं अफसर सलामी देने आये तो गुल को हथियारबंद युवक की पोशाक में मृत पाया.सब उस जांबाज बच्ची की क़ुरबानी पर फफ़क पड़े थे.अंग्रेज अफसरों की भी आँखे छलछला गई थीं.गुल को भी उसी मजार के पास दफना दिया गया.

कुछ इतिहासकारों क मानना है कि अपने भाई की निर्मम हत्या का बदला लेने के लिए गुल जो अचूक निशानेबाज थी,ने मर्द की पोशाक में बंदूक लेकर किले के अंदर अंग्रेजी फौजों को ललकारा और मरते-मरते अपनी जांबाजी क ऐसा करिश्मा दिखाया कि दर्जनों फौजी उनकी गोली से मारे गये और खुद मेजर एसम्स बुरी तरह घायल हो गया था.आख़िरकार किले के अंदर अंग्रेज फौज ने घेर कर गुल की गोली मारकर हत्या कर दी थी.

आजादी से पहले तक जांबाज बच्चों की मजार की सुरक्षा अंग्रेज फौज के जिम्मे थी.आजाद हिंदुस्तान में उन बहादुर बच्चों की क़ुरबानी को भुला दिया गया.आज भी उनकी जीर्ण-शीर्ण मजार मुंगेर किला क्षेत्र के कष्टहरणी घाट स्थित श्रीकृष्ण वाटिका में स्थित है,मानो कह रही हों.......

ख़मोशी में निहां खूं गशता लाखों आरजुएं हैं
चिरागे मुरदा हूं मैं बेजबां गोरे गरीबां का

(मेरे मन में लाखों कामनाएं खून हो-होकर प्रच्छन्न हो गई हैं.मैं बेजबान परदेशियों की कब्र का बुझा हुआ दीपक हूं.)