Monday, October 28, 2013

भारतीय संस्कृति और लक्ष्मी पूजन















दीपोत्सव के पर्व दीपावली पर लक्ष्मी पूजन की परम्परा काफी पुरानी है.वस्तुतः धन की देवी लक्ष्मी का पूजन भारतीय सभ्यता और संस्कृति में इस कदर रच - बस गया है कि लक्ष्मी को भारतीय जीवन दर्शन का अभिन्न अंग माना जाने लगा है. इसमें वास्तविकता भी है.   

कुछ लोगों का विचार है कि भारतीय संस्कृति पूर्णतः धार्मिक और आध्यात्मिक है,भौतिक जीवन का उसमें कोई महत्वपूर्ण स्थान नहीं है.किंतु बात ऐसी नहीं है.भारतीय जीवन में धार्मिकता और आध्यात्मिकता के साथ ही साथ भौतिकता का भी समान महत्व समझा गया है.हमारे जीवन के श्रेष्ठ और आदर्श चार पुरुषार्थ – धर्म,अर्थ,काम और मोक्ष हैं.

धर्म से ही हमारे समस्त कार्य संचलित होते हैं.धर्म वस्तुतः भारतीय जीवन पद्धति का ही दूसरा नाम है.परन्तु अर्थ और काम का महत्व भी धर्म से कम नहीं आँका गया है. अर्थ से,हमारा जीवन सुख और सुविधाएं प्राप्त करता है,हमारा समाज और राष्ट्र अर्थ के बल पर ही अपनी सर्वांगीण उन्नति करता है.यहाँ तक कहा गया है कि ....

सर्वे गुणाः कांचन माश्रयंते |

हमारे जीवन के सर्वाधिक महत्वपूर्ण समय ‘गृहस्थाश्रम’ में अर्थ और काम दोनों की सार्थकता सिद्ध होती है.

अर्थ और काम के प्रति हमारी धारणाएं अच्छी नहीं हैं.उदात्त जीवन के लिए हम इन्हें त्याज्य समझते हैं.संभवतः हम ऐसा इसलिए सोचते हैं कि हमारे समक्ष अर्थ और काम का स्वरूप सदैव अतिशय और अमर्यादित ही उपस्थित होता है.

इस सन्दर्भ में लक्ष्मी की मूर्ति या चित्र का विशेष महत्व है.लक्ष्मी भारतीय संस्कृति का एक अनूठा अभिप्राय है.मंगल कलश या पूर्ण कलश से प्रस्फुटित पद्म पर आसीन और कभी-कभी दोनों पार्श्वों में एक - एक दिग्गज से अपना अभिषेक कराती हुई लक्ष्मी की मूर्ति भारतीय जनमानस केमानस- चक्षुओं में समायी हुई है. कलश,पद्म.दिग्गज और स्वयं लक्ष्मी किसी न किसी उदात्त विचार से अनुप्रमाणित हैं. भारतीय जीवन,संस्कृति या विचारधारा के मूलभूत तत्व लक्ष्मी के इस प्रतीक में एक साथ समाहित हुए हैं.

कलश या पूर्णकलश सम्पूर्णता,संपन्नता या संवृद्धि का प्रतीक है.मनुष्य या विराट पुरुष दोनों का प्रतीक कलश है.

पूर्ण कलश में भरा हुआ जल जीवन का रस है.कलश वस्तुतः दिव्य सौंदर्य और सृजन का प्रतीक है.पद्म और लक्ष्मी,दोनों का जन्म जल से हुआ माना जाता है.पद्म आध्यात्मिकता का और लक्ष्मी भौतिकता का प्रतीक है.इस प्रकार कलश आध्यात्मिक एवं भौतिक दोनों प्रकार के तत्वों का समन्वयात्मक स्वरूप है.

पद्म की प्रतीकात्मकता तो सर्वविदित है.पद्म पृथ्वी और हिरण्यगर्भ का प्रतीक है.पद्मपुराण में कहा गया है ............

तच्च पद्म पुराभूतं पृथिवीरूपमुत्तमम |      

पद्म और सूर्य का संबंध सर्वविदित है.पद्म सूर्योदय के समय अपनी पंखुडियां खोलता है और सूर्यास्त के साथ बंद कर लेता है.इसे ब्रह्म्रुपी ज्ञान के सूर्य से मन रुपी कमल का विकास समझा जा सकता है. जल से स्वयं उत्पन्न होकर और स्वयंभू बनकर पद्म दिव्यवतार का बोध कराता है.तभी पद्म का संयोग ब्रह्मा,विष्णु,और लक्ष्मी के साथ हुआ.लक्ष्मी का तो वह लीला – पुष्प और आसन दोनों है.बिना पद्म के लक्ष्मी की तो परिकल्पना ही नहीं की जा सकती है.

पद्म कीच से उत्पन्न होकर भी सुंदर है,सुरभित है और जल में रहते हुए भी जल से निर्लिप्त है,निर्मल है. पद्म एक शाश्वत सत्य और सनातन शिव का उदहारण प्रस्तुत करता है.संसार रुपी कीच में उत्पन्न होकर भी संसार के मायारूपी जल से निर्लिप्त रहना और संसारिकता के मोह से मुक्त रहना ही मानव जीवन का उच्च आदर्श है.

दिग्गज दिशाओं के,सर्वव्यापकता और सार्वभौमिकता के प्रतीक हैं.दिग्गज(बादल) जल और जीवन के स्रोत हैं.ऐसे दिग्गजों के द्वारा लक्ष्मी का अभिषेक उन्हें राजलक्ष्मी का,जगज्जननी का पद प्रदान करता है.

पद्म पर आसीन लक्ष्मी की मूर्ति में भारतीय संस्कृति का सार समाहित है.लक्ष्मी वैभव एवं संपदा की प्रतीक हैं.परन्तु उनका आसन पद्म भौतिक संपन्न्ता के होते हुए भी उससे अनासक्त और विरक्त है.लक्ष्मी की मूर्ति में हमें वस्तुतः भौतिकता एवं आध्यात्मिकता,दोनों का समन्वय प्राप्त होता है.

भारतीय जीवन का अंतिम या चरम लक्ष्य मोक्ष माना गया है.मोक्ष का अर्थ है,सांसारिकता से मुक्ति,भौतिक माया – मोह से मुक्ति.इस प्रकार लक्ष्मी का प्रतीक भारतीय कला और भारतीय प्रज्ञा का एक अप्रतिम अभिप्राय है,जो हमारी संस्कृति का सच्चा स्वरूप समुपस्थित करता है.   

Thursday, October 24, 2013

उत्सवधर्मिता और हमारा समाज













भारतीय त्यौहार की परंपरा अनादिकालीन है.मनुष्य - सृष्टि के साथ ही उसकी सृष्टि हो गई जान पड़ती है.मनुष्य में आमोद – प्रमोद की एक स्वाभाविक प्रवृत्ति है और स्वभाव से ही वह एक सामाजिक प्राणी है.इन दोनों स्वाभाविक प्रवृत्तियों के सम्मिश्रण से ही त्योहारों की परम्परा का सूत्रपात हुआ होगा. 

सार्वजानिक रूप में,आमोद – प्रमोद को ही हम त्यौहार कह सकते हैं.प्रकृति की शोभा मनुष्य को आनंद विभोर कर देती है.पतझड़ के बुढ़ापे के बाद वसंत-ऋतु में नवजीवन प्राप्त कर जैसे सारी प्रकृति नया वेश – भूषा पहन बच्चों की तरह हंसने – खेलने लगती है,उसी प्रकार प्रकृति का परिवर्तन,सौंदर्य देख मनुष्य के हर्ष का पारावार नहीं रहता.अपने इसी हर्ष एवं आनंद को सार्वजनिक रूप देने के लिए उसने त्यौहार की सृष्टि की है.

भारतीय संस्कृति में एक दौर ऐसा भी था,जब साल के हर दिन कोई न कोई त्यौहार मनाया जाता था,यानि 365 दिन और 365 त्यौहार.इसके पीछे सबसे बड़ी वजह यही थी कि हम चाहते थे कि हमारा पूरा जीवन एक उत्सव बन जाए.दुर्भाग्य से आप सड़क चलते ,दफ्तर में या काम के दौरान यों ही उत्सव नहीं मनाते,इसलिए ये त्यौहार उत्सव मानाने के बहाना भर थे.

अगर आप जीवन में हर चीज को एक उत्सव के तरीके से करते हैं,तो इससे आपमें जीवन को सहज ढंग से जीने का नजरिया आता है,लेकिन बावजूद इसके आप उसमें पूर्ण लगन से शामिल रहते हैं.आज लोगों की सबसे बड़ी समस्या है कि जैसे ही उन्हें लगता है कि उनके जीवन में कोई चीज बेहद महत्वपूर्ण है तो वे उसके बारे में हद से ज्यादा गंभीर हो उठते हैं.दूसरी ओर ,अगर उन्हें लगता है कि चीजें इतनी महत्वपूर्ण नहीं हैं,तो उसके प्रति मन में शिथिलता आ जाती है और वे उसमें उतना जुड़ाव नहीं दिखा पाते.

जबकि जीवन का सार या राज इसी में है कि हर चीज को सहज ढंग से देखा जाय,लेकिन उसमें पूरी  तरह शामिल रहा जाय.यही वजह है कि जीवन से जुड़े जो बेहद महत्वपूर्ण पक्ष हैं,उनके प्रति एक उत्सव वाला नजरिया रखा जाता है,जिससे आप उसके महत्व को समझने या उसका आनंद लेने से चूक न जाएं.

सभ्यता के प्रारंभ से ही,जब  मनुष्य खानाबदोशी अवस्था में जंगलों में रहा करता था,तब भी उनमें सामूहिकता की भावना थी.यह सामूहिकता जंगली जानवरों से रक्षा करने या दूसरे कबीलों से रक्षा के लिए होती थी.तब परिवार और समाज नाम की कोई संस्था नहीं थी, लेकिन सामूहिकता की भावना तब भी थी.सभ्यता के विकास के विभिन्न चरणों से गुजर कर मनुष्य आज विकास के चरम स्तर पर है तो भी मनुष्य ने सामूहिकता का परित्याग नहीं किया है.

आज विभिन्न पर्व,त्योहारों,उत्सवों में यही सामूहिकता की भावना दिखाई देती है.मिलजुल कर उत्सव मनाने के पीछे सामाजिकता की भावना ही रहती है.लोग परिवार,समाज से दूर कितने ही हों,उनमें यही उत्सवधर्मिता अपने परिवार,समाज के पास खींच ले आती है.त्योहारों को एक साथ मिलजुलकर मनाने का आनंद ही कुछ और होता है.

किसी समाज के उत्सव का जीवन उस समाज के जीवन के समान ही रंगमय और दीर्घ होता है.भौगोलिक परिवर्तनों से उत्पन्न प्रकृति के नव – नव रूप,उनसे संचालित विभिन्न क्रिया- कलाप,धार्मिक विश्वास,पौराणिक और ऐतिहासिक वृत्तों से अनुराग,सांस्कृतिक मान्यताएं,सौंदर्य – बोध,जीवन और व्यवहार - जगत का सामंजस्य आदि मिलकर ही पर्व विशेष को जन्म और विकास देते हैं.

दीपमालिका पर्व भी इसके मूल में है.अंधकार पर प्रकाश की विजय,मृत्यु पर अमरता का अभियान आदि अमूर्त भावों ने भी उसे स्पंदन दिया है.हर धर्म ने सृष्टि की उत्पत्ति का मूल ज्योति को माना और सृष्टिकर्ता की कल्पना विराट और अजस्त्र ज्योति-केंद्र के रूप में की.

प्रकाश की पुकार,जीवन के उर्घ्व-गमन का मंगल उत्सव है.और इस पुकार को जितना प्रतीकात्मक सौंदर्य दीपक दे सकता है,उतना किसी अन्य उपकरण से संभव नहीं.मानव मनीषा ने प्राचीनतम युग में भी आलोक की दोहरी स्थिति का अनुभव कर उसे जीवन की प्रेरणा के रूप में स्वीकार किया है.

ऋग्वेद में कहा गया है .........

तव त्रिधातु पृथिवी उतधौर्वेश्वानरव्रतमग्ने सचन्त |
त्वम् भासा रोदसी अततंथाजस्रेंण शोचिषा शोशुचानः ||

अर्थात् – हे वैश्वानर ! अंतरिक्ष,पृथ्वी और द्धुलोक तुम्हारी ही कर्म – व्यवस्था धारण करते हैं.तुम प्रकाश द्वारा व्यक्त होकर पृथ्वी और आकाश में व्याप्त हो और अपने अजस्त्र तेज से उद्भासित हो.

दीपावली मनाने के पीछे भी यही विचार है कि अपनी जिंदगी में उत्सव मनाने का विचार लाया जा सके.इसलिए इस दिन पटाखे चलाये जाते हैं,ताकि थोड़ी सी चिनगारी एवं उत्साह का संचार आपके भीतर भी हो सके.इन त्योहारों का असली मकसद यही है कि साल के हर दिन हमारे अंदर वही उमंग एवं उत्साह कायम रहे.अगर हम यों ही सहज बैठें तो हमारा दिल,दिमाग,शरीर एक पटाखे की तरह उमंग से भरा रहे.

दीपावली विश्व परिवर्तन का यादगार पर्व है.सभी त्योहारों में सबसे अधिक आध्यात्मिक और सबसे ज्यादा ख़ुशी मनाने का त्यौहार.यह त्योहार हर एक के मन में रोमांच और अद्वितीय ख़ुशी की भावना लाता है.सभी इस पर्व पर यह कामना रखते हैं कि हमारे जीवन में भाग्योदय और शुभ –लाभ हो.

दीपावली कार्तिक अमावस्या के दिन आती है.अमावस्या यानि अंधकार,जो अज्ञानता और विकारों का प्रतीक है.इसलिए घर - घर में अंदर और बाहर अधिकाधिक दीपमालाएं आदि लगाने की होड़ लग जाती हैं.लेकिन हमारी आत्मा ही सच्चा दीपक है.इसलिए सच्ची दीपावली मनाने के लिए मन के दीप को जलाना और उसके प्रकाश को चारों ओर फैलाना सबसे जरूरी है.इसलिए हमें स्थूल रोशनी करने के बजाय अज्ञान रुपी अंधकार को मिटाकर अंतर्मन में आत्मज्ञान की ज्योति जलाने की जरूरत है.इसके प्रकाश की खुद हमें ही नहीं,पूरे विश्व को जरूरत है.

दीपोत्सव रोशनी के त्यौहार के रूप में सबसे अलग तो है ही,इसे सबसे ज्यादा उल्लास से मनाये जाने वाले त्योहारों में गिना जा सकता है.इस दिन न केवल घर –आँगन में दीप जलाने बल्कि अपने मन में जमा हो गए अज्ञान के अंधकार को मिटाकर,ज्ञान के दीपक जलाने की बात भी की जाती है. 

पर, दीपावली एक मायने में देश के सारे त्योहारों से अलग इसलिए है कि इसमें हर आदमी,हर परिवार समृद्धि की कामना करता है.दीपावली का महत्व इस बात में भी है कि यह बताती है कि मोह – माया से मुक्ति अपनी जगह है,लेकिन भौतिक समृद्धि भी जीवन का एक महत्वपूर्ण पक्ष है.

दीपावली का त्योहार हमें यह भी बताता है कि सभी लोगों को समृद्ध और खुशहाल बनाने का चिंतन भारतीय संस्कृति की एक प्राचीन चिंता है.      

Sunday, October 20, 2013

धन का देवता या रक्षक


















दीपोत्सव के पर्व दीपावली पर लक्ष्मी पूजन की परम्परा आम है,क्योंकि लक्ष्मी को धन की देवी माना जाता है. लेकिन धन के रक्षक अर्थात् कुबेर की पूजा का कहीं जिक्र नहीं मिलता.बोलचाल एवं मुहावरे में कुबेर का अक्सर जिक्र होता है कि – जैसे कहीं कुबेर का खजाना मिल गया हो.

ऐसा माना जाता है कि आरंभ में कुबेर एक अनार्य देवता थे.उनका वैदिक ब्राह्मणों के साथ मेल नहीं बैठता था.चौथी – पांचवीं शताब्दी में वैष्णव धर्म के उत्थान के साथ, जब लक्ष्मी की,धन की देवी के रूप में प्रतिष्ठा हुई,तब लोग कुबेर को भूलने लगे.धीरे – धीरे वे उपेक्षित होकर,दिक्पाल के रूप में मंदिरों के बाह्य अलंकरण के साधन – मात्र रह गए.

‘वाराह पुराण’ में एक कथा है – जब ब्रह्मा ने सृष्टि रचने का उपक्रम किया,तब उनके मुख से पत्थरों की वृष्टि होने लगी और आंधी तथा तूफ़ान आए. कुछ देर बाद,जब आंधी शांत हुई तब उन्होंने अपने मुख से निकले हुए उन पत्थरों से एक अलौकिक पुरुष की रचना की.फिर उसे धनाधिपति बनाकर देवताओं के धन का रक्षक नियुक्त कर दिया.वही कुबेर के नाम से प्रख्यात हुए. 

कुबेर के धन का देवता बनने के पीछे उनके पूर्वजन्म से संबंध रखने वाली भी कुछ अनुश्रुतियाँ हैं. एक अनुश्रुति है कि वे पूर्वजन्म में चोर थे.एक दिन वे एक मंदिर में चोरी करने के लिए घुसे और माल देखने के लिए, जो दीपक जलाया वह बुझ गया.इस तरह चोर ने दास बार दीपक जलाया और वह हर बार बुझता गया.इस रौशनी के जलने और बुझने को मंदिर में प्रतिष्ठित शिव ने अपनी आराधना समझ लिया.फलतः वे प्रसन्न हो गए और उनकी प्रसन्नता के कारण वह चोर,दूसरे जन्म में,धन का देवता कुबेर हुआ.

बौद्ध – ग्रंथ ‘दीर्घ-निकाय’ की अट्ठ् कथा के अनुसार कुबेर पूर्व जन्म में कुबेर नामक ब्राह्मण थे.वे ईख के खेतों के स्वामी थे और उनके सात कोल्हू चलते थे.एक कोल्हू की आय वे दान कर देते थे. इस प्रकार वे बीस हजार वर्षों तक दान करते रहे.इसके फलस्वरूप उनका जन्म ‘चातुर माहाराजिक’ देवों के वंश में हुआ.

‘शतपथ ब्राह्मण’ में कुबेर को राक्षस बताया गया है और उन्हें दुष्टों और चोरों का नेता कहा गया है. 

साहित्य में अधिकांशतः कुबेर का उल्लेख यक्ष के रूप में हुआ है.उन्हें यक्षों का राजा,यक्षेन्द्र,देव, यक्षराज आदि नामों से पुकारा गया है.ब्राह्मण साहित्य में ही नहीं,बौद्ध और जैन साहित्य में भी कुबेर का उल्लेख इसी रूप में पाया जाता है.बौद्ध साहित्य में उन्हें वेस्सवण,पान्चिक,जम्मल आदि नामों से पुकारा गया है.

कुबेर के नगर के संबंध में वर्णन है कि आलक(कुबेर का नगर),कैलास पर्वत पर,बहुत भव्य,परकोटे से घिरा हुआ नगर है.वहां न केवल यक्ष वरण किन्नर,मुनि, गंधर्व और राक्षस भी रहते हैं.कैलास पर्वत के उस नगर में अनेक सुंदर प्रासाद,उद्यान और झीलें हैं.संभवतः यह भौतिक सुखों की चरम अभिव्यक्ति को अलंकृत रूप में व्यक्त करने का रूपक है.

महाभारत में कहा गया है कि सोना,वायु और अग्नि के सहारे,पृथ्वी से निकलता है.यहाँ अग्नि से भट्ठी,वायु से धौंकनी और कुबेर से सोना निकलने का तात्पर्य जांन पड़ता है.संभवतः कुबेर ही पहले व्यक्ति हैं,जिन्होंने सोने को जमीन से निकालकर पिघलाया.वे उत्तर दिशा के दिक्पाल कहे गए हैं. भारत में सोना उत्तर से ही आता था.

इन सभी तथ्यों से यही जान पड़ता है कि आरंभ में कुबेर एक अनार्य देवता थे और उनका आरम्भ में वैदिक ब्राह्मणों से मेल नहीं बैठता था.बाद में,उनका वैदिक हिन्दू धर्म में प्रवेश हुआ.देवताओं की पंक्ति में आ जाने पर,कुबेर की नाना प्रकार से पूजा की जाने लगी.

‘गृह्य सूत्रों’ में,वैवाहिक कर्म – कांड में ईशान के साथ – साथ,कुबेर का भी आह्वान करने का विधान है.धनद या वसुध के रूप में उनकी पूजा जनसाधारण किया करते थे.कौटिल्य ने भी लिखा है कि कुबेर की मूर्ति खजाने के तहखाने में स्थापित की जानी चाहिए.

प्राचीन भारत में कुबेर के स्वतंत्र मंदिर होते थे.इसका पता विदिशा के निकट, बेसनगर से प्राप्त दूसरी शती ईसा पूर्व के एक ध्वज – स्तम्भ के शीर्ष से लगता है.कुबेर का निवास वट-वृक्ष कहा गया है.इस शीर्ष के वट –वृक्ष में एक घड़ा और रुपयों से भरी दो थैलियाँ दिखाई गई हैं.

हेमचंद के ‘देशी नाम – माला कोश’ में यक्खरति(यक्ष रात्रि का उल्लेख है.इसमें यक्ष –रात्रि को सुख रात्रि नाम दिया गया है कि उस दिन कुबेर की पूजा होती थी.’वाराह पुराण’ के अनुसार ‘यक्ष रात्रि’ कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को मनायी जाती थी.

आज कुबेर की पूजा का प्रचलन नहीं दिखाई पड़ता.ऐसा प्रतीत होता है कि चौथी – पांचवीं शताब्दी(गुप्तकाल) में वैष्णव - धर्म के उत्थान के साथ जब लक्ष्मी की धन की देवी के रूप में प्रतिष्ठा हुई तो लोग कुबेर को भूलने लगे.धीरे धीरे वे उपेक्षित होकर दिक्पाल के रूप में मंदिरों के बाह्य अलंकरण के साधन मात्र रह गए.    

Thursday, October 17, 2013

लुंगगोम : रहस्यमयी तिब्बती साधना

प्राणायाम की मुद्रा में साधक 
विचरण करता लुंगगोमपा 




















इस दुनियां में बहुत से रहस्य हैं.बहुत सी तांत्रिक साधनाएं हैं, जिनके बारे में हमें पता नहीं होता और जो सामान्य व्यक्तियों की निगाहों से दूर ही रहती हैं.प्रसिद्द योगी परमहंस योगानंद ने अपनी बहुचर्चित और बेस्टसेलर आत्मकथा 'ऑटोबायोग्राफी ऑफ़ ए योगी' में भी इस तरह की रहस्यमयात्मक साधनाओं का जिक्र किया है.ऐसी ही एक रहस्यमयी तिब्बती साधना है - लुंगगोम.  
  

लुंग का अर्थ फेफड़ा,हवा या महत्वपूर्ण उर्जा, जो योगियों के अनुसार, प्राण वायु का प्रतीक है.गोम का अर्थ ध्यान या केन्द्रित एकाग्रता है.अतएव ,लुंगगोमपा का अर्थ उस व्यक्ति से है जिसने केन्द्रित ध्यान एवं प्राणायाम के द्वारा आध्यात्मिक उर्जा प्राप्त कर ली है.  

लुंगगोम असामान्य गति की साधना है.यह तिब्बत की एक विशिष्ट साधना की वह प्रक्रिया है जो कि मूलतः प्राणायाम से संबंध रखती है.इस प्रक्रिया में प्राणों के विशिष्ट यौगिक अभ्यास के साथ ही मन की एकाग्रता का भी अभ्यास करना पड़ता है.तिब्बत के मध्ययुगीन साधकों में से अनेक साधक इस साधना में पूर्ण पारंगत थे और स्वल्पकाल में ही सैकड़ों मील की यात्रा पूरी कर लेते थे.

11वीं सदी के तिब्बती संत मिंलारेस्पा,उनके लामा गुरु एवं उनके शिष्य (त्रपा) घोड़े की गति से भी तीव्रतर गति से यात्रा कर लेते थे.मिंलारेस्पा ने स्वयं कहा है कि मैंने एक बार एक मास की यात्रा करने वाले गंतव्य  की स्वल्प समय में ही यात्रा पूरी कर ली थी,जिसे इस सिद्धि के पूर्व,मुझे एक माह में पूरा करना पड़ा था.

अलेक्जेंड्रा डेविड नील नामक पाश्चात्य साधिका ने ऐसे तीन लुंगगोमपा साधकों को यात्रा करते समय स्वयं देखा था.

साधना की इस पद्धति में असामान्य गतिशीलता या त्वरित स्फूर्ति का अभ्यास नहीं करना पड़ता. परन्तु अपनी कायिक सहनशक्ति में असामान्य वृद्धि का अभ्यास करना पड़ता है.इस साधना में पारंगत साधक एक क्षण के लिए भी विश्राम ग्रहण किये बिना कई दिनों तक अहर्निश यात्रा करते रहते हैं.इस यौगिक पद्धति का अभ्यास एवं प्रशिक्षण त्शांग प्रान्त के शालू गोम्पा में प्राचीन काल से कराया जाता रहा है.इसके प्रशिक्षण के अन्य केंद्र भी तिब्बत में स्थित हैं.

महर्षि पतंजलि ने प्राणायाम को परिभाषित करते हुए कहा है कि –‘आसन की सिद्धि के अनंतर श्वास – प्रश्वास की गति का अवच्छेद हो जाना ही प्राणायाम है'. इसके द्वारा प्रकाशवरण क्षीण होता है,और धारणाओं में मन की योग्यता अविर्भूत होती है. 

‘घेरण्ड संहिता’ में कहा गया है कि प्राणायाम से लाघव संप्राप्त होता है – ‘प्राणायामाल्लाघवं च’.
तिब्बती योग की इस पद्धति में प्राणायाम द्वारा इसी लाघव या लघिमा प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है.योगशास्त्र में यह भी कहा गया है कि वायु एवं अग्नितत्व पर समुचित नियंत्रण प्राप्त कर लेने पर साधक में आकाशोड्डयन की क्षमता अविर्भूत होती है.

प्राणायाम द्वारा भूतत्व एवं जलतत्व की मात्रा को लगातार शरीर में से घटाया जाता जाता है और वायु तत्व को बढ़ाया जाता है.परिणाम यह होता है कि शरीर इतना हल्का हो जाता है कि वह हवा में उड़ने लगता है और सैकड़ों मील प्रति घंटे की त्वरित गति से आकाश में यात्रा कर सकता है.

भारतीय योग में भी इसके प्रमाण हैं.शिवसंहिताकार ने कहा है कि इस प्राणायाम के अभ्यास के द्वारा योगी प्रारंभ में हाथ संचालित करते ही मेढ़क की भांति कूदने लगता है और सिद्ध होने पर पद्मासन लगाये - लगाये पृथ्वी छोड़कर आकाश में उड़ने लगता है –

ततोsधिकतराभ्यासाद्गगने चर साधकः||
योंगी पद्मासनस्थोडिप भुवमुत्सृज्य वर्तते ||

प्राणायाम में सौकर्य(दक्षता) हेतु जो नाड़ी शोधन किया जाता है, उसके दो प्रकार हैं – 
1.समनु 2.निर्मनु.
लुंगगोम की साधना में समनु प्राणायाम विधि का ही आत्मीकरण किया जाता है.इसके अनुसार धूम्रवर्ण एवं सतेज वायु बीज ‘यं’ का ध्यान करके इसका जप करते हुए ही पूरक,कुंभक एवं रेचक करना पड़ता है.

तिब्बती पद्धति में अनुभवी गुरु शिष्य को अनेक वर्षों तक विविध प्राणायामों का अभ्यास कराता है और शरीर में वायु पर यथेष्ट नियंत्रण स्थापित हो जाने पर उसे दौड़ने की शिक्षा देता है.इस साधना में गुरु ‘त्रपा’ को एक गोपनीय मंत्र भी प्रदान करता है,जिसे शिष्य इस अभ्यास के अन्तराल में सस्वर उच्चारित करता हुआ अपने विचारों को उसी में केन्द्रित करने का प्रयास करता है.

जिस समय साधक यात्रा करता है,उस समय वह श्वासोच्छ्वास के साथ इस गोपनीय मंत्र का मानसिक गायन तो करता ही है,साथ ही साथ यह भी ध्यान रखता है कि उसका प्रत्येक चरण मंत्र एवं प्राणायाम पर बराबर पड़े.इस समय यात्री को मौन रहना पड़ता है और इतस्तः वीक्षण(यहाँ-वहां देखना)करना छोड़ना पड़ता है.उसे अपनी दृष्टि किसी सुदूरस्थ वस्तु तथा तारा पर केन्द्रित करके यात्रा करनी होती है.चिर काल के अभ्यास के बाद साधक के चरण पृथ्वी का संस्पर्श छोड़कर आकाश में निराधार यात्रा करने लगते हैं.

अभ्यास के समय साधक को किसी लम्बे चौड़े रेगिस्तानी मैदान में ले जाकर इसका प्रशिक्षण दिया जाता है.सामान्यतः ऐसे अभ्यासार्थियों को ज्योत्स्नावती निशा(चांदनी रात) में जगमगाते तारों से भरे आकाश के नीचे संध्या के साथ प्रशिक्षित किया जाता है और इसी समय उन्हें यात्रा करने का आदेश दे दिया जाता है ,क्योंकि दोपहर एवं तृतीय प्रहर में तथा जंगलों,घाटियों एवं पहाड़ों से भरे अंचलों में केवल सिद्धहस्त गुरुगण ही यात्रा कर पाते हैं,अन्य नहीं.

इस साधना में, यात्रा के समय,प्रत्येक साधक को अपनी दृष्टि किसी सुदूरस्थ तारे पर केन्द्रित करके अपनी यात्रा प्रारंभ करनी पड़ती है,और तारे के डूब जाते ही यात्रा बंद कर देनी पड़ती है.जब साधक को प्रगाढ़ योग निद्रा एवं जाग्रत सुषुप्ति का अभ्यास हो जाता है,तब तारों के डूब जाने पर भी साधक को यात्रा अपनी यात्रा रोकने के लिए विवश नहीं होना पड़ता.


इसका कारण यह है कि ध्यान एवं एकाग्रता की इस प्रगाढ़ावस्था में तारे के डूब जाने पर भी ऐसे यात्री साधकों की दृष्टि उस तारे को (ध्यान की एकाग्रता के कारण) देखती ही रहती हैं और साधक अपनी इस प्रगाढ़ योगनिद्रा में शरीर के भार का किंचिदपि अनुभव न करता हुआ पृथ्वी से ऊपर वायु में तैरता हुआ आकाश में अखंड यात्रा करता रहता है.

Sunday, October 13, 2013

रावण जलता नहीं



















यह विडंबना ही है कि हम हर साल रावण को जलाते हैं, पर रावण जलता ही नहीं. शायद इसलिए कि हम रावण को जलाने का नाटक भर करते हैं,उसे वास्तव में जलाना नहीं चाहते, क्योंकि यदि रावण जल गया तो शायद हमारी बहुत सी सुख – सुविधाएं भी वह अपने साथ जलाकर राख कर देगा. ये सुख – सुविधाएं जो अनीति से, अनैतिकता से प्राप्त होती हैं.रावण को हमने बुराईयों का प्रतीक बना दिया है.प्रतिवर्ष उसे धूमधाम से जलाकर हम यह प्रदर्शित करना चाहते हैं कि सत ने असत पर,सद्गुण ने दुर्गुण पर,अच्छाई ने बुराई पर विजय पा ली है.

रावण के दहन को हमने अपने मनोरंजन का माध्यम और साधन बना लिया है. विभीषण ने सीता को राम को लौटाने का अनुरोध करते हुए अपने अग्रज रावण से कहा था ......

सुमति कुमति सबके उर रहहिं 

 अर्थात सुमति और कुमति तो सबके ह्रदय में रहती है.न रावण इसका अपवाद था ,और न हम हैं. यही कुमति थी जिसने वेदों के ज्ञाता ,शूरवीर रावण को इतना निंदनीय बना दिया कि वह शाश्वत हो उठी है .

पर,क्या कुमति केवल रावण में थी.हमारे मन में नहीं है.और, कुमति की लाख निंदा करने के बावजूद क्या हम उसे मन में नहीं संजोए हुए हैं,या उसे संजोये रखने में ही अपने सुख – सुविधापूर्ण जीवन को संभव नहीं मानते.

यदि हमारे मन में यह कुमति नहीं होती तो क्या यह जो चारों ओर अनाचार,अत्याचार, व्यभिचार दिखाई दे रहा है,वह होता ! हमारे मन में कुमति गहरी जड़ें जमाकर बैठ गई हैं. हम उसे उखाड़ फेंकना नहीं चाहते, क्योंकि आज के समय में कुमति को उखाड़ फेंकने का अर्थ सारी भौतिक सुख –सुविधाओं से वंचित होना होगा. हम शायद यह चाहते ही नहीं, इसीलिए हम रावण को जलाने का अभिनय भर कराते हैं, उसे जलाते नहीं.

Thursday, October 10, 2013

मंदारं शिखरं दृष्ट्वा

मंदार में समुद्र मंथन की आकृति 
मंदार में पापहरणी स्थित अष्ट कमल मंदिर  


















बिहार के भागलपुर प्रमंडल के बांका जिलान्तर्गत बौंसी प्रखंड में मंदारहिल रेलवे स्टेशन से तीन किलोमीटर की दूरी पर उत्तर में मंदार पर्वत अवस्थित है.यहाँ से लगभग 50 किलोमीटर की दूरी पर उत्तर दिशा में परम पावनी गंगा बहती है. इसके पूरब दिशा में चीर नदी और पश्चिम दिशा में चांदन नदी बहती है.

पुण्यभूमि मंदार क्षेत्र विष्णुपद स्वरूप है. यहाँ पदार्पण मात्र से ही मानवों में देवत्व आने लगता है. मंदार पर्वत की यह महिमा है कि जो नर - नारी मंदार शिखर के दर्शन मकर संक्रांति के दिन पवित्र पापहरणी पुष्कर में स्नान करते हैं ,साथ ही कपिला (कामधेनु) गौ और भगवान मधुसूदन के दर्शन जीवन में एक बार मंदार क्षेत्र में आकर कर लेते हैं,वे जन्म - मरण के बंधन से मुक्त होकर विष्णुपद प्राप्त कर लेते हैं.
वृहद् विष्णुपुराण में कहा गया है कि ............

"मंदारं शिखरं  दृष्ट्वा ,दृष्ट्वा वा मधुसूदनः
कामधेन्वा मुखं दृष्ट्वा ,पुनर्जन्म न विध्यते" 

जिस प्रकार देवासुर संग्राम के नायक भगवान् विष्णु से बढ़कर कल्याण करने वाले कोई देव नहीं हैं ,परम पावनी गंगा से बढ़कर मोक्ष प्रदायिनी कोई पवित्र नदी नहीं है. 'प्रणव ' जिसे 'ओंकार 'कहते हैं,से बढ़कर सिद्धि देने वाला कोई मंत्र नहीं है.उसी प्रकार मंदार सभी तीर्थों से बढ़कर मोक्ष प्रदान करने वाला तीर्थ है क्योंकि,यह भगवान विष्णु की कर्मभूमि है जो स्वर्ग तुल्य है.

स्कन्द पुराण के अनुसार भारत में 4 ही तीर्थ प्रधान हैं - मंदार ,द्वारिकापुरी,जगन्नाथपुरी और बद्रिकाश्रम.
इसमें मंदार रहस्यमय तीर्थ है. आज तक इसका रहस्य कोई भी नहीं जान सका है. मंदार तीर्थ के साथ -साथ भगवान विष्णु की कर्मभूमि भी है.यहाँ 33 करोड़ देवी देवताओं के साथ भगवान विष्णु लक्ष्मी सहित वास करते हैं .........

"तीर्थानाम् यत् परम्  तीर्थं ,बद्रिकाश्रमं उत्तमं
द्वारिकश्च जगन्नाथं , मंदारं भुवि गोपितम्"

कहा जाता है कि भगवान राम ने अपने पिता की मुक्ति के लिए मंदार में आकर श्राद्ध किया था. उसके उपरांत ही राजा दशरथ ने मंदार के पुण्य प्रताप से स्वर्ग प्राप्त किया था.

कभी चोलवंशी राजा असाध्य चर्म रोग से पीड़ित होकर समस्त तीर्थों का भ्रमण करते हुए जब मंदार वन में आए तो यहाँ उन्हें सुखद अनुभव हुआ.यहाँ के जल से स्नान करने से उनकी कुष्ठ की बीमारी दूर हो गई.मंदार की जलवायु बड़ी ही स्वास्थ्यवर्द्धक है. मंदार की चर्चा लगभग सभी धर्मशास्त्रों में है.हिन्दू धर्मग्रंथों की माला की मनका मंदार ही है.

पुरातन धर्मग्रंथों के अनुसार सागर मंथनोपरांत श्रृष्टि की प्रक्रिया में मंदार का योगदान श्रेष्ठ रहा है .विष्णु अवतार भगवान मधुसूदन के एकमात्र मंदिर तथा मंदार पर्वत के लिए बिहार का यह बांका जनपद पहचाना जाता है .पुरातत्ववेत्ताओं ने इस बात की पुष्टि की है कि यह पर्वत नगाधिपति पर्वतराज हिमालय से भी वृद्ध है .

वाल्मीकीय रामायण,रामचरितमानस,स्कन्दपुराण,युद्धपुराण,वृहद् विष्णुपुराण,गरूड़ पुराण ,शतपथ ब्राह्मण,अमरकोष ,कुमार संभवम्,श्री चैतन्य चरितावली के अलावा उत्तर मध्यकाल के प्रसिद्द कवि भूषण ने भी मंदरांचल की चर्चा अपने सवैयों में की है .

 मंदरांचल से 5 किलोमीटर की  दूरी पर बौंसी अवस्थित है,जहाँ इस  समय भगवान मधुसूदन का मंदिर है. युद्धपुराण में तो बौंसी को वालिशानगर की संज्ञा दी गई है.मंदरांचल पर कई सौ देवालय थे जिसकी चर्चा 1933 में गोंविंद सिंह द्वारा लिखित 'मंदार महात्मय' में की गई है .

इसका भी लिखित प्रमाण मिलता है कि सन् 1573 से 1600 के बीच बंगाल के एक पथभ्रष्ट सेनापति कालापहाड़ ने यहाँ भी उत्पात मचाकर ऐतिहासिक तथा शिल्पीय दृष्टि से उत्कृष्ट धरोहरों का भरपूर नाश किया. इसके भग्नावशेष 5 किलोमीटर की परिधि तक में सहज ही देखे जा सकते हैं .

'मंदरांचल' मंदार या मंदर शब्दों से बना है .'रामचरित मानस' में मंदार के हाथ तथा पंख इन्द्र द्वारा काटे जाने की चर्चा है. कहा जाता है कि प्रातः पूज्य देव गणपति ने 'मंदर' की  तपस्या के वशीभूत होकर इस पर्वत का नाम मंदार रख दिया .

प्राचीन काल में भी यह स्थल महातीर्थ की भांति पूजा जाता था. सन् 1505 में यहाँ कृष्णावतार चैतन्य महाप्रभु का आगमन हुआ था. वे तीन दिवसों तक यहाँ रुके थे. उस स्थल पर अभी भी उनके चरण चिन्ह हैं.वहीँ दीवार में एक शिलालेख भी है.

पौराणिक कथाओं से विदित होता है कि सृष्टि निर्माण हेतु सागर मंथन में इसी पर्वत को धुरी बनाकर बासुकी नाग को मंथन दंड के रूप में प्रस्तुत किया गया. यह भी कहा जाता है कि मंदरांचल के ऊपर भगवान मधुसूदन स्वयं विराजते हैं. बताया जाता है कि मंदार शीर्ष पर अवस्थित मंदिरों में भगवान मधुसूदन की ही पूजा होती थी.बाद में जैनियों द्वारा इसे पट्टे पर लेने के समय इन मंदिरों में चरण चिन्हों की पूजा की जाती थी .
इस दृष्टिकोण से भी आस्थावान लोगों के मध्य यह पर्वत अत्यधिक महत्वपूर्ण हो जाता है .

मकर संक्रांति के अवसर पर यह स्थल अलौकिक रश्मियों से आलोकित हो जाता है.यह सिर्फ धार्मिक सोच ही नहीं, अपितु विज्ञान का एक परम सूत्र है. इस समय मंदरांचल अमृत रश्मियों से अभिसिंचित रहता है.यह समय धार्मिक,आध्यात्मिक तथा वैज्ञानिक तत्वों से दृश्य - अदृश्य शक्ति प्राप्त करने का अनुभव देता है. इस समय यहाँ अधिकतर जनजातीय तांत्रिक व् उच्च कोटि के वैद्य मानव कल्याणार्थ तंत्र - मंत्र तथा औषधियों का निर्माण करते हैं .

शायद मंदरांचल अनूठा पवित्र स्थल है ,जिससे  हिंदू ,जैन और सफा धर्मावलम्बियों(सफा धर्म मानने वाले जनजातियों का एक सम्प्रदाय) की गहन आस्था जुडी हुई है.

Friday, October 4, 2013

नई अंतर्दृष्टि : मंजूषा कला


                                                                         
बिहार में मधुबनी पेंटिंग के अलावा मंजूषा कला का भी अहम् स्थान है.मंजूषा कला अंग देश की प्राचीन राजधानी चंपाअब भागलपुर एवं उसके आस -पास के क्षेत्रों से की प्राचीन विषहरी पूजा से जुड़ी हुई है.

मंजूषा कला को राष्ट्रीय विरासत में भी शामिल किया गया है. मंजूषा बांस,जूट,पुआल और कागज के बने मंदिर के आकार के बॉक्स जैसे हैं,जिन्हें सावन और भादो माह के सिंह नक्षत्र में विषहरी पूजा के अवसर पर बनाया जाता है.

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी पुस्तक 'संस्कृति के चार अध्याय' में द्वितीय शताब्दी के चंपा का जिक्र किया है.चंपा अंग प्रदेश (अब,भागलपुर)की राजधानी थी,जो बाली के पुत्र अंग के नाम पर पड़ा था.यह मौर्य शासक सम्राट अशोक के साथ - साथ 12 वें तीर्थंकर वासुपूज्य की जन्मस्थली भी है.

जनश्रुतियों के अनुसारभगवान् शिव की मानस पुत्रियाँ मनसा, मैना,अदिति, जया और पद्मालोगों द्वारा भगवान शिव,पार्वती,गणेश और कार्तिक की  पूजा किये जाने से ईर्ष्यालु होकर भगवान शिव के पास गई और अपनी समस्या बताई. भगवान शिव ने कहा कि,तुम पृथ्वी पर तभी पूजी जाओगी, जब चंपा के निवासी चांदो तुम्हारी पूजा करेंगे.इतना सुनने के बाद मनसा चांदो के पास गई और उनकी पूजा करने को कहा,लेकिन चांदो ने इंकार कर दिया.

इससे कुपित होकर व्यापार के लिए जा रहे चांदो के नाव को उसने डुबा दियाइससे चांदो(चंद्रधर) के छह पुत्रों की डूबने से मौत हो गईफिर भी चन्द्रधर ने उनकी पूजा करने से इंकार कर दिया. चंद्रधर के सातवें पुत्र बाला लखेन्द्र का विवाह बिहुला से हुआ. इतनी लम्बी अवधि के बाद भी मनसा बहनों का क्रोध थमा नहीं था और बाला को विवाह के रात ही मारने की धमकी दी,तथापि एहतियाती उपाय के रूप में लोहे और बांस से बने घर में बाला और बिहुला को रखा गया. लेकिन विवाह की रात,सर्प के डंसने से बाला की मौत हो गई .

बिहुला ने विश्वकर्मा से मंजूषा के आकार का एक बड़ा नाव तैयार करवाया और अपने पति के शव को लेकरदेवताओं से अनुरोध करउसे पुनर्जीवित करवाने के लिए देवलोक रवाना हुई.देवताओं के अनुरोध पर बाला की जिंदगी वापस मिल गई और कहते हैं कि बाला और बिहुला देवलोक से वापस लौट आए. तब उन्होंने चंद्रधर को मनसा (विषहरी) की पूजा के लिए मनाया.

तब से विषहरी पूजा,लगातार तीन दिनों के लिए भाद्र माह के सिंह लग्न में मनाया जाता है, क्योंकि इसी दिन बाला को सर्प ने डंसा था.ऐसा विश्वास किया जाता है कि सर्प की देवी की पूजा करने से, सर्प के काटने का भय नहीं रहता. इस दिन बाला और बिहुला से संबंधित नाटकों का भी मंचन होता है.

मंजूषा 4 कोने पर बनता है, लेकिन कुछ विशेष प्रकार के मंजूषा  में 6 एवं 8 कोने भी होते हैं. मंजूषा के विशेष प्रकार में, कई अलग अलग तरह के डिजाइन एवं सुंदर बनाने के लिए अन्य सामग्रियों का भी उपयोग किया जाता है. सामान्य या विशेष तौर पर, मंजूषा में पत्ते,विषहरी बहनों, व्यापारी चंद्रधर, बाला लखेंद्र, मगरमच्छ, चंपा प्रदेश और सांप के चित्र बनाये जाते हैं, जिनमें जीवन के पूर्ण रंग के साथ शानदार तरीके से बाला-बिहुला की कहानी का चित्रण बोर्ड पर किया जाता है. मगरमच्छ ,गंगा, चाँद, सूरज आदि के प्रतीक मुख्य रूप से महत्वपूर्ण हैं. बिहुला के खुले बालों के साथ चित्र और बगल में सांप एवं विषहरी बहनों के प्रतीक बनाये जाते हैं.मंजूषा कला को आम तौर पर  जीवंत बनाने के लिए हरा, पीला और लाल रंगों का इस्तेमाल किया जाता है.

यह विश्वास किया जाता है कि आज भी भागलपुर और उसके आस-पास उसी तरह से मंजूषा का निर्माण होता है जैसा विश्वकर्मा के द्वारा बनाया गया था.प्रत्येक वर्ष सिंह नक्षत्र के आगमन के साथ ही लोग मंजूषा बनाना प्रारंभ करते हैं. लालहरे और पीले मंजूषा देखने में काफी आकर्षक लगते हैं .

प्रसिद्द पुरातत्वविद डॉ. बी. पी. सिन्हा ने 1970 -71 में चंपा (भागलपुर) क्षेत्र में उत्खनन के दौरान कई सर्पाकार मूर्तियों,जिनमें मानव सिर थे,पाया.संभवतः यह सिन्धु सभ्यता से जुड़े लगते हैं.खुदाई से प्राप्त 'टेरेकोटा सर्प कला' के प्राप्त होने से यह भी जानकारी मिलती है कि उस समय अंग प्रदेश में सर्प की पूजा प्रचलित थी.

यद्यपि,मंजूषा कला को राष्ट्रीय धरोहर घोषित किया गया है,लेकिन भागलपुर  एवं इसके आस -पास की यह कला सरकार और सामाजिक संगठनों से उचित प्रोत्साहन के अभाव में अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करती नजर आती है,और इसके साथ ही इससे जुड़े लोगों को भी अन्य व्यवसायों की ओर रुख करना पड़ रहा है.