Thursday, February 13, 2014

फूलों के रंग से











भारत में बदलती ऋतुएं जीवन को नए स्पर्श दे जाती हैं.मार्च का पहला पखवारा बीतने पर वसंत ऋतु जब अपने पूर्ण यौवन की देहरी तक पहुँच जाती हैं तब सेमल के हजारों वृक्ष एक साथ खिल उठते हैं.उस समय इसकी टहनियों में पत्तियां नहीं होती,चारों ओर केवल कटोरी जैसे लाल और नारंगी फूल ही फूल दिखाई देते हैं.

जगह-जगह बर्फ जैसे सफ़ेद फूलों वाले कैथ के वृक्ष भी मिलते हैं.हलके हरे रंग की रेशमी पत्तियों के साथ झिलमिलाते हुए रूपहले सफ़ेद फूल वृक्षों पर गुंबद की तरह छा जाते हैं.गेहूं के हरे-भरे खेतों के चारों  ओर पानी की नालियों के आसपास किरात के फिरोजी रंगवाले ढेरों फूल उग आते हैं.सरसों के पीले पीले फूलों के साथ अलसी के फूल अपनी नीली छटा से प्रकृति में नया रंग भर देते हैं.

इसके पहले शरद ऋतु में जब धरती पर कांस के दूधिया सफ़ेद फूल छा जाते हैं,उस समय किसी नदी के किनारे धीरे-धीरे झूमते हुए ये फूल ऐसे लगते हैं जैसे सफ़ेद मलमल का कोई दुपट्टा हवा में लहरा रहा हो.फूल-पौधों और उपवनों की खूबसूरती,नीले गुलमोहर की गहरी नीली आभा मन को प्रसन्न करने के लिए काफी हैं.

शहरों और जंगलों के बीच पड़ने वाले गाँव और खेत मनुष्य को फूल,पौधों,हरे-भरे वृक्षों और प्रकृति की छांव में ले जाते हैं.प्रकृति का संपर्क ही उन्हें सहज जीवन की ओर ले जाता है और वन उपवन उनमें अनंत जीवन-शक्ति भर देते हैं.

गेहूं की लहलहाती हुई सुनहरी बालियों के अथाह समुद्र के उस पार दूर-दूर तक फैले हुए ढाक के वृक्ष जब फूलों से लद जाते हैं,तब ऐसा लगता है जैसे हवा में अंगारे उछाल दिये गए हों,या पूरे जंगल में आग लग गई हो.इसलिए ढाक या पलास के इन भड़कीले वृक्षों को लोग वन की ज्वाला भी कहते हैं.होली के अवसर पर पलास के फूलों से पीला रंग बनाया जाता है और इसकी छटा देखते ही बनती है. मार्च के महीने में जब ढाक के पत्ते झर जाते हैं,तब पलास के फूलों से भरी डालियाँ धरती को अनोखा सौंदर्य प्रदान करती हैं.

प्रकृति के इस सौंदर्य से मनुष्य का प्रेम एकतरफा नहीं है.लोककवि के आदिम मन ने बार-बार अनुभव किया है कि मनुष्य का संग पाकर प्रकृति भी प्रसन्न हो जाती है.कवि की कल्पना है कि सावन के महीने में कन्याओं के स्पर्श से पीपल भी बोल उठता है.....

चबूतरों के बिना
पीपल सुहावने नहीं लगते
न फूलों के बिना फुलाही के वृक्ष
हसलियों के साथ
हमेलें अच्छी लगती हैं
बाजूबन्दों के साथ गजराइयां
‘मेरा अहोभाग्य’ पीपल कहता है
‘कन्याओं ने मुझ पर झूले डाले’

महाकवि कालिदास ने अपने काव्य में लाल फूल वाले अशोक की चर्चा की है जो कुछ शहरों में अनायास दिखाई दे जाते हैं.अशोक की डालियों पर गहरे हरे रंग की पत्तियों के बीच मूंगे जैसे लाल रंग वाले फूल मन को सहज ही मोह लेते हैं.लाल रंग प्रेम और श्रृंगार का प्रतीक माना जाता है.इसलिए महिलाएं पांवों में महावर,होठों पर लाली,माथे पर लाल बिंदी और मांग में सिंदूर का इस्तेमाल करती हैं.शोक को हवा में उड़ा देने वाले अशोक के फूल इसलिए प्रिय लगते हैं.

फूलों की खुशबू और उसके रंग सिर्फ साज-श्रृंगार के ही साधन नहीं हैं,ये हमारे मन को मुरझाने से बचाते हैं और हमें हमेशा तरो-ताजा रखते हैं.’अभिज्ञान शाकुन्तल’ में शकुन्तला की चर्चा करते हुए कालिदास कहते हैं कि उसके ह्रदय पर खस कालेप है,उसकी कोमल कलाइयों में कमलनाल के कंगन हैं,उसकी सखियाँ बार-बार उसके ललाट पर चन्दन का शीतल,सुरभित लेप लगाती हैं और फूलों की शय्या पर वह जिस कुंज में लेटी हैं,वह कुंज पुष्पमालाओं से सुसज्जित है.

वात्सयायन ने विस्तार से उद्यानों के विविध प्रकारों का वर्णन किया है.इन्द्रदेव के अनुपम नंदन-कानन की बार-बार चर्चा हुई है.राजनीतिक शुष्कता और जीवन की नीरसता को सरसता में बदल देने वाले ये उद्यान ही होते थे.शायद इसलिए वात्सयायन का विचार है कि सरोवर के पास घर,उद्यान हो और सरोवर में कुमुद और कमल उगे हुए हों.

आज के युग में किसी भी व्यक्ति के पास फूलों पर लेटने का समय नहीं रह गया है और न जन-सामान्य के पास इतने साधन हैं कि लोग रमणीय उद्यानों का उपयोग कर सकें.आज ऐसे पेड़-पौधों को लगाने में लोग तत्पर रहते हैं जिससे फल या सब्जियां मिल सकें.व्यावसायिक तौर पर फूलों की खेती अलग बात है, लेकिन व्यस्ततम जीवन शैली में स्थान या समय की कमी के कारण फूलों से लदे वृक्ष या पौधे रोपने की परंपरा कम होती जा रही है.

भारतीय साहित्य और संस्कृति में फूल-पौधों की हरीतिमा झलकती है,रंग बिखरे हैं और सुगंध छा गई है लेकिन जीवन की आपाधापी में मन फूलों से लदी डालियों को छोड़कर रेगिस्तान के अनंत विस्तार में भटकने लगा है.

आधुनिक जीवन के तनाव से बचने के लिए सार्वजानिक उद्यानों,हरे-भरे उपवनों की सैर के लिए समय भले ही न हो लेकिन एक गमले में लगे पतली सी टहनी पर झुका हुआ नन्हा सा फूल घर के भीतर छाए हुए उदासी के धुंधलके के वातावरण को सचमुच सरस बना सकता है.

42 comments:

  1. सच कहा है. गमले में खिला एक फूल जीवन में उमंग भर देता है.

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  2. सही लिखा है आपने, आजकल लोग प्रकृति की इस अद्भुत रचना से दूर होते जा रहे हैं।

    नई कड़ियाँ : क्या हिन्दी ब्लॉगजगत में पाठकों की कमी है ?

    समीक्षा - यूसी ब्राउज़र 9.5 ( Review - UC Browser 9.5 )

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  3. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (14.02.2014) को " "फूलों के रंग से" ( चर्चा -1523 )" पर लिंक की गयी है,कृपया पधारे.वहाँ आपका स्वागत है,धन्यबाद।

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  4. विस्तृत और लजवाब चर्चा ... जीवन से कितना ज्यादा जुड़े हैं रंग और रंगों से फूल ...

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  5. बहुत सुंदर प्रस्तृति....!!

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  6. सच कहा ....साधुवाद

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  7. आपकी इस प्रस्तुति को आज की विशेष बुलेटिन - भारत कोकिला से हिन्दी ब्लॉग कोकिला तक में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  8. फुल जीवन में रंग और खुशबु दोनों भर देतें हैं --- सुन्दर चर्चा
    new post बनो धरती का हमराज !

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  9. बहुत ही सुन्दर पोस्ट...
    वाह...
    :-)

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  10. राजीव भाई , बढ़िया लेख बढ़िया अनुभूति , धन्यवाद
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    1. सादर धन्यवाद ! आशीष भाई. आभार.

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  11. फूल हर रंग में सुन्दर लगते हैं
    यह बात भी सही है कि प्रकृति भी लोगों का साथ पाकर प्रसन्न होती है
    सुन्दर प्रस्तुति
    साभार !

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  12. फूलों ने मन मोह लिया ..

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  13. वाह्ह ..कितना मनभावन वर्णन किया लगा की इन वड़ो में घूम रही हु सजीव चित्रण ..साथ ही एक कटु सत्य को कह दिया अपने आधुनिक जीवन सैली हमें प्रकृति से दूर कर रही है

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  14. लाजबाब,सुंदर सार्थक प्रस्तुति ..!

    RECENT POST -: पिता

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  15. बहुत सुंदर .....

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  16. बहुत सुंदर प्रकृति चित्रण ..

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  17. अति सुन्दर ऋतु वर्णन प्राव लिए शैली का सौंदर्य लिए।

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  18. फूलों की खुशबु दूर तक फैलती रहे

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