Saturday, September 5, 2015

नाम ही तो है

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शेक्सपियर ने जब यह कहा था कि,’नाम में क्या रखा है?’ तो उसके जरूर गहरे अर्थ रहे होंगे.अक्सर लोग यह कहते देखे जाते हैं कि ‘नाम में क्या रखा है?’ उसके गुणों को देखा जाना चाहिए.हकीकत यही है कि आज भी नाम और गुण मेल नहीं खाते.अतीत के चरित्रों के गुण-अवगुण को भी लोग नाम रखते  समय याद करते हैं.दुर्योधन का अर्थ है सबसे बड़ा योद्धा,लेकिन कोई भी माता-पिता अपने पुत्र का नामकरण इस नाम पर नहीं करना चाहते.

भारतीय पुरा साहित्य में ऐसे अनेक चरित्रों का वर्णन मिलता है.इन चरित्रों के माध्यम से जहाँ भारतीय संस्कृति की मूल भावना एवं जीवन मूल्य उजागर हुए हैं,वहीँ उनका आधुनिक चिंतन से मेल भी व्यक्त होता है.ऐसा ही एक अद्भुत चरित्र है – राजा अलर्क का.राजा अलर्क का विवरण मार्कंडेय पुराण में मिलता है.

अलर्क महाराज ऋतुध्वज के पुत्र थे.वस्तुतः ऋतुध्वज के प्रथम पुत्र विक्रांत,दूसरे पुत्र सुबाहु तथा तीसरे पुत्र शत्रुमर्दन हुए.उनकी पत्नी का नाम था मदालसा.जब राजा को चौथा पुत्र हुआ तो राजा ने उनका नामकरण करना चाहा.रानी मदालसा हंस पड़ी,क्योंकि नाम के अर्थों के अनुरूप कुछ भी तो नहीं था,अतः व्यर्थ में अर्थों वाले नाम देने की क्या जरूरत है?

राजा को रानी मदालसा की हंसी अखरी.राजा का यह विश्वास था कि क्षत्रियों के नाम वीरतासूचक होने चाहिए.इसलिए पुत्रों के नाम विक्रांत,सुबाहु और शत्रुमर्दन रखा था.रानी इन तीनों के नामकरण संस्कार पर हंसी थी.अतः राजा ने पुनः कहा कि तुम्हारे विचार में ये नाम उपयुक्त नहीं हैं तो चौथे पुत्र का नाम तुम ही रखो.

रानी मदालसा ने चौथे पुत्र का नाम रखा अलर्क.इस नाम का कोई अर्थ नहीं है.पूछने पर रानी ने कहा कि नाम का प्रयोजन तो व्यवहारिक जीवन में पहचान के लिए होता है.आत्मा तो सर्वव्याप्त है,अतः इस शरीर का कोई नाम हो ही नहीं सकता.जो नाम दिया जाएगा,वह अर्थ की दृष्टि से निरर्थक होगा,अतः अलर्क नाम का कोई अर्थ नहीं है.

रानी मदालसा एक उत्तम मां थी,वह जानती थी कि जीवन में धन के अतिरिक्त भी बहुत कुछ सार्थक है.अतः तीन पुत्रों का नामकरण संस्कार भले ही राजा ने किया हो,प्रथम गुरु की तरह शिक्षा मां ने ही दी.राजा के पुत्रों को राज धर्म की शिक्षा माता ने नहीं दी.माता मदालसा ने तीनों पुत्रों को ज्ञानोपदेश देकर गृहस्थ धर्म से विरक्त कर दिया.

तब राजा ऋतुध्वज ने रानी से ने कहा कि ‘यदि तुम मेरे वंश का हित चाहती हो तो इस पुत्र अलर्क को राजधर्म की शिक्षा दो ताकि यह क्षत्रियोचित धर्म का पालन कर सके.रानी मदालसा ने पति की आज्ञा का पालन करते हुए संसार के कल्याण के लिए प्रवृत्ति मार्ग और राजधर्म की शिक्षा दी.माता की शिक्षा के अनुसार तीन पुत्र वैराग्य मार्ग पर गए और अलर्क राजमार्ग पर.

राजा अलर्क यथासमय अपने पिता के आदेशानुसार गद्दी पर बैठे,राजा बने और न्यायोचित ढंग से राज्य का संचालन किया.लेकिन उनके बड़े भाई सुबाहु को लगा कि उनका अनुज सांसारिक सुखों में लिप्त हो गया है.अलर्क को आत्मज्ञान कराने के लिए सुबाहु ने काशी नरेश से सहायता मांगी.काशी नरेश को तो इसी दिन का इंतजार था.उन्होंने राजा अलर्क को संदेश भेजा कि या तो राज्य बड़े भाई सुबाहु को सौंप दें या युद्ध के लिए तैयार रहें.अलर्क ने जवाब में कहा कि यदि सुबाहु स्वयं राज्य मांगते हैं तो वे सहर्ष तैयार हैं,किंतु युद्ध के भय से राज्य त्यागने के लिए तैयार नहीं हैं.

युद्ध में अलर्क की पराजय हुई.उसका सैन्यबल और कोष समाप्त हो गया और उसे वैराग्य हो गया.काशी नरेश ने सुबाहु को राज्य ग्रहण करने को कहा किंतु उसने इंकार करते हुए कहा कि उसका उद्देश्य तो सिर्फ अलर्क को आत्मज्ञान कराना था.अलर्क को सचमुच आत्मज्ञान प्राप्त हो गया.उसने भी राज्य वापस लेने से इंकार कर दिया.अंततः जब कोई राज्य ग्रहण करने को सहमत नहीं हुआ तो अलर्क के बड़े पुत्र को राज्य सौंप दिया गया.

इस प्रकार विश्व का प्रथम दल-बदल हुआ.सत्ता के लिए शत्रु की शरण में जाकर युद्ध लड़ा गया किंतु सत्ता प्राप्ति के लिए कोई उत्सुक नहीं मिला.इस युद्ध और सत्ता संघर्ष का एकमात्र उद्देश्य आत्मज्ञान की प्राप्ति रहा.

अलर्क महान त्यागी,तपस्वी और न्यायी शासक हुए.उन पर उनकी प्रथम गुरुमाता मदालसा का प्रभाव अंत तक रहा.जब तक सत्ता में रहे राज्य के कल्याण में रत रहे और जब राज्य का त्याग किया तो राज्य की और देखा तक नहीं.राजा अलर्क अपने समस्त गुणों के साथ विश्व के प्रथम नेत्रदानी भी कहे जा सकते हैं.उनके सम्बन्ध में वाल्मिकी रामायण में कहा गया है कि ‘राजा अलर्क ने एक अंधे ब्राह्मण को अपने दोनों नेत्रों का दान कर दिया.’

21 comments:

  1. बहुत ही बढियाँ प्रस्तुति

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  2. आप की लिखी ये रचना....
    06/09/2015 को लिंक की जाएगी...
    http://www.halchalwith5links.blogspot.com पर....
    आप भी इस हलचल में सादर आमंत्रित हैं...


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  3. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (06-09-2015) को "मुझे चिंता या भीख की आवश्यकता नहीं-मैं शिक्षक हूँ " (चर्चा अंक-2090) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    श्रीकृष्ण जन्माष्टमी तथा शिक्षक-दिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  4. सुन्दर प्रस्तुति....

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  5. रोचक जानकारी ..
    पढ़कर बहुत अच्छा लगा..

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  6. सुन्दर व सार्थक रचना ..
    मेरे ब्लॉग की नई पोस्ट पर आपका स्वागत है...

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  7. सुन्दर व सार्थक रचना

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  8. प्रेरणादायक प्रसंग, सुंदर सार्थक रचना.

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  9. बहुत सुंदर प्रस्तुति
    publish ebook with largest publishing company,send abstract Today:http://www.onlinegatha.com/

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  10. ज्ञानवर्धक और प्रेरणादायक । सुंदर रचना ।

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  11. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ब्लॉग बुलेटिन : तीन महान विभूतियाँ में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  12. बहुत बए़ि‍या जानकारी। धन्‍यवाद।

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