Friday, October 3, 2014

इतिहास के बिखरे पन्ने : आंसुओं में डूबी गाथा

श्रीकृष्ण वाटिका 
हमारे आस-पास ऐतिहासिक महत्त्व की ऐसी अनेक वस्तुएं,स्मारक,चिन्ह यत्र-तत्र बिखरे पड़े मिलते  हैं,जिनकी ओर बरक्श हमारा ध्यान नहीं जाता.उन्हीं महत्वपूर्ण वस्तुओं,इमारतों,स्मारकों के बारे में जब कोई अन्य व्यक्ति ध्यान दिलाता है तब सोचते हैं कि इस बारे में तो हमें पता ही नहीं था.

बिहार के मुंगेर शहर का ऐतिहासिक मीर कासिम का किला ही महत्वपूर्ण ऐतिहासिक धरोहर नहीं है, बल्कि अन्य महत्वपूर्ण स्मारकों, गंगा के घाट,चंडी स्थान,योग विद्यालय आदि के लिए भी यह शहर जाना जाता है.कष्टहरणी घाट के ऊपर बने टीले से गंगा का नजारा अद्भुत लगता है तो बरसात के दिनों में यहाँ से उफनती गंगा भयावह दृश्य उत्पन्न करती है.

कष्टहरणी घाट के सामने श्रीकृष्ण वाटिका में बंगाल(बिहार,उड़ीसा) के अंतिम नवाब मीर कासिम के दो जांबाज बच्चों गुल और बहार की जीर्ण-शीर्ण मजार ब्रिटिश हुकूमत के जुल्मोसितम की दास्तां बयां करती है.आज भले ही हम उन जांबाज बच्चों की कुरबानी को भूल चुके हैं लेकिन ब्रिटिश हुकूमत भी उन बच्चों की जांबाजी के इतने कायल थी कि जब तक हिंदुस्तान में रहे,तब तक उन बच्चों के सम्मान में मजार पर बंदूक की सलामी दी जाती रही.रोजाना सुबह-शाम अंग्रेज अधिकारी और सिपाही मजार पर सलामी देते रहे.

‘मुंगेर गजेटियर’ के लेखक पी. सी. राय चौधरी ने लिखा है की नवाब मीर कासिम की पराजय के बाद ब्रिटिश हुकूमत की नींव मजबूत हो गई थी.उसी दौर में नवाब के दो बच्चों की हत्या भूलवश हो गई.इसके लिए अंग्रेज शासक अपने को जिम्मेदार मान रहे थे.इसी कारण उन बच्चों के सम्मान में मजार पर रोजाना बंदूक की सलामी देने का आदेश दे रखा था.

इन जिंदादिल बच्चों की दास्तां भी कम रोचक नहीं.ब्रिटिश हुकूमत अपनी ‘फूट डालो राज करो’ की नीति को अंजाम देते हुए बंगाल पर अपना आधिपत्य कायम कर चुकी थी और आगे बढ़ने की योजना बना रही थी.नवाब मीर कासिम को यह मंजूर नहीं था कि व्यावसायिक का चोला फेंक कर अंग्रेज हिंदुस्तान पर हुकूमत करें.इसलिए उन्होंने अंग्रेजों को समुद्र पार खदेड़ने का फैसला किया.उन्होंने मुर्शिदाबाद से दूर मुंगेर में अपनी नयी राजधानी बनाई और मुंगेर किले का जीर्णोद्धार कर आयुधशाला की स्थापना की.फौज को सुसंगठित कर फिरंगी हुक्मरान के साथ जंग का ऐलान किया.मीर कासिम ने मुंगेर राजधानी एवं किले की सुरक्षा का भार अपने वफ़ादार अरबली खां को सौंप कर फौज के साथ कूच किया.उधवा नाला के पास फिरंगी फौजों से मुकाबले में मीर कासिम की पराजय हुई और वे किसी तरह बचकर निकले.

मेजर एसम्स के नेतृत्व में ब्रिटिश फौजों ने मुंगेर किले को चारों तरफ से घेर कर तोपों से जबर्दस्त गोलाबारी की.इसके विरुद्ध नवाब की सुरक्षित सेना टिक नहीं सकी.स्थिति को भांपकर नवाब के वफ़ादार अरबली खां ने मीर कासिम के दो युवा बच्चों गुल और बहार को सुरक्षित भूमिगत सुरंग से बाहर निकाला.मेजर एसम्स के सामने अरबली खां के आत्मसमर्पण करते ही ब्रिटिश फौजों ने गुस्से में उसकी हत्या कर दी और किला क्षेत्र मुंगेर में जुल्म-अत्याचार की सीमा पार कर दी.काफी रक्तपात के बाद अंग्रेजों का मुंगेर पर अधिकार हो सका था.

‘मुंगेर गजेटियर’ के लेखक पी. सी. राय चौधरी  ने लिखा कि अक्टूबर 1764 में दो दिनों तक मुंगेर एवं किले पर बरतानी फौज गोले बरसाते रहे.किला क्षेत्र में अफरातफरी मच गई थी.हताहतों एवं मृतकों की संख्या काफी थी.

मीर कासिम के दोनों युवा बेटे-बेटियों ने अपने वतन से मुहब्बत के कारण सुरंग में रहकर अपने वफ़ादार साथियों को एकजुट कर अंग्रेजों से मुंगेर को आजाद कराने की ठानी.मेजर एसम्स ने मुंगेर में मीर कासिम के वफ़ादार लोगों को फांसी पर लटकाने का आदेश दे रखा था.ऐसे सैकड़ों लोगों को किला क्षेत्र में ही फांसी दे दी गई.दूसरी ओर नवाब के बच्चों की सरगर्मी से तलाश जारी थी.यह सूचना नवाब के बच्चों को भी मिल रही थी.इसलिए मीर कासिम के बेटे बहार रात में बाघ की खाल पहनकर अपने वफादारों से मिलते थे.

अंग्रेज अफसरों को विश्वास था कि मीर कासिम के दोनों बच्चे मुंगेर में ही कहीं छिपे हैं,इसलिए फौज की एक टुकड़ी उनकी तलाश में घरों,जंगलों,पहाड़ों की खाक छान रही थी.एक रात बाघ की खाल में बहार सुरंग के पास गंगा नदी के किनारे टहल रहे थे कि एक अंग्रेज अफसर की नजर पड़ गई और उसने बाघ समझकर उसी क्षण गोली मार दी.उसकी बहन गुल को विश्वास नहीं था की गोली उसी के भाई को मारी गई.देर रात बहार के नहीं लौटने पर सुबह भिखारिन के वेश में सुरंग से बाहर निकली तो थोड़ी दूर गंगा के किनारे भीड़ देखी.उत्सुकतावश जब वहां पहुंची तो अपने भाई को मृत पाया.बाघ की खाल में बहार की लाश को देखकर अंग्रेज अफसर भी हैरत में थे.उनके अंतर्मन को यह बात छू गई.मुंगेर वासियों को उनकी हत्या से काफी आघात लगा.गुल ने उस वक्त तो सीने पर पत्थर रख लिया लेकिन सुरंग में वापस लौटकर जी भर रोई.भाई की मौत ने उसे झकझोर कर रख दिया था.

अंग्रेज अफसरों ने बहार को ससम्मान पीर साहनसफा गुल के दरगा द्वारा कष्टहरणी घाट के पास दफ़नाया.वहां बड़ी संख्या में अंग्रेज अफसर एवं फौज ने बंदूक की सलामी दी थी और रोजाना बंदूक की सलामी देने का आदेश जारी कर दिया था.

अपने जान से अजीज छोटे भाई की मौत ने गुल को इतना आहत किया कि दूसरी रात भाई की मजार से लिपटकर ख़ुदकुशी कर ली.सुबह तड़के जब अंग्रेज फौज एवं अफसर सलामी देने आये तो गुल को हथियारबंद युवक की पोशाक में मृत पाया.सब उस जांबाज बच्ची की क़ुरबानी पर फफ़क पड़े थे.अंग्रेज अफसरों की भी आँखे छलछला गई थीं.गुल को भी उसी मजार के पास दफना दिया गया.

कुछ इतिहासकारों क मानना है कि अपने भाई की निर्मम हत्या का बदला लेने के लिए गुल जो अचूक निशानेबाज थी,ने मर्द की पोशाक में बंदूक लेकर किले के अंदर अंग्रेजी फौजों को ललकारा और मरते-मरते अपनी जांबाजी क ऐसा करिश्मा दिखाया कि दर्जनों फौजी उनकी गोली से मारे गये और खुद मेजर एसम्स बुरी तरह घायल हो गया था.आख़िरकार किले के अंदर अंग्रेज फौज ने घेर कर गुल की गोली मारकर हत्या कर दी थी.

आजादी से पहले तक जांबाज बच्चों की मजार की सुरक्षा अंग्रेज फौज के जिम्मे थी.आजाद हिंदुस्तान में उन बहादुर बच्चों की क़ुरबानी को भुला दिया गया.आज भी उनकी जीर्ण-शीर्ण मजार मुंगेर किला क्षेत्र के कष्टहरणी घाट स्थित श्रीकृष्ण वाटिका में स्थित है,मानो कह रही हों.......

ख़मोशी में निहां खूं गशता लाखों आरजुएं हैं
चिरागे मुरदा हूं मैं बेजबां गोरे गरीबां का

(मेरे मन में लाखों कामनाएं खून हो-होकर प्रच्छन्न हो गई हैं.मैं बेजबान परदेशियों की कब्र का बुझा हुआ दीपक हूं.)

18 comments:

  1. So nice Rajeev jee, I am glad that you shared there story.

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  2. Very touching story, Rajeev. Thanks for sharing.

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (04-10-2014) को "अधम रावण जलाया जायेगा" (चर्चा मंच-१७५६) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच के सभी पाठकों को
    विजयादशमी (दशहरा) की
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  4. आपके इस विशेष लेख की ऐतिहासिक कहानी मैं एक बार में ही पढ़ता चला गया......देश भक्ति और प्रेम के भाव का आपने जो सुन्दर अहसास कराया है ....उसका मैं तहे दिल से आभारी हूँ!

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  5. मन को छूती बहुत ही दुखभरी किन्तु प्रेरक कहानी ! आपने इतिहास के उन पृष्ठों को पाठकों के समक्ष खोल दिया है जो समय के गह्वर में कहीं गुमनामी के अंधेरों में खो गये थे ! गुल और बहार की बहादुरी को सलाम ! इस सुन्दर प्रस्तुति के लिये आभार आपका !

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  6. आपकी आलेख प्रेरित करती ही है ,दिल को छूती भी है ,बहुत बढियाँ

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  7. बहुत सुंदर और सारगर्भित आलेख ...जानकारियों का खजाना
    भ्रमर ५

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  8. Vakayi aise kayi log desh ke liye jaan de chuke hain lekin unko bhoola diya gya unki kahin koi khabar nahi kisi ko....aaapki antim panti me likha sher gazab ka hai aapka aalekh prernadayak...aapko badhaaayi iss aalekh par !!!

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  9. आपकी आलेख प्रेरित करती ही है ,दिल को छूती भी है ,बहुत बढियाँ

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  10. सुनहरे इतिहास से परिचय कराती आलेख .

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  11. गुल और बहार की कहानी बहुत ही प्रेरणादायक लगी ! आपका आभार राजीव जी , आपने इसे शेयर किया !

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  12. बहुत रोचक पोस्ट राजीव जी आभार आपका !

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  13. दीपावली की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ

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  14. ऐसी शहादत और बहादूरी के कई किस्से भारतखंड में बिखरे पड़े हैं। दुश्मन भी जिनकी बहादूरी का कायल हो, ऐसे सपूतों को हम तो भूल ही चलें हैं। अगर इनके स्मारक बने, तो सारे देश में जाबाजों की वो फौज तैयार होगी, जो दुनिया मेें कहीं नहीं मिलेगी।

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