Friday, January 9, 2015

सच ! जो सामने आया ही नहीं

कास्पर हाउजर

व्यक्ति और समाज के पारस्परिक संबंधों को स्पष्ट करने के लिए राजनीति शास्त्र और समाजशास्त्र विषयक पुस्तकों में कई उदाहरण दिए जाते रहे हैं कि किस तरह समाज से बाहर पलने वाले व्यक्तियों  में मानवोचित गुणों का विकास नहीं हो पाता है.जन्म के समय बच्चा एक प्राणीशास्त्रीय जीव मात्र होता है और उसके समाजीकरण एवं व्यक्तित्व के विकास के लिए समाज का होना आवश्यक है.

इस संदर्भ में अन्ना,भेड़िया बालक रामू,कमला और कास्पर हाउजर का जिक्र अक्सर होता रहा है.लेकिन उसके बारे में सिर्फ यही जानकारी दी जाती है कि 1828 में न्यूरेमबर्ग में सत्रह वर्ष के बच्चे कास्पर हाउजर का पता चला जिसे संभवतः राजनीतिक कारणों से मानव संपर्क से अलग कर दिया गया था.समाज के संपर्क के अभाव के कारण उसमें मानवोचित गुणों का विकास नहीं हो सका. लेकिन,पौने दो सौ साल बाद भी क्या कास्पर हाउजर की गुत्थी सुलझ सकी है?

उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में एक किशोर के कारण पूरा यूरोप विचित्र किस्म की चर्चाओं से घिर गया था.शायद ही कोई पढ़ा-लिखा घर होगा,जहाँ ये चर्चाएं न हुई होंगी.

26 मई 1828 को जर्मनी के न्यूरेमबर्ग के खूबसूरत शहर में खून से लथपथ सोलह वर्षीय कास्पर हाउजर दिखाई दिया था.उसने दावा किया कि अपनी उम्र का अधिकांश हिस्सा उसने एक छोटी सी कोठरी में कैद हुए बिताया था.उसके समकालीनों में अधिकांश का विश्वास था कि वह किसी राजवंश का एकलौता वारिस है और किसी ने जान-बूझकर उसका अधिकार हड़पने के लिए उसे बेनाम बना डाला था.कुछ लोगों का कहना था कि वह अपनी झूठी कहानी के बल पर यश प्राप्त करना चाहता है.
अंसबाख(जर्मनी) में कास्पर की मूर्ति
न्यूरेमबर्ग,में उस दिन एक धार्मिक उत्सव था.जब वह नगर में दिखाई दिया,उसके बदन पर धारीदार कपड़े लेकिन चीथड़ों की शक्ल में थे.सबसे पहले उसे शहर के एक मोची ने देखा था.बोलने में असमर्थ उसने मोची को एक चिठ्ठी दिखाई थी,जिस पर फौज की चौथी टुकड़ी के छठे दस्ते में कार्यरत एक कप्तान का  पता लिखा था.उसे कप्तान के पते पर पहुंचाया गया.

कप्तान के इंतजार में बिताये वक्त में वहां उपस्थित लोगो को पूरी तरह यकीन हो गया कि उसे बरसों मानवीय वातावरण से परे रखा गया था,क्योंकि वहां उसने जलती मोमबत्ती पर हाथ रख दिया था और जब हाथ जला तब वह जानवरों की-सी बोली में चीखा था.वह सिर्फ दो शब्द जानता था- नहीं मालूम ! दीवाल घड़ी से वह इतना घबरा गया था कि उसे एक जीवित जानवर समझकर वह घड़ी के पास भी नहीं गया.

कप्तान को देखते ही वह खुश तो जरूर हुआ,पर कप्तान उससे कुछ भी नहीं बुलवा सका था.दो चिठ्ठियाँ  जो उससे मिली थी,धोखाधड़ी लगती थीं.उसमें प्रार्थना की गयी थी कि उसे फौज में भर्ती कर लिया जाय और अगर नौकरी न दे दी जाय तो उसे मार डाला जाय !
सबसे विलक्षण पक्ष था,उसका सधे हाथों से लिखना- कास्पर हाउजर ! पर दूसरी बातों का उत्तर वह इतना ही दे पाया,’नहीं मालूम.’

उसके पैरों में बेड़ियों के निशान थे.पुलिस जेलर ने कहा था कि वह बिना अपनी जांघ सिकोड़े या हिलाये घंटों बैठ सकता है.पर खड़े होने होने में उसे कभी-कभी असह्य तकलीफ होती थी.उसे रोशनी की बजाय अंधेरा पसंद था.जल्दी ही वह किशोर लोगों के आकर्षण का केंद्र बन गया,पर वह भीड़ से बिलकुल विचलित नहीं होता था,बल्कि चुपचाप अपने एक छोटे से काठ के घोड़े से खेलता रहता और घंटों तक घड़ी की टिकटिक ताकते हुए आनंदित होता रहता था.

बहुत बचपन में,जहाँ तक कास्पर हाउजर को याद था,उसे एक अँधेरी कोठरी में कहीं जंगल के बीच में कैद कर लिया गया था.उसे खुद भी मालूम नहीं था कि वह कहाँ से आया,मूल रूप से कौन था?पर जिस कोठरी में उसे कैद किया गया था,उसमें इतना ही जगह था कि वह पाँव पसारे सो सकता था,लेकिन कभी पूरी तरह खड़ा नहीं हो सकता था,कारण कोठरी या तहखाने की ऊंचाई बेहद कम थी.

इस कैद से छुटकारे के कुछ ही दिन पहले एक आदमी उसे तहखाने में दिखायी दिया था.उसी ने हाउजर को उसका नाम लिखना सिखाया था,उसी ने उसे दो-तीन वाक्य भी सिखाये थे.
फिर एक सुबह उसने खुद को खुले आसमान के नीचे राजमार्ग पर पाया.उसे मालूम ही न था कि किस दिशा में जाए.वाही अजनबी,जिसने उसे नाम सिखाया था,उसे न्यूरेमबर्ग छोड़ आया था.वह हाउजर को दिलासा दे चुका था कि जब वह बड़ा अच्छा सैनिक बनेगा तब उसे एक बड़ा घोड़ा दे देगा.

रातों रात कास्पर हाउजर की ख्याति न्यूरेमबर्ग से फैलकर पूरे देश में व्याप्त हो गयी और कुछ ही दिनों में पूरे यूरोप में.उसके अतीत के भी असंख्य दावेदार पैदा हो गये थे.न्यूरेमबर्ग अधिकारीयों ने उसे जेल से मुक्त कर अपने समय के प्रख्यात शिक्षाविद प्रोफ़ेसर जॉर्ज फ्रैड्रिक हाउजर को सौंप दिया.तभी एक हादसा हुआ कि प्रोफ़ेसर के घर में वह खून में लथपथ पाया गया.होश में आने पर उसने बताया कि कोई अजनबी आकर उसके सर पर प्रहार कर गया था.

लोगों को विश्वास हो गया था कि कास्पर हाउजर पर हमला उसी आदमी ने किया होगा,जिसने उसे अँधेरे तहखाने में बरसों कैद रखा.लिहाजा कास्पर हाउजर की सुरक्षा के कड़े प्रबंध किये गये.परंतु कुछ लोग ऐसे भी थे जो उसकी कहानी को बकवास मानते थे.उन्होंने नगर निगम पर आरोप लगाया कि वह ‘कास्पर हाउजर’ के बारे में सहानुभूति जगाकर लोगों से पैसा इकट्ठा कर रहे हैं और उस पैसे का गोलमाल कर रहे हैं.

1831 में एक अंग्रेज लार्ड स्टेनहोप ने उसमें दिलचस्पी दिखाई और उसकी आर्थिक मदद की. कास्पर हाउजर को लेकर वे यूरोप के बहुत से रजवाड़ों में घूमे.फिर तो रजवाड़ों में परस्पर कलह और द्वंद इस कदर बढ़े कि बहुतों को कास्पर हाउजर से रक्त-संबंधों के उन बयानों का खंडन करना पड़ा,जो अफवाहों के रूप में प्रचलित हो गये थे.कही-कहीं तो कई राजवंशियों को द्वंद-युद्ध में अपनी जानें भी गंवानी पड़ी.

लेकिन जैसे वह एकाएक न्यूरेमबर्ग में आया था,वैसे ही एकाएक उसकी मौत भी हो गयी.किसी ने उसे इस लालच में वह उसकी मां के बारे में सब-कुछ बताएगा,उसे पार्क में आने का निमंत्रण दिया,वहीँ उसे चाकू से मार डाला. 

कास्पर डॉ. मेयर को सिर्फ यही बता सका,चाकू ! पार्क,बटुआ,...दौड़ो,पकड़ो ! पुलिस ने पार्क का चप्पा-चप्पा छान मारा.सिर्फ वह बटुआ मिला जिसमें एक कागज था.उस पर उलटी सीधी इबारत लिखी थी जिसे शीशे के सामने ही ठीकठाक पढ़ा जा सकता था.हाउजर की तरह विचित्र था,वह कागज.”हाउजर ही बता सकता है कि मैं कौन हूं! कहाँ से आया...कैसा लगता हूं! मैं अमुक रजवाड़े से आया हूं..... मेरा नाम है...म ल ओ .” पार्क में बर्फ पर सिर्फ कास्पर हाउजर के पाँव के निशान थे.

डॉ. मेयर और पुलिस की खोजों का यह निष्कर्ष था कि यह सब कास्पर हाउजर का ही नाटक था.हाउजर की गलती से छूरा ज्यादा गहरे घुस गया था.जब तक वह होश में रहा,बहुत कोशिश की गयी कि वह स्वीकार कर ले ! पर मृत्यु से कुछ क्षण पूर्व उसके शब्द थे- “यह मैंने खुद नहीं किया.”

पौने दो सौ बरसों से अधिक समय के बाद भी यह जिज्ञासा बनी हुई है कि आखिर कास्पर हाउजर का रहस्य क्या था ?

Keywords खोजशब्द :- Man and Society,Story of Kaspar Hauser,Human Society

14 comments:

  1. सुन्दर, सत्य कथा कास्पर हाउस की! आगे भी ऐसी ही कथाओं से परिचित करतें रहें! साभार! आदरणीय राजीव जी!
    धरती की गोद

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  2. कास्पर हाउजर के बारे में रोचक और दिलचस्प जानकारी दी आपने। मुझे कास्पर हाउजर के बारे में आपके इसी लेख के माध्यम से पता चला है। सादर।।

    नई कड़ियाँ :- ई-वॉलेट और स्मार्टकार्ड पर कंपनी का नाम अब होगा ज़रूरी

    इंटरनेट और हमारी हिन्दी

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  3. सार्थक प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (10-01-2015) को "ख़बरची और ख़बर" (चर्चा-1854) पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. सादर धन्यवाद ! आ. शास्त्री जी. आभार.

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  4. ऐसी दुर्लभ जानकारियाँ सामने लाने के लिए आभार !

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  5. बहुत ही रोचक कहानी है !

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  6. बहुत ही अच्छा लेख |
    http://dharmraj043.blogspot.com/2015/01/blog-post.html

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  7. कास्पर हाउजर की बड़ी विचित्र सी कहानी है ये ! मैं स्तब्ध हूँ और शायद मेरी तरह और भी लोग इसे पढ़कर सोच रहे होंगे की क्या कोई जीता जागता आदमी इतना बड़ा और सटीक नाटक कर सकता है की पूरी जिंदगी उसके मुंह से एक भी शब्द ऐसा न निकले जिसे समझा जा सक्के ? रहस्य से भरी रचनाएं बड़ी अद्भुत और ज्ञानवर्धक होती हैं आपकी श्री राजीव कुमार जी

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