Tuesday, June 9, 2015

मैं सितारों के ख्वाब बुनता हूं

शीराज में हाफिज का मकबरा 
एक शायर की मृत्यु के छह सौ साल बाद भी आज भी उसके देश का कोई ऐसा घर न होगा जहाँ उसके शेर गुनगुनाए न जाते हों,पुस्तक की ऐसी कोई दुकान न होगी जहाँ विभिन्न जगहों से प्रकाशित छोटे बड़े अनेक रूपों में उनका दीवान आज भी दीवानगी की हद तक न बिकता हो.कोई महफ़िल हो या दर्शन उसका उल्लेख लाजिमी है.

वह ईट पर सिर रखकर सोता है और सितारों के ख्वाब बुनता है.आँखों के पानी से सूरज का दामन भिगो सकता है.वह दरवेश भी है और भिखारी भी.पर अपनी टोपी बादशाह के ताज से बदलने को तैयार नहीं.

ये शब्द कहे गए हैं फ़ारसी के अत्यंत लोकप्रिय शायर ‘हाफिज’ के लिए.एक प्रसिद्ध शायर होने के साथ-साथ हाफिज अत्यंत विद्वान,साहित्य के ज्ञाता,साहित्यकार एवं विवेचक भी थे.

हाफिज का जीवनकाल राजनीतिक उथल-पुथल का काल रहा.अपने समय के हालात से हाफिज अछूते नहीं रहे.जब तैमूरलंग इस्फहान के कत्लेआम के बाद शीराज की ओर बढ़ रहा था तो जोशीली शायरी द्वारा हाफिज ने लोगो को एकजुट होकर मुकाबला करने को उकसाया.वह अपने समय के प्रति,अपने कर्तव्यों के प्रति पूर्णतः सजग थे पर अपनी सीमा में बंधे भी महसूस करते थे,इसी दौरान उन्होंने लिखा था...........

‘हालांकि दिल आग से जलकर ख़ाक हो रहा है
पर अपने लबों पर आये लहू को चाटकर खामोश हूं’

हाफिज की कलम से छह हजार से अधिक शेरों ने जन्म लिया.उनमें दर्शन का निचोड़ है एवं उनके पास अन्तर्भेदी दृष्टि है.प्रायः गजल में छह से लेकर पंद्रह शेर होते हैं पर बहुत अच्छी गजलों में ही इन सबमें एक विचार की निरंतरता रहती है.जबकि हाफिज की सभी गजलों में विचार की अटूट कड़ी पायी जाती है.उनमें मानवता के प्रति प्यार एवं आम आदमी की समस्याओं के प्रति सहानुभूति है.

मध्ययुगीन ईरान के आरामपसंद जीवन एवं बेअमल होते हुए भी स्वयं को महान जतलाने का प्रयत्न करना,इस रवैये के विरुद्ध थे.शायद ही विश्व के किसी एक कवि ने इतने लोगों को इतने लंबे काल तक प्रभावित किया हो.

बंगाल में जिस तरह गुरुदेव रवींन्द्र नाथ टैगोर की काव्य रचनाएं प्रत्येक घर का अभिन्न अंग हैं उसी तरह हाफिज पूरे ईरान निवासियों का पारिवारिक सदस्य है.उनका दीवान कुरान के साथ ही अत्यंत सम्मानपूर्वक रखा जाता है.उनके शेर स्कूल की किताब में भी पाए जाते हैं और महफ़िलों,मयखानों में भी सुनाये जाते हैं.अनपढ़ लोग भी उनमें आनंद पाते हैं एवं विद्वानों की सराहना भी पाते हैं.फारसी के नाटकों,वार्ताओं में आज भी वह बहुधा उद्धृत किये जाते हैं.उनकी भाषा सरल और हृदयस्पर्शी है,उसमें एक अंदरूनी लय है.वह अपने शब्दों को यूं चुनते हैं कि फारसी भाषा का पूरा ज्ञान न होने पर भी ह्रदय को बांध लेती है.

अनेक आलोचक हाफिज की तुलना उनके ही समकालीन ,विश्वप्रसिद्ध इतालवी कवि ‘दांते’ से करते हैं.दांते का दर्शन अधिक ठोस,आसपास की,साधारण जन की सच्चाई पर टिका है पर हाफिज की शायरी में इन सबके साथ ही कल्पना की दिलकश उड़ान है.

एक शेर में उन्होंने अपनी महबूबा के गाल के तिल के बदले बल्ख और बुखारा न्यौछावर करने की बात लिखी थी.तैमूरलंग जिनके अधीन ये दोनों शहर थे,जब वह शीराज पहुंचा तो उसने हाफिज को बुला भेजा और क्रोधित होकर जवाब-तलब किया.हाफिज ने बिना संयम खोये और बिना विचलित हुए उत्तर दिया – ‘जहांपनाह,अपनी इसी दरियादिली के कारण ही तो आप देख रहे हैं कि मैं किस कदर फक्कड़ और खस्ताहाल हो चुका हूँ.’

हाफिज की प्रसिद्धि उनके जीवन काल में ही तमाम देशों के साथ हिंदुस्तान भी पहुंची.हिंदुस्तान के दो शासकों मोहम्मद शाह दकिनी और ग्यासअलदीन ने भी उसे बुलाने के लिए राह खर्च भेजा पर वे अपनी मातृभूमि और रुकना नदी का किनारा छोड़कर कहीं जाने को राजी नहीं हुए.दरवेशों और विद्वानों का संग उन्हें बहुत प्रिय था.

हाफिज को शीराज बहुत प्रिय था,जुनून की हद तक प्रिय.कहते हैं वह जीवन में बस एक बार ही शीराज से बाहर गए.बादशाहों के निमंत्रण पर तो नहीं लेकिन भारत के आध्यात्मिक ज्ञान ने उन्हें अपनी ओर आकर्षित किया और उसी का अध्ययन करने भारत जाने का निश्चय किया पर जब बंदरगाह पहुंचे तो मौसम की खराबी के कारण उस दिन जहाज रवाना नहीं हो सका.विधि का आदेश समझ कर लौट गए और फिर कभी कहीं नहीं गये.

शहरवासियों का अपने शायर के प्रति प्रेम की पराकाष्ठा ही है कि 1392 में हाफिज की मृत्यु के पश्चात जब उस पर मकबरा बनवाया गया तो शीराज की पुरानी लूटमार और तोड़फोड़ याद करके किसी हमशहरी ने मकबरे की दीवार पर यह शेर लिख दिया..........

‘अगरच जमलः उकाफ शहर गारत करद
खुदाश खैर दहाद आन के इन इमारत करद’

‘पूरे शहर को भी चाहे लूट लेना,पर मेहरबानी करके इस इमारत को छोड़ देना.’

जिस रुकना नदी का किनारा उन्होंने अपनी भ्रमण-स्थली बनाया था और जो हाफिज का संग पाकर अमर हो गयी है उसी के किनारे सरू के घने सायों में ही हाफिज की चिरस्थायी विश्रामस्थली भी बनायी गयी.आज की इमारत अंतिम शाह के पिता शाह रजा द्वारा एक फ्रांसीसी इंजीनियर की देखरेख में बनवाई गयी.वह बीस हजार वर्गमीटर से अधिक के घेरे में है.छत पर,खंभों,दीवारों पर,मुख्य कब्र के पत्थर पर हाफिज की गजलों को सुंदर लिखावट में लिखकर अमर कर दिया गया है.

उद्यान के मुख्य द्वार पर हाफिज का अमर सन्देश है.........

‘मेरी कब्र के पास से गुजरना तो हिम्मत रखना
दुनियांभर के स्वतंत्रता–प्रेमियों की यह इबादतगाह होगी’

20 comments:

  1. सुन्दर प्रस्तुति

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  2. राजीव जी, प्रसिद्द शायर हाफिज के बारे में जानकारी शेयर करने के लिए धन्यवाद .

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  3. हाफ़िज़ साहब के बारे में आपकी पोस्ट से ही जान्ने को मिला है ... उनकी शक्सियत और जिन्दादिली का हर कोई कायल हो जाएगा ... उम्मीद है उमके पैगाम प्रेरणा देते रहेंगे आने वाली पीड़ियों को ...

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  4. हाफिज साहब पर बहुत सुंदर आलेख, आभार. हाफिज सूफी धारा के प्रणेता थे. उनकी अधिकांश गज़लों को आध्यात्मिक दर्शन के संदर्भ में देखा जा सकता है.उन्होंने प्रेम की भी अच्छी कल्पनाएँ की हैं.

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  5. आपकी इस महत्व्पूर्ण लेख की बदौलत इतनी बड़ी शख्सियत को जान पाया जिसके लिए शुक्रगुजार हूँ...

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  6. आपकी इस महत्व्पूर्ण लेख की बदौलत इतनी बड़ी शख्सियत को जान पाया जिसके लिए शुक्रगुजार हूँ...

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  7. जानकारी मे वर्धन के लिये हार्दिक आभार आदरणीय

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  8. Your posts are very interesting. Get to know something new every time. I had heard about Hafiz but didn't know much about him. Thanks for sharing.

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  9. सुंदर जानकारी आभार !

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  10. बहुत अच्छी जानकरी ऐसे अनुपम शब्द-शिल्पियों की . मुझे याद आ रहा है कि डीडी भारती पर इनके बारे में एक पूरा कार्यक्रम भी आया था . ऐसे लोगों के विषय में लेख आते रहने चाहिये ताकि यह और आगे की पीढ़ी लाभान्वित हो

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  11. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, पतन का कारण - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  12. informative as well as entertaining KAHANI :-)

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  13. बहुत ही बढियाँ

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  14. आदरणीय झा साहब आपका ब्लॉग मुझे बहुत पसंद आया और मैंने join कर लिया। अगर मेरा ब्लॉग www.wikismarter.com आपको पसंद आये तो ज्वाइन करके अनुग्रहित करें।

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  15. महान शायर हाफिज़ साहब के बारे में जानकारी बाँटने हेतु हार्दिक आभार सर

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  16. बहुत ही शानदार रचना। बधाई।

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  17. kubh hi acchi abhivyakti hai......

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  18. राजीव कुमार झा जी, प्रसिद्द शायर हाफिज के बारे में जानकारी शेयर करने के लिए धन्यवाद !
    शिराज़ ईरान में है ?

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