Thursday, March 27, 2014

सिनेमा,सांप और भ्रांतियां











सांप को लेकर कई भ्रांतियां और मिथक लोगों में है.सांप को देखते ही भय इस कदर व्याप्त हो जाता है कि इसे मारना ही श्रेयस्कर समझते हैं.इसका कारण अतीत में सर्पदंश से हुई मौतें और जनमानस के जेहन में समाया हुआ डर भी है.यह धारणा भी लोगों में बनी हुई है कि सांप बदला लेते हैं.इस कारण न केवल गाँव,देहातों में बल्कि शहरों में भी लोग सांप को मारने के बाद उसके फन को कुचलते और आँख फोड़ देते हैं क्योंकि यह भ्रांतियां फैली हुई हैं कि सांप की आँखों में मारने वाले की छवि अंकित हो जाती है.

सांप के संबंध में कई विश्वास प्रचलित हैं.इनमें कुछ का तो खंडन हो चुका है और कुछ अभी भी बरकरार है.जैसे, सांप के संबंध में प्रचलित इस विश्वास का खंडन हो चुका है कि सर्पों में सम्मोहन शक्ति होती है.इसी तरह यह विश्वास भी मिथ्या सिद्ध हो चुका है कि सर्प स्त्रियों पर कभी हमला नहीं करते.सांप के बीन की धुन पर झूमने वाली बात में भी कोई सत्यता नज़र नहीं आती क्योंकि विशेषज्ञों के अनुसार सांप बहरा होता है और हवा द्वारा ले जाई गई ध्वनि को नहीं सुन सकता.यह जमीन पर कंपन,तरंग या सुगंध के अहसास से अपना काम चलाता है.

सांप को लेकर न केवल हिंदी सिनेमा बल्कि हॉलीवुड में भी कई हिट फ़िल्में बनी हैं.सांप के प्रति लोगों के भय,अंधविश्वास और श्रद्धा को फिल्मकारों ने खूब भुनाया है.हिंदी फिल्मों में सांप के ‘बदले की थीम’ को लेकर बनी कई सुपर हिट फ़िल्मों में दिखाया गया कि किस तरह एक नागिन अपने जोड़े की मौत का बदला लेती है.इसी तरह एक अंग्रेजी फिल्म ‘द कल्ट ऑफ़ कोबरा’ भी साँपों के बदला लेने से संबंधित है.

‘द कल्ट ऑफ़ कोबरा’ में दिखाया जाता है कि विश्वयुद्ध के समय कुछ यूरोपीय सिपाही मिस्त्र के एक नगर में सैर-सपाटे के लिये जाते हैं.वहां उन्हें एक ऐसे गुप्त संप्रदाय का पता चलता है,जो सर्पों की पूजा करते हैं.उन्हें पता चलता है कि एक विशेष दिन होने वाले समारोह में एक सर्प एक विशाल घड़े के चरों ओर नृत्य करने वाली नर्तकी के पास आता है और फिर वह धीरे-धीरे मानवाकृति धारण कर लेता है.वे चारों-पांचों सिपाही वेश बदलकर उस स्थान पर पहुँचते हैं.वहां वे सब देखते हैं जो उन्हें बताया गया था.उनमें से एक सिपाही इस अद्भुत दृश्य का फोटो लेना चाहता है.फ़्लैश का प्रकाश होते ही वहां एकत्र लोगों में खलबली मच जाती है.वे उसे पकड़ने के लिए दौड़ते हैं.भीड़-भाड़ में सिपाही किसी तरह बच निकलते हैं,लेकिन सांप उन्हें नहीं छोड़ते.उनमें से प्रत्येक को एक-एक कर सर्पों के कारण मरना पड़ता है.

रामोना और डेसमंड मॉरिस की प्रसिद्द पुस्तक ‘मैन एंड स्नेक्स’ में अनायास ही ‘डान्ह-ग्बी’ नामक एक सर्प देवता के बारे में पढ़ने को मिलता है.’डान्ह-ग्बी’ की पूजा में सुंदर स्त्रियों का विशेष स्थान था.कभी-कभी यह सर्प देवता सुंदर स्त्रियों के सम्मुख प्रकट होकर उन्हें सम्मोहित कर देता.फलतः वे उसकी सेवा में तैनात हो जातीं.उनकी विभिन्न सेवाओं में एक सेवा विशाल घड़े के चारों ओर नृत्य करने की भी होती.बाद में नरबलि भी दी जाती.

लेकिन क्या सर्प बदला लेते हैं? क्या वे रूप भी बदल सकते हैं? सर्प-विशेषज्ञों की खोज जारी है.सर्प-विशेषज्ञ यूनान के एक द्वीप में प्रतिवर्ष घटने वाली एक घटना का रहस्य अभी तक नहीं समझ पाए हैं.इस द्वीप का नाम है सेफालोनिया.पहाड़ों से भरे द्वीप में दो छोटे-छोटे चर्च भी हैं.प्रति वर्ष 6 अगस्त से 15 अगस्त के बीच सैकड़ों छोटे-बड़े विषैले सर्प पहाड़ियों में बने अपने बिलों से निकलते हैं और चर्चों की ओर बढ़ते हैं.यूनानी पंचांग के अनुसार 6 अगस्त ईसा मसीह का दिन है,और 15 अगस्त वर्जिन मेरी का.

इन सर्पों के बारे में एक और विचित्र बात कही जाती है कि प्रत्येक सर्प के सर पर क्रॉस बना हुआ होता है.चर्चों में पहुँचने वाले इन सर्पों के बारे में एक किवदंती भी प्रचलित है.कहते हैं,वर्षों पहले समुद्री डाकू सेफालोनिया पहुंचा करते थे और द्वीप पर बसे दो गांवों मार्कोपोडलो और अर्जेनिया के मध्य रहने वाली ननों को परेशान किया करते थे.समुद्री डाकुओं के व्यवहार से ननें बेहद परेशान थीं.एक दिन मंदर सुपरियर ने ईश्वर से प्रार्थना की कि अगली बार जब समुद्री डाकू आएं, तो वह हमें सर्प बना दें.और कहते हैं,जब समुद्री डाकू अगली बार आए,तब उन्हें कान्वेंट में ननों की बजाय चौबीस सर्प दिखाई दिए.

ग्रामीणों का विश्वास है कि ईश्वर के प्रति उनकी आस्था पुष्ट करने के लिए हर वर्ष 6 से 15 अगस्त के मध्य सर्प पहाड़ियों से उतारकर चर्चों में पहुँचते हैं.कई लोगों ने दोनों पर्वों के बाद इन क्रॉस धारी सर्पों को खोजने की कोशिश की लेकिन उन्हें एक भी सर्प दिखाई नहीं दिए.6 अगस्त को गाँव वाले चर्च में एकत्र होते हैं और उसकी घंटी बजते ही सर्प अपने बिलों से निकलकर चर्चों की ओर रेंगने लगते हैं.सर्पों की संख्या का भी महत्व है.जिस वर्ष बड़ी संख्या में सर्प आते हैं,गाँव वाले संतुष्ट होते हैं,क्योंकि उन्हें लगता है कि उस वर्ष उन्होंने अपने धर्म का पालन अच्छी तरह किया है.जिस वर्ष कम संख्या में सर्प आते हैं,गाँव वाले सोचते हैं कि उस वर्ष उन्होंने धर्म-पालन में कोताही बरती है.

डेसमंड ने अर्जेनिया के मेयर बाल्लास के हवाले से लिखा है कि वर्ष में पूरे द्वीप में कहीं सर्प दिखाई नहीं देते,चर्च की बात तो दूर है.यह चमत्कार सैकड़ों वर्षों से होता आया है,और अब तो दोनों पर्वों पर अन्य देशों के लोग भी यहाँ पहुँचने लगे हैं.

एथेंस के एक पत्रकार डेविड बारिट ने स्वयं इन द्वीपों में सर्पों के इस रहस्यमय आगमन को देखा है.इन सर्पों के संबंध में एक और उल्लेखनीय बात है कि ये सर्प विषैले होते हुए भी किसी को डसते नहीं.

यह भी कहा जा सकता है कि शायद पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए ही यह पूरा किस्सा गढ़ा गया हो.लेकिन इस बारे में कुछ भी कहना कठिन है.

डेसमंड मॉरिस का कहना है कि ‘इतिहास के उदय काल से ही सर्प को देवता के रूप में पूजा जाता रहा है.नाग आरंभिक द्रविड़ों का प्रतीक चिन्ह था और जब कबीले के प्रमुख की मृत्यु हो जाती थी,उसे अर्द्ध-देवता मान लिया जाता था.लोगों का विश्वास था कि दिवंगत प्रभुत्व कभी-कभी सर्प की आकृति धरकर प्रकट भी होता है.’ डेसमंड ने अपनी पुस्तक में नागपंचमी का भी जिक्र किया है.
                         
                                (जनवाणी - रविवाणी में दिनांक :- 30.03.2013 को प्रकाशित)

55 comments:

  1. नई जानकारी के लिये धन्यवाद.

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  2. आदरणीय अद्भुत लेख आपने बहुत शोध करके लिखा है।
    जहाँ तक सर्प के कान नहीं होते, ये बात पूर्णतः सत्य है। और जहाँ तक पूजने कि बात है तो वो हमारे गाँव में हमारे कुल के देवता के रूप में स्थापित हैं।
    मैं यहाँ तक कह सकता हूँ कि मेरे ही क्या बहुत ऐसे कुल के देवता होंगे।
    डसने का ज़िक्र जो आपने किया तो मैं समझता हूँ कि जब मनुष्य और सर्प आमने सामने होते हैं तो, मनुष्य सर्प से और सर्प मनुष्य से डरता है, जिसकी वजह से दोनों एक दूसरे को मरने और काटने पे बाध्य हो जाते हैं।

    लेख बहुत रोचक है।

    एक नज़र :- हालात-ए-बयाँ: ''जज़्बात ग़ज़ल में कहता हूँ''

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    1. सादर धन्यवाद ! अभी जी.भारतीय संस्कति में आरंभिक काल से ही सर्पों की पूजा होती रही है.कई परिवारों के कुल देवता के रूप में स्थापित हैं,यह भी सत्य है.भागलपुर एवं आस-पास के क्षेत्रों की मंजूषा कला एवं विषहरी पूजा इसी से जुड़ी है.
      लेकिन कुछ भ्रांतियां एवं रहस्यमयता भी इसे घेरे रही हैं.यह भी सत्य है कि सांप तब तक नहीं काटता जब तब तक उसे छेड़ा न जाय या शरीर से स्पर्श न हो जाय और वह अपने बचाव के लिए ऐसा करता है.

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  3. बढ़िया लेख , बड़ी मेहनत करते हैं आप अपने लेख पे राजीव भाई ! धन्यवाद !
    ⓘⓐⓢⓘⓗ ( हिन्दी में जानकारियाँ )

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  5. सर्पों के बारे में भ्रांतियां और नई जानकारियां प्रस्तुत करती सराहनीय लेख है ! बधाई !
    लेटेस्ट पोस्ट कुछ मुक्तक !

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  6. आलेख खासा रोचक और दिलचस्प है. साँपों के बारे में लोगों को बहुत कम जानकारी है. इस वजह से भ्रांतियां और मिथक हैं. यह साँपों की वृत्ति को समझने के लिहाज से उपयोगी है.

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  7. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (28.03.2014) को "
    जय बोलें किसकी" (चर्चा अंक-1565)"
    पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें, वहाँ आपका स्वागत है, धन्यबाद।

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  8. सर्पों के बारे में विज्ञान सम्मत एवं प्रचलित गल्प का बड़ा सटीक आलोचनातमक विवरण कोई आप जैसा विज्ञपाठक ही

    मुहैया करवा करवा सकता है। आभार आपकी निरंतर प्रेरक टिप्पणियों का।

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  9. महत्वपूर्ण एवं रोचक जानकारी............

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  10. बहुत रोचक जानकारी......

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  11. जानने योग्य सुन्दर लेख

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  12. साँपों के बारे में सभी बातें प्रतीकात्मकता में सत्य ही हैं...
    --- सम्मोहन... इतने भयानक जीव को सामने पाकर डर के मारे उससे नज़र ही नहीं हटती और व्यक्ति सम्मोहित होकर रह जाता है ...ठीक उसी प्रकार जैसे मेमना भेडिये के सामने आने पर सम्मोहित होकर उसके साथ साथ चल देता है भागने की बजाय ...
    ----- बीन की धुन पर सांप नाचता तो है पर इसलिए नहीं नाचता कि वह सुन पाता है अपितु संपेरे की बीन एवं हाथों के गति के साथ साथ डर के कारण स्वयं को बचाने हेतु गति करता है....
    ----- सर्प ...महाजीविता ...( लोंजीविटी) सबसे अधिक उम्र जीवित रहने वाले जीवों में है अतः वह जीवन एवं चिकित्सा विज्ञान का प्रतीक है .....सर्पों के जितने प्रकार व जातियां होती हैं अन्य किसी जीव की नहीं ...
    ---- नाग जाति के मनुष्य एक विशिष्ट जाति है जो प्रायः समस्त विश्व में पाए जाते थे वे नागों के पालन, आदि में विशेषग्य रहे होंगे ...एवं प्रारंभिक वन सभ्यता में नागों के क्षेत्रों के अधिपति रहे होंगे ...उनके रहस्यात्मक व्यवहार के कारण ही नागों की महत्ता प्रारंभ हुई होगी ...

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    1. सादर धन्यवाद ! आ. श्याम जी. जानकारी साझा करने के लिए आभार.
      जहाँ तक साँपों के समूहन की बात है,मुझे इसमें सत्यता नज़र नहीं आती क्योंकि सांप को देखते ही मनुष्य सबसे पहले उसे भगाने या मारने को ही तत्पर होता है.
      बीन का धुन सांप नहीं सुन पाता बल्कि संपेरों के अंग संचालन से प्रभावित होता है.

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  13. उपयोगी जानकारी।
    पढ़कर अच्छा लगा।

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  14. रोचक और उपयोगी जानकारी......आभार आप का

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  15. तथ्यपूर्ण जानकारी देता लेख |बहुत अच्छा लगा |

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  16. कुछ नई जानकारी देने के लिए आभार

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  17. साँपों के बारे में रोचक और ज्ञानवर्धक जानकारी प्रस्तुति के लिए धन्यवाद

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  18. बहुत सुंदर सार्थक ज्ञानवर्धक जानकारी ..आभार .

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    1. सादर धन्यवाद ! नीरज जी. आभार.

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  19. सर्प से जुदा रहस्य हमारे ग्रंथों में ही प्रचुर मात्र में मिलता है ... बहुत तथ्यपूर्ण रोचक जानकारी ...

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  20. जानकारी और विज्ञान सम्मत तत्वों से भरपूर पोस्ट आपकी टिप्पणियों का शुक्रिया

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    1. सादर धन्यवाद ! आ. वीरेन्द्र जी. आभार.

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  21. साँपों से संबंधित बहुत अच्छी जानकारी भरा आलेख.
    जनवाणी - रविवाणी में इस पोस्ट के प्रकाशित होने पर बधाई !

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  22. आपको ये बताते हुए हार्दिक प्रसन्नता हो रही है कि आपका ब्लॉग ब्लॉग - चिठ्ठा - "सर्वश्रेष्ठ हिन्दी ब्लॉग्स और चिट्ठे" ( एलेक्सा रैंक के अनुसार / 31 मार्च, 2014 तक ) में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएँ,,, सादर .... आभार।।

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    1. सादर धन्यवाद ! मेरे ब्लॉग 'देहात' को शामिल कर सम्मान देने के लिए आभार.

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  23. सांप से भय आम है और इससे जुडी भ्रांतियों की भी कमी नहीं हैं...बहुत रोचक जानकारी...आभार

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  24. bahut sundar jankari deti rachna .....bean wali bat ke baare men maine ak bar kahin padha tha ki apni raksha ke liye bean ke hisaab se saanp ...movement karta hai ....thanks nd aabhar ...

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  25. नाग जाति का प्राचिन समय से ही भारत में निवास करती आई है। यूनान की डिटेल तो नहीं है, पर महाराजा परिक्षित की मौत का बदला लेने के लिए उनके पुत्र महाराज जनमजेय ने नागों को नष्ट करने वाले यज्ञ किया था, जिसमें कई नाग नष्ट हुए थे। ये कहानी सत्य के नजदीक इसलिए भी प्रतीत होती है, कि एक जगह है, जिसका नाम मुझे याद नहीं, वहां नाग अपनी आकर जान देते हैं। नागवंश का जिक्र कई ऐतिसाहिस दस्तावेजों में भी होता है। कलयुग के आरंभ के 2000 साल बाद मगध के हर्यक वंश के पितृहंता (बिम्बसार और अजातशुत्र का वंश) शासकों से त्रस्त होकर मगध की जनता ने विद्रोह कर उन्हें उखाड़ फेंका था, और काशी से नागवंशी शासक (जिनका नाम याद नहीं) को बुलाकर मगध की सत्ता पर बैठाया था।

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