Thursday, February 12, 2015

शंका के जीवाणु


हम सब अक्सर एक साथ कई शौक पालते रहते हैं.और समय-समय पर इन शौकों को पुष्पित-पल्लवित भी करते हैं.लेकिन शौक के कारण मुसीबत को गले लगाने का वाकया कम ही होता है.पहले मैं हस्तरेखा विज्ञान या पामिस्ट्री में विश्वास नहीं रखता था.लेकिन एक घटना ने मेरी राय बदल दी.

वह सत्र की शुरुआत के दिन थे.कई प्रकाशकों के विक्रय प्रतिनिधि नमूने की प्रति लेकर शिक्षकों के पास पहुँच रहे थे.इसी क्रम में एक दुबला-पतला,लहीम-शहीम सा एक विक्रय प्रतिनिधि मुझसे टकरा गया.उसने पुस्तक की प्रति देते हुए मुझे मेमो जांच लेने के लिए कहा.मैं मेज पर हाथ रखकर मेमो में लिखी इबारत को पढ़ रहा था तो उसने एक अजीब सा प्रश्न किया- ‘क्या आप हस्तरेखा विज्ञान में विश्वास रखते हैं?’ मैंने कहा- मुझे तो इन सब पर विश्वास नहीं है. उसने एक सुझाव देते हुए कहा- कल आप वाहन का प्रयोग न करें तो बेहतर.अभी जब आप मेज पर हाथ रख मेमो पढ़ रहे थे तो आपकी हथेली पर मेरी नजर गई,इसी वजह से मैं कह सकता हूँ कि कल अत्यधिक सावधानी बरतें.  

मुझे उसकी बातों पर न तो विश्वास हुआ और और न ही कोई सावधानी रखी.अन्य दिनों की तरह मोटर साइकिल से घर वापस आते हुए कब ध्यान भंग हुआ और प्रमुख चौराहे पर दो बकरी के बच्चे आपस में सींगें लड़ाते हुए अचानक से सड़क के बीच आ गए.जोर से ब्रेक लेने के बाद भी मामूली टक्कर हो ही गयी और सड़क पर गिर पड़ा.हेलमेट की वजह से कोई चोट तो नहीं लगी लेकिन दोनों घुटने छिल गए थे.घर में आराम करते वक्त मुझे अनायास ही उस व्यक्ति की याद हो आई जिसने एक दिन पहले इस दुर्घटना की और इशारा किया था.

यहीं से मुझे हस्तरेखा विज्ञान में रूचि जगी और कई वर्षों के अध्ययन के पश्चात मैं यदा-कदा अपने सहयोगियों और करीबी लोगों का हाथ देख कर सटीक जानकारी दे पाने में सक्षम हो गया था.विभिन्न पत्रिकाओं में इस संबंध में मेरे कुछ लेख भी छपे थे.शायद इसी वजह से इटली के खूबसूरत शहर मिलान में हस्तरेखा विज्ञान पर होने वाले एक अंतर्राष्ट्रीय सेमीनार में भाग लेने के लिए तीस सदस्यीय भारतीय प्रतिनिधिमंडल में मुझे भी शामिल कर लिया गया था.

मिलान में दो दिवसीय सेमिनार समाप्त हो चुका था और अगले दो दिन बाद हमें वापस भारत लौटना था.दो दिनों का हमारा व्यस्त कार्यक्रम था,शहर के महत्वपूर्ण स्थलों के भ्रमण का.पहले दिन भ्रमण के पश्चात सभी लौट चुके थे.मैं रात के खाने के बाद थोड़ी चहलकदमी करते हुए होटल के बाहर आ गया था.तभी सामने से आते हुए एक लम्बे कद के व्यक्ति ने मुझे रोका था,वह शायद मेरी और ही आ रहा था.आप शायद भारत से हैं और सेमिनार में शिरकत करने आए हैं.उसने मेरे बारे में काफी जानकारी जुटा रखी थी.क्या आप मेरे साथ चलकर एक व्यक्ति की हस्तरेखा पढ़ सकेंगे? मैं थोड़ा असमंजस में था.रात के दस बज रहे थे और पता नहीं कितनी देर लग जाय.उसने मेरी मनोदशा पढ़ ली थी,कहा,शीघ्र ही आप वापस लौट जाएंगे.

एक पुराने से मोटर कार से हम गंतव्य की ओर चले.मिलान शहर के चर्च को पार करने के कुछ देर के बाद ही कार एक कच्ची सड़क पर हिचकोले ले रही थी.मैंने घड़ी में देखा-दस बजकर पैंतीस मिनट हो चुके थे.तभी कार एक पुराने से दरवाजे पर रुकी.उसके साथ सीढ़ियों चढ़ते एक अंधेरे कमरे में पहुंच गया था.उसने एक कुर्सी की और बैठने का इशारा करते हुए लाईट जला दी.कमरे में चारों ओर निगाह दौड़ाई तो चीख निकलते-निकलते रह गई.पलंग के सामने एक युवती की लाश पड़ी थी.शक्लोसूरत से कोई भारतीय ही लग रही थी.

मारे भय के संज्ञाशून्य हो चला था.तभी उस व्यक्ति से सर्द स्वर में कहा,मैं चाहता हूँ कि आप इन हाथों की रेखाएं पढ़ें.मैंने कई साथियों,परिचितों के हाथ की रेखाएं पढ़ी थीं,लेकिन इतनी भयानक स्थिति में कभी नहीं.मैं अपने आपको असहाय महसूस कर रहा था.मुझे क्या अधिकार था कि उस युवती के हाथ की रेखाओं को पढूं जिसके होठ हमेशा के लिए चुप हो चुके हैं. अतीत की बातों को परतों के नीचे दबे रहना ही ठीक होता है.

मैं इस निश्चय पर पहुंचा ही था कि किसी ठंढे निःश्वास ने मुझे स्पर्श किया.यह कोरी कल्पना थी या वास्तविकता,कह नहीं सकता.मगर मैंने सोचा और महसूस भी किया कि कोई चीज मेरे कानों में फुसफुसा रही है,संकोच न करो.हाथ की रेखाएं पढ़ो और जो सच है,वह बता दो.

सी क्षण में अपनी सारी संकल्पनाशक्ति गंवा बैठा.मानो मैं किसी अदृश्य शक्ति के नियंत्रण में था.मैंने अपने को पलंग की और खींचता महसूस किया और सिहरकर देखा कि मैंने झुककर उन मृत हाथों को बड़ी मृदुता से अपने हाथों में ले लिया है.

मुझे ज्यादा रौशनी मिल सके इसलिए उस व्यक्ति ने एक और लैंप जलाया,चूंकि कमरे में कोई मेज नहीं थी इसलिए उसने पलंग के पायताने रखे ताबूत को खींच लिया और जब उसने लैंप को उस पर रखा तो मैंने ताबूत पर लिखी इबारत पढ़ी : जूलिया विंगेट,उम्र 25 वर्ष.

उम्र : 25 वर्ष, फिर भी उसकी हस्तरेखाएं परेशानी और चिंता की सूचना दे रही थी.मगर विवाह रेखाएं इसका प्रतिकार करते हुए कह रही थीं कि उसे अपने पति से बेहद प्यार था.जैसे-जैसे में उसके हाथ को पढ़ता गया,उस व्यक्ति के मुखड़े पर अंकित वेदना और भी तीव्र और गहरी होती गयी.उस औरत के जीवन का कोई राज था,जिसे उसने चुपचाप संजो रखा था.यह स्नेह किसी ऐसे व्यक्ति के प्रति था,जिसे वह पैसों से सहायता और सहारा देती आयी थी.मुझे विश्वास है कि वह उसका कोई रिश्तेदार था.

वह व्यक्ति इस तरह कराहा जैसे उसके सीने में चाकू घोंप दिया गया हो और वह कुर्सी में बेहोश होकर ढह गया.मृत हथेलियों को छोड़कर मैं उसकी ओर लपका.तबतक वह होश में आ गया था.वह याद करने की कोशिश कर रहा था कि मैं यहाँ क्यों था.जब उसे याद आया तो मेरी बांह पकड़ते हुए कमरे के बाहर ले गया और कहा,श्रीमान, अब आप जाइए,किसी रोज मैं आपको सभी बातें अच्छी तरह समझा सकूंगा.

किसी तरह वहां से निकलकर मुख्य सड़क पर आया और टैक्सी लेकर अपने होटल पहुंचा.इस क्रम में दो घंटे व्यतीत हो चुके थे.मेरे रूम मेट काफी घबराए हुए थे कि मैं अचानक कहाँ गायब हो गया था.अजीब सी स्थिति थी कि किसी को कुछ बता भी नहीं सकता था.

एक साल गुजर गए थे. उस वाकये के बाद मैंने लोगों के हाथ की रेखाएं पढ़नी बंद कर दी थी.जब भी किसी व्यक्ति का हाथ देखता,वही मृत हाथ सामने आ जाती और मेरे शरीर में एक सिहरन सी दौड़ जाती थी.मैंने यह राज अपने सीने में दफ़न कर रखा था.

एक प्रकाशक के आमंत्रण पर मैं दिल्ली गया था.नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के पास ही पहाड़गंज के एक होटल में ठहरा था.होटल से निकलकर प्रकाशक से मिलने जाने ही वाला था कि एक व्यक्ति ने मुझे रोकते हुए कहा,सर एक व्यक्ति आपसे मिलना चाहते हैं,पास ही एक होटल में रुके हैं.उस व्यक्ति के साथ होटल के कमरे में पहुंचा तो एक व्यक्ति को प्रतीक्षारत पाया,जो हड्डियों का ढांचा मात्र लग रहा था.उसने उठकर हाथ मिलाने की कोशिश की,पर मैं उसे पहचान नहीं पाया.जब उसने यहां बुलाने के लिए माफ़ी मांगी तो आवाज कुछ पहचानी सी लगी.फिर वह सब याद आ गया जब मिलान में एक मृत युवती के हाथ की रेखाएं देखने गया था.

मैंने आपके घर फोन कर आपके बारे में पता किया था कि आप यहां पर हैं.मेरे पास बैठ जाइए,मेरी आवाज में दम नहीं है.फिर खांसी का दौरा रुकते ही उसने कहा,क्या पिछले साल की मिलान की एक रात की याद है आपको,जब आपने मेरी खातिर हस्तरेखाएं पढ़ीं थीं?

मेरे सर हिलाते ही उसने अपनी बात कहनी शुरू की.वह युवती मेरी पत्नी थी.भारत में ही पुरी के जगन्नाथ मंदिर में उससे मिला था.वह टूरिस्ट गाइड का काम करती थी और मैं भारत भ्रमण के आया था.यहीं उससे मित्रता हो गयी थी. मुझे अक्सर लगता था कि उसके जीवन में कोई है,जिसे वह मुझे छिपाकर  रखना चाहती थी.मैंने इस बारे में संकेत किया तो उसने कहा,यदि आप चाहते हैं कि हमारी मित्रता बनी रहे तो इस बारे में कुछ न पूछें.

छह महीने बाद ही उससे विवाह कर उसे मिलान ले गया था.परिवार में उसके अलावा कोई नहीं था.तीन वर्ष हमने मिलान में सुखपूर्वक गुजारे.न उसने कभी मुझे मेरे अतीत के बारे में पूछा,और न मैंने उसके अतीत के बारे में जानने की कोशिश की.

एक रोज भारत से उसके नाम से एक पत्र आया.मैं वह पत्र उसके पास ले गया और पूछा,क्या तुम्हारे भारत में और भी दोस्त हैं,तुमने तो कभी नहीं बताया.वह चौंकी और उसकी आँखों में आंसू छलछला आये.वह अपने कमरे में चली गयी.अगर मैं उसके पीछे-पीछे गया होता और उसका विश्वास जीतने की कोशिश की होती,तो सबकुछ ठीक हो जाता.मगर लगता है उसी एक क्षण में मेरा अहं जग गया था और ईर्ष्या मेरे दिल पर हावी हो गयी थी.

कई दिनों तक मैं अपनी पत्नी से दूर रहा और अपनी ईर्ष्या को सहलाता रहा.अंत में मैंने एक योजना बनाई और प्रतिशोध की बात सोची.मैंने सोचा उससे सच कबूल करवाकर ही रहूंगा.मैंने उस पर नजर रखना शुरू कर दिया और उसकी हर हरकत पर मेरी निगाह रहती.मैंने डाकिये को मिलाकर उसकी डाक पढ़नी शुरू कर दी.रात को चुपचाप उठकर मैं उसके कमरे में चला जाता और उसपर नजर रखता.

एक रात दबे पांव उसके कमरे में पहुंचा तो उसे एक चिट्ठी लिखते हुए पाया.मैं चुपचाप उसके पीछे खड़े रहकर उसकी चिट्ठी को पढ़ने की कोशिश की,मेरे प्रिय,तुम जानते हो कि मैं तुमसे कितना प्यार करती हूं और तुमसे दूर रहकर भी तुम्हारे भविष्य की चिंता मुझे सताती रहती है.मुझे उस दिन की प्रतीक्षा है जब हम तुम फिर मिलेंगे.मैं कुछ पैसे भेज रही हूँ,इसका सदुपयोग करना.’

इसके आगे मैं पढ़ नहीं पाया.मेरी आँखों के आगे अँधेरा छा गया था.मैं ईर्ष्या से पागल हो रहा था.उसी क्षण मैंने फैसला कर लिया कि अपनी जिंदगी का अंत कर लूंगा और उसे स्वतंत्र कर दूंगा ताकि वह भारत जाकर उस आदमी से शादी कर ले,जिसे उससे प्यार है.

मैंने अपनी वसीयत लिखी और सबकुछ उसके नाम कर दिया,मैं नहीं चाहता था कि मेरे मरने के बाद उसे कोई तकलीफ हो.मेरे लिखने के दौरान ही जूलिया के आने की पदचाप सुनायी दी.मैंने झट से तकिये के नीचे वसीयत को छुपाया,जब उसने कमरे में आकर कहा,मेरे सर में बहुत दर्द हो रहा है,जरा दवाई की शीशी देना.मैंने दवा की आलमारी से एक छोटी शीशी उठाकर उसे दी और मुंह फेर लिया.आहिस्ते से वह दरवाजे की और बढ़ी और हमारी नजरें मिली.गुडनाईट कहते हुए वह अपने कमरे की और बढ़ी और कुछ परेशान और विचलित होकर मैंने आखिरी चिट्ठी लिखनी शुरू की.

कई बार लिखा और फाड़ डाला क्योंकि जो लिखा वह जंचता ही नहीं था,सुबह होने को था और मेरा पत्र पूरा नहीं हुआ था.फिर मैंने सोचा,ज्यादा लिखना क्या,चंद लाइनें ही काफी हैं.फिर मैंने लिखा-अलविदा ! जूलिया.मुझे सब पता लग गया है.अब तुम स्वतंत्र हो.सुखी रहो- जॉन विंगेट.

मैंने पत्र लिफाफे में रखा और चुपचाप उसके कमरे में पहुंचकर देखा कि रौशनी की रेखाएं उसके तकिये पर पसर रही थीं.अपने आंसू पोछकर मैं आखिरी चुंबन के लिए झुका.उसके होंठ बर्फ की तरह ठंढे थे.’हे भगवान ! माजरा क्या है?मैंने उसे जल्दी से उठाकर गले लगाया.अंत में एक ठंडी अंगुली ने मेरे दिमाग में यह ख्याल पैदा किया कि वह मर चुकी थी.इतना कहकर वह शख्स निढाल पड़ गया.थोड़ी देर आराम करने के बाद वह पुनः बोला,’आप आसानी से समझ सकते हैं कि क्या हुआ होगा?उस रात उत्तेजित अवस्था में मुझे यह कतई ध्यान नहीं रहा कि मैंने उसे दर्द की दवाई वाली शीशी की जगह जहर वाली शीशी थमा दी थी जो मैंने अपने खात्मे के लिए रखा था.

आपने उस रात बताया था कि कोई शख्स था जिसे वह प्यार करती थी.वह उसका रिश्तेदार था,उस पर बोझ था और उसी ने उसका जीवन बर्बाद किया था.आपकी बात सच निकली.वह व्यक्ति जिसे उसने पैसे भेजे थे,उसका सगा भाई था और बेरोजगार था.मैं अबतक केवल इसलिए जीवित रहा कि उस व्यक्ति के बारे में अपनी पत्नी की इच्छापूर्ति कर सकूं.मैं एक महीने पहले भारत आया और पुरी होते हुए यहां पहुंचा.मैंने सारी धन-संपत्ति उसके नाम कर दिया है.अब वापस अपने वतन लौटने की सोच रहा हूँ ताकि शांति से मर सकूं.सिर्फ आपसे मिलने की आस बाकी थी,वह भी पूरी हो गई.इतना कहकर वह बिस्तर पर गिर पड़ा.

मैंने सांत्वना भरे हाथ उसके माथे पर रखा और अपने कार्य के लिए निकल पड़ा.दो दिन बाद ही उसके होटल के एक स्टाफ ने मुझे खबर दी कि विंगेट इस दुनियां में नहीं रहा.जब उसका शव कब्रिस्तान रवाना हुआ तो उसकी शवयात्रा में शामिल होने वाला एक मात्र व्यक्ति मैं ही था.

एक छोटी सी गलतफहमी या मन में पल रहे शंका के जीवाणु से घर-परिवार के बिखराव की अनेकों कहानियां पढ़ी थीं,और कई हिंदी फिल्मों में भी देखा था,लेकिन प्रत्यक्ष रूप से शंका और संदेह के कारण विंगेट दंपत्ति को अपनी आँखों के सामने मौत के आगोश में सोते हुए पाया.

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18 comments:

  1. बहुत सुंदर । कहानी है या आपबीती है अंतर नहीं कर पाया ।

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  2. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (13.02.2015) को "भावना और कर्तव्य " (चर्चा अंक-1888)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।

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  3. शंका का समाधान नहीं है. सशक्त लेखन.

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  4. oh ....shak insan ki sochne ki kshmta khatm kar deta hai ....bahut sundar aur rochak prstuti ...

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  5. बहुत बढियाँ आलेख

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  6. बहुत ही अच्‍छा लेख। लेखन तारीफ के काबिल है।

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  7. ऐसा होता है दुनिया में !

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  8. साकार प्रस्तुति...

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  9. क्या यह सचमुच में सत्य पर आधारित थी . पढ़ कर दिल जोरो से धड़कने लगा .. आपने पता नहीं कैसे लाश की हस्त रेखाए देखी... बहुत ही रोंगटे खड़े कर देने वाली कहानी थी... अगर यह सत्य पर आधारित है तो सचमुच आपको बधाई देनी पड़ेगी , की आप अनजान शख्स के साथ बिना जाने अनजान जगह पर हस्त रेखा देखने के लिए चले गये और वहा जाकर आपको लाश की रेखाए देखने के लिए कहा गया. उस व्यक्ति ने अपनी पत्नी का मर्डर कर दिया था, वह आपको फसा भी सकता था. . . .
    मेरे ब्लॉग पर आप सभी लोगो का हार्दिक स्वागत है.

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  10. ant tk bandhe rakhnewali sundar aalekh...

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  11. जानकारी भरी सुंदर प्रस्तुति।

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  12. मैंने इस पोस्ट का एक एक शब्द पढ़ा राजीव जी ! ये आप बीती है या कोई कहानी है लेकिन बहुत दिलचस्प है ! हर पल एक नया खुलासा ! ये बिलकुल सही कहा आपने कि शंका बहुत बड़ा दुश्मन है आदमी का ! आपका एक और नया कौशल सामने आया है ! आपकी पोस्ट सदैव आकर्षित करती हैं !

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  13. उत्कृष्ट लेखन का उदहारण.
    मज़ा अ गया..

    http://themissedbeat.blogspot.in/?m=1

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  14. सच है शंका बहुत ही बुरी है और इसका निदान भी खुद ही करना होता है ...

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