Monday, July 7, 2014

अपेक्षाओं के बोझ तले सिसकता बचपन


पिछले कई सालों की भांति इस साल भी ग्रीष्मावकाश में मुंबई में था.छोटी बहन वहां के एक प्रतिष्ठित स्कूल में गणित की शिक्षिका है.एक महीने के लम्बे ग्रीष्मावकाश में उसे घर आने और सबों से मिलने-जुलने का अवसर मिल जाता है.वापसी में अक्सर मैं ही उसे पहुँचाने मुंबई जाता हूँ.इस बहाने कुछ घूमना फिरना भी हो जाता है.इस बार दस वर्षीय भांजे ने बताया कि एक प्रतिष्ठित चैनल पर चल रहे जूनियर डांस रियल्टी शो के अंतिम चार में पहुँचने वाली लड़की इसी अपार्टमेंट के पहले तल्ले पर रहती है और उसी के शो जीतने की संभावना है.

बात आयी गयी हो गयी.एक शाम अपार्टमेंट से नीचे उतर कर मुख्य सड़क पर जाने के बारे में सोच ही रहा था कि बिल्डिंग के अहाते में काफी शोरगुल सुनाई दिया.अच्छी खासी भीड़ जमा हो चुकी थी.पूछने पर पता चला एक बच्ची बेहोशी की अवस्था में थी.लगभग एक घंटे बाद वापस लौटने पर छोटी बहन ने बताया कि जूनियर रियल्टी शो वाली बच्ची शो से बाहर हो जाने पर सदमें में थी और कई बार बेहोश हो चुकी थी.

इस घटना से कुछ वर्ष पहले की एक घटना की याद ताजा हो गई.कोलकाता में बच्चों के इसी तरह के एक शो से एक बच्ची के बाहर होने पर,सदमे के कारण उसकी आवाज चली गई थी,जिसे चिकित्सकों के अथक प्रयास के बाद वापस लाया जा सका.ऐसे शो न केवल बच्चों बल्कि उनके माता-पिता एवं अभिभावकों के लिए भी प्रतिष्ठा का प्रश्न बन जाते हैं.बच्चों के मन में यह बात बैठा दी जाती है कि केवल उसे ही जीतना है,और इससे कम कुछ नहीं.नतीजतन, सफल नहीं होने पर ऐसे बच्चे कुंठा के शिकार हो जाते हैं और उन्हें लगता है कि उनकी दुनियां ही समाप्त हो गई है.जबकि इस तरह की कोई भी प्रतियोगिता बच्चों की समुचित प्रतिभा का आकलन करने के लिए पर्याप्त नहीं है.

बच्चों के माता-पिता को ऐसे शो में गर्व के साथ कहते दिखाया जाता है कि हालांकि वे इस विधा में आगे नहीं बढ़ सके लेकिन चाहते हैं उनके बच्चे इस क्षेत्र में आगे बढ़ें.ऐसी महत्वाकांक्षा बुरी नहीं,लेकिन स्वस्थ प्रतियोगिता और असफलता को सामान्य रूप से लेना भी यदि माता-पिता सिखा सकें तो कोई कारण नहीं कि इस तरह की घटना की पुनरावृत्ति हो.

सामान्यतया बच्चे ऐसा कहते पाए जाते हैं कि उनके माता-पिता चाहते हैं कि वह इंजीनियर,डॉक्टर बने,क्योंकि उनके माता या पिता भी इंजीनियर या डॉक्टर हैं,भले ही बच्चों की अभिरुचि का क्षेत्र अलग हो.

सभी बच्चों में एक ही तरह की प्रतिभा एवं रूचि नहीं पायी जाती.जुड़वां बच्चों तक में अलग-अलग तरह की प्रतिभा और रुचियों का पाया जाना सामान्य बात है.ऐसे में यदि बच्चों की रूचि के अनुसार कैरियर का विकल्प मिले तो इससे अच्छी बात कोई नहीं.माता-पिता और अभिभावकों की जिम्मेवारी और भी अधिक है कि बच्चे की अभिरुचि के अनुसार ही शैक्षणिक गतिविधियों को प्रोत्साहन दिया जाय.

27 comments:

  1. बढिया सुंदर आलेख , राजीव भाई धन्यवाद !
    ॥ जय श्री हरि: ॥

    ReplyDelete
    Replies
    1. सादर धन्यवाद ! आशीष भाई. आभार.

      Delete
  2. विचारणीय । देखा देखी कहाँ ले जायेगी पता नहीं ?

    ReplyDelete
  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (08-07-2014) को "अच्छे दिन हैं दूर, कीजिये काँय काँय-काँ ; चर्चा मंच 1668 पर भी होगी।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    ReplyDelete
  4. सच, उम्मीदें बोझ न बनें ...... विचारणीय हर अभिभावक के लिए

    ReplyDelete
  5. कई बिन्दुओं को छुआ है आपने इस पोस्ट में अतिशय महत्वकांशा मारक सिद्ध होती है। बचपन को बचपन ही रहने दो उसमें महत्वकांक्षा न घुसाई जाए तो बेहतर। सहज पल्लवन ही स्थाई पल्लवन है न की अति उत्साही मायावी पल्लवन।

    ReplyDelete
  6. बच्चे की अभिरुचि के अनुसार ही शैक्षणिक गतिविधियों को प्रोत्साहन दिया जाय..... बिलकुल सही बात ..

    बहुत बढ़िया प्रेरक प्रस्तुति

    ReplyDelete
  7. ये सच है की बच्चे की रूचि अनुसार उसका मार्ग तय हो पर कई बार बचे भी नहीं समझ पाते की उनकी रूचि किस में है ... हाँ आपकी बात से सहमत हूँ की अत्यधिक अपेक्षाएं नहीं रखनी चाहियें और न ही बच्चों पर बोझ डालना चाहिए किसी भी बात का ...

    ReplyDelete
  8. अपनी महत्वाकांक्षाओं का बोझ जब अभिवावक बच्चों पर लाद देते हैं तो यही हश्र होता है , आज हमने अपने बच्चों का बचपन छीन लिया है, पर यह बहुत ही विचारणीय है

    ReplyDelete
  9. बच्चों पर अपनी उम्मीदों का बोझ न डालें...बहुत सारगर्भित आलेख...

    ReplyDelete
  10. हम बच्चों के अभिरुचि के विरुद्ध अपनी महत्वाकांक्षाओं के अनुसार बच्चों पर दबाव बनांते हैं तो इसका प्रतिकूल प्रभाव भी देखने को मिलता ही है। बहुत ही विचारणीय आलेख।

    ReplyDelete
    Replies
    1. सादर धन्यवाद ! राजेंद्र जी. आभार.

      Delete
  11. बचपन का एहसास छीन रहे हैं रियलिटी शोज़

    ReplyDelete
    Replies
    1. जी,बिल्कुल सही कहा, आ. वीरेन्द्र जी.
      आभार.

      Delete
  12. ब्लॉग बुलेटिन की आज गुरुवार १० जुलाई २०१४ की बुलेटिन -- राम-रहीम के आगे जहाँ और भी हैं – ब्लॉग बुलेटिन -- में आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार!

    ReplyDelete
  13. बच्चे की अभिरुचि के अनुसार ही शैक्षणिक गतिविधियों को प्रोत्साहन दिया जाय..... बिलकुल सही बात ..बहुत बढ़िया प्रेरक प्रस्तुति

    ReplyDelete